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हर्बल लाइफ का ‘सुपर कोच’ गुरु “गिरीश साहू” बना सरकारी गुरुजी ..!

हर्बल लाइफ का ‘सुपर कोच’ गुरु “गिरीश साहू” बना सरकारी गुरुजी ..!

सरकारी स्कूल में बच्चों को पढ़ाने वाला शिक्षक नेटवर्क मार्केटिंग में सक्रिय होने के आरोपों से घिरा; बालोद से महासमुंद तक ‘सुपर कोच’ की भूमिका पर उठे सवाल

विशेष रिपोर्ट | प्रधान संपादक मयंक गुप्ता / 06 अक्टूबर 2026/ दिन मंगलवार
महासमुंद/बालोद छत्तीसगढ़
शिक्षा विभाग में सरकारी सेवा और निजी नेटवर्क मार्केटिंग गतिविधियों के बीच संभावित टकराव को लेकर एक मामला सामने आया है। विकासखंड डौंडी के शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला बेलौदा में पदस्थ शिक्षक गिरीश साहू, जो मूलतः महासमुंद जिले के इमलीभांठा क्षेत्र के निवासी बताए जा रहे हैं, उनके खिलाफ हर्बल लाइफ न्यूट्रिशन से जुड़कर नेटवर्क मार्केटिंग गतिविधियां संचालित करने और स्वयं को ‘सुपर कोच’ के रूप में प्रचारित करने के गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

शिकायतकर्ता द्वारा जिला शिक्षा अधिकारी और कलेक्टर के समक्ष दिए गए आवेदन में आरोप लगाया गया है कि शिक्षक सरकारी सेवा में रहते हुए हर्बल लाइफ से संबंधित प्रचार-प्रसार, नेटवर्किंग और कथित रूप से उत्पादों की बिक्री/प्रमोशन में सक्रिय हैं। शिकायत के साथ सोशल मीडिया पोस्ट, स्क्रीनशॉट और वीडियो जैसे डिजिटल साक्ष्य लगाए जाने की बात भी कही गई है।

बालोद में शिक्षक, महासमुंद में भी ‘सुपर कोच’?

इस पूरे मामले का सबसे अहम पहलू यह बताया जा रहा है कि गिरीश साहू केवल बालोद जिले में ही हर्बल लाइफ की नेटवर्किंग गतिविधियों से जुड़े नहीं बताए जा रहे, बल्कि महासमुंद जिले में भी उनके ‘सुपर कोच’ के रूप में सक्रिय रहने के आरोप सामने आए हैं।

यानी सवाल सिर्फ निजी कंपनी से जुड़ने तक सीमित नहीं है। सवाल यह भी है कि एक सरकारी शिक्षक की प्राथमिक जिम्मेदारी विद्यालय में शिक्षण कार्य है, तो फिर सरकारी सेवा के साथ नेटवर्क मार्केटिंग की गतिविधियों के लिए कितना समय और किस स्तर तक सक्रियता उचित है..?

‘एक्स्ट्रा इनकम’ के सपने का नेटवर्क

हर्बल लाइफ जैसी नेटवर्क मार्केटिंग व्यवस्था में लोगों को अतिरिक्त आय, बेहतर जीवनशैली और आर्थिक स्वतंत्रता के सपने दिखाकर नेटवर्क से जोड़ने के आरोप अक्सर सामने आते रहे हैं। महासमुंद क्षेत्र में भी शिकायत के अनुसार लोगों को हेल्थ और वेल्थ से जुड़े दावों के साथ नेटवर्किंग से जोड़ने का प्रयास किया गया।

हालांकि किसी भी उत्पाद अथवा कंपनी के संबंध में अंतिम निष्कर्ष जांच के बाद ही निकाला जा सकता है, लेकिन सरकारी कर्मचारी द्वारा ऐसी व्यावसायिक गतिविधियों में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष भागीदारी का आरोप अपने आप में विभागीय जांच का विषय जरूर बनता है।

बिना मेडिकल डिग्री ‘हेल्थ’ सलाह देने का आरोप

शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि शिक्षक द्वारा सोशल मीडिया एवं अन्य माध्यमों से स्वयं को ‘हेल्थ कोऑर्डिनेटर’, ‘डिजिटल क्रिएटर’ या ‘कोच’ के रूप में प्रस्तुत किया जाता है और लोगों को हेल्थ सप्लीमेंट्स के संबंध में सलाह दी जाती है।

यहां बड़ा सवाल यह है कि यदि कोई व्यक्ति चिकित्सक या मान्यता प्राप्त पोषण विशेषज्ञ नहीं है, तो क्या उसे किसी व्यक्ति की बीमारी, उपचार अथवा स्वास्थ्य स्थिति के संबंध में चिकित्सकीय सलाह देने का अधिकार है.?

यदि ऐसे दावे वास्तव में किए गए हैं, तो संबंधित विभागों द्वारा इसकी वैधानिकता की जांच किया जाना आवश्यक है।

कमाई पत्नी के खाते में होने की सफाई भी चर्चा में

शिकायत से जुड़े पक्ष के अनुसार जब शिक्षक से नेटवर्किंग से होने वाली आय को लेकर सवाल किए गए तो कथित तौर पर यह जवाब दिया गया कि कमाई उनकी नहीं बल्कि उनकी पत्नी के खाते में आती है।

लेकिन शिकायतकर्ता का दावा है कि सोशल मीडिया पर कंपनी से संबंधित प्रचार और नेटवर्किंग गतिविधियों में शिक्षक की स्वयं की सक्रियता के डिजिटल साक्ष्य मौजूद हैं।

यही वजह है कि अब सवाल केवल खाते में पैसा आने का नहीं, बल्कि यह पता लगाने का है कि व्यावसायिक गतिविधि वास्तव में कौन संचालित कर रहा था और सरकारी सेवा में रहते हुए उसमें संबंधित शिक्षक की भूमिका क्या थी..?

महासमुंद का दूसरा मामला और गंभीर सवाल

इसी प्रकरण से जुड़े आरोपों में महासमुंद के श्रीराम वाटिका, ईमलीभांठा क्षेत्र की एक दुखद घटना का भी उल्लेख किया गया है। मृतक दिनेश साहू की माता श्रीमती खेमिन साहू द्वारा पुलिस प्रशासन के समक्ष शिकायत देकर अपने बेटे की मृत्यु के कारणों और उससे जुड़े व्यक्तियों की भूमिका की जांच की मांग किए जाने की बात सामने आई है।

शिकायत में मृतक की पत्नी, एक व्यक्ति तथा शिक्षक गिरीश साहू के बीच कथित संबंधों और हर्बल लाइफ नेटवर्किंग गतिविधियों का उल्लेख किया गया है। शिकायतकर्ता परिवार ने इन घटनाक्रमों को अपने बेटे की मानसिक परेशानी से जोड़ते हुए जांच की मांग की है।

हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि इस रिपोर्ट में नहीं की जा रही है और दिनेश साहू की आत्महत्या को किसी व्यक्ति अथवा हर्बल लाइफ गतिविधि से सीधे जोड़ने का निष्कर्ष जांच के बिना निकालना उचित नहीं होगा। पुलिस जांच में यदि कोई आपराधिक अथवा अन्य जिम्मेदारी सामने आती है, तभी उस पर अंतिम टिप्पणी की जा सकती है।

13 अगस्त 2025 की घटना, लेकिन शिकायत के सवाल अब भी कायम

शिकायत के अनुसार दिनेश साहू ने 13 अगस्त 2025 की रात आत्महत्या की थी।

उनकी मां द्वारा पुलिस अधीक्षक महासमुंद के समक्ष शिकायत प्रस्तुत कर मामले की निष्पक्ष जांच की मांग किए जाने का दावा है।

अब सवाल यह है कि शिकायत पर पुलिस स्तर पर क्या जांच हुई? किन बिंदुओं पर जांच की गई?

क्या संबंधित व्यक्तियों के बयान लिए गए? क्या मोबाइल चैट, सोशल मीडिया गतिविधियों और अन्य डिजिटल साक्ष्यों की जांच हुई..?

यदि शिकायत अब भी लंबित है, तो परिवार को जांच की स्थिति की स्पष्ट जानकारी मिलना जरूरी है।

सरकारी शिक्षक की ‘सुपर कोच’ भूमिका पर विभागीय जांच जरूरी

सरकारी शिक्षक के मामले में सबसे महत्वपूर्ण बिंदु छत्तीसगढ़ सिविल सेवा आचरण नियमों के तहत उनकी निजी व्यावसायिक गतिविधियों की वैधानिकता है।

क्या शिक्षक ने किसी सक्षम अधिकारी से अनुमति ली थी..?

क्या उन्होंने नेटवर्क मार्केटिंग अथवा किसी निजी व्यावसायिक गतिविधि में स्वयं को अधिकृत रूप से जोड़ा था..?

क्या उनकी सोशल मीडिया गतिविधियां वास्तविक व्यावसायिक प्रचार का हिस्सा थीं..?

क्या इससे उनके सरकारी शिक्षकीय दायित्व प्रभावित हुए..?

और सबसे महत्वपूर्ण—क्या ‘सुपर कोच’ के रूप में उनकी भूमिका सरकारी सेवा के आचरण नियमों के अनुरूप है..?

इन सवालों का जवाब केवल विभागीय जांच से ही स्पष्ट हो सकता है।

शिक्षामंत्री से जांच और कड़ी कार्रवाई की मांग

इस पूरे मामले को लेकर छत्तीसगढ़ के शिक्षामंत्री से मांग की गई है कि सरकारी सेवा में रहते हुए निजी नेटवर्क मार्केटिंग गतिविधियों में संलिप्तता के आरोपों की निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच कराई जाए।

यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित शिक्षक के विरुद्ध सेवा नियमों के अनुसार कठोर विभागीय कार्रवाई की जानी चाहिए। शिकायतकर्ता पक्ष की मांग है कि सरकारी स्कूल को छोड़कर निजी नेटवर्किंग को प्राथमिकता देने वाले ऐसे मामलों पर विभाग स्पष्ट नीति और कार्रवाई सुनिश्चित करे।

अब बड़ा सवाल—‘सुपर कोच’ या सरकारी शिक्षक?

इस पूरे मामले का केंद्र यही सवाल है।

क्या सरकारी शिक्षक का काम बच्चों को शिक्षा देना है या निजी नेटवर्क मार्केटिंग में ‘सुपर कोच’ बनकर नेटवर्क तैयार करना..?

अगर आरोप गलत हैं तो जांच के बाद शिक्षक को क्लीन चिट मिलनी चाहिए।
अगर आरोप सही हैं तो सरकारी सेवा में रहते हुए निजी व्यावसायिक गतिविधियों पर नियमों के मुताबिक कार्रवाई होनी चाहिए।

क्योंकि मामला केवल एक शिक्षक या एक कंपनी तक सीमित नहीं है। मामला उस भरोसे का है जो अभिभावक और समाज एक सरकारी शिक्षक पर करते हैं।

हर्बल लाइफ के ‘सुपर कोच’ से जुड़े आरोपों की निष्पक्ष जांच ही अब इस पूरे मामले की असली तस्वीर सामने ला सकती है।

महासमुंद में पंचायत कार्यों पर सवाल..! ‘पलक बारदाना’ के संचालक अतुल अग्रवाल से जुड़े करीब आधा करोड़ के कार्य जांच के घेरे में

महासमुंद में पंचायत कार्यों पर सवाल..! ‘पलक बारदाना’ के संचालक अतुल अग्रवाल से जुड़े करीब आधा करोड़ के कार्य जांच के घेरे में

खट्टा के कथित ₹2 लाख ‘कट’ से लेकर ₹50 हजार के पोल बिल तक उठे सवाल; सीसी रोड, हाईमास्ट लाइट और पानी टैंकर के कार्यों की सूक्ष्म जांच की मांग

विशेष रिपोर्ट | प्रधान संपादक मयंक गुप्ता / 05 अक्टूबर 2026/ दिन सोमवार

महासमुंद। महासमुंद जनपद पंचायत क्षेत्र में विकास कार्यों के नाम पर हुए भुगतान और बिल-वाउचर को लेकर सवाल लगातार गहराते जा रहे हैं। अब पलक बारदाना फर्म के संचालक अतुल अग्रवाल से जुड़े विभिन्न पंचायतों के कार्यों की सूक्ष्मता से जांच कराने की मांग उठने लगी है। उपलब्ध शिकायतों और सामने आए दस्तावेजों के आधार पर करीब आधा करोड़ रुपये के कार्यों को जांच के दायरे में लाने की मांग की जा रही है।

इन कार्यों में सीसी रोड निर्माण, हाईमास्ट लाइट, पानी टैंकर सहित अन्य पंचायत स्तरीय कार्य शामिल बताए जा रहे हैं। सवाल यह है कि संबंधित कार्य वास्तव में निर्धारित मापदंडों के अनुरूप हुए या नहीं, सामग्री की वास्तविक आपूर्ति हुई या नहीं और भुगतान से जुड़े बिल-वाउचर तथा फर्म के दस्तावेजों में सब कुछ नियमानुसार है या नहीं।

₹50 हजार के एक पोल बिल ने बढ़ाए सवाल

मामले में सामने आए एक टैक्स इनवॉइस में पलक बारदाना, डुमरतराई रायपुर के नाम से बिल जारी होना बताया गया है। बिल में ग्राम पंचायत मरौद, जिला महासमुंद को खरीदार दर्शाया गया है।

इनवॉइस नंबर 27, दिनांक 06 जून 2026 में 9 मीटर के एक पोल की मूल कीमत ₹42,373 दर्शाई गई है। 9 प्रतिशत CGST और 9 प्रतिशत SGST के बाद कुल राशि ₹50,000 बताई गई है।

अब जांच का विषय यह है कि—

क्या पोल वास्तव में पंचायत को सप्लाई हुआ..?

क्या स्टॉक रजिस्टर में इसकी एंट्री है..?

क्या पोल मौके पर स्थापित है..?

खरीद दर बाजार मूल्य के अनुरूप थी या नहीं..?

संबंधित पंचायत में तकनीकी स्वीकृति और माप पुस्तिका उपलब्ध है या नहीं..?

भुगतान किस खाते में और किस प्रक्रिया से किया गया..?

बिल पर अतुल अग्रवाल के हस्ताक्षर से भी उठे सवाल

सामने आए दस्तावेज में “For Palak Bardana” के स्थान पर अतुल अग्रवाल के हस्ताक्षर दिखाई देने की बात सामने आई है। ऐसे में यह जांच जरूरी हो जाती है कि संबंधित फर्म में उनकी आधिकारिक भूमिका क्या है और पंचायतों से होने वाले लेन-देन में उनकी भूमिका किस स्तर तक रही है।

हालांकि, केवल किसी बिल पर हस्ताक्षर होना अपने आप में वित्तीय अनियमितता सिद्ध नहीं करता। इसकी पुष्टि के लिए फर्म के GST रिकॉर्ड, बैंक लेन-देन, खरीद-बिक्री दस्तावेज, पंचायत भुगतान रिकॉर्ड और अधिकृत हस्ताक्षर संबंधी दस्तावेजों की जांच आवश्यक होगी।

खट्टा पंचायत के कथित ₹2 लाख ‘कट’ ने बढ़ाई हलचल

ग्राम पंचायत खट्टा के सचिव द्वारिका निषाद की शिकायत में निर्माण कार्य के भुगतान को लेकर दबाव बनाए जाने और कथित रूप से ₹2 लाख के लेन-देन की बातचीत का दावा किया गया है।

शिकायत में रामस्वरूप दीवान और ठेकेदार अतुल अग्रवाल का नाम सामने आने की बात कही गई है। सचिव पक्ष का आरोप है कि अधूरे कार्य के बावजूद भुगतान के लिए दबाव बनाया गया।

इन आरोपों की वास्तविकता का निर्धारण केवल शिकायत के आधार पर नहीं किया जा सकता। यदि कथित बातचीत का मूल ऑडियो उपलब्ध है तो उसकी फॉरेंसिक जांच, कॉल डिटेल और संबंधित वित्तीय लेन-देन की जांच से ही आरोपों की पुष्टि या खंडन संभव होगा।

सचिव संघ ने भी खोला मोर्चा

मामले को लेकर सचिव संघ महासमुंद की ब्लॉक इकाई ने 27 सितंबर 2026 को कोडार बांध गार्डन में बैठक आयोजित की। संघ ने पंचायत सचिव द्वारिका निषाद के विरुद्ध की गई शिकायत और कथित राजनीतिक दबाव को लेकर आपत्ति दर्ज कराते हुए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की।

संघ का कहना है कि यदि किसी सचिव पर नियम विरुद्ध तरीके से दबाव बनाया गया है अथवा धमकी या गलत शिकायत के माध्यम से दबाव बनाने का प्रयास हुआ है, तो इसकी भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

अब सवाल सिर्फ खट्टा का नहीं

सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या मामला केवल खट्टा पंचायत तक सीमित है या महासमुंद जनपद पंचायत क्षेत्र की अन्य पंचायतों में भी अतुल अग्रवाल से जुड़े कार्यों और भुगतान की जांच की आवश्यकता है?

बताया जा रहा है कि करीब आधा करोड़ रुपये के विभिन्न कार्यों में सीसी रोड निर्माण, हाईमास्ट लाइट, पानी टैंकर तथा अन्य विकास कार्य शामिल हैं। इन सभी कार्यों का पंचायतवार रिकॉर्ड निकालकर भौतिक सत्यापन किए जाने की मांग उठ रही है।

जांच में इन दस्तावेजों का मिलान जरूरी

वर्क ऑर्डर | तकनीकी स्वीकृति | प्रशासकीय स्वीकृति | माप पुस्तिका | बिल-वाउचर | GST इनवॉइस | स्टॉक रजिस्टर | कार्य पूर्णता प्रमाण-पत्र | भुगतान आदेश | बैंक रिकॉर्ड | फर्म के GST दस्तावेज

इन दस्तावेजों का आपस में मिलान और मौके पर हुए कार्य का भौतिक सत्यापन ही यह स्पष्ट कर सकता है कि भुगतान के बदले वास्तव में कितना काम हुआ और सामग्री की आपूर्ति किस स्तर पर हुई।

प्रशासन के सामने सबसे बड़ा सवाल

अब जिला प्रशासन और जिला पंचायत के सामने सवाल यह है कि अतुल अग्रवाल की फर्म से जुड़े महासमुंद जनपद पंचायत क्षेत्र के विभिन्न पंचायतों के कार्यों की पंचायतवार स्वतंत्र जांच और वित्तीय ऑडिट कब होगी..?

यदि जांच में किसी प्रकार की वित्तीय अनियमितता, फर्जी बिलिंग, सामग्री की कमी, नियम विरुद्ध भुगतान या सरकारी राशि के दुरुपयोग की पुष्टि होती है तो जिम्मेदार लोगों पर नियमानुसार कार्रवाई का रास्ता साफ होगा।

वहीं, यदि आरोप जांच में निराधार पाए जाते हैं तो संबंधित फर्म और व्यक्तियों को भी अपनी स्थिति स्पष्ट करने का पूरा अधिकार है।

फिलहाल खट्टा पंचायत की शिकायत और ₹50 हजार के पोल बिल से उठे सवालों का दायरा अब महासमुंद जनपद पंचायत क्षेत्र में अतुल अग्रवाल से जुड़े अन्य कार्यों तक पहुंचता दिखाई दे रहा है। ऐसे में करीब आधा करोड़ रुपये के बताए जा रहे कार्यों की निष्पक्ष, दस्तावेजी और भौतिक जांच से ही पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकेगी।

बिरकोनी में गरीबों के राशन पर बड़ा सवाल..! दो माह के हक की जगह एक माह का अनाज देने का आरोप, शक्कर-नमक भी महीनों से नदारद

बिरकोनी में गरीबों के राशन पर बड़ा सवाल..! दो माह के हक की जगह एक माह का अनाज देने का आरोप, शक्कर-नमक भी महीनों से नदारद

हितग्राहियों ने सेल्समैन पर राशन की हेराफेरी और कालाबाजारी के लगाए गंभीर आरोप; कैमरे के सामने सेल्समैन के कथित बयान से मचा हड़कंप, SDM ने जांच के दिए निर्देश

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता/01 अक्टूबर 2026/दिन गुरुवार
महासमुंद। जिले में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के तहत गरीब और जरूरतमंद परिवारों को मिलने वाले राशन के वितरण को लेकर एक गंभीर मामला सामने आया है। ग्राम पंचायत बिरकोनी स्थित शासकीय उचित मूल्य की दुकान में हितग्राहियों ने निर्धारित मात्रा में राशन नहीं मिलने सहित शक्कर और नमक के लंबे समय से वितरण नहीं किए जाने के आरोप लगाए हैं। मामले ने उस समय और तूल पकड़ लिया, जब मीडिया के सवालों के दौरान दुकान के सेल्समैन की ओर से राशन बेचने संबंधी कथित बयान सामने आया।

हितग्राहियों का आरोप है कि शासन द्वारा दो माह का राशन एक साथ उपलब्ध कराने के बावजूद उन्हें कथित तौर पर केवल एक माह का राशन दिया जा रहा है। इससे गरीब परिवारों को अपने हिस्से के खाद्यान्न के लिए बार-बार दुकान के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।

दो माह के राशन के आदेश, हितग्राहियों को एक माह का ही वितरण..?

ग्रामीणों के अनुसार बिरकोनी की उचित मूल्य दुकान में राशन वितरण को लेकर लंबे समय से शिकायतें सामने आती रही हैं। उनका कहना है कि दुकान खुलने और राशन वितरण की व्यवस्था भी नियमित नहीं रहती। सबसे गंभीर आरोप यह है कि दो माह के निर्धारित राशन के स्थान पर कई हितग्राहियों को केवल एक माह का खाद्यान्न दिया जा रहा है।

यदि यह आरोप जांच में सही पाए जाते हैं तो यह सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत निर्धारित खाद्यान्न वितरण व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। ऐसे में विभागीय स्तर पर स्टॉक रजिस्टर, वितरण पंजी, ई-पॉस मशीन में दर्ज आंकड़ों और वास्तविक वितरण की जांच महत्वपूर्ण होगी।

छह महीने से शक्कर और नमक नहीं मिलने का दावा

ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें पिछले करीब 5 से 6 महीनों से शक्कर और नमक का वितरण नहीं किया गया है। हितग्राहियों का कहना है कि राशन दुकान में अनाज के लिए तो वे किसी तरह इंतजार कर लेते हैं, लेकिन आवश्यक सामग्री नहीं मिलने से परिवारों की परेशानी बढ़ गई है।

कुछ ग्रामीणों ने दुकान संचालन में अनियमितता और राशन की कथित कालाबाजारी की आशंका भी जताई है। हालांकि इन आरोपों की वास्तविकता जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।

कैमरे के सामने सेल्समैन के कथित बयान से बढ़ा विवाद

मामले की जानकारी लेने जब मीडिया टीम ने दुकान के सेल्समैन ओमन कुमार साहू से सवाल किए तो बातचीत के दौरान उनके द्वारा राशन बेचने की बात स्वीकार किए जाने का दावा सामने आया। वायरल/रिकॉर्ड किए गए कथित बयान में सेल्समैन की ओर से यह कहते हुए सुना गया कि वह राशन बेचता है और शिकायतकर्ता जो करना चाहें कर सकते हैं।

इस कथित बयान ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है। हालांकि बयान की परिस्थितियों, उसका पूरा संदर्भ और राशन बिक्री से संबंधित वास्तविकता की पुष्टि विभागीय जांच के बाद ही हो सकेगी।

हितग्राहियों ने की कार्रवाई की मांग

बिरकोनी के ग्रामीणों ने संबंधित अधिकारियों से मांग की है कि दुकान के पिछले कई महीनों के खाद्यान्न आवंटन और वितरण का रिकॉर्ड खंगाला जाए। साथ ही स्टॉक रजिस्टर, ई-पॉस मशीन के आंकड़े, दुकान में उपलब्ध वास्तविक स्टॉक और हितग्राहियों को वितरित किए गए राशन का मिलान कराया जाए।

ग्रामीणों का कहना है कि यदि किसी स्तर पर राशन की हेराफेरी या कालाबाजारी हुई है तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि पात्र परिवारों के अधिकार का राशन उन्हें समय पर मिल सके।

SDM ने मामले को गंभीर माना, जांच के निर्देश

मामले को लेकर महासमुंद की SDM सुश्री अक्षा गुप्ता से प्रतिक्रिया ली गई। उन्होंने राशन वितरण में किसी भी प्रकार की अनियमितता को गंभीरता से लेते हुए मामले की जांच कराने की बात कही। उनके अनुसार जांच के बाद यदि किसी कर्मचारी या संबंधित व्यक्ति की भूमिका सामने आती है तो नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।

अब जांच में यह स्पष्ट होना बाकी है कि बिरकोनी की उचित मूल्य दुकान में वास्तव में कितना राशन आवंटित हुआ, कितना उठाव किया गया और कितना हितग्राहियों को वितरित किया गया। साथ ही शक्कर और नमक के वितरण का रिकॉर्ड भी जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा।

दुकान की जानकारी

दुकान: शासकीय उचित मूल्य की दुकान, ग्राम पंचायत बिरकोनी, विकासखंड एवं जिला महासमुंद
दुकान आईडी: 582001046
प्रबंधक: उत्तम कुमार यादव
विक्रेता/सेल्समैन: ओमन साहू
नोडल अधिकारी: बाबू लाल अहिरवार
दुकान का निर्धारित समय: मंगलवार से रविवार, सुबह 8 बजे से दोपहर 2 बजे तक
सोमवार: अवकाश

अब जांच पर टिकी ग्रामीणों की नजर

बिरकोनी की इस राशन दुकान को लेकर सामने आए आरोपों के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या रिकॉर्ड और भौतिक स्टॉक के मिलान से वास्तविक स्थिति सामने आएगी? हितग्राहियों के आरोप, सेल्समैन का कथित बयान और दुकान के सरकारी रिकॉर्ड—इन तीनों का मिलान जांच में महत्वपूर्ण साबित होगा।

यदि जांच में अनियमितता प्रमाणित होती है तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई के साथ-साथ प्रभावित हितग्राहियों को उनके हिस्से का खाद्यान्न उपलब्ध कराना भी प्रशासन के सामने बड़ी जिम्मेदारी होगी।

रायपुर के उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में दो धुरंधर कर्मचारी 14-15 सालों से एक ही वित्तीय शाखा में जमे है,आय से अधिक संपत्ति की जांच की मांग IHRF ने की।

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रायपुर के उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में दो धुरंधर कर्मचारी 14-15 सालों से एक ही वित्तीय शाखा में जमे है,आय से अधिक संपत्ति की जांच की मांग IHRF ने की।

—नवीन रोशन बेक और जेम्स सैलवा राज अन्नास्वामी; फाउंडेशन ने दूरस्थ ट्रांसफर और पूरे कार्यकाल के ऑडिट की मांग की

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता/30 सितम्बर 2026/ दिन बुधवार
रायपुर। छत्तीसगढ़ के महत्वपूर्ण संरक्षित क्षेत्र उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में व्यवस्था एवं व्यय शाखा से जुड़े दो कर्मचारियों की लंबे समय तक एक ही कार्यालय में निरंतर पदस्थापना को लेकर गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं। शिकायतों और उपलब्ध दस्तावेजों में जिन दो नामों को बार-बार दोहराया जा रहा है, वे हैं—सहायक ग्रेड-2 नवीन रोशन बेक और सहायक ग्रेड-2 जेम्स सैलवा राज अन्नास्वामी। दोनों पर करीब 14-15 साल से उसी संवेदनशील वित्तीय शाखा में जमे रहने का आरोप है। आरटीआई और पूर्व शिकायतों के बावजूद कोई ठोस प्रशासनिक कार्रवाई न होने का आरोप लग रहा है। अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार फाउंडेशन ने अब इन दोनों के दूरस्थ स्थानांतरण, सेवा रिकॉर्ड जांच और पूरे कार्यकाल के वित्तीय ऑडिट की मांग रख दी है।
उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व राज्य के वन एवं वन्यजीव संरक्षण का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसका प्रशासनिक ढांचा वन विभाग के अधीन संचालित होता है। शिकायतकर्ता पक्ष के अनुसार, व्यवस्था एवं व्यय शाखा—जहां भुगतान, बिल-वाउचर, वित्तीय स्वीकृतियां और अभिलेख रखरखाव जैसे संवेदनशील काम होते हैं—में ये दोनों कर्मचारी लंबे समय से एक ही जगह बैठे हैं।

नवीन रोशन बेक: 2011-12 से लगातार एक ही जगह

शिकायत में दर्ज जानकारी के मुताबिक, नवीन रोशन बेक वर्ष 2011-12 से सहायक ग्रेड-3 के रूप में संबंधित कार्यालय में पदस्थ रहे। 6 दिसंबर 2016 को उन्हें सहायक ग्रेड-2 में पदोन्नति मिली, लेकिन पदोन्नति के बाद भी वे उसी कार्यालय और उसी शाखा में बने रहे। अगर शिकायत की अवधि सही साबित होती है तो उनकी एक ही जगह निरंतर उपस्थिति लगभग 14-15 वर्ष तक पहुंच जाती है।

जेम्स सैलवा राज अन्नास्वामी: 2012-13 से जमे

दूसरे कर्मचारी जेम्स सैलवा राज अन्नास्वामी वर्ष 2012-13 से सहायक ग्रेड-3 के रूप में कार्यरत बताए जाते हैं। 21 नवंबर 2019 को उन्हें सहायक ग्रेड-2 में पदोन्नति मिली, लेकिन वे भी उसी कार्यालय में पदस्थ रहे। उनकी भी एक ही शाखा में निरंतर पदस्थापना की अवधि करीब 13-14 वर्ष बताई जा रही है।

दोनों के मामले में शिकायतकर्ता पक्ष का कहना है कि लंबे समय तक एक ही संवेदनशील वित्तीय पद पर बैठे रहने से भुगतान प्रक्रियाओं, बिल-वाउचर, स्वीकृतियों और अभिलेखों की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। फिलहाल किसी वित्तीय अनियमितता या घोटाले को स्थापित तथ्य नहीं कहा जा सकता। इसके लिए विभागीय जांच और मूल दस्तावेजों का परीक्षण जरूरी है।

आरटीआई और शिकायतों के बाद भी कार्रवाई नहीं

शिकायतकर्ता पक्ष का आरोप है कि इन दोनों कर्मचारियों की लंबी पदस्थापना को लेकर पहले भी शिकायतें की गईं और आरटीआई के जरिए जानकारी मांगी गई। छत्तीसगढ़ शासन का आधिकारिक आरटीआई पोर्टल नागरिकों को आवेदन और अपील की सुविधा देता है, लेकिन विभाग की ओर से अपेक्षित प्रशासनिक समीक्षा या कार्रवाई अभी तक सामने नहीं आई है। अब मुख्य सवाल यही है कि अगर दस्तावेजों में लंबी पदस्थापना की पुष्टि होती है तो विभाग ने अब तक क्या परीक्षण किया? पदस्थापना अवधि, कार्य-विभाजन और वित्तीय दायित्वों की समीक्षा हुई या नहीं..?

फाउंडेशन की साफ मांग: दोनों का दूरस्थ ट्रांसफर और पूरे कार्यकाल का ऑडिट

अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार फाउंडेशन ने उच्च अधिकारियों के समक्ष शिकायत रखते हुए कहा है कि संवेदनशील वित्तीय शाखा में लंबे समय तक एक ही कर्मचारी के रहने पर शिकायत आने के बाद निष्पक्षता बनाए रखने के लिए पहले प्रशासनिक स्तर पर स्थानांतरण किया जा सकता है। इसके बाद संबंधित अवधि के अभिलेखों की स्वतंत्र जांच कराई जा सकती है।

फाउंडेशन द्वारा प्रस्तावित स्थानांतरण में—

जेम्स सैलवा राज अन्नास्वामी (सहायक ग्रेड-2) को वन परिसर वाई-नगर, बलरामपुर वन मंडल, सरगुजा संभाग में, तथा

नवीन रोशन बेक (सहायक ग्रेड-2) को दोरीपाल वन परिसर, जिला सुकमा, बस्तर संभाग में
पदस्थ करने का सुझाव दिया गया है। अंतिम निर्णय सक्षम विभागीय प्राधिकारी नियमों, संवर्ग और प्रशासनिक आवश्यकता के अनुसार ही लेंगे।

फाउंडेशन ने दोनों कर्मचारियों के संबंधित शाखा में कार्यरत रहने की पूरी अवधि के दौरान किए गए शासकीय भुगतानों की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच की मांग की है। जांच के दायरे में विशेष रूप से बिल-वाउचर, भुगतान आदेश, वित्तीय स्वीकृतियां, कार्यादेश, सेवा संबंधी रिकॉर्ड और अन्य वित्तीय दस्तावेजों का परीक्षण शामिल करने को कहा गया है। यदि जांच में कोई अनियमितता सामने आती है तो संबंधित जिम्मेदार व्यक्ति के खिलाफ नियमानुसार विभागीय और कानूनी कार्रवाई की मांग भी की गई है।

प्रशासन के सामने ये बड़े सवाल

क्या नवीन रोशन बेक और जैस सैलवा राज अन्नास्वामी की इतने लंबे समय की पदस्थापना नियमानुसार और सक्षम अधिकारी की स्वीकृति से हुई..?

क्या उनकी पदस्थापना और कार्य-विभाजन की समय-समय पर समीक्षा की गई..?

क्या एक ही वित्तीय शाखा में 14-15 साल तक कार्य करने से उत्पन्न संभावित हित-संघर्ष या प्रशासनिक जोखिम का आकलन किया गया..?

आरटीआई और शिकायतों में आए दस्तावेजों पर विभाग ने क्या परीक्षण किया..?

क्या दोनों के पूरे कार्यकाल के वित्तीय रिकॉर्ड का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाएगा..?

फाउंडेशन ने शीघ्र प्रशासनिक निर्णय लेने की मांग के साथ अल्टीमेटम भी दिया है। यदि शिकायत में प्रस्तुत दस्तावेजों का निष्पक्ष परीक्षण नहीं हुआ और लंबे समय से चली आ रही पदस्थापना पर विभाग ने स्पष्ट निर्णय नहीं लिया, तो संगठन आंदोलन और कानूनी प्रक्रिया का रास्ता अपनाने की चेतावनी दे रहा है।

अब निगाहें वन विभाग के उच्च अधिकारियों पर टिकी हैं। क्या विभाग नवीन रोशन बेक और जैस सैलवा राज अन्नास्वामी के खिलाफ लगाए गए आरोपों और आरटीआई दस्तावेजों की स्वतंत्र जांच कराएगा? क्या इन दोनों की पदस्थापना की समीक्षा होगी? और क्या वर्षों से जुड़े वित्तीय रिकॉर्ड का निष्पक्ष ऑडिट कराया जाएगा? इन सवालों का जवाब अब विभागीय कार्रवाई और आधिकारिक जांच से ही सामने आएगा।

जनपद से निजी संस्थान तक DSC का खेल..! संकाय शाखा की समृद्धि शर्मा के अधीन काम सीखने वाले महेंद्र वर्मा अब निजी सेंटर में पंचायतों की DSC से करते दिखे काम

जनपद से निजी संस्थान तक DSC का खेल..! संकाय शाखा की समृद्धि शर्मा के अधीन काम सीखने वाले महेंद्र वर्मा अब निजी सेंटर में पंचायतों की DSC से करते दिखे काम

खैरा-सिरपुर समेत कई पंचायतों के डिजिटल सिग्नेचर टोकन निजी परिसर में मिलने से उठे गंभीर सवाल; 39 लाख के पुराने मामले से भी जुड़ रही जांच की कड़ियां

विशेष रिपोर्ट: मयंक गुप्ता, प्रधान संपादक | 29 सितम्बर 2026 | दिन मंगलवार
महासमुंद। जनपद पंचायत महासमुंद की संकाय शाखा में पदस्थ श्रीमती समृद्धि शर्मा और उनके अधीन कार्य सीखने वाले सहायक महेंद्र कुमार वर्मा की भूमिका को लेकर पंचायतों के डिजिटल सिग्नेचर सर्टिफिकेट (DSC) के उपयोग का मामला अब सवालों के घेरे में है।

मीडिया पड़ताल के दौरान महेंद्र कुमार वर्मा जनपद पंचायत परिसर से बाहर एक निजी संस्थान के कार्यालय में पंचायतों की DSC से ऑनलाइन कार्य करते दिखाई दिए। मौके पर अलग-अलग ग्राम पंचायतों के नाम से चिन्हित डिजिटल सिग्नेचर टोकन भी रखे दिखाई देने का दावा किया गया है।

जनपद से बाहर, निजी संस्थान में पंचायतों का काम..?

पड़ताल के दौरान खैरा और सिरपुर पंचायतों के DSC से ऑनलाइन कार्य किए जाने की स्थिति सामने आने की बात कही गई। इसके अलावा बिरझर और तोरला पंचायतों के नाम से चिन्हित DSC टोकन भी मौके पर दिखाई दिए।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि पंचायतों के आधिकारिक DSC जनपद पंचायत की निर्धारित व्यवस्था से बाहर निजी संस्थान तक कैसे पहुंचे?

यदि महेंद्र वर्मा वर्तमान में संबंधित पंचायतों के अधिकृत DSC ऑपरेटर नहीं हैं, तो उनके द्वारा इन डिजिटल सिग्नेचर का इस्तेमाल किस अनुमति और अधिकार के तहत किया जा रहा था—यह जांच का विषय है।

समृद्धि शर्मा के अधीन सीखा काम, अब निजी संस्थान में DSC संचालन..?

मामले में श्रीमती समृद्धि शर्मा की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। बताया जाता है कि महेंद्र कुमार वर्मा ने उनके अधीन रहते हुए पंचायत संबंधी ऑनलाइन एवं DSC से जुड़े कार्य सीखे थे।

अब जनपद पंचायत से बाहर निजी संस्थान में उनके द्वारा पंचायतों के DSC से काम करते दिखाई देने की स्थिति सामने आने के बाद यह जांच जरूरी हो गई है कि DSC की अभिरक्षा और उसके उपयोग की जिम्मेदारी आखिर किसके पास थी।

39 लाख की पुरानी फाइल भी फिर चर्चा में

महासमुंद जनपद पंचायत में करीब 39 लाख रुपये के कथित वित्तीय अनियमितता मामले को लेकर पहले से शिकायत और जांच की चर्चा रही है। अब DSC के कथित निजी उपयोग का मामला सामने आने के बाद पुराने वित्तीय प्रकरण की भी डिजिटल रिकॉर्ड के साथ जांच किए जाने की मांग उठ सकती है।

जांच में यह देखा जाना जरूरी है कि संबंधित DSC से किन तारीखों में, किस स्थान से और कितने वित्तीय लेनदेन किए गए।

अब इन सवालों के जवाब जरूरी

महेंद्र वर्मा को पंचायतों की DSC इस्तेमाल करने की अनुमति किसने दी?

क्या निजी संस्थान से पंचायतों का ऑनलाइन वित्तीय कार्य अधिकृत था?

समृद्धि शर्मा की निगरानी में DSC की व्यवस्था किस प्रकार संचालित होती थी?
खैरा, सिरपुर, बिरझर और तोरला के DSC निजी परिसर में कैसे पहुंचे?

39 लाख रुपये के पुराने मामले से जुड़े डिजिटल रिकॉर्ड की भी जांच होगी या नहीं?

पंचायतों की DSC से जुड़े मामले में अब केवल मौखिक स्पष्टीकरण पर्याप्त नहीं होगा। DSC लॉग, ऑनलाइन ट्रांजेक्शन, भुगतान रिकॉर्ड और अधिकृत उपयोगकर्ताओं की जानकारी सामने आने पर ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

अब निगाह इस बात पर है कि जनपद पंचायत और जिला प्रशासन इस कथित DSC नेटवर्क की जांच कर महेंद्र वर्मा, समृद्धि शर्मा तथा अन्य संबंधित जिम्मेदारों की भूमिका को रिकॉर्ड के आधार पर स्पष्ट करता है या नहीं।

रसूख का घमंड.! महासमुंद के “लंदन मैरिज पैलेस” ने हड़प ली सरकारी जमीन और सार्वजनिक रास्ता अब लगा दिया निजी ट्रांसफार्मर

रसूख का घमंड.! महासमुंद के “लंदन मैरिज पैलेस” ने हड़प ली सरकारी जमीन और सार्वजनिक रास्ता अब लगा दिया निजी ट्रांसफार्मर

नगर के अयोध्या नगर-नयापारा क्षेत्र में स्थानीय लोगों ने खोला मोर्चा; खसरा नंबर 786/1 और 785/1 के रास्ते पर निर्माण और निजी ट्रांसफार्मर लगाने का आरोप, कार्रवाई नहीं होने पर आंदोलन व न्यायालय जाने की चेतावनी

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता/28 सितम्बर 2026/दिन सोमवार
महासमुंद। पूरब का पश्चिम में … उजाला हो गया.. महासमुंद में लंदन पैलेस का बोलबाला हो गया जी हा जिला महासमुंद के तुमगांव रोड स्थित शहर के वार्ड क्रमांक 04, अयोध्या नगर/नयापारा क्षेत्र में संचालित ‘लंदन मैरिज पैलेस’ को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। स्थानीय निवासियों और जनप्रतिनिधियों ने मैरिज पैलेस से जुड़े निर्माण को लेकर सरकारी भूमि पर कथित अतिक्रमण, सार्वजनिक रास्ते के अवरोध, भवन निर्माण संबंधी अनुमति, अग्नि सुरक्षा तथा ध्वनि प्रदूषण सहित कई गंभीर शिकायतें प्रशासन के समक्ष रखी हैं।
मामले को लेकर वार्डवासियों, पार्षद और स्थानीय नागरिकों ने शासन-प्रशासन से उच्च स्तरीय जांच अथवा SIT गठित करने, संबंधित भूमि के दस्तावेजों की जांच कराने, कथित अवैध निर्माण पर कार्रवाई करने और सार्वजनिक रास्ते को बहाल कराने की मांग की है। नागरिकों का कहना है कि यदि शिकायतों पर शीघ्र कार्रवाई नहीं हुई तो वे आंदोलन और न्यायालय की शरण लेने पर मजबूर होंगे।

पहले अतिक्रमण हटने के बाद फिर कब्जे का आरोप

स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि क्षेत्र की बेशकीमती शासकीय भूमि पर पूर्व में प्रशासनिक कार्रवाई के माध्यम से अतिक्रमण हटाया गया था। इसके बावजूद उसी भूमि पर दोबारा निर्माण अथवा कब्जे की स्थिति निर्मित होने का आरोप लगाया जा रहा है।

शिकायतकर्ताओं ने प्रशासन से यह स्पष्ट करने की मांग की है कि संबंधित भूमि का वर्तमान राजस्व रिकॉर्ड क्या है, जमीन किसके नाम दर्ज है, उसका भू-उपयोग क्या निर्धारित है और निर्माण के लिए किन विभागों से अनुमति प्राप्त की गई है।

नागरिकों ने विशेष रूप से पुराने एवं वर्तमान राजस्व अभिलेख, पट्टा/स्वामित्व दस्तावेज, सीमांकन रिपोर्ट, नक्शा और खसरा रिकॉर्ड की जांच की मांग की है।

आम रास्ते को लेकर सबसे बड़ा विवाद

वार्ड पार्षद राहुल आंवडे के अनुसार, खसरा नंबर 786/1 और 785/1 से संबंधित जिस रास्ते का उपयोग स्थानीय लोग करते रहे हैं, वहां निर्माण कर रास्ते को बाधित किए जाने की शिकायत सामने आई है।

वार्ड पार्षद का दावा है कि, संबंधित मार्ग पर नगर पालिका द्वारा सड़क और नाली का निर्माण भी कराया जा चुका है। ऐसे में यदि सार्वजनिक उपयोग में रहे रास्ते पर निजी निर्माण अथवा अवरोध किया गया है तो उसके दस्तावेजों और स्थल की वास्तविक स्थिति की प्रशासनिक जांच आवश्यक है।

शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि रास्ते के बीच निजी ट्रांसफार्मर स्थापित किया गया है। नागरिकों का कहना है कि यदि ट्रांसफार्मर वास्तव में सार्वजनिक आवागमन वाले मार्ग पर स्थापित है तो इसकी अनुमति, स्थान और सुरक्षा मानकों की भी जांच होनी चाहिए।

भवन अनुमति और फायर सेफ्टी को लेकर भी सवाल

स्थानीय शिकायतकर्ताओं ने मैरिज पैलेस के निर्माण और संचालन को लेकर नगर पालिका की भवन निर्माण अनुमति, टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग की स्वीकृति तथा फायर सेफ्टी NOC से संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक किए जाने की मांग की है।

शिकायतकर्ताओं का कहना है कि बड़े आयोजन स्थल के संचालन के लिए आवश्यक वैधानिक अनुमतियां मौजूद हैं या नहीं, इसकी विभागीय स्तर पर जांच की जानी चाहिए। यदि सभी आवश्यक अनुमति उपलब्ध हैं तो प्रशासन उनके दस्तावेज स्पष्ट करे और यदि किसी अनुमति का अभाव है तो नियमानुसार कार्रवाई की जाए।

डीजे और ध्वनि प्रदूषण का भी आरोप

क्षेत्रवासियों ने मैरिज पैलेस में देर रात तक तेज आवाज में डीजे बजने की शिकायत भी प्रशासन के समक्ष रखी है। उनका कहना है कि लगातार तेज ध्वनि के कारण आसपास रहने वाले परिवारों, विद्यार्थियों, बुजुर्गों और अन्य नागरिकों को परेशानी का सामना करना पड़ता है।

नागरिकों ने प्रशासन से मांग की है कि आयोजन स्थल पर ध्वनि प्रदूषण से संबंधित निर्धारित नियमों और समय-सीमा का पालन सुनिश्चित कराया जाए तथा आवश्यकता पड़ने पर मौके पर ध्वनि स्तर की जांच कराई जाए।

पार्किंग की व्यवस्था पर भी उठे सवाल

शिकायतकर्ताओं के अनुसार, मैरिज पैलेस में पर्याप्त पार्किंग व्यवस्था नहीं होने के कारण विवाह एवं अन्य आयोजनों के दौरान बड़ी संख्या में वाहन आसपास की गलियों और मुख्य मार्ग पर खड़े हो जाते हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि इससे यातायात प्रभावित होने के साथ-साथ आपातकालीन वाहनों के आवागमन में भी परेशानी उत्पन्न हो सकती है। इसलिए आयोजन स्थल की स्वीकृत पार्किंग क्षमता, वाहन प्रबंधन और अग्निशमन/आपातकालीन पहुंच मार्ग की भी जांच की जानी चाहिए।

‘राजनीतिक रसूख’ के आरोपों की भी जांच की मांग

शिकायतकर्ताओं ने पूरे मामले में राजनीतिक प्रभाव का आरोप लगाते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी आवश्यक है।
नागरिकों का कहना है कि जांच ऐसी एजेंसी अथवा अधिकारियों से कराई जानी चाहिए जिन पर स्थानीय स्तर के किसी प्रभाव का दबाव न हो। इसी वजह से उन्होंने राज्य स्तर पर SIT अथवा उच्च स्तरीय जांच की मांग रखी है।

जनदर्शन में पहुंचा मामला

बताया गया कि वार्डवासियों और जनप्रतिनिधियों ने इस संबंध में कलेक्टर जनदर्शन सहित संबंधित विभागों के समक्ष शिकायत और ज्ञापन प्रस्तुत किया है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि नगर पालिका परिषद और जिला प्रशासन को पूर्व में भी आवेदन दिए गए हैं, लेकिन अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई।

अब नागरिक यह जानना चाहते हैं कि संबंधित भूमि का वास्तविक स्वामित्व क्या है, निर्माण को कौन-कौन सी स्वीकृतियां प्राप्त हैं और आम रास्ते से संबंधित राजस्व एवं नगर पालिका रिकॉर्ड में क्या स्थिति दर्ज है।

नागरिकों ने रखीं चार प्रमुख मांगें

शिकायतकर्ताओं ने प्रशासन के सामने मुख्य रूप से चार मांगें रखी हैं—

पहली— संबंधित भूमि, खसरा नंबर, स्वामित्व/पट्टा रिकॉर्ड, सीमांकन और निर्माण अनुमति की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए।

दूसरी— यदि निर्माण शासकीय भूमि अथवा सार्वजनिक रास्ते पर नियमविरुद्ध पाया जाता है तो नियमानुसार कार्रवाई करते हुए रास्ता बहाल कराया जाए।

तीसरी— मैरिज पैलेस की भवन अनुमति, भूमि उपयोग, पार्किंग व्यवस्था, अग्नि सुरक्षा और अन्य आवश्यक अनुमतियों की विभागीय जांच कराई जाए।

चौथी— यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी द्वारा शिकायतों के बावजूद नियमों के उल्लंघन की अनदेखी की गई है तो उसकी भूमिका की भी जांच की जाए।

कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन की चेतावनी

वार्ड पार्षद राहुल आंवडे के साथ ज्ञापन सौंपने पहुंचे स्थानीय नागरिकों ने कहा है कि यदि शासन-प्रशासन ने शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई नहीं की तो क्षेत्रवासी आंदोलन का रास्ता अपनाएंगे।

नागरिकों ने उग्र आंदोलन, चक्काजाम और न्यायालय की शरण लेने की चेतावनी दी है। उनका कहना है कि सार्वजनिक रास्ते, सरकारी भूमि और नागरिक सुविधाओं से जुड़े मामले में प्रशासन को मौके की जांच कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

ज्ञापन/विरोध में अजय, खेदूराम, भुनेश्वर मदनकार, वीरेंद्र साहू, कु. प्रीति, राजेन्द्र साहू, इमरान, यशवंत जोशी, कुसुम पाल, शिवनारायण साहू, निर्मला, कमला देवांगन, प्रभा शर्मा, माधुरी अवसर और गुलाब बाई साहू सहित अन्य नागरिकों की मौजूदगी बताई गई है।

अब जांच में सामने आएगा असली सच

‘लंदन मैरिज पैलेस’ को लेकर उठे विवाद में फिलहाल कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं, लेकिन इन आरोपों की अंतिम पुष्टि राजस्व रिकॉर्ड, स्थल निरीक्षण, सीमांकन, भवन अनुमति, फायर सेफ्टी दस्तावेज और संबंधित विभागों की जांच से ही हो सकेगी।

अब देखने वाली बात यह होगी कि जिला प्रशासन शिकायत पर क्या कदम उठाता है और जांच के बाद सरकारी भूमि, आम रास्ते, निर्माण अनुमति और मैरिज पैलेस संचालन से जुड़े वास्तविक तथ्य क्या सामने आते हैं।

अध्यात्म, सद्भाव और मानसिक शांति का संदेश माउंट आबू से महासमुंद पहुंचे राजयोगी बीके रामनाथ भाई, हुआ भव्य स्वागत

अध्यात्म, सद्भाव और मानसिक शांति का संदेश माउंट आबू से महासमुंद पहुंचे राजयोगी बीके रामनाथ भाई, हुआ भव्य स्वागत

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता/27 सितम्बर 2026/दिन रविवार
​महासमुंद। प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय मुख्यालय माउंट आबू (राजस्थान) के धार्मिक प्रभाग के अध्यक्ष राजयोगी ब्रह्मा कुमार रामनाथ भाई जी का एकदिवसीय प्रवास महासमुंद में संपन्न हुआ। इस अवसर पर स्थानीय सेवाकेंद्र ‘उपकार भवन’ में एक गरिमामय एवं आध्यात्मिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में स्थानीय श्रद्धालुओं और प्रबुद्ध जनों ने भाग लिया।

​आत्मीय स्नेह और सर्वधर्म सद्भाव से हुआ अभिनंदन

उपकार भवन पहुंचने पर ब्रह्माकुमारी बहनों ने आध्यात्मिक परंपरा के अनुसार बीके रामनाथ भाई जी को ‘आत्मा स्मृति’ का तिलक लगाकर और पुष्पगुच्छ भेंट कर भावभीना स्वागत किया। कार्यक्रम में कौमी एकता और सामाजिक समरसता की अनूठी झलक देखने को मिली।

​भाई जी के स्वागत के लिए विशेष रूप से गौसिया मस्जिद के सदर मोहम्मद शकील खान, गुरुद्वारा कमेटी के सदस्य सोनू चावला एवं मनजीत गुरुदत्ता जी उपस्थित रहे। उन्होंने बीके रामनाथ भाई जी को पुष्पगुच्छ भेंट कर उनका आत्मीय अभिनंदन किया और सर्वधर्म सद्भाव का सशक्त संदेश दिया।

​तनावमुक्त जीवन के लिए 5 मौलिक प्रश्नों के उत्तर खोजना जरूरी

उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए राजयोगी रामनाथ भाई जी ने वर्तमान जीवनशैली पर गहरा प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आज के दौर में बढ़ती व्यस्तता और मानसिक तनाव के कारण मन तथा बुद्धि को ईश्वर में एकाग्र करना अत्यंत चुनौतीपूर्ण हो गया है।

​उन्होंने बताया कि राजयोग मेडिटेशन की शिक्षा हमें परमात्मा से जुड़ने, उनसे सर्व संबंध स्थापित करने और जीवन में स्थायी सुख-शांति प्राप्त करने का सहज मार्ग दिखाती है। इसके लिए उन्होंने हर मनुष्य को 5 गूढ़ प्रश्नों के उत्तर तलाशने की प्रेरणा दी:

  1. मैं कौन हूँ..?
  2. मेरा वास्तविक स्वरूप क्या है..?
  3. मेरे मूल गुण क्या हैं..?
  4. मेरे श्रेष्ठ कर्म क्या होने चाहिए..?
  5. मैं कहाँ से आया हूँ..?

​भाई जी ने कहा कि सृष्टि का सबसे बुद्धिमान प्राणी होने के नाते मनुष्य को इन पाँच रहस्यों को समझना अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि संस्थान द्वारा संचालित ‘सात दिवसीय राजयोग शिविर’ के माध्यम से समाज का हर वर्ग इन रहस्यों को समझकर अपने जीवन को श्रेष्ठ और तनावमुक्त बना सकता है।

​साधकों को कराया गहन मेडिटेशन का अभ्यास

कार्यक्रम के अंतिम चरण में बीके रामनाथ भाई जी ने सेवाकेंद्र में नियमित आने वाले नियमित विद्यार्थियों (साधकों) को योग-अभ्यास कराया। उनके मार्गदर्शन में सभी उपस्थित लोगों ने राजयोग मेडिटेशन के माध्यम से गहरी मानसिक शांति और ईश्वर-अनुभूति का अनुभव किया।

संकुल केंद्र सिरपुर के सुकुलबाय मिडिल स्कूल में मनमानी.! निर्धारित समय से सवा दो घंटे पहले बच्चों की छुट्टी, शिक्षिका ने जड़ा स्कूल में ताला…!!

संकुल केंद्र सिरपुर के सुकुलबाय मिडिल स्कूल में मनमानी.! निर्धारित समय से सवा दो घंटे पहले बच्चों की छुट्टी, शिक्षिका ने जड़ा स्कूल में ताला…!!

प्रधान पाठक की अनुपस्थिति में स्कूल संचालन पर उठे सवाल, त्रैमासिक परीक्षा के बीच सामने आई गंभीर लापरवाही; DEO ने कहा—जांच के बाद होगी नियमानुसार कार्रवाई

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता | 23 सितम्बर 2026 | दिन बुधवार

महासमुंद (छत्तीसगढ़)।
महासमुंद विकासखंड के संकुल केंद्र सिरपुर अंतर्गत ग्राम पंचायत सुकुलबाय स्थित शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला में विद्यालय संचालन को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि निर्धारित समय पूरा होने से करीब सवा दो घंटे पहले ही विद्यार्थियों की छुट्टी कर स्कूल के मुख्य द्वार पर ताला लगा दिया गया और संबंधित शिक्षिका विद्यालय से चली गईं।

मामला उस समय सामने आया, जब 22 सितम्बर 2026 को दोपहर लगभग 3 बजे मीडिया टीम विद्यालय पहुंची। इस दौरान स्कूल का मुख्य द्वार बंद और तालाबंद पाया गया। स्थानीय स्तर पर मिली जानकारी और प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों के अनुसार, विद्यालय में विद्यार्थियों की छुट्टी लगभग 1:45 बजे ही कर दी गई थी।

स्कूल में कक्षा छठवीं से आठवीं तक के विद्यार्थियों की पढ़ाई संचालित होती है। ऐसे में निर्धारित शैक्षणिक समय से काफी पहले विद्यालय बंद किए जाने की घटना ने शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली और निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

प्रधान पाठक अवकाश पर, संचालन की जिम्मेदारी किसकी..?

जानकारी के अनुसार विद्यालय के प्रधान पाठक हर्ष प्रताप मन्नाडे व्यक्तिगत/पारिवारिक कारणों से अवकाश पर थे। उनकी अनुपस्थिति में विद्यालय की व्यवस्था वहां पदस्थ शिक्षिका श्रीमती चित्रलेखा साहू (एल.बी.) द्वारा संभाले जाने की बात सामने आई है।

आरोप है कि इसी दौरान विद्यार्थियों को निर्धारित समय से पहले छुट्टी दे दी गई और विद्यालय के मुख्य द्वार पर ताला लगा दिया गया।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या विद्यालय को निर्धारित समय से पहले बंद करने की कोई सक्षम अनुमति ली गई थी? यदि अनुमति नहीं थी, तो विद्यालय संचालन का समय कम करने का निर्णय किस आधार पर लिया गया?

इन सवालों का स्पष्ट जवाब विभागीय जांच और संबंधित अभिलेखों के परीक्षण के बाद ही सामने आ सकेगा।

त्रैमासिक परीक्षा के बीच समय से पहले स्कूल बंद

मामले को गंभीर बनाने वाला एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि इन दिनों विद्यालय में त्रैमासिक परीक्षाएं आयोजित होने की जानकारी सामने आई है।

बताया गया है कि परीक्षा का समय सुबह 10 बजे से दोपहर 12:30 बजे तक निर्धारित है। परीक्षा समाप्त होने के बाद भी विद्यालय की निर्धारित शैक्षणिक गतिविधियां और विद्यार्थियों से संबंधित अन्य कार्य संचालित किए जाने होते हैं।

ऐसे में यदि विद्यार्थियों को लगभग 1:45 बजे ही छुट्टी दे दी गई, तो यह जांच का विषय है कि परीक्षा के बाद निर्धारित विद्यालयीन गतिविधियां क्यों नहीं कराई गईं और स्कूल को समय से पहले बंद करने का निर्णय किस आधार पर लिया गया।

प्राथमिक स्कूल के शिक्षकों ने भी बताई स्थिति

मामले में शासकीय प्राथमिक शाला में पदस्थ प्रधान पाठक लक्ष्मण सिंह ध्रुव और सहायक शिक्षक रामनाथ यादव के हवाले से बताया गया है कि मिडिल स्कूल की शिक्षिका श्रीमती चित्रलेखा साहू ने लगभग 1:45 बजे विद्यार्थियों की छुट्टी की और स्कूल में ताला लगाकर वहां से चली गईं।

यदि यह तथ्य जांच में सही पाया जाता है तो विभाग के सामने विद्यालय संचालन, विद्यार्थियों की उपस्थिति और निर्धारित समय-सारिणी के पालन से जुड़े कई सवालों का जवाब तलाशना होगा।

संकुल समन्वयक बोले—जानकारी नहीं थी

संकुल समन्वयक सिरपुर धरम पटेल से दूरभाष पर संपर्क किए जाने पर उन्होंने मामले के पूर्व से संज्ञान में नहीं होने की बात कही।

उन्होंने कहा कि यदि विद्यालय निर्धारित समय से पहले बंद किया गया है तो इसकी जांच की जानी चाहिए और तथ्य सही पाए जाने पर नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।

संकुल स्तर पर निगरानी की जिम्मेदारी को देखते हुए यह सवाल भी उठ रहा है कि ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यालयों में समयपालन और नियमित संचालन की वास्तविक स्थिति की निगरानी किस प्रकार की जा रही है।

DEO बोले—मामला गंभीर, जांच के बाद होगी कार्रवाई

मामले की जानकारी महासमुंद के जिला शिक्षा अधिकारी बी.एल. देवांगन तक पहुंचाई गई। DEO ने मामले को गंभीरता से लेते हुए कहा कि घटना की जांच कराई जाएगी और तथ्य सही पाए जाने पर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।

महत्वपूर्ण बात यह है कि फिलहाल संबंधित शिक्षिका को कोई कारण बताओ नोटिस जारी नहीं किया गया है। इसलिए इस स्तर पर विभागीय कार्रवाई को लेकर किसी अंतिम निर्णय की बात कहना उचित नहीं होगा।

अब विभागीय जांच में यह स्पष्ट होना बाकी है कि स्कूल वास्तव में किस समय बंद हुआ, उस समय विद्यालय में कौन-कौन उपस्थित थे, विद्यार्थियों की छुट्टी किस आधार पर की गई और क्या इसके लिए किसी अधिकारी से अनुमति ली गई थी।

क्या पहले भी समय से पहले बंद होता रहा स्कूल..?

स्थानीय लोगों की ओर से यह भी आरोप लगाया गया है कि विद्यालय को पहले भी समय से पहले बंद किए जाने की घटनाएं सामने आती रही हैं।

यदि यह शिकायत लगातार होती रही है तो विभाग के लिए यह जांच का विषय होगा कि पूर्व में भी ऐसी कोई शिकायत प्राप्त हुई थी या नहीं और यदि हुई थी तो उस पर क्या कार्रवाई की गई।

साथ ही विद्यालय के उपस्थिति रजिस्टर, विद्यार्थियों की उपस्थिति, शिक्षक उपस्थिति, परीक्षा संबंधी अभिलेख और विद्यालय संचालन की समय-सारिणी की जांच से वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है।

बच्चों की पढ़ाई से जुड़ा सवाल, अब जवाबदेही तय होने का इंतजार

सरकारी विद्यालयों में निर्धारित समय तक शैक्षणिक गतिविधियों का संचालन केवल औपचारिकता नहीं बल्कि विद्यार्थियों के शिक्षा-अधिकार और विद्यालय की जिम्मेदारी से जुड़ा विषय है।

यदि किसी कारणवश विद्यालय को निर्धारित समय से पहले बंद करना आवश्यक हो, तो उसकी प्रक्रिया और सक्षम अनुमति का पालन किया जाना जरूरी है। वहीं, यदि बिना अनुमति के विद्यालय समय से पहले बंद किया गया है, तो जिम्मेदारी तय करना विभाग का विषय होगा।

सुकुलबाय स्कूल की यह घटना अब जांच के केंद्र में है। ग्रामीणों और अभिभावकों की नजर इस बात पर है कि शिक्षा विभाग मामले की जांच किस स्तर तक करता है और जांच में यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित जिम्मेदारी कैसे तय की जाती है।

फिलहाल नोटिस जारी होने की बात सामने नहीं आई है और विभाग की ओर से जांच के बाद ही आगे की कार्रवाई किए जाने की बात कही गई है।

​16वें वित्त आयोग की बैठक: बागबाहरा जनपद में ₹1.20 करोड़ का विकास ब्लूप्रिंट तैयार, बुनियादी सुविधाओं से चमकेगी ग्राम पंचायतें

​16वें वित्त आयोग की बैठक: बागबाहरा जनपद में ₹1.20 करोड़ का विकास ब्लूप्रिंट तैयार, बुनियादी सुविधाओं से चमकेगी ग्राम पंचायतें

​जनपद पंचायत बागबाहरा की विशेष सामान्य सभा में सर्वसम्मति से पारित हुआ प्रस्ताव

​पेयजल, स्वच्छता, नाली निर्माण और आवागमन की सुविधाओं को प्राथमिकता के साथ किया जाएगा सुदृढ़

​जनपद अध्यक्ष केशव चंद्राकर ने दिए सख्त निर्देश—कार्यों की गुणवत्ता और पारदर्शिता से नहीं होगा कोई समझौता

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता/ दिन सोमवार / 21 सितम्बर 2026
​महासमुंद / बागबाहरा
ग्रामीण इलाकों की तस्वीर बदलने, स्थानीय स्तर पर विकास कार्यों को रफ्तार देने और पंचायती राज व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने की दिशा में जनपद पंचायत बागबाहरा ने एक बड़ा कदम उठाया है। सोमवार को जनपद पंचायत के मुख्य सभागार में केंद्र सरकार द्वारा संचालित 16वें वित्त आयोग की प्राथमिकताओं को लेकर एक विशेष सामान्य सभा की बैठक का आयोजन किया गया। इस महत्वपूर्ण बैठक में क्षेत्र के चहुंमुखी विकास, आधारभूत ढांचे को मजबूती देने और ग्रामीणों की मूलभूत सुविधाओं के विस्तार के लिए 1 करोड़ 20 लाख रुपये (1,20,0000) की वृहद कार्ययोजना को सर्वसम्मति से अंतिम रूप दिया गया।

​ग्राम पंचायतों की जरूरतों पर गहराई से हुआ मंथन

​बैठक की अध्यक्षता जनपद पंचायत अध्यक्ष केशव नायकराम चंद्राकर ने की। इस दौरान क्षेत्र की विभिन्न ग्राम पंचायतों से आए जनप्रतिनिधियों और जनपद सदस्यों ने अपने-अपने इलाकों की जल-निकासी, सीसी रोड निर्माण, पेयजल आपूर्ति, स्वच्छता प्रबंधन और सामुदायिक भवनों के रखरखाव जैसे आवश्यक मुद्दों को सदन के सामने रखा।
​सदन में इस बात पर विस्तृत रणनीति बनाई गई कि 16वें वित्त आयोग के तहत मिलने वाली राशि का आवंटन किस तरह किया जाए ताकि दूरस्थ एवं पिछड़े ग्रामीण क्षेत्रों को इसका सीधा और अधिकतम लाभ मिल सके। सदस्यों के बहुमूल्य सुझावों को शामिल करते हुए प्राथमिकताओं के आधार पर विकास कार्यों का चयन कर कार्ययोजना तैयार की गई।

​गुणवत्ता और पारदर्शिता से कोई समझौता नहीं: केशव चंद्राकर

​विशेष सामान्य सभा को संबोधित करते हुए जनपद अध्यक्ष केशव नायकराम चंद्राकर ने कहा कि 16वें वित्त आयोग से प्राप्त होने वाली निधि सीधे तौर पर ग्रामीणों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने का माध्यम है। उन्होंने अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए प्रमुख बिंदुओं पर बल दिया:

​गुणवत्ता पर जोर: स्वीकृत निर्माण कार्यों में प्रयुक्त होने वाली सामग्री और निर्माण स्तर पर किसी भी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

​पूर्ण पारदर्शिता: योजनाओं के चयन से लेकर उनके क्रियान्वयन तक पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता रखी जाए ताकि जनता में शासन-प्रशासन के प्रति विश्वास मजबूत हो।

​समयबद्ध क्रियान्वयन: स्वीकृत प्रस्तावों पर अविलंब प्रशासनिक स्वीकृति लेकर कार्य शीघ्र प्रारंभ कराए जाएं, ताकि ग्रामीणों को सुविधाओं का लाभ समय पर मिल सके।

​वरिष्ठ अधिकारियों और सदस्यों की रही उपस्थिति

​बैठक में जनपद पंचायत के उपाध्यक्ष तरुण व्यव्हार और मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) मनहरण लाल मंडावी विशेष रूप से उपस्थित रहे। सीईओ मंडावी ने 16वें वित्त आयोग के दिशा-निर्देशों और तकनीकी पहलुओं की जानकारी सदन के समक्ष रखी। बैठक में जनपद पंचायत के सभी सम्माननीय सदस्यों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया और क्षेत्र के विकास के लिए तैयार किए गए प्रस्तावों पर अपनी सहमति की मुहर लगाई।

​ग्रामीण अर्थव्यवस्था और बुनियादी सुविधाओं को मिलेगी गति

​कार्ययोजना के पारित होने के बाद अब बहुत जल्द जनपद पंचायत बागबाहरा के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायतों में निर्माण व विकास कार्य धरातल पर उतरेंगे। 1.20 करोड़ रुपये की इस कार्ययोजना से न केवल गांवों का इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत होगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसरों का सृजन होगा और ग्रामीणों को दैनिक जीवन में आ रही समस्याओं से राहत मिलेगी।

RTI के सवाल पर डॉ. सी.वी. रामन् विश्वविद्यालय का दो टूक जवाब: “स्ववित्तपोषित हैं, सूचना का अधिकार अधिनियम लागू नहीं” — अब कानूनी दायरे और जवाबदेही पर उठे सवाल

RTI के सवाल पर डॉ. सी.वी. रामन् विश्वविद्यालय का दो टूक जवाब: “स्ववित्तपोषित हैं, सूचना का अधिकार अधिनियम लागू नहीं” — अब कानूनी दायरे और जवाबदेही पर उठे सवाल

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता/ दिन सोमवार/ 21 सितम्बर 2026/
बिलासपुर / डॉ. सी.वी. रामन् विश्वविद्यालय, करगी रोड, कोटा, बिलासपुर में सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत मांगी गई जानकारी को लेकर विवाद सामने आया है। विश्वविद्यालय के उप कुलसचिव की ओर से जारी पत्र में कहा गया है कि विश्वविद्यालय निजी क्षेत्र का स्ववित्तपोषित शैक्षणिक संस्थान है और उसे केन्द्र सरकार, राज्य सरकार, यूजीसी अथवा किसी सरकारी संस्था से वित्तीय अनुदान या अन्य सहायता प्राप्त नहीं होती। इसी आधार पर विश्वविद्यालय ने स्वयं को RTI अधिनियम के दायरे से बाहर बताया है।

मामले में आवेदक की ओर से जनहित से जुड़ी सूचनाएं मांगते हुए निर्धारित प्रक्रिया के तहत आवेदन प्रस्तुत किया गया था। आवेदन के साथ ₹10 का भारतीय पोस्टल ऑर्डर भी लगाया गया था। लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन ने मांगी गई सूचना उपलब्ध कराने के बजाय आवेदन और पोस्टल ऑर्डर वापस कर दिया।

विश्वविद्यालय की ओर से जारी पत्र क्रमांक 2545/सू.अ./2026 में मूल रूप से यह पक्ष रखा गया है कि संस्थान स्ववित्तपोषित है और सरकारी वित्तीय सहायता प्राप्त नहीं करता, इसलिए वह RTI Act, 2005 के अंतर्गत नहीं आता।

राज्य अधिनियम के तहत स्थापित विश्वविद्यालय होने का पहलू

डॉ. सी.वी. रामन् विश्वविद्यालय की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार विश्वविद्यालय छत्तीसगढ़ के निजी विश्वविद्यालय संबंधी कानून के तहत संचालित है। विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर उपलब्ध दस्तावेज में भी इसे राज्य विधानमंडल के अधिनियम से स्थापित निजी विश्वविद्यालय बताया गया है। यूजीसी से संबंधित विश्वविद्यालय के उपलब्ध दस्तावेज में भी इसे राज्य विधानमंडल द्वारा स्थापित निजी विश्वविद्यालय तथा डिग्री प्रदान करने के लिए यूजीसी अधिनियम की धारा 22 के तहत सक्षम विश्वविद्यालय बताया गया है।

विश्वविद्यालय की वर्तमान वेबसाइट पर उसके बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट में राज्य सरकार द्वारा नामित सदस्यों का भी उल्लेख है। हालांकि, केवल किसी नियामक या नामित सदस्य की मौजूदगी से RTI लागू होने का स्वतः निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता; वास्तविक कानूनी स्थिति धारा 2(h) के परीक्षण और संस्था की वास्तविक संरचना एवं सरकारी नियंत्रण पर निर्भर करेगी।

RTI कानून वास्तव में क्या कहता है..?

सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 2(h) में “लोक प्राधिकारी” की परिभाषा दी गई है। इसमें संविधान, संसद या राज्य विधानमंडल के कानून से स्थापित या गठित निकायों के साथ-साथ सरकार के स्वामित्व, नियंत्रण अथवा पर्याप्त प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष वित्तीय सहायता प्राप्त करने वाले निकायों को भी शामिल किया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने Thalappalam Service Cooperative Bank Ltd. बनाम State of Kerala मामले में स्पष्ट किया कि केवल सरकारी निगरानी या सामान्य नियामक नियंत्रण किसी संस्था को स्वतः RTI के तहत “लोक प्राधिकारी” नहीं बना देता। सरकारी नियंत्रण और वित्तीय सहायता की प्रकृति एवं वास्तविकता महत्वपूर्ण होती है।

दूसरी ओर, निजी विश्वविद्यालयों को लेकर न्यायालयों के निर्णय पूरी तरह एक जैसे नहीं हैं। उदाहरण के तौर पर 6 जुलाई 2022 को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने Amity University के मामले में एक स्ववित्तपोषित निजी विश्वविद्यालय को, जो राज्य के निजी विश्वविद्यालय अधिनियम के तहत स्थापित था और सरकारी वित्तीय सहायता प्राप्त नहीं करता था, RTI के तहत “लोक प्राधिकारी” नहीं माना।

इसीलिए डॉ. सी.वी. रामन् विश्वविद्यालय के मामले में भी अंतिम कानूनी स्थिति का निर्धारण संबंधित सूचना आयोग या सक्षम न्यायिक मंच द्वारा विश्वविद्यालय की स्थापना, वैधानिक संरचना, सरकारी नियंत्रण, वित्तीय सहायता और मांगी गई सूचना की प्रकृति जैसे तथ्यों के आधार पर किया जाना अधिक उचित होगा।

सवाल सिर्फ RTI का नहीं, पारदर्शिता का भी

इस पूरे विवाद ने विश्वविद्यालयों की जवाबदेही और पारदर्शिता को लेकर बहस जरूर तेज कर दी है। विश्वविद्यालय हजारों विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा प्रदान करते हैं और उनकी डिग्रियों एवं प्रमाण-पत्रों का उपयोग रोजगार, आगे की पढ़ाई और विभिन्न प्रशासनिक प्रक्रियाओं में किया जाता है।

ऐसे में सवाल यह है कि यदि कोई नागरिक विश्वविद्यालय की मान्यता, पाठ्यक्रम, प्रशासनिक निर्णय, फीस, शैक्षणिक व्यवस्था अथवा अन्य सार्वजनिक महत्व की जानकारी मांगता है, तो वह जानकारी किस वैधानिक माध्यम से प्राप्त कर सकता है..?

यह भी महत्वपूर्ण है कि RTI अधिनियम के तहत हर मांगी गई सूचना स्वतः उपलब्ध कराना आवश्यक नहीं होता। अधिनियम में विभिन्न अपवाद और प्रतिबंध भी निर्धारित हैं। इसलिए किसी सूचना को देने से इनकार करने की स्थिति में उसके लिए लागू वैधानिक आधार और प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

विश्वविद्यालय के अपने दस्तावेज भी बने चर्चा का विषय

दिलचस्प बात यह है कि विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर RTI से संबंधित विषय को शैक्षणिक पाठ्यक्रम का हिस्सा भी दिखाया गया है। विश्वविद्यालय के उपलब्ध B.A. LL.B. पाठ्यक्रम दस्तावेज में Right to Information Act, 2005, लोकतंत्र में सूचना के अधिकार और लोक प्राधिकारियों के दायित्व जैसे विषय शामिल हैं।

ऐसे में यह मामला केवल एक RTI आवेदन और उसके जवाब तक सीमित न रहकर विश्वविद्यालयों की पारदर्शिता, जवाबदेही और वैधानिक स्थिति पर व्यापक चर्चा का विषय बन सकता है।

अब सूचना आयोग में उठ सकता है मामला

यदि आवेदक विश्वविद्यालय के जवाब से असंतुष्ट है, तो उपलब्ध कानूनी उपायों के तहत संबंधित सक्षम मंच के समक्ष इस निर्णय को चुनौती देने का रास्ता खुला रहता है। छत्तीसगढ़ में राज्य सूचना आयोग RTI से जुड़े मामलों के लिए वैधानिक संस्था है। बिलासपुर जिला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट भी छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग को RTI Act के तहत गठित संस्था के रूप में सूचीबद्ध करती है।

ऐसे में अब मुख्य प्रश्न यह होगा कि संबंधित सूचना आयोग विश्वविद्यालय की वैधानिक स्थिति और RTI Act की धारा 2(h) के प्रावधानों को किस प्रकार लागू करता है।

युवाओं से जुड़ा मुद्दा होने के कारण मामला महत्वपूर्ण

डॉ. सी.वी. रामन् विश्वविद्यालय स्वयं अपनी वेबसाइट पर राज्य अधिनियम के तहत स्थापित निजी विश्वविद्यालय होने तथा यूजीसी से मान्यता संबंधी दस्तावेज उपलब्ध कराता है।

इसलिए विवाद का केंद्र विश्वविद्यालय की डिग्रियों को सीधे “अवैध” या “अप्रामाणिक” बताना नहीं, बल्कि यह वैधानिक प्रश्न है कि क्या विश्वविद्यालय RTI Act की धारा 2(h) के तहत लोक प्राधिकारी है और यदि नहीं, तो सार्वजनिक महत्व की सूचनाओं तक नागरिकों की पहुंच का वैधानिक माध्यम क्या होगा..?

अब निगाहें संभावित प्रथम अपील/शिकायत तथा सूचना आयोग अथवा अन्य सक्षम प्राधिकारी के निर्णय पर रहेंगी। यदि मामला वहां पहुंचता है, तो विश्वविद्यालय की स्थापना संबंधी अधिनियम, सरकारी नियंत्रण, वित्तीय सहायता और सूचना की प्रकृति जैसे बिंदुओं पर विस्तृत परीक्षण हो सकता है।

फिलहाल विश्वविद्यालय की ओर से जारी पत्र में स्ववित्तपोषित होने और सरकारी वित्तीय सहायता नहीं मिलने को RTI लागू न होने का आधार बताया गया है। इस दावे की अंतिम वैधानिक व्याख्या संबंधित सक्षम प्राधिकारी अथवा न्यायालय द्वारा ही की जानी है।