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महासमुंद उप संचालक कृषि विभाग में पदस्थ डिप्टी डायरेक्टर एफ.आर. कश्यप की मनमानी बेनकाब..!

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ट्रांसफर ऑर्डर को ठेंगा दिखाकर चहेते जितेंद्र पटेल को फिर ऑफिस बिठाया, अनुदान घोटाले की साठगांठ फिर शुरू – कृषि मंत्री और कलेक्टर अब भी खामोश..?

शासकीय आदेशों की अवहेलना अब मौखिक आदेश के दमपर अधिकारियों का दबदबा

रिपोर्टर मयंक गुप्ता
महासमुंद 29 दिसंबर 2025 छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में कृषि विभाग एक बार फिर सुर्खियों में है, लेकिन इस बार कारण है खुली तानाशाही और सरकारी नियमों की बेखौफ अवहेलना। उप संचालक कृषि फागुराम कश्यप (एफआर कश्यप) पर गंभीर आरोप लगे हैं कि वे खुद को ‘जिले का राजा’ समझकर चल रहे हैं और लिखित ट्रांसफर आदेश को पूरी तरह नजरअंदाज कर अपने चहेते कर्मचारी जितेंद्र पटेल को मौखिक निर्देश देकर रोजाना कार्यालय में बुला रहे हैं। विभागीय सूत्रों का कहना है कि पटेल अब भी महासमुंद मुख्यालय में आते हैं, अनुदान योजनाओं की महत्वपूर्ण फाइलें हैंडल करते हैं और शाम को चले जाते हैं – जैसे उनका ट्रांसफर हुआ ही न हो!
यह मामला सिर्फ एक कर्मचारी का ट्रांसफर नहीं, बल्कि विभाग में व्याप्त कथित भ्रष्टाचार और साठगांठ की गहरी जड़ों को उजागर कर रहा है। कर्मचारियों और किसानों में भारी आक्रोश है, क्योंकि अनुदान वितरण में फिर से देरी, कटौती और कमीशनबाजी की शिकायतें सामने आ रही हैं।

ट्रांसफर आदेश कागज पर, हकीकत में मौखिक ‘हुकुम..’!

पृष्ठभूमि याद करें तो अक्टूबर 2025 में छत्तीसगढ़ कृषि स्नातक शासकीय कृषि अधिकारी संघ ने जितेंद्र पटेल के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया था। आरोप थे – मैदानी कर्मचारियों के साथ अभद्र व्यवहार, मानसिक प्रताड़ना और लंबे समय से मुख्यालय में ‘आरामदायक अटैचमेंट’। पटेल पिछले 13 वर्षों से महासमुंद कार्यालय में अटैच थे, जबकि उनका मूल पदस्थापन पिथौरा था।
संघ की अनिश्चितकालीन हड़ताल और दबाव के बाद विभाग ने 2016 के पुराने निर्देशों का हवाला देकर पटेल का ट्रांसफर आदेश जारी किया। संघ ने इसे अपनी बड़ी जीत बताया और कर्मचारियों ने राहत की सांस ली। लेकिन अब सूत्रों का दावा है कि उप संचालक कश्यप ने सब कुछ पलट दिया। मौखिक रूप से पटेल को बुलावा भेजा जा रहा है और वे नियमित रूप से ऑफिस आकर काम निपटा रहे हैं।
एक अनाम विभागीय सूत्र ने कहा, “लिखित आदेश तो कूड़ेदान में डाल दिया गया। कश्यप साहब की मौखिक ‘राज’ चल रही है। अनुदान फाइलें फिर वही पुराने हाथों में हैं, जहां कमीशन का खेल पहले भी चलता था। किसानों का नुकसान हो रहा है, लेकिन कोई सुनवाई नहीं।”

पुराने आरोपों की काली छाया: गरियाबंद से महासमुंद तक फर्जीवाड़े का सिलसिला..?

फागुराम कश्यप पहले गरियाबंद जिले में पदस्थ थे, जहां मैनपुर ब्लॉक में मिनी राइस मिल किट वितरण योजना में फर्जी बिल लगाकर सरकारी पैसा आहरण करने के गंभीर आरोप लगे थे। सूत्र बताते हैं कि इसी मामले में उन्हें निलंबित किया गया था, जिसके बाद ट्रांसफर महासमुंद में हुआ। अब यहां भी उनकी कार्यशैली पर सवाल उठ रहे हैं। कर्मचारियों का कहना है कि कश्यप और पटेल की यह ‘भ्रष्ट जोड़ी’ अनुदान योजनाओं में पुरानी साठगांठ फिर से सक्रिय कर रही है, जिससे किसानों को सीधा नुकसान पहुंच रहा है।
किसानों की शिकायतें बढ़ी हैं – अनुदान में अनावश्यक देरी, बिना वजह कटौती और फाइलें अटकाना। एक प्रभावित किसान ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “पहले हड़ताल से कुछ राहत मिली थी, लेकिन अब फिर वही हालात। फाइलें घूम-घूमकर वही पुराने लोगों के पास पहुंच रही हैं। हमारा हक मारकर कमीशनबाजी हो रही है।”

कर्मचारी फिर आक्रोशित: नई हड़ताल की तैयारी..?

संघ के पदाधिकारियों में भारी निराशा है। एक पदाधिकारी ने कहा, “हमने इतना संघर्ष किया, ट्रांसफर हुआ, लेकिन मौखिक बुलावे से सब व्यर्थ हो गया। यह विभाग की गरिमा और सरकारी नियमों का खुला मजाक है। अगर जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो फिर अनिश्चितकालीन हड़ताल होगी। कर्मचारी एकजुट हैं और इस मनमानी को बर्दाश्त नहीं करेंगे।”

अपील: कृषि मंत्री और कलेक्टर से त्वरित एक्शन की गुहार..!

यह मामला अब बेहद गंभीर हो चुका है। सरकारी आदेश की खुली अवमानना, मौखिक मनमानी और कथित भ्रष्टाचार पर उच्च स्तरीय जांच जरूरी है। विभागीय सूत्रों का मानना है कि अगर जांच हुई तो कई बड़े खुलासे होंगे।
कृषि मंत्री और महासमुंद जिला कलेक्टर से अपील है कि तत्काल संज्ञान लें और निम्न कदम उठाएं:
जितेंद्र पटेल के मौखिक बुलावे और ऑफिस आने-जाने पर तुरंत रोक लगाएं।
फागुराम कश्यप की कार्यशैली पर स्वतंत्र उच्च स्तरीय जांच कराएं।
सभी अनुदान योजनाओं का फौरन ऑडिट करवाएं और पारदर्शिता सुनिश्चित करें।
नियमों की अवहेलना करने वालों पर सख्त विभागीय कार्रवाई करें।
अगर जल्द एक्शन नहीं हुआ तो विभाग में फिर हड़ताल भड़केगी और किसानों का आक्रोश सड़कों पर उतरेगा। ‘राजा’ की यह तानाशाही कब तक चलेगी? महासमुंद के कर्मचारी और किसान अब इंसाफ की राह देख रहे हैं।
एफआर कश्यप और जितेंद्र पटेल से बार-बार संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। मामला संवेदनशील है और आगे की अपडेट के लिए नजर रखी जा रही है।

समर्थन मूल्य धान खरीदी में अभी एफ आर कश्यप जिला नोडल अधिकारी बने है।

सूत्र बताते है कि, जबसे इनको जिले का नोडल नियुक्त किया गया है ये धान खरीदी समितियों में प्रभारियों को खुले आम डिमांड करते है। नहीं करने पर हर गतिविधियों में पैनी नजर गड़ाए बैठे रहते है। जहां इनका जेब गरम हुआ बिना कुछ बोले चुपचाप निकल जाते है।

महासमुंद की ‘अमर’ कुर्सी: भ्रष्टाचार की जड़ें और अधिकारी की ‘अटल’ मुस्कान का रहस्य…!

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रिपोर्ट मयंक गुप्ता
महासमुंद / जिले की गर्म धूप में सड़कों पर धूल उड़ती है, खेतों से चावल की खुशबू आती है, लेकिन इन दिनों यहां की हवा में कुछ और ही महक फैली है – भ्रष्टाचार की। जिला खाद्य अधिकारी अजय कुमार यादव की कुर्सी पिछले पांच साल से ज्यादा समय से एक ही जगह पर टिकी हुई है, मानो वह कोई प्राचीन स्मारक हो। जबकि जिले के अन्य बड़े पदों पर अधिकारी आते-जाते रहते हैं – कलेक्टर हो या एसपी, हर दो-तीन साल में चेहरे बदल जाते हैं। लेकिन यादव साहब की कुर्सी? वह तो ‘अमर’ लगती है। स्थानीय लोग मजाक में कहते हैं, “यह कुर्सी नहीं, कोई जादुई सिंहासन है!” लेकिन हकीकत में सवाल उठ रहे हैं: क्या यह मजबूती राजनीतिक ‘व्यवस्था’ की देन है, या फिर कुछ और गहरा राज..?

चावल मिलों का ‘अदृश्य’ जाल जहां से निकलती है सत्ता की जड़ें

महासमुंद छत्तीसगढ़ का एक प्रमुख कृषि जिला है, जहां सैकड़ों राइस मिलें धान को चावल में बदलने का काम करती हैं। ये मिलें न सिर्फ स्थानीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, बल्कि सरकारी सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) का भी महत्वपूर्ण हिस्सा। यहां धान की खरीद, स्टॉक का सत्यापन, लाइसेंस का नवीनीकरण – सब कुछ जिला खाद्य अधिकारी के हाथों से गुजरता है। सूत्रों के मुताबिक, कुछ मिल मालिकों को ‘विशेष’ छूट मिलती है: निरीक्षण में ढील, समय सीमा में बढ़ोतरी, या फिर स्टॉक में गड़बड़ी पर आंख मूंद लेना। बदले में? अफवाहें कहती हैं कि ‘उपहार’ का सिलसिला चलता है – नकदी, सुविधाएं या राजनीतिक समर्थन।
एक स्थानीय व्यापारी, नाम न बताने की शर्त पर, हमें बताते हैं, “मिलों को चलाने के लिए अधिकारी की ‘मंजूरी’ जरूरी है। कुछ मिलें तो सालों से बिना सख्त जांच के चल रही हैं। अगर कोई शिकायत करे, तो फाइलें गुम हो जाती हैं।” क्या यह सिर्फ संयोग है कि यादव साहब की कुर्सी इतनी स्थिर है? या फिर मिल मालिकों और अधिकारियों के बीच का यह ‘रिश्ता’ ही कुर्सी की नींव मजबूत कर रहा है? जिले के बाजारों में चाय की थड़ियों पर यही चर्चा है, लेकिन सबके मुंह पर ताला लगा है – डर है सत्ता की पहुंच का।

बिलासपुर का ‘स्वर्ण महल’: सैलरी से परे की लग्जरी

एक सरकारी अधिकारी की मासिक कमाई कितनी होती है? ज्यादा से ज्यादा कुछ लाख रुपए सालाना, लेकिन क्या इतने से करोड़ों का बंगला बन सकता है? बिलासपुर में यादव साहब का निर्माणाधीन घर चर्चा का केंद्र बना हुआ है। चमकदार संगमरमर की फर्श, विशाल गेट, पार्किंग में लग्जरी गाड़ियों के लिए जगह – यह सब देखकर स्थानीय लोग हैरान हैं। एक अनुमान के मुताबिक, इस संपत्ति की कीमत कम से कम दो करोड़ रुपए से ऊपर है।
एक विपक्षी नेता, जो कांग्रेस से जुड़े हैं, ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “अगर उनकी पूरी सेवा अवधि की सैलरी जोड़ लें, तो भी यह घर और कारें नहीं आ सकतीं। यह साफ तौर पर आय से अधिक संपत्ति का मामला है। जांच होनी चाहिए – विजिलेंस या एसीबी से।” क्या यह संपत्ति वैध स्रोतों से आई है? यादव साहब की ओर से अब तक कोई स्पष्टीकरण नहीं आया है, लेकिन उनकी मुस्कुराहट बरकरार है। लोग पूछते हैं: क्या यह मुस्कान आत्मविश्वास की है, या फिर ‘सुरक्षा’ की..?

मंत्री की ‘रहस्यमयी’ चुप्पी राजनीतिक तूफान की आहट

खाद्य मंत्री दयालदास बघेल इस पूरे विवाद पर मौन साधे हुए हैं। कोई आधिकारिक बयान नहीं, कोई जांच का आदेश नहीं। यह चुप्पी कांग्रेस के स्थानीय कार्यकर्ताओं में गुस्सा पैदा कर रही है। वे आरोप लगाते हैं कि यादव साहब की कुर्सी ‘राजनीतिक संरक्षण’ से मजबूत है। एक कार्यकर्ता ने कहा, “अगर मंत्री जी चुप हैं, तो क्या कोई ‘मासिक समझौता’ चल रहा है? या फिर अधिकारी इतने प्रभावशाली हैं कि उनका तबादला नामुमकिन है?”
कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने चेतावनी दी है: अगर जल्द तबादला नहीं हुआ, तो वे सड़कों पर उतरेंगे। धरना, प्रदर्शन और शिकायत अभियान की योजना बन रही है। सोशल मीडिया पर #AtalKursi हैशटैग ट्रेंड कर रहा है, जहां लोग मीम्स शेयर कर रहे हैं – एक में यादव साहब की कुर्सी को ‘सुपरग्लू’ से चिपकाया दिखाया गया है। व्हाट्सएप ग्रुप्स में मैसेज वायरल हो रहे हैं, और जिले की राजनीति में उबाल आ रहा है। क्या यह छोटा-सा मामला बड़ा राजनीतिक नाटक बन जाएगा..?

भ्रष्टाचार का कानूनी चेहरा आय से अधिक संपत्ति का जाल

भारत में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 13(1)(e) के तहत आय से अधिक संपत्ति रखना गंभीर अपराध है। अगर कोई सरकारी अधिकारी अपनी ज्ञात आय से ज्यादा धन या संपत्ति जमा करता है और उसकी व्याख्या नहीं कर पाता, तो वह दोषी ठहराया जा सकता है। अभियोजन को सिर्फ असमानता साबित करनी होती है; बाकी बोझ आरोपी पर। सजा? सात साल तक की जेल और जुर्माना।
ऐसे मामलों की जांच सीबीआई, राज्य विजिलेंस या एंटी-करप्शन ब्यूरो जैसी एजेंसियां करती हैं। महासमुंद के इस मामले में अगर जांच शुरू हो, तो कई रहस्य खुल सकते हैं – मिलों से जुड़े लेन-देन, संपत्ति के स्रोत और राजनीतिक कनेक्शन। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे केस अक्सर राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करते हैं। क्या छत्तीसगढ़ सरकार कदम उठाएगी..?

आने वाला समय जनता की आवाज या सत्ता का सन्नाटा..?

महासमुंद की सड़कें अभी शांत हैं, लेकिन हवा में तनाव महसूस हो रहा है। अगर यादव साहब की कुर्सी नहीं हिली, तो यह न सिर्फ भ्रष्टाचार का प्रतीक बनेगी, बल्कि राजनीतिक असंतोष को जन्म देगी। जनता अब चुप नहीं बैठेगी – वे जवाब मांग रही हैं। क्या मंत्री जी की चुप्पी टूटेगी? या यह ‘अमर’ कुर्सी और मजबूत हो जाएगी?
यह कहानी अभी खत्म नहीं हुई। महासमुंद की जनता की नजरें सत्ता के गलियारों पर टिकी हैं। अगर कार्रवाई नहीं हुई, तो यह छोटा जिला पूरे राज्य की राजनीति को हिला सकता है। इंतजार कीजिए – अगला पन्ना क्या लाएगा?

महासमुंद धान खरीदी संकट: उठाव ठप, जगह खत्म, किसान कर्ज के जाल में फंसे – सरकार मौन क्यों..?

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तत्काल कार्रवाई करो, वरना आंदोलन तय..!

रिपोर्टर मयंक गुप्ता
महासमुंद / जिले में धान खरीदी केंद्रों पर इन दिनों हाहाकार मचा हुआ है। सरकारी समर्थन मूल्य पर धान खरीदी तो जोरों पर है, लेकिन उठाव की भयंकर देरी ने पूरी व्यवस्था को लकवा मार दिया है। केंद्रों पर धान के ढेर लगातार ऊंचे होते जा रहे हैं, जबकि मिलों या गोदामों तक पहुंचाने के लिए ट्रक या संसाधन नदारद। केंद्र प्रभारियों के चेहरे पीले पड़ गए हैं – वे जानते हैं कि अगले 4-5 दिनों में स्टोरेज की जगह पूरी तरह समाप्त हो जाएगी, और खरीदी बंद करने के अलावा कोई चारा नहीं बचेगा। इससे समितियां करोड़ों के घाटे में चली जाएंगी, और सबसे बड़ा नुकसान होगा उन किसानों का, जिन्होंने बैंक से कर्ज लेकर धान की फसल उगाई है।

सरकार द्वारा तय खरीदी लिमिट के अनुसार ही धान लिया जा रहा है, लेकिन इस लिमिट को बढ़ाने की कोई घोषणा नहीं। नतीजा – लक्ष्य अधर में लटक गया। स्टैकिंग तो हो रही है, मगर उठाव न होने से जगह की किल्लत चरम पर है। मिलर्स द्वारा सप्लाई किए बारदानों की हालत और बुरी – 50% अच्छे, बाकी फटे-चीथड़े, फिर भी पूरा पैसा वसूला जा रहा। एक केंद्र प्रभारी ने गोपनीयता की शर्त पर बताया, “हम लोग बेहद परेशान हैं। समय पर उठाव नहीं हुआ तो समिति इस बार दिवालिया हो जाएगी। बारदाना, रखरखाव और अन्य खर्चे बढ़ते जा रहे हैं।”

किसानों की स्थिति तो और भी विकट है। हजारों किसानों का टोकन अभी तक नहीं कटा, और एग्रीस्टैक पोर्टल पर ऑनलाइन स्लॉट 16 से 20 जनवरी तक पूरी तरह बुक हो चुके हैं। एक किसान ने दर्द भरी आवाज में कहा, “कर्ज लेकर बोवनी की, धान तैयार है, लेकिन बेचने का नंबर नहीं आ रहा। 31 जनवरी के बाद क्या फरवरी में खरीदी होगी? सरकार स्पष्ट बताए, वरना हम सड़कों पर उतरेंगे।” कई किसानों के चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ दिख रही हैं – फसल खराब होने का डर, कर्ज का ब्याज बढ़ना, और परिवार का पेट पालने की चिंता।

यह समस्या सिर्फ महासमुंद की नहीं, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ की धान खरीदी व्यवस्था पर बड़ा सवालिया निशान लगा रही है। लॉजिस्टिक्स की कमी, मिलिंग कैपेसिटी की सीमितता, बारदाना गुणवत्ता और पोर्टल की गड़बड़ियां सालों से चली आ रही हैं, लेकिन समाधान दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहा। किसान संगठनों ने चेतावनी दी है कि अगर तत्काल उठाव तेज नहीं किया गया, तो बड़ा प्रदर्शन होगा।
शासन-प्रशासन से सीधी अपील:

1 उठाव के लिए अतिरिक्त ट्रक और संसाधन तुरंत लगाएं।

2 खरीदी लिमिट बढ़ाएं और फरवरी तक खरीदी जारी रखने की आधिकारिक घोषणा करें।

3 बारदाना की गुणवत्ता जांचें और दोषी मिलर्स पर कार्रवाई करें।

4 टोकन और स्लॉट की समस्या का स्थायी हल निकालें।

किसानों की मेहनत और उनके कर्ज का बोझ देखते हुए अब चुप्पी नहीं चलेगी। सरकार जागे, तुरंत कार्रवाई करे, वरना यह संकट पूरे प्रदेश में आग की तरह फैलेगा। क्या मुख्यमंत्री और कृषि मंत्री इस पुकार को सुनेंगे? समय कम है, फैसला अब होना चाहिए!

दंतेवाड़ा DAV स्कूल में सनसनीखेज खुलासा किशोर छात्राओं की तस्वीरें बिना अनुमति सोशल मीडिया पर वायरल

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शिक्षकों पर लापरवाही के गंभीर आरोप – कलेक्टर ने दी त्वरित कार्रवाई की चेतावनी..!

रिपोर्टर मयंक गुप्ता
दंतेवाड़ा, 25 दिसंबर 2025 छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित दंतेवाड़ा जिले के प्रतिष्ठित DAV कुंहाररास पब्लिक स्कूल में बच्चों की निजता और सुरक्षा से जुड़ा एक बेहद गंभीर मामला सामने आया है। स्कूल के शिक्षकों पर आरोप है कि उन्होंने कक्षा 9वीं और 10वीं की छात्राओं की तस्वीरें बिना किसी अनुमति के खींचीं और उन्हें व्हाट्सएप स्टेटस तथा अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर अपलोड कर दिया। ये तस्वीरें ज्यादातर क्लासरूम गतिविधियों या स्कूल कार्यक्रमों के दौरान ली गईं प्रतीत होती हैं, जिससे इन किशोरावस्था की लड़कियों की सुरक्षा पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है। अभिभावकों में इस घटना से जबरदस्त आक्रोश व्याप्त है और वे इसे स्कूल प्रशासन की घोर लापरवाही करार दे रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार, मुख्य आरोप एक शिक्षक अपूर्व पर लगा है, जिन्होंने विशेष रूप से इन छात्राओं की फोटोज फोकस करके लीं और उन्हें सार्वजनिक कर दिया। अभिभावकों का कहना है कि इस उम्र (14-16 वर्ष) की लड़कियां बेहद संवेदनशील होती हैं। ऐसी तस्वीरों का गलत इस्तेमाल – जैसे ऑनलाइन हैरेसमेंट, फोटो मॉर्फिंग, साइबर बुलिंग या ब्लैकमेलिंग – बहुत आसानी से हो सकता है। एक गुस्साए अभिभावक ने कहा, “स्कूल में पढ़ाई के लिए बच्चे जाते हैं, न कि अपनी तस्वीरें वायरल करवाने। क्लास में शिक्षकों को मोबाइल फोन इस्तेमाल करने की इजाजत कैसे मिल गई? क्या प्राचार्य मृत्युंजय पाणिग्राही ने नियमों को ताक पर रख दिया है? अभिभावकों का कहना है कि,प्रिंसिपल और अन्य शिक्षकों द्वारा भी अभद्र व्यवहार करते हैं।”
यह मामला तब प्रकाश में आया जब अभिभावकों ने सोशल मीडिया पर अपने बच्चों की ये तस्वीरें देखीं। स्कूल में मोबाइल फोन के उपयोग पर सख्त नियम होने के बावजूद यहां नियमों की खुलेआम अवहेलना हो रही है। शिक्षा विशेषज्ञों की राय है कि नाबालिग छात्राओं की तस्वीरें इस तरह सार्वजनिक करना न केवल प्राइवेसी का गंभीर उल्लंघन है, बल्कि POCSO एक्ट (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्शुअल ऑफेंसेज) और जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के प्रावधानों के तहत आपराधिक कृत्य की श्रेणी में आता है।
मीडिया ने जब स्कूल प्राचार्य मृत्युंजय पाणिग्राही से संपर्क करने की कोशिश की तो उनका फोन नहीं उठा। स्कूल प्रबंधन की ओर से अभी तक कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया या आधिकारिक बयान नहीं आया है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए जब जिला कलेक्टर देवेश कुमार ध्रुव से दूरभाष पर संपर्क किया गया, तो उन्होंने सख्त लहजे में कहा कि ऐसी अनियमितताएं किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं की जाएंगी। कलेक्टर ने आश्वासन दिया कि सोशल मीडिया पर छात्राओं की तस्वीरें वायरल करने वाले शिक्षकों और स्कूल प्रबंधन के खिलाफ त्वरित कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने संबंधित अधिकारियों को जांच के निर्देश देने की बात कही।
अभिभावक दोषी शिक्षक अपूर्व सहित अन्य संलिप्त शिक्षकों और प्रिंसिपल को तुरंत निलंबित या हटाने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि अगर सख्त कदम नहीं उठाए गए तो ऐसे मामले बार-बार सामने आते रहेंगे। कई अभिभावकों ने विरोध प्रदर्शन की चेतावनी दी है और जिला शिक्षा अधिकारी, पुलिस तथा स्थानीय प्रशासन से स्वतंत्र जांच की अपील की है।
यह घटना एक बार फिर स्कूलों में बच्चों की डिजिटल सुरक्षा और प्राइवेसी के बड़े मुद्दे को उजागर करती है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि सभी स्कूलों में स्पष्ट गाइडलाइंस लागू की जाएं: क्लासरूम में शिक्षकों का मोबाइल उपयोग पूरी तरह प्रतिबंधित हो, बच्चों की तस्वीरें केवल आधिकारिक चैनलों से और अभिभावकों की लिखित अनुमति के बाद ही शेयर की जाएं। DAV जैसे राष्ट्रीय स्तर के शिक्षा संस्थान से ऐसी लापरवाही की कल्पना भी नहीं की जा सकती, खासकर आदिवासी बहुल और संवेदनशील क्षेत्र जैसे दंतेवाड़ा में।
फिलहाल, अभिभावक और स्थानीय समुदाय न्याय का इंतजार कर रहे हैं। कलेक्टर के हस्तक्षेप से उम्मीद है कि जल्द ही दोषियों पर कार्रवाई होगी। बच्चों की सुरक्षा से किसी भी तरह का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा। मामले की आगे की जांच पर सभी की निगाहें टिकी हैं।

महासमुंद धान खरीदी घोटाला किसान की आत्महत्या की कोशिश से हड़कंप, 2304 क्विंटल शॉर्टेज पर प्रशासन की चुप्पी ने सुलगाई आग..!

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रिपोर्टर मयंक गुप्ता
महासमुंद, 23 दिसंबर 2025: छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में किसानों की बदहाली की एक दिल दहला देने वाली कहानी सामने आ रही है। बागबाहरा ब्लॉक के दूरस्थ क्षेत्र में ओडिशा बॉर्डर से लगी प्राथमिक कृषि साख सहकारी समिति खेमडा (पंजीयन क्रमांक 1373) में समर्थन मूल्य पर धान खरीदी की प्रक्रिया में लगातार अनियमितताओं का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। हाल ही में मीडिया के औचक निरीक्षण से उजागर हुई दबंगई और लापरवाही की घटनाओं के बीच अब एक और चौंकाने वाला खुलासा हुआ है – एक किसान द्वारा आत्महत्या की कोशिश और पिछले साल की बड़ी गड़बड़ी पर प्रशासन की रहस्यमयी चुप्पी। यह सब मिलकर किसानों के हितों पर गहरा संकट पैदा कर रहा है, जहां मेहनतकश किसान अपनी फसल का सही दाम पाने के बजाय हताशा के शिकार हो रहे हैं।


यह सब वर्ष 2025-26 के धान खरीदी अभियान का हिस्सा है, जहां सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर किसानों से धान खरीदा जा रहा है। लेकिन खेमडा समिति में हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। मीडिया की टीम द्वारा किए गए अचानक जांच में पाया गया कि पुराने जूट के बारदानों में धान भरा जा रहा था, बिना किसी मार्किंग या उचित स्टैकिंग के। यह सरकारी नियमों का खुला उल्लंघन है, क्योंकि मार्किंग से बारदानों की ट्रैकिंग और धान की गुणवत्ता सुनिश्चित होती है। बिना इन प्रक्रियाओं के, धान की मात्रा में हेरफेर, गुणवत्ता की गिरावट और किसानों के भुगतान में धांधली की पूरी गुंजाइश बन जाती है। इससे न केवल किसानों का आर्थिक नुकसान होता है बल्कि पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं।
समिति प्रभारी जोगेंद्र साव से जब इस बारे में सवाल किया गया, तो उनका रवैया बेहद आक्रामक और असहयोगपूर्ण था। उन्होंने दावा किया कि जिला नोडल अधिकारी और कलेक्टर से कोई स्पष्ट निर्देश नहीं मिले हैं, और मार्किंग तभी की जाएगी जब ऊपर से आदेश आएंगे। सवालों पर उन्होंने धमकी भरे लहजे में कहा, “आपको क्या फर्क पड़ता है? जो करना है करो, मैं सिर्फ अपने अफसरों को रिपोर्ट करूंगा।” यह जवाब न सिर्फ मीडिया की जांच को चुनौती देता है बल्कि समिति में चल रही गड़बड़ियों को छिपाने की साजिश की ओर इशारा करता है। प्रभारी की यह मनमानी साफ बताती है कि यहां नियमों की बजाय व्यक्तिगत दबदबा चल रहा है, जो किसानों के लिए घातक साबित हो सकता है।
समिति के नए अध्यक्ष चंदू साहू का व्यवहार भी कम चौंकाने वाला नहीं था। फोन पर संपर्क करने पर उन्होंने रूखे अंदाज में पूछा, “आपका समिति से क्या लेना-देना है?” यह दुर्व्यवहार न केवल पारदर्शिता की कमी को उजागर करता है बल्कि सार्वजनिक संस्थाओं में जवाबदेही की कमी को भी सामने लाता है। ऐसी दबंगई से किसानों का विश्वास टूट रहा है, जो साल भर की मेहनत के बाद यहां फसल बेचने आते हैं।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। विगत कुछ दिनों में एक और दर्दनाक घटना घटी, जब किसान मनबोध गाड़ा ने हताशा में अपना गला रेतकर आत्महत्या की कोशिश की। यह घटना समिति की लापरवाही और किसानों पर पड़ रहे दबाव की चरम मिसाल है। सूत्रों के मुताबिक, मनबोध गाड़ा समिति की अनियमितताओं और भुगतान में देरी से इतने परेशान थे कि उन्होंने यह कदम उठाया। शुक्र है कि समय रहते उन्हें बचा लिया गया, लेकिन यह घटना प्रशासन की उदासीनता पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। क्या किसानों की जान की कीमत इतनी सस्ती है कि ऐसी घटनाएं नजरअंदाज की जा रही हैं?
और तो और, लापरवाही की हदें पार करते हुए पिछले साल 2024-25 सीजन में इसी समिति में 2304 क्विंटल धान का शॉर्टेज पाया गया था। यह कमी न केवल लाखों रुपयों के नुकसान का संकेत है बल्कि संभावित घोटाले की ओर भी इशारा करती है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि अब तक इस पर कोई ठोस कार्यवाही नहीं हुई। न जांच हुई, न दोषियों पर कार्रवाई। यह चुप्पी ऊपरी अधिकारियों की मिलीभगत की शंका को और मजबूत करती है। आखिर इतनी बड़ी गड़बड़ी पर सन्नाटा क्यों? क्या यह किसानों के साथ धोखा नहीं है?
मामले को जिला नोडल अधिकारी अविनाश शर्मा के सामने रखा गया, तो उन्होंने बस इतना कहा, “मैं बात कर ठीक करवाता हूं।” लेकिन यह वादा कितना खोखला है, यह समय बताएगा। क्या यह सिर्फ लीपापोती है या वास्तविक सुधार होगा? किसानों और स्थानीय लोगों में आक्रोश बढ़ रहा है, और वे तत्काल जांच की मांग कर रहे हैं।
यह पूरा प्रकरण महासमुंद जिले की कृषि सहकारी समितियों की सड़ी-गली व्यवस्था को उजागर करता है। सरकार को तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए – सख्त जांच, दोषियों पर कार्रवाई और डिजिटल सिस्टम से पारदर्शिता सुनिश्चित करनी चाहिए। किसानों की आवाज दबाने वाली यह दबंगई अब सहन नहीं की जा सकती। अगर जल्द कदम नहीं उठाए गए, तो छोटी घटनाएं बड़े आंदोलन का रूप ले सकती हैं, और किसानों की मेहनत पर पानी फिरने की यह साजिश और गहरा सकती है। प्रशासन जागो, वरना किसान की हताशा पूरे सिस्टम को हिला देगी!

महासमुंद धान परिवहन में करोड़ों के घोटाले की कोशिश नाकाम, 500 बोरी धान से लदा ट्रक जब्त, चार आरोपियों पर FIR

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रिपोर्टर मयंक गुप्ता
महासमुंद, 22 दिसंबर 2025 – छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में समर्थन मूल्य पर धान उपार्जन की प्रक्रिया जोर-शोर से चल रही है, लेकिन कुछ लोग सरकारी व्यवस्था को चूना लगाने की फिराक में हैं। कलेक्टर विनय कुमार लंगेह के सख्त निर्देशों पर प्रशासन ने धान परिवहन में बड़ी हेराफेरी का पर्दाफाश किया है। सरायपाली तहसील के सिंगबहाल धान उपार्जन केंद्र से जुड़े मामले में गंभीर अनियमितता सामने आने के बाद चार व्यक्तियों के खिलाफ सिंघोड़ा थाने में प्राथमिकी दर्ज कर ली गई है।
घटना 20 दिसंबर 2025 की शाम की है। खाद्य अधिकारी अजय यादव को सूचना मिली कि सिंगबहाल उपार्जन केंद्र से धान परिवहन में कुछ गड़बड़ हो रही है। तुरंत कार्रवाई करते हुए खाद्य निरीक्षक अविनाश दुबे और तहसीलदार श्रीधर पंडा की टीम मौके पर पहुंची। केंद्र के प्रभारी बुद्धिवंत प्रधान से सभी जरूरी दस्तावेज मांगे गए, जिसमें डिलीवरी ऑर्डर (DO), डिमांड ड्राफ्ट (DM), राइस मिलर गेट पास और तौल पत्रक शामिल थे।
दस्तावेजों की बारीकी से जांच की गई तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। DO में छुईखलाई स्थित भोलेनाथ इंडस्ट्रीज को 350 क्विंटल धान जारी करने का उल्लेख था। DM में कुल 875 बोरे धान सिंगबहाल केंद्र से इसी मिल को भेजे जाने का रिकॉर्ड था। लेकिन ट्रक नंबर CG 06 HB 4361 में केवल 500 बोरे ही लोड किए गए थे। यानी निर्धारित मात्रा से काफी कम धान ट्रक में भरा गया, जो स्पष्ट रूप से शासन को आर्थिक नुकसान पहुंचाने की नियत से किया गया कृत्य था।
संयुक्त जांच दल ने गहन पड़ताल की। दस्तावेजों के अलावा रजिस्टर के पन्ने खंगाले गए और सीसीटीवी फुटेज भी चेक की गई। जांच में पाया गया कि केंद्र प्रभारी बुद्धिवंत प्रधान, हेमंत साहू और गिरिजाशंकर भोई ने जानबूझकर कम धान लोड करवाया। इस पूरे खेल में छुईखलाई की भोलेनाथ इंडस्ट्रीज के संचालक आशीष अग्रवाल की भी सक्रिय भूमिका सामने आई है। सभी आरोपी महासमुंद जिले के ही निवासी हैं और इनकी मिलीभगत से सरकारी धान की हेराफेरी की कोशिश की गई।
प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए संदिग्ध 500 बोरी धान से लदे ट्रक को जब्त कर लिया और उसे सिंघोड़ा थाने के सुपुर्द कर दिया। सिंगबहाल समिति में प्रारंभिक जांच पूरी करने के बाद पंचनामा तैयार किया गया। सभी संबंधित दस्तावेजों को जब्त कर लिया गया है, ताकि आगे की जांच में कोई सबूत छूट न जाए।
कलेक्टर विनय कुमार लंगेह के निर्देश पर जिले भर में धान खरीदी और परिवहन पर कड़ी निगरानी रखी जा रही है। इस साल जिले में धान जप्ती के सबसे ज्यादा मामले दर्ज किए गए हैं, जो प्रशासन की सतर्कता को दर्शाता है। अधिकारियों का कहना है कि धान खरीदी प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाए रखने के लिए ऐसी अनियमितताओं पर सख्ती से निपटा जाएगा। किसानों का हित सर्वोपरि है और कोई भी व्यक्ति सरकारी व्यवस्था से खिलवाड़ नहीं कर पाएगा।
यह मामला एक बार फिर धान उपार्जन में व्याप्त भ्रष्टाचार की परतें उजागर करता है, लेकिन प्रशासन की मुस्तैदी से ऐसे प्रयासों पर लगाम लग रही है। जांच आगे बढ़ने पर और भी खुलासे होने की संभावना है।

महासमुंद में अवैध धान पर प्रशासन का बड़ा शिकंजा एक ही रात में 870 कट्टे जब्त, ओडिशा से तस्करी की कोशिश नाकाम

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रिपोर्टर मयंक गुप्ता
महासमुंद, 20 दिसंबर 2025 – छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में अवैध धान के परिवहन और भंडारण के खिलाफ जिला प्रशासन ने कड़ा रुख अपनाया हुआ है। बीती रात और आज सुबह अलग-अलग स्थानों पर की गई छापेमारी में कुल 860 कट्टे धान जब्त किए गए हैं। यह कार्रवाई पड़ोसी राज्य ओडिशा से धान की तस्करी को रोकने और अवैध भंडारण पर अंकुश लगाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। संयुक्त टीम ने सतर्कता दिखाते हुए इन प्रकरणों को उजागर किया और आगे भी ऐसी गतिविधियों पर नजर रखने का ऐलान किया है।
प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, सबसे पहले तहसील सरायपाली के ग्राम चिउराकूट में बड़ी कार्रवाई हुई। यहां ओडिशा से अवैध रूप से लाए गए और डंप किए गए लगभग 70 कट्टे धान को टीम ने जब्त कर लिया। यह धान गुप्त तरीके से परिवहन कर छिपाया गया था, लेकिन गश्ती दल की मुस्तैदी से तस्करों की योजना पर पानी फिर गया। जब्त धान को तत्काल प्रभाव से थाना सिंघोड़ा को सुपुर्द कर दिया गया, जहां आगे की कानूनी प्रक्रिया शुरू की जा रही है।
इसी कड़ी में बीती रात कोमाखान तहसील के अंतर्गत ग्राम नर्रा में एक और सफल छापा पड़ा। यहां 200 कट्टे अवैध धान बरामद किए गए। टीम को सूचना मिली थी कि बड़े पैमाने पर धान का परिवहन हो रहा है, जिसके आधार पर रात में ही कार्रवाई की गई। यह धान भी बिना किसी वैध दस्तावेज के जमा किया जा रहा था, जो स्पष्ट रूप से नियमों का उल्लंघन था।
सबसे बड़ा प्रकरण तहसील पिथौरा के ग्राम बम्हनी में सामने आया, जहां गोयल ट्रेडर्स के गोदाम में अवैध रूप से 600 कट्टे धान का भंडारण पाया गया। निरीक्षण के दौरान गोदाम में भारी मात्रा में धान रखा मिला, जिसके लिए कोई वैध अनुमति या दस्तावेज नहीं थे। यह धान संभवतः बाहर से लाकर स्टॉक किया गया था। प्रशासन ने तुरंत इसे जब्त कर लिया और मंडी अधिनियम के तहत कार्रवाई के लिए मंडी सचिव को निर्देश दिए हैं। इस प्रकरण से अवैध व्यापार की गहरी साजिश का पता चलता है।
जिला प्रशासन की संयुक्त टीम, जिसमें राजस्व, खाद्य और मंडी विभाग के अधिकारी शामिल हैं, ने इन सभी कार्रवाइयों को अंजाम दिया। कलेक्टर के निर्देशन में चल रही यह मुहिम धान खरीदी सीजन में अवैध गतिविधियों को पूरी तरह रोकने के उद्देश्य से शुरू की गई है। टीम ने स्पष्ट किया कि अवैध धान परिवहन और भंडारण करने वालों के खिलाफ आगे भी सतत और कड़ी कार्रवाई जारी रहेगी। कोई भी व्यक्ति या व्यापारी यदि ऐसे नियमों का उल्लंघन करता पाया गया, तो उसके विरुद्ध सख्त कानूनी कदम उठाए जाएंगे।
यह कार्रवाई जिले में किसानों के हितों की रक्षा करने और सरकारी धान खरीदी व्यवस्था को पारदर्शी बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण है। प्रशासन की इस सतर्कता से अवैध तस्करों में हड़कंप मच गया है, और आने वाले दिनों में ऐसी और कार्रवाइयां होने की संभावना है।

जंगल के लुटेरों को लगा बिजली का करंट..! 149 हरे पेड़ों की हत्या करने वाले दो भाइयों को सीधे जेल, वन अधिकार पट्टा भी छिना

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रिपोर्टर मयंक गुप्ता
महासमुंद/पिथौरा 06 दिसंबर 2025 वन विभाग ने जंगल माफियाओं के खिलाफ जो ताबड़तोड़ एक्शन लिया है, उसने पूरे इलाके में सनसनी फैला दी है। पिथौरा रेंज के संरक्षित वन कक्ष क्रमांक 248 में दो सगे भाइयों ने मिलकर 0.61 हेक्टेयर जंगल को पूरी तरह बर्बाद कर दिया था। 149 हरे-भरे पेड़ों को कुल्हाड़ी से काटकर, जंगल साफ करके ये लोग उसे अपनी खेती में मिलाने की साजिश रच रहे थे। लेकिन वन विभाग की नजर उन पर पड़ी और 24 घंटे के अंदर इनका पूरा खेल खत्म!
आरोपी हैं।
मधुसूदन साहू
साधु साहू
(दोनों सगे भाई, पिता समारू साहू, ग्राम मेमरा, तहसील बसना)
इन दोनों को 2-3 साल पहले वन अधिकार अधिनियम के तहत 5-5 एकड़ पट्टा मिला था। लेकिन लालच ने इनकी अक्ल मार ली। अपने पट्टे से सटा संरक्षित जंगल धीरे-धीरे काटकर ये लोग उसे अपनी जमीन में मिलाने का प्लान बना रहे थे। इनकी इस हरकत से न सिर्फ 149 कीमती पेड़ नष्ट हुए, बल्कि जंगल में रहने वाले तेंदुआ, सांभर, जंगली मुर्गे समेत कई वन्यजीवों के घोंसले और अंडे भी तबाह हो गए। मौके पर वन्यजीवों के पैरों के निशान, मल-मूत्र और घोंसले के अवशेष मिले हैं, जिन्हें सबूत के तौर पर जब्त कर लिया गया।

घर पर छापा → मिला माल

आरोपियों के घर दबिश दी गई तो वहाँ से बरामद हुए:
21 सागौन के ताजे चिरान
2 खून से सने कुल्हाड़ी
1 हाथ आरी
दोनों ने पुलिसिया पूछताछ में कबूल कर लिया कि “इन्हीं कुल्हाड़ियों से हमने पेड़ काटे थे।”

सख्त से सख्त कार्रवाई

वनमंडलाधिकारी मयंक पांडेय के सीधे आदेश पर तुरंत एफआईआर दर्ज हुई। आरोपियों पर ठोके गए ये भारी-भरकम कानूनी हथियार:
भारतीय वन अधिनियम 1927
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972
लोक संपत्ति क्षति निवारण अधिनियम 1984
छत्तीसगढ़ काष्ठ चिरान अधिनियम 1984
05 दिसंबर को अपराध दर्ज → 06 दिसंबर को सुबह-सुबह दोनों को गिरफ्तार कर बसना कोर्ट में पेश किया गया। माननीय प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट मंजीत जांगड़े ने एक मिनट भी गँवाए बिना दोनों को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में जिला जेल महासमुंद भेज दिया।
साथ ही सबसे बड़ा झटका:
इनके द्वारा पहले मिला वन अधिकार पट्टा तत्काल प्रभाव से रद्द करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। यानी अब न जंगल बचेगा, न इनका पट्टा!

पूरी टीम थी एक्शन में

यह धमाकेदार कार्रवाई वनमंडलाधिकारी मयंक पांडेय के नेतृत्व में हुई। संयुक्त वनमंडलाधिकारी डिम्पी बैस ने मौके पर मार्गदर्शन किया, जबकि वन परिक्षेत्र अधिकारी सालिकराम डडसेना ने पूरी टीम को लीड किया।
हीरो रहे फील्ड के जांबाज:
ललित पटेल, ननकुसिया साहू, प्रभा ठाकुर, वीरेंद्र बंजारे, कोकिलकांत दिनकर, पुष्पा नेताम और कुलेश्वर डडसेना।
वन विभाग का साफ मैसेज:
“जंगल हमारी अमानत है। जो हाथ भी उठाएगा, उसका हाथ काट दिया जाएगा।
अतिक्रमण, अवैध कटाई और वन्यजीवों को नुकसान पहुँचाने वालों के लिए अब कोई माफी नहीं।”
जंगल बचाओ — जंगल बचाएगा!

टोकन की जद्दोजहद ने तोड़ी किसान की उम्मीदें: धान खरीदी केंद्र की घोर लापरवाही से हताश किसान ने की खुदकुशी की कोशिश

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ब्लेड से गला काटकर फैलाया दहशत का माहौल..!

रिपोर्टर मयंक गुप्ता
महासमुंद / बागबाहरा छत्तीसगढ़: राज्य में धान की खरीद प्रक्रिया एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गई है। सरकारी योजनाओं और किसान कल्याण की बड़ी-बड़ी बातों के बीच एक साधारण किसान की जिंदगी पर संकट मंडरा रहा है, जो पूरे तंत्र की नाकामी को उजागर कर रहा है। बागबाहरा ब्लॉक के सेनभांठा गांव में रहने वाले किसान मनबोध गाड़ा ने प्रशासनिक उदासीनता और सहकारी संस्थाओं की बेरुखी से तंग आकर एक बेहद दर्दनाक कदम उठाया, जिसने पूरे इलाके को झकझोर दिया। इस घटना ने सवाल खड़े कर दिए हैं कि क्या किसानों के लिए बनाई गई सुविधाएं वाकई उनकी मदद कर रही हैं या उन्हें और ज्यादा परेशान कर रही हैं?

घटना का पूरा ब्योरा महीनों की मेहनत बर्बाद, टोकन न मिलने से बढ़ी हताशा

किसान मनबोध गाड़ा ने अपनी फसल उगाने के लिए साहूकारों और बैंकों से भारी कर्ज लिया था। कड़ी मेहनत से तैयार किए गए धान को बेचने की उम्मीद लेकर वह बार-बार खेमडा धान खरीदी केंद्र पहुंचा, जो मुंगासेर सहकारी बैंक से जुड़ा हुआ है। लेकिन हर बार उसे निराशा ही हाथ लगी। टोकन जारी करने की प्रक्रिया में लगातार देरी होती रही—कभी सर्वर की खराबी का बहाना, कभी समय खत्म होने की दलील, तो कभी अगले दिन आने की सलाह। इन सबके बीच किसान के धान घर में ही पड़े सड़ते रहे, जबकि कर्ज की किस्तें सिर पर चढ़ती जा रही थीं।
ग्रामीणों के मुताबिक, मनबोध ने कई बार केंद्र के अधिकारियों और कर्मचारियों से मदद की गुहार लगाई। वह अपनी समस्या बताता रहा, लेकिन हर बार उसे खाली हाथ लौटना पड़ा। जैसे-जैसे दिन गुजरते गए, आर्थिक दबाव के साथ-साथ उसकी मानसिक हालत भी बिगड़ती चली गई। परिवार की रोजमर्रा की जरूरतें पूरी न होने से घर में तनाव बढ़ता गया, और किसान खुद को असहाय महसूस करने लगा। यह स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि उसने आखिरकार एक खतरनाक फैसला ले लिया।

दर्दनाक पल: केंद्र से लौटते वक्त उठाया आत्मघाती कदम

घटना वाले दिन मनबोध एक बार फिर धान खरीदी केंद्र पहुंचा, उम्मीद के साथ कि शायद आज टोकन मिल जाए। लेकिन वहां भी वही पुराना जवाब मिला—’आज टोकन नहीं कटेगा।’ यह सुनकर उसकी सारी उम्मीदें चकनाचूर हो गईं। घर लौटते हुए उसकी हताशा गुस्से में बदल गई, और इसी उन्माद में उसने ब्लेड से अपना गला काट लिया। खून से सना किसान सड़क पर गिर पड़ा, जिसे देखकर आसपास के लोग स्तब्ध रह गए। पूरे गांव में अफरा-तफरी मच गई, और लोग इधर-उधर भागने लगे।
तुरंत ही ग्रामीणों ने 112 इमरजेंसी सेवा को कॉल किया। पुलिस और मेडिकल टीम मौके पर पहुंची, और घायल किसान को फौरन बागबाहरा के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया। डॉक्टरों ने बताया कि गले पर गहरा कट लगा है, और काफी खून बह चुका है। उसकी हालत बेहद नाजुक बनी हुई है, और प्राथमिक इलाज के बाद उसे बड़े अस्पताल में शिफ्ट करने की योजना बनाई जा रही है। परिवार वाले सदमे में हैं, और गांव में हर तरफ मातम का माहौल है।

ग्रामीणों का उबलता गुस्सा ‘सरकार की नीतियां सिर्फ कागजों तक सीमित’

इस घटना ने स्थानीय किसानों और संगठनों में जबरदस्त आक्रोश पैदा कर दिया है। लोग कह रहे हैं कि सरकार हर चुनावी मंच पर किसानों की आमदनी दोगुनी करने और उनकी मदद करने की बात करती है, लेकिन हकीकत में सिस्टम उन्हें और ज्यादा पीड़ा दे रहा है। ग्रामीणों ने कई सवाल उठाए हैं:
अगर धान खरीदी की व्यवस्था इतनी कुशल है, तो किसान टोकन के लिए महीनों क्यों भटकते रहते हैं?
सहकारी बैंक और खरीदी केंद्रों के कर्मचारियों की जिम्मेदारी कौन तय करेगा?
क्या किसानों की मानसिक पीड़ा और आर्थिक नुकसान की भरपाई कोई अधिकारी करेगा?
किसान संगठनों ने चेतावनी दी है कि अगर ऐसी घटनाएं जारी रहीं, तो बड़े स्तर पर आंदोलन हो सकता है। वे मांग कर रहे हैं कि टोकन सिस्टम को और ज्यादा सरल, पारदर्शी और तेज बनाया जाए, ताकि किसानों को अनावश्यक परेशानी न झेलनी पड़े।

प्रशासन पर सवालों की बौछार: क्या होगा दोषियों का..?

यह मामला सीधे तौर पर सहकारी विभाग, खरीदी केंद्र के प्रबंधन और जिला प्रशासन की भूमिका पर उंगली उठाता है। टोकन प्रणाली को किसानों की सहूलियत के लिए शुरू किया गया था, लेकिन अब यह उनके लिए अभिशाप बनती जा रही है। क्या सर्वर की समस्याएं और कर्मचारियों की लापरवाही को रोकने के लिए कोई ठोस कदम उठाए जाएंगे? स्थानीय निवासियों की मांग है कि:
दोषी कर्मचारियों पर सख्त कार्रवाई की जाए, और उन्हें निलंबित किया जाए।
पीड़ित किसान और उसके परिवार को तत्काल आर्थिक मदद दी जाए, ताकि वे इस संकट से उबर सकें।
पूरे राज्य में धान खरीदी प्रक्रिया की समीक्षा की जाए, और तकनीकी खामियों को दूर किया जाए।

बड़ा सबक एक किसान की पीड़ा, पूरे तंत्र की नाकामी

मनबोध गाड़ा की यह कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस पूरे सिस्टम की असफलता की मिसाल है जो किसानों को उनका हक समय पर देने में विफल हो रहा है। अगर प्रशासन ने समय रहते ध्यान दिया होता, तो शायद यह दुखद घटना टाली जा सकती थी। आज मनबोध अस्पताल में मौत से लड़ रहा है, जबकि पूरा सिस्टम जवाब तलाश रहा है। सवाल यह है कि क्या एक टोकन की कीमत किसी किसान की जिंदगी से ज्यादा है? यह घटना राज्य सरकार को झकझोरने के लिए काफी है, और उम्मीद है कि इससे सबक लेकर भविष्य में ऐसी लापरवाहियां न दोहराई जाएं। किसानों का सब्र टूट रहा है, और अगर व्यवस्था नहीं सुधरी, तो ऐसे हादसे और बढ़ सकते हैं।

शिक्षा में क्रांति का बिगुल गजेन्द्र यादव ने रायपुर संभाग को दे डाला 90%+ का वारंट, लापरवाही करने वाले तैयार रहें..!

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रिपोर्टर मयंक गुप्ता
महासमुंद, 05 दिसम्बर 2025
स्कूल शिक्षा मंत्री गजेन्द्र यादव ने आज महासमुंद में रायपुर संभाग के शिक्षा तंत्र को पूरी तरह हिला कर रख दिया। जिला पंचायत सभाकक्ष में हुई मैराथन समीक्षा बैठक में मंत्री ने अधिकारियों को साफ-साफ सुनाते हुए कहा, “अब कागजी घोड़े दौड़ाने का जमाना गया। 2026 का बोर्ड रिजल्ट ही बताएगा कि कौन अफसर नौकरी करने लायक है और कौन नहीं।”
बैठक में सचिव स्कूल शिक्षा सिद्धार्थ कोमल परदेशी, आयुक्त समग्र शिक्षा डॉ. प्रियंका शुक्ला के साथ रायपुर, बलौदाबाजार, धमतरी, गरियाबंद और महासमुंद के सभी डीईओ, डीएमसी, बीईओ, बीआरसी मौजूद रहे।

मंत्री के टॉप-10 नॉन-नेगोशिएबल टारगेट

1/ 31 दिसंबर 2025 तक अपार आईडी 100% – एक भी बच्चा छूटा तो डीईओ सीधे जवाबदेह

2/ 2026 बोर्ड: 10वीं में न्यूनतम 85%, 12वीं में न्यूनतम 90% और अधिकतम बच्चे फर्स्ट डिविजन में

3/ बायोमेट्रिक उपस्थिति 100% अनिवार्य – लेट आने वालों का नाम व फोटो पोर्टल पर सार्वजनिक

4/ हर बीईओ हर महीने न्यूनतम 40 स्कूलों का दौरा, जीपीएस फोटो के साथ रिपोर्ट

5/ जनवरी 2026 से “धारा-प्रवाह हिंदी अभियान” – कक्षा 5 तक हर बच्चा फरवरी तक फर्राटेदार हिंदी पढ़े

6/ माध्यमिक स्तर पर बेसिक गणित + अंग्रेजी रेमेडियल क्लासेस अनिवार्य

7/ ड्रॉपआउट रेट 0.1% से ऊपर हुआ तो पूरा ब्लॉक फेल, बीईओ निलंबित

8/ सेवानिवृत्त शिक्षक को रिटायरमेंट के दिन ही पूरा पेंशन-ग्रेच्युटी, देरी करने वाले बीईओ पर एफआईआर

9 / एक हफ्ते में हर स्कूल में PM ई-विद्या चैनल रोज चलेगा
अगले 3 साल की मास्टर प्लान 31 जनवरी 2026 तक विभाग को जमा

10/ मंत्री ने कड़े लहजे में कहा, “शिक्षा सुधार मेरी प्राथमिकता नहीं, मजबूरी है। जो नहीं कर सकता, वो अभी इस्तीफा दे दे।”

बच्चों की क्रिएटिविटी ने जीता दिल

बैठक के बाद मंत्री ने प्रदर्शनी देखी और मूड 180 डिग्री पलट गया।
अटल टिंकरिंग लैब का स्मार्ट डेम सिंचाई मॉडल देखकर बच्चे को गले लगा लिया
बसना के बच्चों का “जादुई गणित पिटारा” देखकर खुद खेलने लगे
बागबाहरा की AI प्रदर्शनी पर बोले, “ये बच्चे दुनिया बदलेंगे, बस हमें अपना काम ठीक करना है”
अंत में मंत्री का क्लोजिंग पंच:
“बच्चे तैयार हैं, संसाधन तैयार हैं, अब सिर्फ आपकी इच्छाशक्ति बाकी है।
2026 में रिजल्ट आएगा, तब देखते हैं कौन खड़ा रहता है और कौन गिरता है!”
रायपुर संभाग में आज से काउंटडाउन शुरू:
90% या goodbye!
जल्दी देखते हैं कौन बचता है…