महासमुंद में आस्था के दरबार पर शुल्क का विवाद..! अम्बेडकर चौक में ‘शीघ्र दर्शन’ के नाम पर 10–20 रुपये की पर्ची काटने का आरोप, श्रद्धालुओं में नाराजगी
समिति की पारदर्शिता और प्रशासन की निगरानी पर उठे सवाल
प्रधान संपादक मयंक गुप्ता/16 अक्टूबर 2026 / दिन शुक्रवार
महासमुंद। शारदीय नवरात्रि के पावन अवसर पर महासमुंद शहर माता रानी की भक्ति, श्रद्धा और धार्मिक उत्साह में सराबोर है। शहर के विभिन्न चौक-चौराहों पर आकर्षक दुर्गा पंडाल, मनमोहक झांकियां और धार्मिक कलाकृतियां श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं। मां राजराजेश्वरी महामाया के दरबार से लेकर अलग-अलग पूजा स्थलों तक भक्तों की आवाजाही जारी है। लेकिन इसी धार्मिक माहौल के बीच तुमगांव ढाल स्थित अम्बेडकर चौक में बनाई गई ‘माता वैष्णो देवी गुफा दर्शन’ की झांकी को लेकर शुल्क वसूली का विवाद सामने आया है।
आरोप है कि यहां ‘शीघ्र दर्शन’, ‘सामान्य दर्शन’ और दान के नाम पर 10 रुपये तथा 20 रुपये की पर्चियां काटी जा रही हैं। इस व्यवस्था को लेकर कुछ श्रद्धालुओं और स्थानीय नागरिकों ने आपत्ति जताई है। उनका सवाल है कि जब धार्मिक आयोजन का उद्देश्य लोगों को आस्था से जोड़ना और
श्रद्धालुओं को माता रानी के दर्शन कराना है, तो दर्शन व्यवस्था में अलग-अलग शुल्क लेने का आधार क्या है? हालांकि, इस मामले में समिति का पक्ष, शुल्क की आधिकारिक स्थिति और प्रशासन की प्रतिक्रिया सामने आना अभी बाकी है।
अम्बेडकर चौक की गुफा झांकी बनी आकर्षण, लेकिन शुल्क व्यवस्था पर विवाद
तुमगांव ढाल स्थित अम्बेडकर चौक पर ‘जय मां भवानी दुर्गा पूजा समिति’ के नाम से माता वैष्णो देवी गुफा दर्शन की झांकी तैयार किए जाने की जानकारी सामने आई है। धार्मिक स्वरूप में बनाई गई इस झांकी को देखने के लिए श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। नवरात्रि के दौरान ऐसी झांकियां लोगों को धार्मिक परंपराओं से जोड़ने और पर्व की रौनक बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
लेकिन झांकी के सामने टेंट लगाकर दर्शनार्थियों से कथित तौर पर 10 और 20 रुपये की पर्चियां काटे जाने की व्यवस्था ने विवाद खड़ा कर दिया है। स्थानीय लोगों के अनुसार, पर्चियों पर ‘शीघ्र दर्शन’, ‘सामान्य दर्शन’ अथवा ‘दान पत्र’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जा रहा है।
अब इस पूरे मामले में यह स्पष्ट होना जरूरी है कि संबंधित राशि अनिवार्य प्रवेश शुल्क के रूप में ली जा रही है, किसी विशेष सुविधा के लिए निर्धारित की गई है या स्वैच्छिक दान के तौर पर मांगी जा रही है। इन तीनों व्यवस्थाओं की प्रकृति अलग-अलग है। इसलिए वास्तविक स्थिति सामने आए बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।
रसीद पर पदाधिकारियों का नाम और संपर्क विवरण नहीं होने का आरोप
इस विवाद का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू समिति की पारदर्शिता से जुड़ा है। स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि इस्तेमाल की जा रही रसीद पुस्तिका पर समिति के जिम्मेदार पदाधिकारियों के नाम और संपर्क संबंधी जानकारी स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं है।
यदि रसीद पर समिति की पहचान, जिम्मेदार व्यक्ति और राशि प्राप्त करने का उद्देश्य स्पष्ट नहीं है, तो श्रद्धालुओं के मन में स्वाभाविक रूप से सवाल उठ सकते हैं। धार्मिक आयोजनों में आर्थिक सहयोग लेने की स्थिति में भी लोगों को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि उनसे किस उद्देश्य से राशि मांगी जा रही है और प्राप्त धन का हिसाब कौन रख रहा है।
ऐसे में संबंधित समिति को सामने आकर रसीद व्यवस्था, शुल्क निर्धारण और दान संग्रह के उद्देश्य पर स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए, ताकि किसी तरह की गलतफहमी की गुंजाइश न रहे।
अन्य पंडालों में निःशुल्क दर्शन, फिर यहां अलग व्यवस्था क्यों..?
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि महासमुंद शहर के अन्य स्थानों पर भी नवरात्रि के दौरान भव्य दुर्गा पंडाल और आकर्षक धार्मिक झांकियां स्थापित की गई हैं। उनके मुताबिक, कई स्थानों पर श्रद्धालु बिना प्रवेश शुल्क दिए माता रानी के दर्शन कर रहे हैं।
इसी तुलना के कारण अम्बेडकर चौक की व्यवस्था को लेकर सवाल उठ रहे हैं। लोगों का कहना है कि यदि यहां दर्शन के लिए कोई शुल्क निर्धारित किया गया है, तो उसकी स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए। वहीं, यदि राशि स्वैच्छिक दान के रूप में ली जा रही है, तो श्रद्धालुओं पर भुगतान करने का दबाव नहीं होना चाहिए।
हालांकि, अलग-अलग पूजा समितियों की व्यवस्थाएं एक जैसी हों, यह आवश्यक नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि किसी भी शुल्क या दान की प्रकृति स्पष्ट हो, श्रद्धालुओं को भ्रमित न किया जाए और लागू नियमों का पालन किया जाए।
आस्था के नाम पर आर्थिक लेन-देन की निगरानी कौन करेगा..?
नवरात्रि जैसे बड़े धार्मिक पर्व पर हजारों लोग परिवार सहित दर्शन के लिए निकलते हैं। ऐसे अवसरों पर पूजा समितियों की जिम्मेदारी केवल झांकी सजाने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि भीड़ प्रबंधन, सुरक्षा, स्वच्छता और आर्थिक पारदर्शिता भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
अम्बेडकर चौक के मामले में अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या संबंधित समिति ने शुल्क या दान संग्रह की व्यवस्था के संबंध में स्थानीय प्रशासन को जानकारी दी है? क्या पर्चियों पर पर्याप्त विवरण दर्ज है? क्या दर्शनार्थियों को यह बताया जा रहा है कि राशि देना अनिवार्य है या पूरी तरह स्वैच्छिक?
इन सवालों का जवाब संबंधित समिति और प्रशासन की जांच अथवा आधिकारिक स्पष्टीकरण से ही सामने आ सकता है। केवल आरोपों के आधार पर इसे अवैध वसूली घोषित करना उचित नहीं होगा, लेकिन शिकायतों की निष्पक्ष जांच और तथ्यात्मक स्थिति स्पष्ट करना भी आवश्यक है।
जिला प्रशासन और पुलिस से निष्पक्ष जांच की अपेक्षा
इस मामले में जिला प्रशासन, स्थानीय पुलिस और संबंधित निकाय के अधिकारियों से अपेक्षा है कि वे शिकायतों की जानकारी लेकर वास्तविक स्थिति की जांच करें। यदि शुल्क लिया जा रहा है, तो उसका आधार, अनुमति संबंधी स्थिति और रसीद की पारदर्शिता नियमानुसार परखी जानी चाहिए। यदि दान स्वैच्छिक है, तो श्रद्धालुओं को इसकी स्पष्ट जानकारी दी जानी चाहिए।
जांच के दौरान पूजा समिति का पक्ष भी सुना जाना चाहिए, ताकि किसी निर्दोष व्यक्ति या संस्था पर एकतरफा आरोप न लगे। यदि किसी नियम का उल्लंघन प्रमाणित होता है, तो संबंधित प्रावधानों के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है।
अब जवाब का इंतजार: श्रद्धालुओं की सुविधा या शुल्क को लेकर भ्रम..?
अम्बेडकर चौक की ‘माता वैष्णो देवी गुफा दर्शन’ झांकी को लेकर उठे सवालों का समाधान तथ्यों और पारदर्शिता से ही संभव है। समिति की ओर से स्पष्ट जानकारी और प्रशासन की ओर से निष्पक्ष जांच सामने आने पर ही यह तय हो सकेगा कि पर्चियों के जरिए राशि किस उद्देश्य से ली जा रही थी और व्यवस्था में किसी सुधार की आवश्यकता है या नहीं।
सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या श्रद्धालुओं को दर्शन और दान के बीच का अंतर स्पष्ट रूप से बताया जा रहा है?
नवरात्रि का पर्व श्रद्धा, सेवा और सामाजिक सद्भाव का प्रतीक है। ऐसे में धार्मिक आयोजनों से जुड़े हर आर्थिक लेन-देन में स्पष्टता और जवाबदेही बनी रहनी चाहिए, ताकि भक्तों की आस्था के साथ किसी प्रकार का भ्रम या असंतोष पैदा न हो।
बेबाक बयान न्यूज की नजर इस मामले पर बनी रहेगी। संबंधित समिति और प्रशासन का पक्ष सामने आने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।