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महासमुंद में तेज रफ्तार का कहर..! दो सगे भाइयों की जिंदगी दांव पर, एक वेंटिलेटर पर तो दूसरा गंभीर रुप से घायल; हादसे के बाद कार छिपाने और नंबर प्लेट गायब करने के आरोप

महासमुंद में तेज रफ्तार का कहर..! दो सगे भाइयों की जिंदगी दांव पर, एक वेंटिलेटर पर तो दूसरा गंभीर रुप से घायल; हादसे के बाद कार छिपाने और नंबर प्लेट गायब करने के आरोप

सरपंच प्रतिनिधि के रिश्तेदार पर दुर्घटना का आरोप, पीड़ित परिवार को महज 20 हजार रुपये देने की बात आई सामने; पुलिस की जांच और कार्रवाई पर उठे गंभीर सवाल

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता
13 अक्टूबर 2026 | मंगलवार
महासमुंद, छत्तीसगढ़।
महासमुंद जिले में सड़क सुरक्षा और कानून के निष्पक्ष पालन को लेकर एक गंभीर मामला सामने आया है। खल्लारी थाना क्षेत्र के अवराडबरी नेशनल हाईवे पर हुए सड़क हादसे में दो सगे भाई गंभीर रूप से घायल हो गए। इनमें बड़े भाई दीनदयाल यादव की हालत बेहद नाजुक बताई जा रही है। परिजनों के अनुसार, वह अस्पताल में वेंटिलेटर सपोर्ट पर हैं और कोमा की स्थिति में जिंदगी की जंग लड़ रहे हैं। वहीं, छोटे भाई थानेश्वर यादव की भी कई हड्डियां टूटने से हालत गंभीर हो गई।

इस हादसे ने दो परिवारों की खुशियों को गहरे संकट में डाल दिया है। एक ओर तीन छोटी बेटियों के पिता दीनदयाल यादव के जीवन को लेकर परिवार चिंतित है, तो दूसरी ओर महज दो महीने की बच्ची के पिता थानेश्वर यादव भी गंभीर चोटों से जूझ रहे हैं। दोनों भाई मेहनत-मजदूरी कर अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे।

मामले को लेकर अब दुर्घटना के कारणों के साथ-साथ कथित समझौते, दुर्घटनाग्रस्त कार की स्थिति और साक्ष्यों से छेड़छाड़ के आरोपों की निष्पक्ष जांच की मांग उठ रही है। सबसे अहम सवाल यह है कि क्या पूरे मामले में कानून के अनुसार कार्रवाई होगी और पीड़ित परिवार को न्याय मिल पाएगा?

कैसे हुआ दर्दनाक हादसा..?

प्राप्त जानकारी और परिजनों के बताए घटनाक्रम के अनुसार, 9 अक्टूबर 2026 को सुबह लगभग 11 से 12 बजे के बीच खल्लारी थाना क्षेत्र के अवराडबरी नेशनल हाईवे पर यह दुर्घटना हुई।
बताया गया है कि ग्राम बोइरगांव निवासी 22 वर्षीय खुशहाल सिन्हा मारुति सुजुकी एस-क्रॉस कार क्रमांक CG 05 AG 2103 चला रहा था। आरोप है कि कार तेज रफ्तार में और लापरवाहीपूर्वक चलाई जा रही थी।

इसी दौरान होंडा शाइन मोटरसाइकिल क्रमांक CG 06 P 7387 पर सवार दो सगे भाई दीनदयाल यादव (34 वर्ष) और थानेश्वर यादव (32 वर्ष) अपने गृह ग्राम कोल्दा में आयोजित पितर-खेदी कार्यक्रम में शामिल होने जा रहे थे। बताया जाता है कि दोनों अपने काम से छुट्टी लेकर घर लौट रहे थे, तभी कार की चपेट में आ गए।

टक्कर इतनी जोरदार थी कि दोनों भाई गंभीर रूप से घायल हो गए। घटना के बाद उन्हें तत्काल चिकित्सा सहायता की आवश्यकता पड़ी। हादसे की वास्तविक परिस्थितियों, वाहनों की गति और टक्कर के कारणों का निर्धारण पुलिस की निष्पक्ष जांच तथा उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाना जरूरी है।

एक भाई वेंटिलेटर पर, दूसरे की कई हड्डियां टूटीं

हादसे के बाद डायल 112 की सहायता से दोनों घायलों को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बागबाहरा ले जाए जाने की जानकारी सामने आई है। वहां से उनकी गंभीर स्थिति को देखते हुए महासमुंद रेफर किया गया। बाद में उन्हें लभरा खुर्द स्थित सोहम हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया।

अस्पताल के डॉक्टर युगल चंद्राकर की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, दीनदयाल यादव के सिर में गंभीर चोट आई है। उनकी हालत नाजुक है और उन्हें वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया है। उनके कोमा में होने की बात भी बताई गई है।
वहीं, थानेश्वर यादव की दोनों जांघों और हाथ की हड्डियां टूटने की जानकारी दी गई है। उनकी आगे की चिकित्सा और स्वास्थ्य में सुधार के संबंध में अस्पताल की सलाह के अनुसार निर्णय लिया जाएगा।

यह केवल एक सड़क दुर्घटना नहीं, बल्कि उन परिवारों के सामने खड़ा गंभीर मानवीय संकट है, जिनकी रोजी-रोटी दोनों भाइयों की मेहनत पर निर्भर थी।

तीन बेटियों और दो महीने की मासूम का भविष्य चिंता में

दीनदयाल यादव की तीन छोटी बेटियां हैं। दूसरी ओर, थानेश्वर यादव की महज दो महीने की एक मासूम बच्ची है। परिवार के लिए यह हादसा आर्थिक और भावनात्मक रूप से बेहद कठिन परिस्थिति लेकर आया है।

जानकारी के अनुसार, दोनों भाई महासमुंद के होटल स्वर्ण और होटल आकाशिया में काम करते थे। अपनी मेहनत की कमाई से घर चलाने वाले इन भाइयों के गंभीर रूप से घायल होने से परिवार की आय पर संकट खड़ा हो गया है।

ऐसे में पीड़ित परिवार को चिकित्सा सहायता, कानूनी प्रक्रिया की जानकारी और दुर्घटना से संबंधित बीमा दावे के लिए आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराने में मदद मिलना महत्वपूर्ण है। हालांकि, किसी भी आर्थिक सहायता या मुआवजे का निर्धारण संबंधित नियमों, बीमा शर्तों और मामले के तथ्यों के आधार पर ही होगा।

सरपंच प्रतिनिधि के बयान ने खड़े किए सवाल

मामले में एक और पहलू चर्चा में है। मीडिया से बातचीत के दौरान ग्राम पंचायत अवराडबरी के सरपंच प्रतिनिधि मुकुंद सिन्हा के कथित बयान को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, मुकुंद सिन्हा आरोपी युवक खुशहाल सिन्हा के ननिहाल पक्ष से संबंधित बताए जा रहे हैं। आरोप है कि उन्होंने घायल परिवार को 20 हजार रुपये देने की बात कही और इससे अधिक आर्थिक सहायता देने से इनकार किया।

उनके नाम से यह कथन भी सामने आया है कि एफआईआर दर्ज होने पर बीमा कंपनी खर्च उठाएगी और उन्हें इस मामले की चिंता नहीं रहेगी।

यदि बातचीत में वास्तव में ऐसे शब्द कहे गए हैं, तो उनकी परिस्थितियों और संदर्भ की पुष्टि आवश्यक है। किसी व्यक्ति के कथित बयान को अंतिम तथ्य मानने से पहले उसकी स्वतंत्र पुष्टि तथा संबंधित पक्ष का जवाब लिया जाना चाहिए।

फिर भी, गंभीर रूप से घायल दो व्यक्तियों के मामले में आर्थिक सहायता, चिकित्सा खर्च और कानूनी जिम्मेदारी को लेकर स्पष्टता होना जरूरी है। किसी भी पक्ष की आर्थिक हैसियत या राजनीतिक-सामाजिक प्रभाव कानून से ऊपर नहीं हो सकता।

दुर्घटनाग्रस्त कार कहां है? वाहन को लेकर उठे गंभीर सवाल

इस प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण सवाल दुर्घटना में शामिल चारपहिया वाहन की वर्तमान स्थिति को लेकर सामने आया है।

आरोप है कि दुर्घटना में क्षतिग्रस्त मोटरसाइकिल खल्लारी थाने में रखी गई है, जबकि हादसे में शामिल बताई जा रही मारुति सुजुकी एस-क्रॉस कार को आरोपी के गृह ग्राम बोइरगांव में तुला राम देवांगन के घर पर रखा गया है।

यदि कार वास्तव में पुलिस की विधिवत जब्ती और जांच प्रक्रिया से बाहर किसी निजी स्थान पर रखी गई है, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि ऐसा किस परिस्थिति में हुआ और क्या वाहन को सुरक्षित रखने के लिए पुलिस ने कोई निर्देश जारी किया था।

दुर्घटना में शामिल वाहनों की जांच महत्वपूर्ण साक्ष्य जुटाने का हिस्सा है। वाहन की क्षति, टक्कर के निशान, तकनीकी परीक्षण और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर दुर्घटना की परिस्थितियों का पता लगाया जा सकता है।

इसलिए पुलिस को वाहन की स्थिति, जब्ती की कार्रवाई और तकनीकी परीक्षण के संबंध में स्पष्ट जानकारी सामने लानी चाहिए।

नंबर प्लेट तोड़कर गायब करने का आरोप, जांच से खुलेगा सच

मामले में यह आरोप भी सामने आया है कि दुर्घटना के बाद कार की नंबर प्लेट को तोड़कर गायब कर दिया गया। इस संबंध में भीमखोज निवासी वरुण पप्पू सिन्हा का नाम लिया जा रहा है।
हालांकि, इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि और पुलिस रिकॉर्ड से सत्यापन आवश्यक है। फिलहाल इसे प्रमाणित तथ्य के बजाय जांच का विषय माना जाना चाहिए।
यदि दुर्घटना के बाद वाहन की नंबर प्लेट हटाई गई या साक्ष्यों के साथ जानबूझकर छेड़छाड़ की गई, तो पुलिस को इसकी गंभीरता से जांच करनी चाहिए। घटनास्थल की तस्वीरें, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, वाहन की पहचान, उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज और अन्य तकनीकी साक्ष्य इस मामले में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

पुलिस को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि वाहन की पहचान किस आधार पर की गई, उसकी वर्तमान स्थिति क्या है और क्या संबंधित व्यक्तियों से पूछताछ की गई है।

थाना प्रभारी नहीं मिले, पुलिस की कार्रवाई पर उठे सवाल

मामले की जानकारी लेने के लिए मीडिया टीम के खल्लारी थाना पहुंचने पर थाना प्रभारी के उपलब्ध नहीं होने की बात भी सामने आई है।

हालांकि, किसी अधिकारी का किसी समय कार्यालय में मौजूद नहीं होना अपने आप में लापरवाही का प्रमाण नहीं है। लेकिन गंभीर दुर्घटना और साक्ष्यों से छेड़छाड़ के आरोपों के बीच पुलिस की कार्रवाई के बारे में स्पष्ट जानकारी मिलना आवश्यक है।

पीड़ित परिवार और आम जनता यह जानना चाहती है कि दुर्घटना के संबंध में क्या रिपोर्ट दर्ज हुई है, वाहन की जांच की गई है या नहीं, आरोपी चालक के विरुद्ध क्या कार्रवाई हुई है और कथित नंबर प्लेट प्रकरण की जांच किस स्तर पर है।

इन सवालों का जवाब पुलिस के आधिकारिक बयान और दस्तावेजों से ही सामने आना चाहिए।

पुलिस अधीक्षक से निष्पक्ष जांच की मांग

इस पूरे प्रकरण में महासमुंद पुलिस अधीक्षक से निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने की मांग उठती है। मामले की गंभीरता को देखते हुए निम्न बिंदुओं पर स्पष्टता आवश्यक है:
दुर्घटना के संबंध में दर्ज रिपोर्ट, लागू कानूनी धाराओं और अब तक की कार्रवाई की जानकारी सार्वजनिक की जाए।

दुर्घटना में शामिल कार और मोटरसाइकिल की स्थिति स्पष्ट कर आवश्यक तकनीकी जांच कराई जाए।

नंबर प्लेट तोड़ने या साक्ष्यों से छेड़छाड़ के आरोपों की निष्पक्ष जांच की जाए।

प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज और अन्य साक्ष्यों का परीक्षण किया जाए।

पीड़ित परिवार को चिकित्सा दस्तावेजों, बीमा दावे और वैधानिक मुआवजे की प्रक्रिया में नियमानुसार सहायता उपलब्ध कराई जाए।
इन बिंदुओं की जांच से न केवल दुर्घटना की वास्तविक परिस्थितियां स्पष्ट हो सकती हैं, बल्कि किसी भी प्रकार के संदेह को दूर करने में भी मदद मिलेगी।

बड़ा सवाल: क्या पीड़ित परिवार को मिलेगा न्याय..?

दो सगे भाई अस्पताल में गंभीर चोटों से जूझ रहे हैं। एक की हालत नाजुक बताई जा रही है, जबकि दूसरा कई फ्रैक्चर के कारण उपचाराधीन है। उनके घरों में छोटी बच्चियां और एक दो महीने की मासूम बच्ची अपने पिता और परिवार के भविष्य से जुड़ी अनिश्चितता के बीच हैं।

ऐसी स्थिति में सबसे जरूरी है कि जांच तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर हो, न कि किसी के सामाजिक प्रभाव या पारिवारिक संबंधों के आधार पर।

क्या दुर्घटना में शामिल वाहन की स्थिति स्पष्ट की जाएगी? क्या नंबर प्लेट गायब होने के आरोप की जांच होगी? क्या पुलिस अब तक की कार्रवाई का विवरण सामने लाएगी? और क्या पीड़ित परिवार को न्यायिक प्रक्रिया में समय पर सहायता मिलेगी..?

इन सवालों के जवाब संबंधित पुलिस अधिकारियों की आधिकारिक प्रतिक्रिया और जांच के निष्कर्षों से ही मिल सकेंगे।

बेबाक बयान न्यूज इस मामले में सभी संबंधित पक्षों का पक्ष सामने आने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित करेगा। उद्देश्य किसी को दोषी घोषित करना नहीं, बल्कि गंभीर दुर्घटना से जुड़े सवालों की निष्पक्ष जांच, पारदर्शिता और पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने की आवश्यकता को सामने लाना है।

​​”महासमुंद कृषि विभाग के उप संचालक फागुराम कश्यप का जलवा बरकरार, ‘कलेक्टर जैसा रौब’ और रसूख के साथ डटे हुये है …!!

​​”महासमुंद कृषि विभाग के उप संचालक फागुराम कश्यप का जलवा बरकरार, ‘कलेक्टर जैसा रौब’ और रसूख के साथ डटे हुये है …!!

नोटिस और स्पष्टीकरण की लंबी सूची फिर भी कोई कार्यवाही नहीं, सिस्टम पर बड़ा सवाल..?

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता/ 12 अक्टूबर 2026/ दिन सोमवार
​महासमुंद / ​छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में कृषि विभाग और जलग्रहण क्षेत्र प्रबंधन (WDC-PMKSY 2.0) भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अराजकता का अड्डा बनता नजर आ रहा है। पूरे मामले की सुई अब जिले के उप संचालक कृषि (DDA) फागुराम कश्यप की कार्यप्रणाली और उनकी संदिग्ध भूमिका की ओर घूम गई है।

​सरायपाली विधानसभा की महिला विधायक श्रीमती चातुरी नंद द्वारा विधानसभा में मुद्दा उठाए जाने, राज्य स्तर से कारण-बताओ नोटिस जारी होने और विभाग में वित्तीय घोटालों की भरमार के बावजूद फागुराम कश्यप पर कार्रवाई न होना, इस आशंका को मजबूत करता है कि कश्यप के नेतृत्व में जिले में भ्रष्टाचार को खुला बढ़ावा दिया जा रहा है।

​1. फागुराम कश्यप को किसका संरक्षण? विधायक श्रीमती चातुरी नंद के बयानों से हड़कंप

​सरायपाली विधायक श्रीमती चातुरी नंद ने विभागीय गलियारों में मचे घमासान के बीच बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं। विधायक का स्पष्ट कहना है कि उप संचालक कृषि फागुराम कश्यप को शासकीय नोटिस जारी होने और उनके कार्यकाल के दौरान लगातार गंभीर धांधली उजागर होने के बाद भी विभागीय स्तर पर कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई।

​प्रशासनिक संरक्षण का आरोप: विधायक के अनुसार, फागुराम कश्यप को उच्च स्तर पर “प्रशासनिक संरक्षण” प्राप्त है, जिसके दम पर वे विभागीय नियमों और वित्तीय पारदर्शिता को दरकिनार कर खुलेआम काम कर रहे हैं।

​सदन से सड़क तक गूंज: विधानसभा में मामला उठने के बावजूद कश्यप की कुर्सी का सुरक्षित रहना यह दर्शाता है कि कृषि विभाग में उच्चाधिकारियों की मिलीभगत किस कदर गहरी है।

​2. WDC-PMKSY 2.0 में करोड़ों/लाखों का गबन: उप संचालक की निगरानी पर सवाल

​छ.ग. राज्य जलग्रहण क्षेत्र प्रबंधन एजेंसी (SLNA) द्वारा महासमुंद के उप संचालक कृषि सह परियोजना प्रबंधक (WCDC) को जारी ‘कारण-बताओ नोटिस’ से यह साफ हो गया है कि फागुराम कश्यप के प्रशासनिक नियंत्रण में योजनाओं में भारी वित्तीय अनियमितता हुई है।

​निजी खातों में सरकारी पैसा: कश्यप के अधीन कार्यरत WDT कर्मचारियों द्वारा मजदूरी भुगतान की राशि को सीधे अपने निजी बैंक खातों में ट्रांसफर किया गया।

​₹18.95 लाख का अवैध आहरण: शासकीय वित्त निर्देशों का उल्लंघन करते हुए ₹18,95,849/- जैसी बड़ी राशि का ई-पेमेंट के बिना गबन किया गया।

​वेंडरों पर मेहरबानी व फर्जीवाड़ा: नियमों के खिलाफ जाकर ₹10 लाख का एडवांस भुगतान किया गया, बिना जियो-टैगिंग के काम दिखाए गए, और बिना सत्यापन के एक ही वेंडर को बार-बार भुगतान कर सरकारी खजाने को चूना लगाया गया।

​इन तमाम वित्तीय अनियमितताओं के दौरान परियोजना प्रमुख के रूप में फागुराम कश्यप की मौन स्वीकृति और जांच न कराना उनके सीधे संरक्षण की ओर इशारा करता है।

​3. जैविक खेती और DMF में ‘कश्यप का दोहरा खेल’: पात्र किसान ठगे गए

​बागबाहरा विकासखंड सहित पूरे जिले में कृषि योजनाओं के वितरण में बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा सामने आया है।

​एक ही किसान को दोहरा लाभ: वर्ष 2024-25 में ‘जैविक खेती मिशन’ के तहत दिए गए बैटरी स्प्रेयर की सूची में शामिल किसानों को ही वर्ष 2025-26 में ‘DMF मद’ से दोबारा मशीनें बांट दी गईं।

​दस्तावेजी साक्ष्य: जैविक खेती योजना की सूची के स्पष्ट कॉलम से यह प्रमाणित होता है कि उप संचालक कार्यालय की नाक के नीचे किस प्रकार अपात्रों पर सरकारी खजाना लुटाया गया और वास्तविक जरूरतमंद किसानों को वंचित रखा गया।

​PMKKKY नियमों का उल्लंघन: खनन प्रभावित क्षेत्रों के लिए सुरक्षित DMF बजट का कश्यप के कार्यकाल में अनधिकृत रूप से गैर-प्रभावित क्षेत्रों में बंदरबांट किया गया।

​4. कमार जनजातीय किसान की मौत: क्या कश्यप की शह पर हुई लीपापोती..?

​बागबाहरा के ग्राम बैहाडीह के विशेष संरक्षित कमार जनजाति के किसान की कृषि विभाग के ओडिशा (कालाहांडी) अध्ययन भ्रमण के दौरान हुई संदिग्ध मौत ने इस मामले को और अधिक संवेदनशील बना दिया है।

​अधिकारियों को बचाने का खेल: आरोप है कि उप संचालक फागुराम कश्यप के संरक्षण में कार्यरत बागबाहरा के प्रभारी senior अधिकारी श्री गंगा प्रसाद शरणागत ने इस पूरी घटना को दबाने और वरिष्ठ अधिकारियों व मीडिया से छिपाने का प्रयास किया।

​बिना पारदर्शी जांच के शव रवाना: जनजातीय किसान की मृत्यु किन परिस्थितियों में हुई, इसका खुलासा किए बिना मामले में लीपापोती की गई और अब तक किसी अधिकारी पर FIR दर्ज नहीं कराई गई है।

​जनहित में उठीं मुख्य मांगें

1 ​उप संचालक फागुराम कश्यप का तत्काल निलंबन: प्रशासनिक संरक्षण के आरोपों और वित्तीय घोटालों की निष्पक्ष जांच हेतु फागुराम कश्यप को तुरंत पद से हटाया जाए।

2 ​घोटाले की उच्चस्तरीय / EOW जांच: WDC-PMKSY 2.0 और DMF मद में हुए लाखों रुपये के गबन की निष्पक्ष एजेंसी से जांच कराकर कश्यप व संबंधित कर्मियों से राशि की वसूली की जाए।

3 ​कमार किसान की मौत पर FIR: अध्ययन भ्रमण के दौरान हुई मौत के जिम्मेदार विभागीय अधिकारियों पर गैर-इरादतन हत्या व लापरवाही की FIR दर्ज कराई जाए।

4 ​दोहरे वितरण की जांच: जैविक खेती और DMF योजना की सूचियों के मिलान के आधार पर फर्जीवाड़ा करने वाले अधिकारियों की सेवा समाप्त की जाए।

​संपादकीय दृष्टिकोण: महासमुंद कृषि विभाग में सामने आ रहे एक के बाद एक घोटालों से यह साफ है कि उप संचालक फागुराम कश्यप के कार्यकाल में भ्रष्टाचार ने संस्थागत रूप ले लिया है। अब देखना यह होगावी कि राज्य शासन और जिला प्रशासन महिला विधायक के आरोपों व आधिकारिक नोटिसों पर संज्ञान लेकर क्या कड़ा एक्शन उठाता है।

साहब, जवाब दो.! महासमुंद में 39 लाख के ‘कोरोना खेल’ का असली खिलाड़ी कौन है..?

साहब, जवाब दो.! महासमुंद में 39 लाख के ‘कोरोना खेल’ का असली खिलाड़ी कौन है..?

नोटिस के बाद भी समृद्धि शर्मा -दिलीप मनहरे पर एक्शन क्यों नहीं लिया गया ..?

39 लाख रुपये की सैनिटाइजर, मास्क और स्वच्छता सामग्री खरीदी की जांच का क्या हुआ? 26 जून 2024 को कारण बताओ नोटिस जारी होने की बात, लेकिन अंतिम कार्रवाई का विवरण अब भी सवालों के घेरे में

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता
12 अक्टूबर 2026 | सोमवार
महासमुंद, छत्तीसगढ़।
महासमुंद जिले की जनपद पंचायत में कोरोना काल के दौरान हुई कथित खरीदी और 39 लाख रुपये के भुगतान का पुराना प्रकरण एक बार फिर प्रशासनिक जवाबदेही के केंद्र में है। सरकारी धन से सैनिटाइजर, मास्क और स्वच्छता सामग्री की खरीदी के नाम पर किए गए भुगतान को लेकर उठे सवालों का स्पष्ट और दस्तावेजी जवाब अब भी सामने आना जरूरी है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि इस मामले में कारण बताओ नोटिस जारी किए गए थे, तो उसके बाद जांच कहां तक पहुंची और अंतिम कार्रवाई का निर्णय क्या हुआ..?

यह मामला केवल पुराने बिल-वाउचर का नहीं, बल्कि सरकारी खरीद प्रक्रिया, भुगतान की पारदर्शिता और जिम्मेदार अधिकारियों-कर्मचारियों की जवाबदेही से जुड़ा है। कोरोना जैसी आपातकालीन परिस्थिति में खरीदी की आवश्यकता अपनी जगह थी, लेकिन सार्वजनिक धन के उपयोग में नियमों का पालन और खर्च का सत्यापन भी उतना ही अनिवार्य था।

39 लाख रुपये का प्रकरण: समृद्धि शर्मा और दिलीप मनहरे पर उठे सवाल

उपलब्ध प्रकरण-विवरण के अनुसार, वर्ष 2019-20 में कोरोना काल के दौरान सैनिटाइजर, मास्क और स्वच्छता सामग्री की खरीदी के नाम पर लगभग 39 लाख रुपये के भुगतान का मामला सामने आया था। इस खरीदी की प्रक्रिया, सामान्य सभा के प्रस्ताव, वेंडर चयन, बिल-वाउचर और वित्तीय नियमों के पालन को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं।

इस मामले में तत्कालीन जनपद पंचायत के संकाय शाखा में पदस्थ समृद्धि शर्मा और लिपिक दिलीप मनहरे को जिला पंचायत महासमुंद की ओर से 26 जून 2024 को कारण बताओ नोटिस जारी किए जाने की बात सामने आई थी। बताया गया था कि संबंधित व्यक्तियों से तीन दिनों के भीतर जवाब मांगा गया था और संतोषजनक जवाब नहीं मिलने की स्थिति में नियमानुसार अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी गई थी।

हालांकि, नोटिस जारी होने की बात अपने आप में किसी व्यक्ति को दोषी साबित नहीं करती। संबंधित नोटिस, जवाब, जांच प्रतिवेदन और अंतिम आदेश की प्रमाणित प्रतियां सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि किसकी क्या भूमिका थी और प्रशासन ने क्या निष्कर्ष निकाला।

अब मुख्य सवाल यही है—समृद्धि शर्मा और दिलीप मनहरे से मांगे गए जवाबों पर प्रशासन ने क्या निर्णय लिया? क्या जांच पूरी हो चुकी है, या मामला अब भी लंबित है..?

जांच के केंद्र में पांच अहम सवाल

इस 39 लाख रुपये के प्रकरण में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए निम्न बिंदुओं पर स्पष्ट जानकारी सामने आनी चाहिए—

खरीदी की वैधानिकता: क्या संबंधित खरीदी के लिए सामान्य सभा या सक्षम प्राधिकारी की विधिवत स्वीकृति ली गई थी? क्या खरीदी प्रक्रिया निर्धारित वित्तीय नियमों के अनुरूप थी..?

बिल और भुगतान का सत्यापन: क्या भुगतान से संबंधित बिल, वाउचर, बैंक रिकॉर्ड और वेंडर के दस्तावेजों की जांच की गई..?

सामग्री की वास्तविक आपूर्ति: क्या सैनिटाइजर, मास्क और स्वच्छता सामग्री की मात्रा, गुणवत्ता तथा वास्तविक आपूर्ति का भौतिक सत्यापन किया गया?

कारण बताओ नोटिस पर निर्णय: 26 जून 2024 को जारी बताए जा रहे नोटिस के जवाब में संबंधित पक्षों ने क्या स्पष्टीकरण दिया? उस पर जांच अधिकारी या सक्षम प्राधिकारी ने क्या निष्कर्ष निकाला..?

जिम्मेदारी और अंतिम आदेश: क्या किसी अधिकारी, कर्मचारी या अन्य संबंधित व्यक्ति की भूमिका निर्धारित की गई? यदि अनियमितता प्रमाणित हुई, तो क्या कार्रवाई की गई? और यदि आरोप प्रमाणित नहीं हुए, तो क्या प्रकरण को अंतिम रूप से बंद करने का आदेश जारी हुआ..?

नोटिस के बाद दो साल से अधिक का सवाल: फाइल आगे बढ़ी या जवाबदेही अटकी..?

26 जून 2024 को नोटिस जारी किए जाने का विवरण यदि आधिकारिक अभिलेखों से पुष्ट होता है, तो 12 अक्टूबर 2026 तक इस मामले की वर्तमान स्थिति जानना सार्वजनिक हित का महत्वपूर्ण विषय है।

प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि नोटिस के बाद जवाब प्राप्त हुए या नहीं, जांच किस अधिकारी को सौंपी गई, जांच प्रतिवेदन कब तैयार हुआ और अंतिम निर्णय किस स्तर पर लंबित है।

यदि जांच पूरी हो चुकी है, तो निष्कर्ष और कार्रवाई का विवरण सार्वजनिक किया जाना चाहिए। यदि जांच लंबित है, तो देरी का कारण और उसे पूरा करने की समयसीमा बताई जानी चाहिए। केवल नोटिस जारी कर देना जवाबदेही का अंतिम चरण नहीं है; मामले का निष्पक्ष परीक्षण और नियमानुसार निर्णय भी जरूरी है।

क्या वेंडर और भुगतान से जुड़े दस्तावेजों की स्वतंत्र जांच हुई..?

इस प्रकरण में भुगतान प्राप्त करने वाले वेंडर की पहचान, बिलों की वैधता, बैंक लेन-देन और सामग्री की आपूर्ति से जुड़े अभिलेख महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इन दस्तावेजों की जांच से ही यह पता चल सकेगा कि सरकारी राशि का उपयोग वास्तविक खरीदी के लिए हुआ या कहीं प्रक्रिया संबंधी अनियमितता हुई।

यदि अभिलेखों में विसंगतियां पाई गई हैं, तो उनकी जिम्मेदारी साक्ष्यों के आधार पर तय की जानी चाहिए। वहीं, यदि सभी भुगतान और आपूर्तियां नियमसम्मत पाई गई हैं, तो संबंधित पक्षों को भी स्पष्ट निष्कर्ष के माध्यम से स्थिति बताई जानी चाहिए।

जांच का उद्देश्य किसी को पहले से दोषी ठहराना नहीं, बल्कि तथ्यों के आधार पर जिम्मेदारी तय करना और सरकारी धन के उपयोग का हिसाब जनता के सामने लाना है।

महासमुंद प्रशासन से सीधे सवाल

जिला पंचायत महासमुंद और संबंधित सक्षम अधिकारियों को इस प्रकरण पर निम्न बिंदुओं पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए—

39 लाख रुपये की कोरोना कालीन खरीदी की जांच वर्तमान में किस स्तर पर है..?

समृद्धि शर्मा और दिलीप मनहरे को जारी किए जाने की बात सामने आए कारण बताओ नोटिस पर क्या अंतिम निर्णय लिया गया..?

क्या संबंधित वेंडर के बिल, भुगतान रिकॉर्ड और सामग्री आपूर्ति का सत्यापन पूरा हो चुका है..?

क्या जांच में किसी प्रकार की वित्तीय या प्रक्रियागत अनियमितता प्रमाणित हुई..?

यदि कार्रवाई की गई है, तो आदेश की तारीख और कार्रवाई का विवरण क्या है..?

यदि नहीं, तो प्रकरण लंबित रहने का कारण क्या है..?

बेबाक बयान न्यूज की पड़ताल जारी

जनता के पैसे का हिसाब जनता तक पहुंचना चाहिए। 39 लाख रुपये के इस पुराने प्रकरण में न तो केवल नोटिस जारी होने को दोष सिद्ध होने का प्रमाण माना जा सकता है और न ही अंतिम कार्रवाई की जानकारी के अभाव को अपने आप क्लीन चिट समझा जा सकता है।

जरूरत है निष्पक्ष जांच, दस्तावेजी पारदर्शिता और समयबद्ध निर्णय की। यदि किसी की भूमिका प्रमाणित होती है, तो नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए; यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते, तो संबंधित पक्षों को भी स्पष्ट निष्कर्ष के साथ राहत मिलनी चाहिए।

अब महासमुंद प्रशासन को बताना चाहिए—39 लाख रुपये के कोरोना खरीदी प्रकरण में जांच कहां तक पहुंची, जवाबदेही किसकी तय हुई और अंतिम आदेश कब जारी होगा..?

बेबाक बयान न्यूज इस मामले में आधिकारिक अभिलेखों, जांच की स्थिति और संबंधित पक्षों के जवाब के आधार पर पड़ताल जारी रखेगा।

महासमुंद के नए कलेक्टर के रूप में उभर रहे – उप संचालक कृषि अधिकारी फागुराम कश्यप..!

महासमुंद के नए कलेक्टर के रूप में उभर रहे – उप संचालक कृषि अधिकारी फागुराम कश्यप..!

कृषि विभाग में नियमों की धज्जियां: 1 साल पहले रिलीव हुए जितेंद्र पटेल अब भी कुर्सी पर कायम क्यों..?

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता /10 अक्टूबर 2026 / दिन शनिवार
​महासमुंद। छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले का कृषि विभाग इन दिनों भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अव्यवस्था और अफसरों की बेलगाम तानाशाही का गढ़ बन चुका है। विभाग में शासकीय आदेशों और नियमों को ताक पर रखकर चहेते कर्मचारियों को खुलेआम संरक्षण दिया जा रहा है। स्थानीय चर्चाओं और विभागीय गलियारों में यह बात जोर पकड़ रही है कि उप संचालक (DD) फागुराम कश्यप खुद को महासमुंद के ‘कलेक्टर’ की उपाधि से ऊपर मानकर सारे नियम-कानूनों की धज्जियां उड़ाते हुए मनमाने निर्णय ले रहे हैं।

​एक तरफ जहाँ रिलीविंग आदेश के एक वर्ष बीत जाने के बावजूद ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी (RAEO) जितेंद्र पटेल जिला मुख्यालय में ही जमे हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ उप संचालक फागुराम कश्यप पर तानाशाही रवैये और किसानों को अपमानित करने के गंभीर आरोप लगे हैं। इस दोहरे संकट के कारण जहाँ एक ओर अधिकारी-कर्मचारी संघ काम बंद हड़ताल पर चले गए थे, वहीं दूसरी ओर भारतीय किसान संघ ने भी प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

​1. कागजों में रिलीव, धरातल पर ‘कुर्सी मोह’: जानिए क्या है पूरा मामला

​विभागीय दस्तावेजों के अनुसार, ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी जितेंद्र पटेल की मूल पदस्थापना पिथौरा के वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी कार्यालय में है। जिला कार्यालय से उन्हें पिथौरा भेजने के लिए उप संचालक कार्यालय द्वारा आदेश क्रमांक/स्था./भारमुक्त/2025-26/5771 (दिनांक 13/10/2025) जारी किया गया था।

​इस आदेश में जितेंद्र पटेल को तत्काल प्रभाव से अपना समस्त प्रभार अन्य अधिकारी (भूषण साहू) को सौंपकर पिथौरा में उपस्थिति दर्ज कराने के निर्देश दिए गए थे। हालांकि, आदेश जारी होने के पूरे 1 साल बाद भी पटेल को केवल कागजों में ही कार्यमुक्त (रिलीव) दिखाया गया है। वे आज भी महासमुंद के उप संचालक कार्यालय में अटैचमेंट का अनुचित लाभ उठाते हुए अपनी कुर्सी पर डटे हुए हैं।

​2. ‘कलेक्टर’ की भांति मनमानी कर रहे उप संचालक फागुराम कश्यप!

​इस पूरे प्रशासनिक घालमेल में कृषि विभाग के उप संचालक फागुराम कश्यप की कार्यप्रणाली सबसे ज्यादा सवालों के घेरे में है। कर्मचारियों का आरोप है कि कश्यप जिला प्रशासन और शासन के नियमों को ठेंगा दिखाते हुए खुद को जिले का सर्वेसर्वा मान चुके हैं:

​विवादों से पुराना नाता: फागुराम कश्यप पूर्व में गरियाबंद जिले में पदस्थापना के दौरान निलंबन (सस्पेंशन) की कार्रवाई का सामना कर चुके हैं।

​नियमों की अनदेखी: महासमुंद जिले में उनका कार्यकाल 3 वर्ष से अधिक समय का हो चुका है। सामान्य स्थानांतरण नियमों के बावजूद उन्हें इतने लंबे समय तक एक ही स्थान पर बनाए रखना प्रशासनिक संरक्षण और रणनीतियों पर कई सवाल खड़े करता है।

​ताकत का दुरुपयोग: कर्मचारियों का आरोप है कि उप संचालक की शह पर ही जितेंद्र पटेल जैसे अधिकारी मनमानी कर रहे हैं और वरिष्ठ अधिकारियों का भय दिखाकर कर्मचारियों पर अनुचित दबाव बना रहे हैं।

​3. कर्मचारियों में भारी आक्रोश: काम बंद हड़ताल और उग्र आंदोलन की चेतावनी

​छत्तीसगढ़ कृषि स्नातक शासकीय कृषि अधिकारी संघ और ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारियों ने इस तानाशाही के खिलाफ आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है।

​कर्मचारियों के मुख्य आरोप एवं मांगें:

​अमर्यादित व्यवहार: मैदानी कर्मचारियों का आरोप है कि जितेंद्र पटेल लंबे समय से कर्मचारियों के साथ अभद्र व्यवहार कर रहे हैं।

एक वर्ष पूर्व ​एकसूत्रीय मांग: कर्मचारियों ने स्पष्ट कर दिया था कि जब तक जितेंद्र पटेल को पिथौरा स्थित मूल पदस्थापना स्थल पर नहीं भेजा जाता, वे काम पर वापस नहीं लौटेंगे और ऐसा हुआ भी फिर राजनीतिक पकड़ इतनी मजबूत की संघ की मांगों को दरकिनार करते हुए की जा रही है मनमानी

​राज्यव्यापी आंदोलन की चेतावनी: संघ के पदाधिकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि महासमुंद जिला प्रशासन और रायपुर मुख्यालय ने तुरंत ठोस कदम नहीं उठाए, तो इस आंदोलन को पूरे छत्तीसगढ़ में उग्र रूप दिया जाएगा।

​4. अन्नदाताओं का अपमान: भारतीय किसान संघ ने खोला कलेक्टर के सामने मोर्चा

​प्रशासनिक घपले के बीच किसानों के साथ दुर्व्यवहार की घटना ने आग में घी का काम किया है। भारतीय किसान संघ (BKS) की महासमुंद जिला इकाई ने डिप्टी डायरेक्टर एग्रीकल्चर (DDA) एफ.आर. कश्यप पर किसानों को अपमानित करने का आरोप लगाया है।

​अपनी कृषि संबंधी समस्याओं के समाधान के लिए गए किसानों के साथ अधिकारी द्वारा असम्मानजनक और दुर्व्यवहारपूर्ण व्यवहार किया गया। इस घटना से आक्रोशित सैकड़ों किसानों ने एकजुट होकर जिला कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा और कश्यप को तत्काल पद से हटाने या निलंबित करने की मांग की।

​ज्ञापन सौंपने वाले प्रमुख किसान नेताओं में कौशल्या तिवारी, शोभ कुमार साहू, रूपेश कुमार, भेख लाल साहू, नेम लाल चंद्राकर, अश्वनी साहू, सोहन, चगन साहू, हेमंत साहू और कुंदन सहित कई अन्य किसान शामिल थे।

​5. धान खरीदी से ठीक पहले बढ़ा संकट, किसान परेशान

​धान कटाई का सीजन सिर पर है और 15 नवंबर से राज्य में सरकारी धान खरीदी शुरू होने वाली है। ऐसे संवेदनशील समय में कृषि विभाग के कर्मचारियों की हड़ताल और किसानों के आक्रोश से स्थिति बेहद चिंताजनक हो गई है।

​तकनीकी सलाह, खाद-बीज का वितरण और शासकीय कृषि योजनाओं का क्रियान्वयन पूरी तरह ठप होने की कगार पर है। इस पूरे प्रशासनिक विवाद, कथित फिजूलखर्ची और नियम विरुद्ध पदस्थापना पर अब तक जिला प्रशासन या कृषि विभाग के आला अधिकारियों की तरफ से कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है। अब देखना होगा कि शासन-प्रशासन इस मामले पर क्या कड़ा रुख अपनाता है।

महासमुंद के नए कलेक्टर के रूप में उभर रहे – उप संचालक कृषि अधिकारी फागुराम कश्यप..!

महासमुंद के नए कलेक्टर के रूप में उभर रहे – उप संचालक कृषि अधिकारी फागुराम कश्यप..!

कृषि विभाग में नियमों की धज्जियां: 1 साल पहले रिलीव हुए जितेंद्र पटेल अब भी कुर्सी पर कायम क्यों..?

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता /10 अक्टूबर 2026 / दिन शनिवार
​महासमुंद। छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले का कृषि विभाग इन दिनों भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अव्यवस्था और अफसरों की बेलगाम तानाशाही का गढ़ बन चुका है। विभाग में शासकीय आदेशों और नियमों को ताक पर रखकर चहेते कर्मचारियों को खुलेआम संरक्षण दिया जा रहा है। स्थानीय चर्चाओं और विभागीय गलियारों में यह बात जोर पकड़ रही है कि उप संचालक (DD) फागुराम कश्यप खुद को महासमुंद के ‘कलेक्टर’ की उपाधि से ऊपर मानकर सारे नियम-कानूनों की धज्जियां उड़ाते हुए मनमाने निर्णय ले रहे हैं।

​एक तरफ जहाँ रिलीविंग आदेश के एक वर्ष बीत जाने के बावजूद ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी (RAEO) जितेंद्र पटेल जिला मुख्यालय में ही जमे हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ उप संचालक फागुराम कश्यप पर तानाशाही रवैये और किसानों को अपमानित करने के गंभीर आरोप लगे हैं। इस दोहरे संकट के कारण जहाँ एक ओर अधिकारी-कर्मचारी संघ काम बंद हड़ताल पर चले गए थे, वहीं दूसरी ओर भारतीय किसान संघ ने भी प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

​1. कागजों में रिलीव, धरातल पर ‘कुर्सी मोह’: जानिए क्या है पूरा मामला

​विभागीय दस्तावेजों के अनुसार, ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी जितेंद्र पटेल की मूल पदस्थापना पिथौरा के वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी कार्यालय में है। जिला कार्यालय से उन्हें पिथौरा भेजने के लिए उप संचालक कार्यालय द्वारा आदेश क्रमांक/स्था./भारमुक्त/2025-26/5771 (दिनांक 13/10/2025) जारी किया गया था।

​इस आदेश में जितेंद्र पटेल को तत्काल प्रभाव से अपना समस्त प्रभार अन्य अधिकारी (भूषण साहू) को सौंपकर पिथौरा में उपस्थिति दर्ज कराने के निर्देश दिए गए थे। हालांकि, आदेश जारी होने के पूरे 1 साल बाद भी पटेल को केवल कागजों में ही कार्यमुक्त (रिलीव) दिखाया गया है। वे आज भी महासमुंद के उप संचालक कार्यालय में अटैचमेंट का अनुचित लाभ उठाते हुए अपनी कुर्सी पर डटे हुए हैं।

​2. ‘कलेक्टर’ की भांति मनमानी कर रहे उप संचालक फागुराम कश्यप!

​इस पूरे प्रशासनिक घालमेल में कृषि विभाग के उप संचालक फागुराम कश्यप की कार्यप्रणाली सबसे ज्यादा सवालों के घेरे में है। कर्मचारियों का आरोप है कि कश्यप जिला प्रशासन और शासन के नियमों को ठेंगा दिखाते हुए खुद को जिले का सर्वेसर्वा मान चुके हैं:

​विवादों से पुराना नाता: फागुराम कश्यप पूर्व में गरियाबंद जिले में पदस्थापना के दौरान निलंबन (सस्पेंशन) की कार्रवाई का सामना कर चुके हैं।

​नियमों की अनदेखी: महासमुंद जिले में उनका कार्यकाल 3 वर्ष से अधिक समय का हो चुका है। सामान्य स्थानांतरण नियमों के बावजूद उन्हें इतने लंबे समय तक एक ही स्थान पर बनाए रखना प्रशासनिक संरक्षण और रणनीतियों पर कई सवाल खड़े करता है।

​ताकत का दुरुपयोग: कर्मचारियों का आरोप है कि उप संचालक की शह पर ही जितेंद्र पटेल जैसे अधिकारी मनमानी कर रहे हैं और वरिष्ठ अधिकारियों का भय दिखाकर कर्मचारियों पर अनुचित दबाव बना रहे हैं।

​3. कर्मचारियों में भारी आक्रोश: काम बंद हड़ताल और उग्र आंदोलन की चेतावनी

​छत्तीसगढ़ कृषि स्नातक शासकीय कृषि अधिकारी संघ और ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारियों ने इस तानाशाही के खिलाफ आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है।

​कर्मचारियों के मुख्य आरोप एवं मांगें:

​अमर्यादित व्यवहार: मैदानी कर्मचारियों का आरोप है कि जितेंद्र पटेल लंबे समय से कर्मचारियों के साथ अभद्र व्यवहार कर रहे हैं।

एक वर्ष पूर्व ​एकसूत्रीय मांग: कर्मचारियों ने स्पष्ट कर दिया था कि जब तक जितेंद्र पटेल को पिथौरा स्थित मूल पदस्थापना स्थल पर नहीं भेजा जाता, वे काम पर वापस नहीं लौटेंगे और ऐसा हुआ भी फिर राजनीतिक पकड़ इतनी मजबूत की संघ की मांगों को दरकिनार करते हुए की जा रही है मनमानी

​राज्यव्यापी आंदोलन की चेतावनी: संघ के पदाधिकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि महासमुंद जिला प्रशासन और रायपुर मुख्यालय ने तुरंत ठोस कदम नहीं उठाए, तो इस आंदोलन को पूरे छत्तीसगढ़ में उग्र रूप दिया जाएगा।

​4. अन्नदाताओं का अपमान: भारतीय किसान संघ ने खोला कलेक्टर के सामने मोर्चा

​प्रशासनिक घपले के बीच किसानों के साथ दुर्व्यवहार की घटना ने आग में घी का काम किया है। भारतीय किसान संघ (BKS) की महासमुंद जिला इकाई ने डिप्टी डायरेक्टर एग्रीकल्चर (DDA) एफ.आर. कश्यप पर किसानों को अपमानित करने का आरोप लगाया है।

​अपनी कृषि संबंधी समस्याओं के समाधान के लिए गए किसानों के साथ अधिकारी द्वारा असम्मानजनक और दुर्व्यवहारपूर्ण व्यवहार किया गया। इस घटना से आक्रोशित सैकड़ों किसानों ने एकजुट होकर जिला कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा और कश्यप को तत्काल पद से हटाने या निलंबित करने की मांग की।

​ज्ञापन सौंपने वाले प्रमुख किसान नेताओं में कौशल्या तिवारी, शोभ कुमार साहू, रूपेश कुमार, भेख लाल साहू, नेम लाल चंद्राकर, अश्वनी साहू, सोहन, चगन साहू, हेमंत साहू और कुंदन सहित कई अन्य किसान शामिल थे।

​5. धान खरीदी से ठीक पहले बढ़ा संकट, किसान परेशान

​धान कटाई का सीजन सिर पर है और 15 नवंबर से राज्य में सरकारी धान खरीदी शुरू होने वाली है। ऐसे संवेदनशील समय में कृषि विभाग के कर्मचारियों की हड़ताल और किसानों के आक्रोश से स्थिति बेहद चिंताजनक हो गई है।

​तकनीकी सलाह, खाद-बीज का वितरण और शासकीय कृषि योजनाओं का क्रियान्वयन पूरी तरह ठप होने की कगार पर है। इस पूरे प्रशासनिक विवाद, कथित फिजूलखर्ची और नियम विरुद्ध पदस्थापना पर अब तक जिला प्रशासन या कृषि विभाग के आला अधिकारियों की तरफ से कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है। अब देखना होगा कि शासन-प्रशासन इस मामले पर क्या कड़ा रुख अपनाता है।

महासमुंद के किसानों का ऐलान: धान का MSP 3358 रुपये प्रति क्विंटल करो, पुरानी बकाया राशि तुरंत दो वरना आंदोलन तय – मानिक साहू

महासमुंद के किसानों का ऐलान: धान का MSP 3358 रुपये प्रति क्विंटल करो, पुरानी बकाया राशि तुरंत दो वरना आंदोलन तय – मानिक साहू

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता / 10 अक्टूबर 2026 / दिन शनिवार
महासमुंद। खेती की लागत आसमान छू रही है, लेकिन फसल का सही दाम नहीं मिल रहा। इस दोहरी मार से परेशान महासमुंद के किसानों ने अब चुप रहने से इनकार कर दिया है। महासमुंद किसान कांग्रेस के जिलाध्यक्ष मानिक साहू के नेतृत्व में किसानों ने प्रदेश के मुख्यमंत्री के नाम एक जोरदार ज्ञापन सौंपकर साफ चेतावनी दी है कि अगर उनकी जायज मांगें नहीं मानी गईं तो व्यापक आंदोलन तय है।

क्या हैं किसान की मुख्य मांगें..?

किसानों ने सबसे पहले धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) बढ़ाकर 3358 रुपये प्रति क्विंटल करने की मांग रखी है। उनका कहना है कि खाद, बीज, दवा, डीजल और मजदूरी की बढ़ती कीमतों ने खेती को घाटे का सौदा बना दिया है। ऐसे में पुराना MSP किसानों को राहत नहीं दे पा रहा।

इसके अलावा ज्ञापन में ये महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए गए हैं:

पुरानी बकाया अंतर राशि का तुरंत भुगतान: वित्तीय वर्ष 2024-25 की 117 रुपये प्रति क्विंटल और 2025-26 की 186 रुपये प्रति क्विंटल की अंतर राशि तुरंत किसानों के खाते में भेजी जाए।

राजीव गांधी किसान न्याय योजना की लंबित चौथी किस्त का अविलंब भुगतान किया जाए।

2026-27 में केंद्र सरकार द्वारा MSP में की जाने वाली किसी भी वृद्धि का पूरा लाभ सीधे किसानों तक पहुंचे।

पूरे देश और प्रदेश में समर्थन मूल्य गारंटी कानून लागू किया जाए, ताकि MSP कानूनी रूप से बाध्यकारी बने और किसानों का शोषण बंद हो।

15 नवंबर की बाध्यता पर भी सवाल

ज्ञापन में धान खरीदी की समय-सीमा को लेकर भी गंभीर आपत्ति जताई गई है। महासमुंद जिले के बागबाहरा समेत कई मैदानी इलाकों में अक्टूबर के अंत तक धान की कटाई पूरी हो जाती है। ऐसे में 15 नवंबर तक इंतजार करना किसानों के लिए बहुत जोखिम भरा है।

किसानों का कहना है कि बेमौसम बारिश, नमी और भंडारण की कमी के कारण खेत या घर में पड़ी फसल खराब होने का खतरा हमेशा बना रहता है। इसलिए खरीदी की शुरुआत स्थानीय फसल कटाई के समय के हिसाब से ही होनी चाहिए, न कि एक तय तारीख के इंतजार में।

चेतावनी साफ है

जिलाध्यक्ष मानिक साहू ने साफ कहा कि किसानों की ये मांगें न तो कोई राजनीतिक नारा हैं और न ही अव्यावहारिक। ये जमीनी हकीकत पर आधारित हैं। अगर शासन ने इन पर सहानुभूतिपूर्वक और जल्द फैसला नहीं लिया, तो किसान वर्ग को आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ेगा।

महासमुंद के किसान अब इंतजार नहीं करना चाहते। वे चाहते हैं कि लागत के हिसाब से सही दाम मिले, पुरानी बकाया राशि समय पर पहुंचे और MSP को कानूनी सुरक्षा मिले। अब गेंद सरकार के पाले में है।

महासमुंद में मानवता की मिसाल बाइक की टक्कर से तड़प रहे बेजुबान के लिए देवदूत बने विहिप-बजरंग दल के कार्यकर्ता, वन विभाग और डॉक्टरों ने मिलकर बचाई जान

महासमुंद में मानवता की मिसाल बाइक की टक्कर से तड़प रहे बेजुबान के लिए देवदूत बने विहिप-बजरंग दल के कार्यकर्ता, वन विभाग और डॉक्टरों ने मिलकर बचाई जान

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता/ 09 अक्टूबर 2026 / दिन शुक्रवार
​महासमुंद। कलेक्टर कार्यालय के समीप एक भीषण हादसे में गंभीर रूप से घायल बेजुबान की जान बचाकर बजरंग दल के कार्यकर्ताओं, वन विभाग और पशु चिकित्सा विभाग की टीम ने तत्परता और जीवदया का अनुपम उदाहरण पेश किया है।

​दर्दनाक हादसे के बाद आक्रामक हो गया था बंदरों का झुंड

प्राप्त जानकारी के अनुसार, शुक्रवार को जिला कलेक्टर कार्यालय के आसपास के मार्ग पर सड़क पार कर रहा एक बंदर तेज रफ्तार मोटरसाइकिल की चपेट में आ गया। दुर्घटना इतनी भीषण थी कि बंदर सड़क पर लहूलुहान होकर तड़पने लगा। इस बीच, घायल साथी की चीख-पुकार सुनकर दर्जनों बंदरों का झुंड वहां इकट्ठा हो गया और आक्रामक रुख अपनाते हुए घायल बंदर को घेरकर बैठ गया। इसके कारण राहगीरों का वहां पहुंचना और रेस्क्यू करना बेहद खतरनाक हो चुका था।

​जेसीबी की मदद से हटी भीड़, बोरी में रेस्क्यू कर पहुंचाया फॉरेस्ट ऑफिस

घटना की भनक लगते ही विश्व हिंदू परिषद बजरंग दल के नगर संयोजक कान्हा प्रधान बिना देर किए मौके पर पहुंचे। स्थिति की संवेदनशीलता को देखते हुए उन्होंने तुरंत जिला गौ रक्षा प्रमुख सुमन सेंद्रे को सूचित किया। इसी दौरान उस मार्ग से गुजर रही नगर पालिका की जेसीबी मशीन को रुकवाया गया। जेसीबी की मदद से बंदरों के झुंड को सूझबूझ के साथ सुरक्षित दूर हटाया गया। इसके बाद कार्यकर्ताओं ने तत्परता दिखाते हुए घायल बंदर को बोरी में सुरक्षित रखकर सीधे वन विभाग कार्यालय पहुंचाया।

​चिकित्सकीय टीम का त्वरित एक्शन, शुरू हुआ इलाज

बंदर को फॉरेस्ट ऑफिस पहुंचाते ही सुमन सेंद्रे ने उपसंचालक पशु चिकित्सा केंद्र महासमुंद के वरिष्ठ पशु चिकित्सक डॉ. प्रमोद कोसरिया को फोन कर स्थिति से अवगत कराया। सूचना मिलते ही डॉ. कोसरिया तुरंत मेडिकल किट के साथ फॉरेस्ट ऑफिस पहुंचे और घायल बंदर का प्राथमिक उपचार व घावों की ड्रेसिंग की।

​इनकी रही सराहनीय उपस्थिति

रेस्क्यू और इलाज की इस पूरी प्रक्रिया में वन विभाग से कौशलेंद्र आदिल एवं अन्य कर्मचारी मुस्तैद रहे। वहीं विश्व हिंदू परिषद बजरंग दल की ओर से जिला गौ रक्षा प्रमुख सुमन सेंद्रे, नगर संयोजक कान्हा प्रधान, अखिलेश साहू समेत बड़ी संख्या में कार्यकर्ता मौजूद रहे। प्रशासनिक अधिकारियों और स्थानीय नागरिकों ने युवाओं की इस त्वरित पहल और जीवदया की खुले दिल से प्रशंसा की है।

महासमुंद पुलिस तबादला आदेश पर सवाल एसपी के तबादला आदेश पर बड़ा सवाल..!

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आदेश में बसना ट्रांसफर, फिर भी महासमुंद सिटी कोतवाली में जमे प्रधान आरक्षक हरिश कुमार कंवर
महीनों बाद भी नहीं हुई रवानगी..? दूसरे जवानों ने माना आदेश, एक कर्मचारी को क्यों मिली अलग छूट—पुलिस प्रशासन से जवाब की मांग

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता/ 09 अक्टूबर 2026 / दिन शुक्रवार
महासमुंद (छत्तीसगढ़)।
महासमुंद जिला पुलिस प्रशासन में जारी स्थानांतरण आदेश के पालन को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। पुलिस अधीक्षक कार्यालय से जारी स्थानांतरण आदेश क्रमांक पुअ/महा/स्था/एम-2315/26, दिनांक 20 मार्च 2026 में थाना महासमुंद में पदस्थ प्रधान आरक्षक हरिश कुमार कंवर, बैज नंबर 871 का स्थानांतरण थाना बसना किया गया था। दस्तावेज में स्थानांतरित कर्मचारियों को नवीन पदस्थापना स्थल के लिए रवानगी देने तथा आमद की सूचना कार्यालय को भेजने संबंधी निर्देश भी दर्ज बताए जा रहे हैं।

लेकिन उपलब्ध जानकारी और लगाए गए आरोपों के मुताबिक, आदेश जारी होने के कई माह बाद भी हरिश कुमार कंवर महासमुंद सिटी कोतवाली में ही कार्यरत बताए जा रहे हैं। यदि यह स्थिति सही है, तो मामला केवल एक कर्मचारी के स्थानांतरण का नहीं, बल्कि वरिष्ठ अधिकारी के लिखित आदेश के अनुपालन और पुलिस विभाग की प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ जाता है।
स्थानांतरण सूची में क्रमांक 07 पर दर्ज है नाम
पुलिस अधीक्षक कार्यालय की बताई जा रही स्थानांतरण सूची में सरल क्रमांक 07 पर प्रधान आरक्षक हरिश कुमार कंवर का नाम दर्ज है। आदेश के अनुसार उनकी नवीन पदस्थापना थाना बसना की गई थी।

स्थानांतरण आदेशों का उद्देश्य पुलिस बल में प्रशासनिक आवश्यकता, कार्य-वितरण और विभागीय अनुशासन बनाए रखना होता है। ऐसे में यदि किसी कर्मचारी की रवानगी किसी कारण से रोक दी गई हो, तो उसके पीछे सक्षम अधिकारी का स्पष्ट आदेश या विधिवत संशोधन होना अपेक्षित है।

यहीं से सबसे बड़ा सवाल सामने आता है—यदि स्थानांतरण आदेश प्रभावी था, तो उसकी अनुपालना क्यों नहीं हुई..?

क्या रवानगी रोकी गई या आदेश में हुआ कोई संशोधन..?

इस पूरे मामले में पुलिस प्रशासन के सामने कुछ सीधे और महत्वपूर्ण प्रश्न हैं।

क्या प्रधान आरक्षक हरिश कुमार कंवर को स्थानांतरण आदेश के बावजूद महासमुंद में कार्य करने की अनुमति किसी सक्षम अधिकारी ने दी..?

क्या उनकी रवानगी स्थगित करने या स्थानांतरण संशोधित करने का कोई लिखित आदेश जारी हुआ
.?

यदि ऐसा कोई आदेश जारी हुआ है तो उसकी प्रति सार्वजनिक अथवा विभागीय रिकॉर्ड में उपलब्ध क्यों नहीं है..?

और यदि ऐसा कोई आदेश नहीं हुआ, तो फिर स्थानांतरण के महीनों बाद भी संबंधित कर्मचारी पुरानी पदस्थापना पर किस आधार पर कार्य कर रहे हैं..?

इन सवालों का स्पष्ट उत्तर ही पूरे मामले की वास्तविक स्थिति सामने ला सकता है।

बाकी कर्मचारियों ने माना आदेश, फिर इस मामले में स्थिति अलग क्यों..?

स्थानांतरण सूची में शामिल अन्य पुलिसकर्मियों के संबंध में विभागीय स्तर पर नवीन पदस्थापना पर आमद की प्रक्रिया पूरी होने की बात सामने आती रही है। ऐसे में एक ही आदेश में शामिल किसी कर्मचारी के मामले में अलग स्थिति होने पर स्वाभाविक रूप से प्रशासनिक समानता और आदेश पालन को लेकर सवाल उठते हैं।

पुलिस विभाग अनुशासन आधारित व्यवस्था है। निचले स्तर के कर्मचारी यदि स्थानांतरण आदेश का पालन करते हैं, तो वरिष्ठ अधिकारियों के लिखित आदेशों के पालन की अपेक्षा प्रत्येक कर्मचारी से समान रूप से की जाती है।

इसी कारण यह मामला अब विभागीय निगरानी के दायरे में आने की मांग कर रहा है।

ASP से पक्ष जानने का प्रयास, स्पष्ट जवाब का इंतजार

मामले में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक से संबंधित कर्मचारी की वर्तमान पदस्थापना, स्थानांतरण आदेश के पालन तथा रवानगी की स्थिति को लेकर पक्ष जानने का प्रयास किए जाने की बात सामने आई है।

यदि विभाग के पास रवानगी रोकने, स्थानांतरण संशोधित करने अथवा किसी विशेष प्रशासनिक कारण से कर्मचारी को वर्तमान स्थान पर बनाए रखने का वैध आदेश है, तो उसे स्पष्ट किया जाना चाहिए।

वहीं यदि ऐसा कोई आदेश नहीं है, तो पुलिस अधीक्षक कार्यालय द्वारा जारी मूल स्थानांतरण आदेश के अनुपालन की स्थिति की विभागीय जांच होना स्वाभाविक प्रशासनिक प्रक्रिया होगी।

मामले में इन बिंदुओं की जांच जरूरी

इस पूरे प्रकरण में निष्पक्ष जांच के लिए पुलिस प्रशासन निम्न रिकॉर्ड की जांच कर सकता है—

20 मार्च 2026 के स्थानांतरण आदेश की मूल प्रति।

प्रधान आरक्षक हरिश कुमार कंवर की रवानगी संबंधी प्रविष्टि।

थाना बसना में उनकी आमद संबंधी रिकॉर्ड।

सिटी कोतवाली महासमुंद की उपस्थिति एवं ड्यूटी रजिस्टर।

स्थानांतरण रोकने अथवा संशोधित करने संबंधी कोई लिखित आदेश।

रक्षित केंद्र/आरआई स्तर से जारी रवानगी संबंधी दस्तावेज।

संबंधित अधिकारी द्वारा आदेश अनुपालन की रिपोर्ट।

इन दस्तावेजों की जांच से यह स्पष्ट हो सकता है कि मामला प्रशासनिक प्रक्रिया में हुई चूक का है अथवा किसी सक्षम आदेश के कारण संबंधित कर्मचारी की पदस्थापना यथावत रखी गई।

अब एसपी कार्यालय की कार्रवाई पर नजर

इस प्रकरण ने जिला पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं। यदि स्थानांतरण आदेश प्रभावी होने के बावजूद उसकी अनुपालना नहीं हुई है, तो विभागीय स्तर पर इसकी वजह स्पष्ट होना आवश्यक है।

वहीं यदि हरिश कुमार कंवर को महासमुंद में ही बनाए रखने के लिए कोई सक्षम आदेश जारी हुआ है, तो उस आदेश की स्थिति भी स्पष्ट की जानी चाहिए, ताकि अनावश्यक भ्रम की स्थिति समाप्त हो।

मुद्दा किसी एक कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई की मांग भर का नहीं, बल्कि पुलिस विभाग के लिखित प्रशासनिक आदेशों की पारदर्शी अनुपालना का है।

अब देखना होगा कि पुलिस अधीक्षक कार्यालय इस मामले में उपलब्ध रिकॉर्ड की जांच कर स्थिति स्पष्ट करता है या नहीं।

बेबाक बयान का सवाल सीधा है—यदि स्थानांतरण आदेश लागू था, तो रवानगी क्यों नहीं हुई? और यदि रवानगी रोकने का आदेश था, तो वह आदेश किस सक्षम अधिकारी ने जारी किया..?

इन दोनों सवालों का आधिकारिक जवाब ही पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर सामने ला सकता है।

अभिनय जगत का एक सशक्त अध्याय समाप्त महान अभिनेता नाना पाटेकर का 75 वर्ष की आयु में निधन

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अभिनय जगत का एक सशक्त अध्याय समाप्त महान अभिनेता नाना पाटेकर का 75 वर्ष की आयु में निधन

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता/ 08 अक्टूबर 2026 / गुरुवार
रायपुर / ​भारतीय सिनेमा के दिग्गज और अपनी बहुमुखी प्रतिभा व संवाद अदायगी के लिए जाने जाने वाले अभिनेता नाना पाटेकर (विश्वनाथ पाटेकर) का 8 अक्टूबर 2026 को 75 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। गोवा स्थित उनके आवास पर दिल का दौरा (कार्डियक अरेस्ट) पड़ने के कारण उनका देहांत हुआ। उनके निधन की खबर से हिंदी और मराठी सिनेमा जगत के साथ-साथ पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत देश की कई जानी-मानी हस्तियों और फिल्म इंडस्ट्री के सहयोगियों ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है।

​शुरुआती जीवन और संघर्ष: पोस्टर पेंटिंग से रंगमंच तक का सफर

​नाना पाटेकर का जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मुरुड-जंजीरा में एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। बचपन में ही आर्थिक तंगी का सामना करने के कारण उन्हें काफी कम उम्र से काम करना पड़ा।

​प्रारंभिक संघर्ष: अपनी पढ़ाई का खर्च उठाने और परिवार की आर्थिक मदद के लिए वे सिनेमा के पोस्टर पेंट करने और फिल्में देखने आने वालों के लिए चाय बेचने का काम भी करते थे।

​रंगमंच से जुड़ाव: मुंबई के सर जे. जे. इंस्टीट्यूट ऑफ एप्लाइड आर्ट से व्यावसायिक कला (Commercial Art) की पढ़ाई करने के बाद, उन्होंने थिएटर (रंगमंच) की दुनिया में कदम रखा। मराठी नाटकों में उनके सशक्त अभिनय ने उन्हें जल्द ही पहचान दिलाई।

​बॉलीवुड और मराठी सिनेमा में सिनेमाई सफर

​नाना पाटेकर ने 1978 में फिल्म ‘गमन’ से अपने अभिनय करियर की शुरुआत की थी। हालांकि, 1980 के दशक के अंत में उन्हें बड़ी सफलता मिली।

​सफलता का दौर: 1989 में आई विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म ‘परिंदा’ में उनके द्वारा निभाए गए “अन्ना” के खलनायक किरदार ने उन्हें रातों-रात स्टार बना दिया।

​क्रांतिवीर और प्रतिष्ठित संवाद: 1994 में आई फिल्म ‘क्रांतिवीर’ उनके करियर का मील का पत्थर साबित हुई। इस फिल्म में उनकी तीखी और जोशीली संवाद अदायगी (Dialogue Delivery) ने उन्हें भारतीय सिनेमा के सबसे प्रभावशाली अभिनेताओं में शुमार कर दिया।

​निर्देशन और अन्य भूमिकाएँ: उन्होंने 1991 में ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ फिल्म का निर्देशन भी किया, जिसके लिए उन्होंने भारतीय सेना के साथ दो साल का विशेष प्रशिक्षण लिया था।

​विभिन्न विधाओं में अभिनय: केवल गंभीर और उग्र भूमिकाएँ ही नहीं, बल्कि ‘वेलकम’ (उदय शेट्टी) और ‘ब्लफ़मास्टर’ जैसी फिल्मों में उनकी कॉमिक टाइमिंग ने भी दर्शकों का दिल जीता। मराठी सिनेमा में उनकी फिल्म ‘नटसम्राट’ (2016) और ‘डॉ. प्रकाश बाबा आमटे’ को सर्वकालिक उत्कृष्ट अभिनय माना जाता है।

​प्रमुख पुरस्कार और उपलब्धियाँ

​अपने लगभग पांच दशक लंबे करियर में नाना पाटेकर को कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया:

प्रमुख पुरस्कार और उपलब्धियाँ

​अपने लगभग पांच दशक लंबे करियर में नाना पाटेकर को कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया:

पुरस्कारवर्ष/फिल्म
पद्म श्री2013 (कला के क्षेत्र में योगदान के लिए)

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ अभिनेता)क्रांतिवीर (1994)

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार

(सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता)परिंदा (1989) और अग्निसाक्षी (1996)

फिल्मफेयर पुरस्कार विभिन्न श्रेणियों में कई बार सम्मानित

सामाजिक कार्य: नाम फाउंडेशन (Naam Foundation)

​नाना पाटेकर न केवल एक महान कलाकार थे, बल्कि एक संवेदनशील समाजसेवक भी थे।

​किसानों के लिए पहल: महाराष्ट्र में पड़े भीषण सूखे के दौरान जब किसान आत्महत्या कर रहे थे, तब नाना पाटेकर ने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर 2015 में ‘नाम फाउंडेशन’ की स्थापना की।

​जल संरक्षण और पुनर्वास: इस संस्था के जरिए उन्होंने हजारों पीड़ित किसान परिवारों को आर्थिक सहायता दी, नदियां और तालाब खुदवाए, और गांवों में जल संरक्षण के लिए अभूतपूर्व कार्य किए। उनकी इस सामाजिक पहल के लिए देशवासी उनका बहुत सम्मान करते हैं।

​एक युग का अंत

​नाना पाटेकर की गिनती उन गिने-चुने अभिनेताओं में होती थी, जिन्होंने बिना किसी पारंपरिक हीरो वाली छवि के, अपने निडर अंदाज, अद्वितीय संवाद अदायगी और दमदार अभिनय के बल पर सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाई। उनका जाना भारतीय कला और सामाजिक क्षेत्र के लिए एक अपूरणीय क्षति है।

अभिनय जगत का एक सशक्त अध्याय समाप्त महान अभिनेता नाना पाटेकर का 75 वर्ष की आयु में निधन

अभिनय जगत का एक सशक्त अध्याय समाप्त महान अभिनेता नाना पाटेकर का 75 वर्ष की आयु में निधन

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता/ 08 अक्टूबर 2026 / गुरुवार
रायपुर / ​भारतीय सिनेमा के दिग्गज और अपनी बहुमुखी प्रतिभा व संवाद अदायगी के लिए जाने जाने वाले अभिनेता नाना पाटेकर (विश्वनाथ पाटेकर) का 8 अक्टूबर 2026 को 75 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। गोवा स्थित उनके आवास पर दिल का दौरा (कार्डियक अरेस्ट) पड़ने के कारण उनका देहांत हुआ। उनके निधन की खबर से हिंदी और मराठी सिनेमा जगत के साथ-साथ पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत देश की कई जानी-मानी हस्तियों और फिल्म इंडस्ट्री के सहयोगियों ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है।

​शुरुआती जीवन और संघर्ष: पोस्टर पेंटिंग से रंगमंच तक का सफर

​नाना पाटेकर का जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मुरुड-जंजीरा में एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। बचपन में ही आर्थिक तंगी का सामना करने के कारण उन्हें काफी कम उम्र से काम करना पड़ा।

​प्रारंभिक संघर्ष: अपनी पढ़ाई का खर्च उठाने और परिवार की आर्थिक मदद के लिए वे सिनेमा के पोस्टर पेंट करने और फिल्में देखने आने वालों के लिए चाय बेचने का काम भी करते थे।

​रंगमंच से जुड़ाव: मुंबई के सर जे. जे. इंस्टीट्यूट ऑफ एप्लाइड आर्ट से व्यावसायिक कला (Commercial Art) की पढ़ाई करने के बाद, उन्होंने थिएटर (रंगमंच) की दुनिया में कदम रखा। मराठी नाटकों में उनके सशक्त अभिनय ने उन्हें जल्द ही पहचान दिलाई।

​बॉलीवुड और मराठी सिनेमा में सिनेमाई सफर

​नाना पाटेकर ने 1978 में फिल्म ‘गमन’ से अपने अभिनय करियर की शुरुआत की थी। हालांकि, 1980 के दशक के अंत में उन्हें बड़ी सफलता मिली।

​सफलता का दौर: 1989 में आई विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म ‘परिंदा’ में उनके द्वारा निभाए गए “अन्ना” के खलनायक किरदार ने उन्हें रातों-रात स्टार बना दिया।

​क्रांतिवीर और प्रतिष्ठित संवाद: 1994 में आई फिल्म ‘क्रांतिवीर’ उनके करियर का मील का पत्थर साबित हुई। इस फिल्म में उनकी तीखी और जोशीली संवाद अदायगी (Dialogue Delivery) ने उन्हें भारतीय सिनेमा के सबसे प्रभावशाली अभिनेताओं में शुमार कर दिया।

​निर्देशन और अन्य भूमिकाएँ: उन्होंने 1991 में ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ फिल्म का निर्देशन भी किया, जिसके लिए उन्होंने भारतीय सेना के साथ दो साल का विशेष प्रशिक्षण लिया था।

​विभिन्न विधाओं में अभिनय: केवल गंभीर और उग्र भूमिकाएँ ही नहीं, बल्कि ‘वेलकम’ (उदय शेट्टी) और ‘ब्लफ़मास्टर’ जैसी फिल्मों में उनकी कॉमिक टाइमिंग ने भी दर्शकों का दिल जीता। मराठी सिनेमा में उनकी फिल्म ‘नटसम्राट’ (2016) और ‘डॉ. प्रकाश बाबा आमटे’ को सर्वकालिक उत्कृष्ट अभिनय माना जाता है।

​प्रमुख पुरस्कार और उपलब्धियाँ

​अपने लगभग पांच दशक लंबे करियर में नाना पाटेकर को कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया:

प्रमुख पुरस्कार और उपलब्धियाँ

​अपने लगभग पांच दशक लंबे करियर में नाना पाटेकर को कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया:

पुरस्कारवर्ष/फिल्म
पद्म श्री2013 (कला के क्षेत्र में योगदान के लिए)

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ अभिनेता)क्रांतिवीर (1994)

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार

(सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता)परिंदा (1989) और अग्निसाक्षी (1996)

फिल्मफेयर पुरस्कार विभिन्न श्रेणियों में कई बार सम्मानित

सामाजिक कार्य: नाम फाउंडेशन (Naam Foundation)

​नाना पाटेकर न केवल एक महान कलाकार थे, बल्कि एक संवेदनशील समाजसेवक भी थे।

​किसानों के लिए पहल: महाराष्ट्र में पड़े भीषण सूखे के दौरान जब किसान आत्महत्या कर रहे थे, तब नाना पाटेकर ने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर 2015 में ‘नाम फाउंडेशन’ की स्थापना की।

​जल संरक्षण और पुनर्वास: इस संस्था के जरिए उन्होंने हजारों पीड़ित किसान परिवारों को आर्थिक सहायता दी, नदियां और तालाब खुदवाए, और गांवों में जल संरक्षण के लिए अभूतपूर्व कार्य किए। उनकी इस सामाजिक पहल के लिए देशवासी उनका बहुत सम्मान करते हैं।

​एक युग का अंत

​नाना पाटेकर की गिनती उन गिने-चुने अभिनेताओं में होती थी, जिन्होंने बिना किसी पारंपरिक हीरो वाली छवि के, अपने निडर अंदाज, अद्वितीय संवाद अदायगी और दमदार अभिनय के बल पर सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाई। उनका जाना भारतीय कला और सामाजिक क्षेत्र के लिए एक अपूरणीय क्षति है।