39 लाख से DSC तक: महासमुंद की पंचायतों में फाइलों का सफर, भुगतान का खेल और कार्रवाई का इंतजार
विशेष रिपोर्ट: मयंक गुप्ता, प्रधान संपादक / 21 सितम्बर 2026 / दिन सोमवार
महासमुंद (छत्तीसगढ़)।
महासमुंद में पंचायत व्यवस्था से जुड़े वित्तीय मामलों को लेकर उठ रहे सवाल अब सिर्फ किसी एक पंचायत या किसी एक कर्मचारी तक सीमित नहीं दिखाई देते। एक तरफ पुराने वित्तीय अनियमितता के आरोपों से जुड़ी जांच और कार्रवाई का सवाल है, तो दूसरी तरफ डिजिटल सिग्नेचर (DSC), बिल-वाउचर और पंचायत भुगतान प्रक्रिया को लेकर नई शिकायतों ने व्यवस्था की निगरानी पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
सार्वजनिक रूप से सामने आई एक रिपोर्ट में महासमुंद जिले की एक पंचायत में 15वें वित्त आयोग की राशि को कथित तौर पर अपूर्ण दस्तावेजों और कोरे बिल-वाउचर के आधार पर निकालने के आरोपों का उल्लेख किया गया था। ऐसे में महासमुंद की पंचायतों में वित्तीय प्रक्रिया की पारदर्शिता और डिजिटल भुगतान व्यवस्था की निगरानी पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
सवाल नंबर-1: पंचायत की DSC किसके पास और क्यों?
04 अगस्त 2026 की शिकायत के अनुसार, जनपद पंचायत महासमुंद की संकाय शाखा में पदस्थ कर्मचारी श्रीमती समृद्धि शर्मा पर कुछ पंचायत प्रतिनिधियों के डिजिटल सिग्नेचर सर्टिफिकेट (DSC) अपने पास रखने का आरोप लगाया गया है।
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि DSC पंचायत प्रतिनिधियों के पास रहने के बजाय दूसरे स्तर पर रखे जाने से भुगतान प्रक्रिया पर वास्तविक नियंत्रण को लेकर सवाल पैदा हो रहे हैं।
इसी शिकायत में कोरे अथवा अपूर्ण बिल-वाउचर के माध्यम से भुगतान किए जाने और DSC वापस मांगने पर भुगतान प्रभावित होने की कथित धमकियों का भी उल्लेख है।
अब असली सवाल यह है—यदि आरोप गलत हैं तो रिकॉर्ड सार्वजनिक करके स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं की जाती? और यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो जिम्मेदारी तय करने में देरी क्यों?
सवाल नंबर-2: 39 लाख की पुरानी फाइल अभी तक बंद क्यों नहीं?
वर्ष 2019-20 से जुड़ी 15वें वित्त आयोग की राशि में लगभग 39 लाख रुपये की कथित वित्तीय अनियमितता का मामला भी इस पूरे प्रकरण को और गंभीर बनाता है।
शिकायतकर्ताओं का दावा है कि कोरोना काल में सैनिटाइजर, मास्क और अन्य सामग्री की खरीदी के नाम पर भुगतान में गड़बड़ी की गई।
लेकिन यहां सबसे महत्वपूर्ण बात आरोप नहीं, बल्कि जांच और उसके बाद की कार्रवाई है।
यदि जांच पूरी हो चुकी है, तो जनता जानना चाहती है—
कितनी राशि का वास्तविक भुगतान हुआ?
किस मद में हुआ?
किन दस्तावेजों के आधार पर हुआ?
किस अधिकारी ने भुगतान स्वीकृत किया?
जांच में क्या निष्कर्ष निकला?
और जिम्मेदारी किसकी तय हुई?
इन सवालों का जवाब दस्तावेजों के साथ सामने आना चाहिए।
जांच रिपोर्ट जमा होने के बाद अगला कदम क्या?
मामले से संबंधित पक्षों के अनुसार जनपद पंचायत की CEO मिषा कोसले द्वारा जांच पूरी कर रिपोर्ट जिला पंचायत कार्यालय में जमा कराई गई है।
अब निगाह जिला पंचायत CEO एस. आलोक और संबंधित प्रशासनिक स्तर पर होने वाली कार्रवाई पर है।
यहां सवाल किसी अधिकारी को दोषी ठहराने का नहीं, बल्कि जांच रिपोर्ट की प्रशासनिक स्थिति स्पष्ट करने का है।
यदि रिपोर्ट में अनियमितता पाई गई है तो आगे की वैधानिक कार्रवाई क्या हुई?
यदि आरोप प्रमाणित नहीं हुए तो क्या प्रशासन ने शिकायतकर्ताओं को लिखित रूप से इसकी जानकारी दी.
?
फाइल की वास्तविक स्थिति ही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा जवाब हो सकती है।
खैरा-खट्टी प्रकरण ने बढ़ाए दूसरे सवाल
24 जून 2026 को जिले की ग्राम पंचायतों में ग्राम सभाओं के आयोजन के निर्देश जारी किए गए थे। सार्वजनिक रिपोर्टिंग के अनुसार उस दिन महासमुंद जिले की सभी ग्राम पंचायतों में ग्राम सभा आयोजित की जानी थी।
इसी अवधि से जुड़े खैरा और खट्टी पंचायत प्रकरण में शिकायतकर्ताओं ने सचिव मोती मेहरा पर अपनी मूल पंचायत की बैठक से अनुपस्थित रहने और ग्राम पंचायत खट्टी में पहुंचकर कार्यवाही में हस्तक्षेप करने के आरोप लगाए हैं।
शिकायत में यह भी कहा गया है कि खट्टी पंचायत की सरपंच उनकी पत्नी श्रीमती अनिता मेहरा हैं।
इन आरोपों की पुष्टि या खंडन संबंधित जांच अभिलेखों से होना चाहिए। यदि जांच में ग्रामीणों के बयान, उपस्थिति रजिस्टर, फोटो अथवा अन्य दस्तावेज लिए गए हैं, तो प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि जांच का निष्कर्ष क्या रहा।
06 अगस्त की जांच के बाद क्या हुआ..?
शिकायत के अनुसार, 06 अगस्त 2026 को ग्राम पंचायत खट्टी में जांच टीम पहुंची और ग्रामीणों के बयान दर्ज किए गए।
यदि जांच वास्तव में पूरी हो चुकी है, तो अब जनता का सवाल सीधा है—
जांच रिपोर्ट में क्या लिखा है?
किसकी जिम्मेदारी तय हुई?
क्या विभागीय कार्रवाई प्रस्तावित की गई?
और यदि कार्रवाई नहीं हुई तो उसका कारण क्या है?
किसी भी शिकायत में आरोप लग जाना अपने आप में दोष सिद्ध होना नहीं है। लेकिन जांच पूरी होने के बाद उसका निष्कर्ष सामने न आना भी पारदर्शिता के सवाल पैदा करता है।
असली मुद्दा: पंचायत में पैसा और डिजिटल अधिकार किसके नियंत्रण में..?
पूरे मामले को एक साथ देखने पर चार बिंदु सबसे महत्वपूर्ण बनते हैं—
पहला— पंचायत की DSC की सुरक्षा और उसके उपयोग की जवाबदेही।
दूसरा— बिल-वाउचर और भुगतान प्रक्रिया की पारदर्शिता।
तीसरा— पुराने वित्तीय अनियमितता के मामलों में जांच के बाद कार्रवाई की स्थिति।
चौथा— पंचायत प्रतिनिधियों और सचिवों के बीच अधिकारों तथा शासकीय कार्यप्रणाली से जुड़े विवादों का निष्पक्ष निपटारा।
इन चारों सवालों का जवाब यदि दस्तावेजों के साथ सामने आता है तो विवाद की वास्तविक तस्वीर स्वतः स्पष्ट हो सकती है।
प्रशासन से 7 सीधे सवाल
- 39 लाख रुपये से जुड़ी जांच रिपोर्ट में अंतिम निष्कर्ष क्या है?
- जांच रिपोर्ट जिला पंचायत कार्यालय में कब प्राप्त हुई?
- रिपोर्ट के आधार पर अब तक कौन-सी कार्रवाई की गई?
- पंचायतों की DSC किसके पास रखने की अनुमति है और उसकी जवाबदेही किस अधिकारी की है?
- कोरे या अपूर्ण बिल-वाउचर से भुगतान के आरोपों की जांच हुई या नहीं?
- खैरा-खट्टी प्रकरण की जांच रिपोर्ट में क्या निष्कर्ष निकला?
- यदि आरोप प्रमाणित नहीं हुए हैं, तो संबंधित शिकायतकर्ताओं को इसकी लिखित जानकारी कब दी गई?
जनता को चाहिए आरोप नहीं, दस्तावेजों वाला जवाब
पंचायतों में विकास के लिए आने वाला प्रत्येक रुपया सार्वजनिक धन है। इसलिए उसका भुगतान, स्वीकृति, बिल, वाउचर और डिजिटल प्रक्रिया रिकॉर्ड में स्पष्ट होना चाहिए।
महासमुंद में उठे इन सवालों का समाधान किसी बयान, आश्वासन या मौखिक जवाब से नहीं, बल्कि जांच रिपोर्ट, भुगतान अभिलेख और कार्रवाई की आधिकारिक स्थिति सामने आने से होगा।
अब देखना यह है कि संबंधित प्रशासन इन सवालों का जवाब कितनी जल्दी और कितनी पारदर्शिता से सामने रखता है।
क्योंकि सवाल सिर्फ 39 लाख रुपये का नहीं है—सवाल यह है कि पंचायत के पैसे पर अंतिम नियंत्रण किसका है और उसकी जवाबदेही किसकी है..?
यह संस्करण आरोपों को तथ्य की तरह पेश करने के बजाय दस्तावेज और जवाबदेही केंद्रित खोजी रिपोर्ट बनाता है, जिससे खबर का असर भी बना रहता है और कानूनी जोखिम अपेक्षाकृत कम होता है।

