दृश्यम मूवी की तर्ज पर कोरोना काल के गर्भ में “कफ़न” पहन “दफन” हो गया “39 लाख” का भूत
नोटिस के दो साल बाद भी जवाबदेही पर सवाल, CEO जिला पंचायत और उप संचालक पंचायत की कार्यप्रणाली पर उठी उंगलियां!
सैनिटाइजर, मास्क और स्वच्छता सामग्री की खरीदी से जुड़ा मामला फिर चर्चा में; 26 जून 2024 को जारी हुए थे कारण बताओ नोटिस, अब जांच के निष्कर्ष और अंतिम कार्रवाई सार्वजनिक करने की मांग
प्रधान संपादक मयंक गुप्ता | बेबाक बयान न्यूज़ / 23 अक्टूबर 2026/दिन शुक्रवार
महासमुंद, छत्तीसगढ़। यह एक बहुचर्चित सस्पेंस थ्रीलर मूवी दृश्यम से कम नहीं आंका जा सकता है।
क्यों इस 39 लाख के मूवी को ऐसा तैयार किया गया है जब जब कोई सबूत मिलेगा उसको फिर से दफन करने में महारत हासिल किये हुए कलाकार अपनी कलाकृति से नए स्क्रिप्ट के रूप में सामने आ जाता है।
बता दे कि, पूरे पंचायत जगत में यह चर्चा का विषय बना हुआ है कि, जिस करारोपण अधिकारी लिपिक दिलीप कुमार मनहरे को जांच अधिकारी बनाकर शिकायत मिलने पर जांच टीम गठित की जाती है और ग्राम पंचायतों में जांच अधिकारी बन रौब दिखाते हुए सरपंचों को कहा जाता है कि, ज्यादा नेतागिरी करोगे तो धारा 40 के तहत निपटा दूंगा। जबकि जांचकर्ता अधिकारी द्वारा किए गए कृत्य में स्वयं आरोप सिद्ध होने पर भी आज दिवस तक किसी प्रकार से कोई कार्यवाही नहीं होना अपने आप में प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है।
कहां जाता है कि, जब जब जिस जिस युगों में महामारी किसी भी रूप में जन्म लेती है तो उस युग के जीवंत जीवों को नफ़ा और नुकसान तो सहना ही पड़ता है कोई रोता है तो तो कोई उन रोते हुए परिवारों को लूटने में पीछे नहीं हटते । इसी लिए कहा जाता है कि, कोई भी महामारी किसी को बहुत आगे ले जाती है और किसी को बहुत पीछे छोड़ जाती है। ताजा उदाहरण सम्पूर्ण प्रदेश में व्याप्त कोरोना महामारी के दौर में सरकारी धन से की गई खरीदी और उसके भुगतान की पारदर्शिता को लेकर महासमुंद जनपद पंचायत का एक पुराना मामला एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। सैनिटाइजर, मास्क और स्वच्छता सामग्री की खरीदी से संबंधित लगभग 39 लाख रुपये के कथित वित्तीय अनियमितता प्रकरण में कारण बताओ नोटिस जारी होने के बावजूद अंतिम कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट नहीं होने का आरोप लगाया जा रहा है। ऐसे में सवाल केवल खरीदी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी है कि संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों से जवाब मांगने के बाद प्रशासन ने आगे क्या कदम उठाए?
इस मामले में मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जिला पंचायत महासमुंद तथा उप संचालक पंचायत की कार्यप्रणाली को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। यदि प्रकरण में अनियमितताओं को लेकर नोटिस जारी किए गए थे, तो उनकी जांच का निष्कर्ष क्या निकला? संबंधित पक्षों के जवाबों का परीक्षण किस स्तर पर हुआ? और यदि नियमों का उल्लंघन प्रमाणित पाया गया, तो जिम्मेदारी निर्धारित करने तथा आगे की कार्रवाई में देरी क्यों हुई? इन सवालों का स्पष्ट जवाब सामने आना जरूरी है।
कोरोना काल की खरीदी पर संदेह, ₹39 लाख के खर्च का हिसाब मांग रहे सवाल
उपलब्ध विवरण के अनुसार, वर्ष 2019-20 के दौरान जनपद पंचायत महासमुंद में कोरोना संक्रमण की रोकथाम और स्वच्छता व्यवस्था के लिए सैनिटाइजर, मास्क तथा अन्य आवश्यक सामग्री की खरीदी की गई थी। इसी खरीदी और भुगतान प्रक्रिया को लेकर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं।
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि खरीदी के दौरान निर्धारित प्रक्रियाओं का समुचित पालन नहीं किया गया। भुगतान की स्वीकृति, वेंडरों के चयन, बिल-वाउचर की वैधता और सामग्री की वास्तविक आपूर्ति जैसे बिंदुओं पर जांच की आवश्यकता जताई गई है।
हालांकि, इन आरोपों को अंतिम रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता। इसकी वास्तविक स्थिति संबंधित खरीदी की मूल नस्ती, स्वीकृति आदेश, भुगतान अभिलेख, स्टॉक रजिस्टर और जांच रिपोर्ट के परीक्षण से ही स्पष्ट होगी।
खरीदी प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों को लेकर उठे ये सवाल
मामले से संबंधित शिकायत में कई बिंदुओं पर आपत्ति जताई गई है। इनमें प्रमुख रूप से निम्न सवाल शामिल हैं:
1.क्या नियमों के अनुसार हुई थी खरीदी?
क्या सैनिटाइजर, मास्क और स्वच्छता सामग्री की खरीदी के लिए सक्षम अधिकारी की विधिवत स्वीकृति ली गई थी? क्या लागू भंडार क्रय नियमों और निर्धारित वित्तीय प्रक्रियाओं का पालन किया गया था? यदि किसी विशेष परिस्थिति में सामान्य प्रक्रिया से अलग व्यवस्था अपनाई गई, तो क्या उसके समर्थन में वैध आदेश और दस्तावेज मौजूद हैं?
2.भुगतान की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी थी?
शिकायत में आरोप है कि भुगतान प्रक्रिया में आवश्यक औपचारिकताओं की अनदेखी की गई। ऐसे में यह स्पष्ट होना चाहिए कि भुगतान किन फर्मों या वेंडरों को किया गया, भुगतान की स्वीकृति किस अधिकारी ने दी और प्रत्येक भुगतान के समर्थन में कौन-कौन से दस्तावेज उपलब्ध हैं।
3.खरीदी गई सामग्री की वास्तविक आपूर्ति हुई या नहीं?
सरकारी धन से खरीदी गई सामग्री की मात्रा, गुणवत्ता और वितरण का सत्यापन महत्वपूर्ण है। क्या संबंधित सामग्री का स्टॉक रजिस्टर में विधिवत संधारण हुआ? क्या सामग्री प्राप्त होने के प्रमाण, वितरण सूची और भौतिक सत्यापन रिपोर्ट उपलब्ध हैं? यदि सामग्री की आपूर्ति हुई थी, तो उसके दस्तावेज सार्वजनिक जांच के लिए महत्वपूर्ण होंगे।
4.बिल-वाउचर और बैंक रिकॉर्ड की जांच हुई या नहीं?
किसी भी वित्तीय अनियमितता के आरोप की निष्पक्ष जांच के लिए मूल बिल, वाउचर, भुगतान आदेश, बैंक विवरण और संबंधित फर्मों के अभिलेखों का मिलान आवश्यक है। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि इन दस्तावेजों की जांच किसी सक्षम अधिकारी या लेखा परीक्षण दल ने की थी या नहीं।
इन बिंदुओं पर प्रमाण आधारित जांच ही तय कर सकती है कि मामला प्रक्रियागत चूक का है या इसमें कोई गंभीर वित्तीय अनियमितता हुई है।
26 जून 2024 को जारी हुए थे कारण बताओ नोटिस
इस प्रकरण का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जिला पंचायत महासमुंद द्वारा 26 जून 2024 को तत्कालीन संकाय शाखा प्रभारी समृद्धि शर्मा तथा तत्कालीन लिपिक दिलीप मनहरे को अलग-अलग कारण बताओ नोटिस जारी किए जाने की जानकारी सामने आई है।
बताया गया है कि नोटिस में खरीदी और भुगतान प्रक्रिया से संबंधित आपत्तियां दर्ज करते हुए संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों से तीन दिनों के भीतर जवाब मांगा गया था। उपलब्ध विवरण के अनुसार, नोटिस में संतोषजनक जवाब नहीं मिलने की स्थिति में निलंबन और अनुशासनात्मक कार्रवाई किए जाने की बात भी कही गई थी।
यदि नोटिस में निर्धारित समयसीमा के भीतर जवाब मांगे गए थे, तो अब यह जानना जरूरी है कि संबंधित पक्षों ने जवाब प्रस्तुत किए या नहीं। जवाब प्रस्तुत किए जाने की स्थिति में उनका परीक्षण किस अधिकारी ने किया?
क्या जांच अधिकारी नियुक्त किया गया? क्या आरोपों की पुष्टि या खारिज करने के लिए दस्तावेजों की जांच हुई? और क्या किसी सक्षम प्राधिकारी ने अंतिम आदेश जारी किया?
इन सवालों के जवाब के बिना केवल नोटिस जारी होने को अंतिम कार्रवाई नहीं माना जा सकता।
CEO जिला पंचायत और उप संचालक पंचायत की भूमिका पर सवाल
मामले में मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जिला पंचायत महासमुंद तथा उप संचालक पंचायत की कार्यप्रणाली को लेकर जवाबदेही संबंधी प्रश्न उठाए जा रहे हैं। खासकर यह जानना महत्वपूर्ण है कि नोटिस जारी होने के बाद प्रकरण किस स्तर पर लंबित रहा और उसकी वर्तमान प्रशासनिक स्थिति क्या है।
यदि संबंधित अधिकारियों के समक्ष जांच और कार्रवाई की फाइल लंबित रही है, तो उसके कारण स्पष्ट किए जाने चाहिए। यदि जांच पूरी हो चुकी है, तो उसके निष्कर्ष और आदेश की जानकारी सामने आनी चाहिए। वहीं, यदि किसी अन्य विभाग या सक्षम प्राधिकारी के स्तर पर निर्णय लंबित है, तो उसकी स्थिति भी स्पष्ट की जानी चाहिए।
सवाल यह नहीं कि केवल नोटिस जारी हुआ था; सवाल यह है कि नोटिस के बाद जांच कहां तक पहुंची और जवाबदेही तय करने के लिए क्या कार्रवाई हुई?
इस मामले में किसी अधिकारी या कर्मचारी को दोषी ठहराने से पहले जांच के निष्कर्ष और संबंधित पक्षों का जवाब सामने आना आवश्यक है। लेकिन सार्वजनिक धन से जुड़े मामले में कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट करना प्रशासनिक पारदर्शिता की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
पुलिस अधीक्षक, कलेक्टर और ACB/EOW से जांच की मांग
इस मामले को लेकर बेबाक बयान न्यूज़ के प्रधान संपादक मयंक गुप्ता द्वारा पुलिस अधीक्षक, जिला कलेक्टर महासमुंद तथा भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB)/आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (EOW), रायपुर के समक्ष शिकायत आवेदन प्रस्तुत किए जाने की जानकारी दी गई है।
शिकायत के माध्यम से मामले की निष्पक्ष जांच कराकर वित्तीय लेन-देन की वास्तविक स्थिति सामने लाने और यदि आरोप प्रमाणित हों, तो संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई करने की मांग की गई है।
शिकायत में प्रमुख रूप से निम्न मांगें उठाई गई हैं।
निष्पक्ष जांच: खरीदी की मूल नस्ती, स्वीकृति आदेश, बिल-वाउचर, बैंक रिकॉर्ड और सामग्री की आपूर्ति से जुड़े दस्तावेजों की जांच कराई जाए।
जिम्मेदारी तय हो: भुगतान की स्वीकृति देने, बिलों का परीक्षण करने और सामग्री की प्राप्ति दर्ज करने वाले संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका की जांच की जाए।
आपराधिक कार्रवाई पर निर्णय: यदि जांच में धोखाधड़ी, जालसाजी, आपराधिक षड्यंत्र या भ्रष्टाचार से संबंधित अपराध के पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं, तो सक्षम प्राधिकारी द्वारा लागू कानूनों के तहत FIR और आगे की कार्रवाई पर निर्णय लिया जाए।
विभागीय कार्रवाई: यदि विभागीय जांच में कदाचार प्रमाणित होता है, तो संबंधित सेवा नियमों के अनुसार कार्रवाई की जाए।
राशि की वसूली: यदि सरकारी धन का अनुचित भुगतान या नुकसान प्रमाणित होता है, तो विधिसम्मत प्रक्रिया के तहत जिम्मेदार पक्षों से वसूली की कार्रवाई की जाए।
वित्तीय एवं फॉरेंसिक जांच: आवश्यकता के अनुसार बिल-वाउचर, बैंक लेन-देन और आपूर्ति संबंधी अभिलेखों का स्वतंत्र परीक्षण कराया जाए।
क्या दो साल बाद भी अंतिम कार्रवाई का इंतजार?
26 जून 2024 को कारण बताओ नोटिस जारी किए जाने के विवरण और अब तक अंतिम कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट नहीं होने के आरोप के बीच यह मामला प्रशासनिक जवाबदेही का महत्वपूर्ण प्रश्न बन गया है। हालांकि, अंतिम आदेश जारी हुआ है या नहीं, विभागीय जांच की क्या स्थिति है और किसी स्तर पर कार्रवाई की गई है या नहीं—इन तथ्यों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
यदि प्रकरण में अब तक कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है, तो संबंधित विभाग को विलंब के कारण स्पष्ट करने चाहिए। वहीं, यदि जांच पूरी हो चुकी है, तो उसके निष्कर्ष और की गई कार्रवाई की जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए, ताकि तथ्यों के आधार पर स्थिति स्पष्ट हो सके।
सरकारी धन जनता के करों और सार्वजनिक संसाधनों से जुड़ा होता है। इसलिए ऐसी खरीदी में पारदर्शिता, दस्तावेजों का सत्यापन और समयबद्ध कार्रवाई केवल विभागीय औपचारिकता नहीं, बल्कि सार्वजनिक जवाबदेही का हिस्सा है।
प्रशासन से सीधे सवाल
₹39 लाख की कथित अनियमितता से जुड़े मामले की वर्तमान स्थिति क्या है?
26 जून 2024 को जारी कारण बताओ नोटिस के बाद संबंधित पक्षों के जवाबों पर क्या निर्णय लिया गया?
क्या खरीदी, भुगतान और सामग्री की आपूर्ति का स्वतंत्र सत्यापन कराया गया?
मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जिला पंचायत महासमुंद और उप संचालक पंचायत के स्तर पर फाइल की क्या स्थिति है?
यदि आरोप प्रमाणित पाए गए हैं, तो अब तक क्या विभागीय, वित्तीय या कानूनी कार्रवाई की गई है?
यदि कोई कार्रवाई नहीं हुई है, तो देरी के कारण क्या हैं और अंतिम निर्णय कब तक लिया जाएगा?
अब जवाबदेही तय करने की जरूरत
महासमुंद जनपद पंचायत के कोरोना कालीन खरीदी प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है—दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच, आरोपों की पुष्टि या खंडन और जिम्मेदारी का स्पष्ट निर्धारण। केवल आरोपों के आधार पर किसी को दोषी ठहराना उचित नहीं है, लेकिन गंभीर वित्तीय सवालों को अनिश्चितकाल तक लंबित रखना भी सार्वजनिक हित में नहीं होगा।
शिकायतकर्ता की ओर से मामले में त्वरित जांच और आवश्यक कानूनी कार्रवाई की मांग की गई है। साथ ही, कार्रवाई नहीं होने की स्थिति में मामले को उच्च न्यायालय छत्तीसगढ़ तथा सक्षम विशेष न्यायालय के समक्ष ले जाने की चेतावनी दिए जाने की जानकारी भी सामने आई है।
अब देखना होगा कि जिला प्रशासन, जिला पंचायत और संबंधित विभाग इस मामले में क्या आधिकारिक जानकारी देते हैं और कथित ₹39 लाख की खरीदी से जुड़े सवालों का जवाब किस तरह सामने आता है।
बेबाक बयान न्यूज़ का पक्ष: इस समाचार में उठाए गए वित्तीय अनियमितता संबंधी बिंदु शिकायत और उपलब्ध विवरण पर आधारित हैं। संबंधित अधिकारियों, कर्मचारियों तथा अन्य पक्षों का आधिकारिक जवाब और जांच का अंतिम निष्कर्ष सामने आने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाना चाहिए।