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दृश्यम मूवी की तर्ज पर कोरोना काल के गर्भ में “कफ़न” पहन “दफन” हो गया “39 लाख” का भूत

दृश्यम मूवी की तर्ज पर कोरोना काल के गर्भ में “कफ़न” पहन “दफन” हो गया “39 लाख” का भूत

नोटिस के दो साल बाद भी जवाबदेही पर सवाल, CEO जिला पंचायत और उप संचालक पंचायत की कार्यप्रणाली पर उठी उंगलियां!

सैनिटाइजर, मास्क और स्वच्छता सामग्री की खरीदी से जुड़ा मामला फिर चर्चा में; 26 जून 2024 को जारी हुए थे कारण बताओ नोटिस, अब जांच के निष्कर्ष और अंतिम कार्रवाई सार्वजनिक करने की मांग

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता | बेबाक बयान न्यूज़ / 23 अक्टूबर 2026/दिन शुक्रवार
महासमुंद, छत्तीसगढ़। यह एक बहुचर्चित सस्पेंस थ्रीलर मूवी दृश्यम से कम नहीं आंका जा सकता है।
क्यों इस 39 लाख के मूवी को ऐसा तैयार किया गया है जब जब कोई सबूत मिलेगा उसको फिर से दफन करने में महारत हासिल किये हुए कलाकार अपनी कलाकृति से नए स्क्रिप्ट के रूप में सामने आ जाता है।
बता दे कि, पूरे पंचायत जगत में यह चर्चा का विषय बना हुआ है कि, जिस करारोपण अधिकारी लिपिक दिलीप कुमार मनहरे को जांच अधिकारी बनाकर शिकायत मिलने पर जांच टीम गठित की जाती है और ग्राम पंचायतों में जांच अधिकारी बन रौब दिखाते हुए सरपंचों को कहा जाता है कि, ज्यादा नेतागिरी करोगे तो धारा 40 के तहत निपटा दूंगा। जबकि जांचकर्ता अधिकारी द्वारा किए गए कृत्य में स्वयं आरोप सिद्ध होने पर भी आज दिवस तक किसी प्रकार से कोई कार्यवाही नहीं होना अपने आप में प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है।
कहां जाता है कि, जब जब जिस जिस युगों में महामारी किसी भी रूप में जन्म लेती है तो उस युग के जीवंत जीवों को नफ़ा और नुकसान तो सहना ही पड़ता है कोई रोता है तो तो कोई उन रोते हुए परिवारों को लूटने में पीछे नहीं हटते । इसी लिए कहा जाता है कि, कोई भी महामारी किसी को बहुत आगे ले जाती है और किसी को बहुत पीछे छोड़ जाती है। ताजा उदाहरण सम्पूर्ण प्रदेश में व्याप्त कोरोना महामारी के दौर में सरकारी धन से की गई खरीदी और उसके भुगतान की पारदर्शिता को लेकर महासमुंद जनपद पंचायत का एक पुराना मामला एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। सैनिटाइजर, मास्क और स्वच्छता सामग्री की खरीदी से संबंधित लगभग 39 लाख रुपये के कथित वित्तीय अनियमितता प्रकरण में कारण बताओ नोटिस जारी होने के बावजूद अंतिम कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट नहीं होने का आरोप लगाया जा रहा है। ऐसे में सवाल केवल खरीदी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी है कि संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों से जवाब मांगने के बाद प्रशासन ने आगे क्या कदम उठाए?

इस मामले में मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जिला पंचायत महासमुंद तथा उप संचालक पंचायत की कार्यप्रणाली को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। यदि प्रकरण में अनियमितताओं को लेकर नोटिस जारी किए गए थे, तो उनकी जांच का निष्कर्ष क्या निकला? संबंधित पक्षों के जवाबों का परीक्षण किस स्तर पर हुआ? और यदि नियमों का उल्लंघन प्रमाणित पाया गया, तो जिम्मेदारी निर्धारित करने तथा आगे की कार्रवाई में देरी क्यों हुई? इन सवालों का स्पष्ट जवाब सामने आना जरूरी है।

कोरोना काल की खरीदी पर संदेह, ₹39 लाख के खर्च का हिसाब मांग रहे सवाल

उपलब्ध विवरण के अनुसार, वर्ष 2019-20 के दौरान जनपद पंचायत महासमुंद में कोरोना संक्रमण की रोकथाम और स्वच्छता व्यवस्था के लिए सैनिटाइजर, मास्क तथा अन्य आवश्यक सामग्री की खरीदी की गई थी। इसी खरीदी और भुगतान प्रक्रिया को लेकर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं।

शिकायत में आरोप लगाया गया है कि खरीदी के दौरान निर्धारित प्रक्रियाओं का समुचित पालन नहीं किया गया। भुगतान की स्वीकृति, वेंडरों के चयन, बिल-वाउचर की वैधता और सामग्री की वास्तविक आपूर्ति जैसे बिंदुओं पर जांच की आवश्यकता जताई गई है।

हालांकि, इन आरोपों को अंतिम रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता। इसकी वास्तविक स्थिति संबंधित खरीदी की मूल नस्ती, स्वीकृति आदेश, भुगतान अभिलेख, स्टॉक रजिस्टर और जांच रिपोर्ट के परीक्षण से ही स्पष्ट होगी।

खरीदी प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों को लेकर उठे ये सवाल

मामले से संबंधित शिकायत में कई बिंदुओं पर आपत्ति जताई गई है। इनमें प्रमुख रूप से निम्न सवाल शामिल हैं:

1.क्या नियमों के अनुसार हुई थी खरीदी?

क्या सैनिटाइजर, मास्क और स्वच्छता सामग्री की खरीदी के लिए सक्षम अधिकारी की विधिवत स्वीकृति ली गई थी? क्या लागू भंडार क्रय नियमों और निर्धारित वित्तीय प्रक्रियाओं का पालन किया गया था? यदि किसी विशेष परिस्थिति में सामान्य प्रक्रिया से अलग व्यवस्था अपनाई गई, तो क्या उसके समर्थन में वैध आदेश और दस्तावेज मौजूद हैं?

2.भुगतान की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी थी?

शिकायत में आरोप है कि भुगतान प्रक्रिया में आवश्यक औपचारिकताओं की अनदेखी की गई। ऐसे में यह स्पष्ट होना चाहिए कि भुगतान किन फर्मों या वेंडरों को किया गया, भुगतान की स्वीकृति किस अधिकारी ने दी और प्रत्येक भुगतान के समर्थन में कौन-कौन से दस्तावेज उपलब्ध हैं।

3.खरीदी गई सामग्री की वास्तविक आपूर्ति हुई या नहीं?

सरकारी धन से खरीदी गई सामग्री की मात्रा, गुणवत्ता और वितरण का सत्यापन महत्वपूर्ण है। क्या संबंधित सामग्री का स्टॉक रजिस्टर में विधिवत संधारण हुआ? क्या सामग्री प्राप्त होने के प्रमाण, वितरण सूची और भौतिक सत्यापन रिपोर्ट उपलब्ध हैं? यदि सामग्री की आपूर्ति हुई थी, तो उसके दस्तावेज सार्वजनिक जांच के लिए महत्वपूर्ण होंगे।

4.बिल-वाउचर और बैंक रिकॉर्ड की जांच हुई या नहीं?

किसी भी वित्तीय अनियमितता के आरोप की निष्पक्ष जांच के लिए मूल बिल, वाउचर, भुगतान आदेश, बैंक विवरण और संबंधित फर्मों के अभिलेखों का मिलान आवश्यक है। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि इन दस्तावेजों की जांच किसी सक्षम अधिकारी या लेखा परीक्षण दल ने की थी या नहीं।

इन बिंदुओं पर प्रमाण आधारित जांच ही तय कर सकती है कि मामला प्रक्रियागत चूक का है या इसमें कोई गंभीर वित्तीय अनियमितता हुई है।

26 जून 2024 को जारी हुए थे कारण बताओ नोटिस

इस प्रकरण का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जिला पंचायत महासमुंद द्वारा 26 जून 2024 को तत्कालीन संकाय शाखा प्रभारी समृद्धि शर्मा तथा तत्कालीन लिपिक दिलीप मनहरे को अलग-अलग कारण बताओ नोटिस जारी किए जाने की जानकारी सामने आई है।

बताया गया है कि नोटिस में खरीदी और भुगतान प्रक्रिया से संबंधित आपत्तियां दर्ज करते हुए संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों से तीन दिनों के भीतर जवाब मांगा गया था। उपलब्ध विवरण के अनुसार, नोटिस में संतोषजनक जवाब नहीं मिलने की स्थिति में निलंबन और अनुशासनात्मक कार्रवाई किए जाने की बात भी कही गई थी।

यदि नोटिस में निर्धारित समयसीमा के भीतर जवाब मांगे गए थे, तो अब यह जानना जरूरी है कि संबंधित पक्षों ने जवाब प्रस्तुत किए या नहीं। जवाब प्रस्तुत किए जाने की स्थिति में उनका परीक्षण किस अधिकारी ने किया?
क्या जांच अधिकारी नियुक्त किया गया? क्या आरोपों की पुष्टि या खारिज करने के लिए दस्तावेजों की जांच हुई? और क्या किसी सक्षम प्राधिकारी ने अंतिम आदेश जारी किया?
इन सवालों के जवाब के बिना केवल नोटिस जारी होने को अंतिम कार्रवाई नहीं माना जा सकता।

CEO जिला पंचायत और उप संचालक पंचायत की भूमिका पर सवाल

मामले में मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जिला पंचायत महासमुंद तथा उप संचालक पंचायत की कार्यप्रणाली को लेकर जवाबदेही संबंधी प्रश्न उठाए जा रहे हैं। खासकर यह जानना महत्वपूर्ण है कि नोटिस जारी होने के बाद प्रकरण किस स्तर पर लंबित रहा और उसकी वर्तमान प्रशासनिक स्थिति क्या है।

यदि संबंधित अधिकारियों के समक्ष जांच और कार्रवाई की फाइल लंबित रही है, तो उसके कारण स्पष्ट किए जाने चाहिए। यदि जांच पूरी हो चुकी है, तो उसके निष्कर्ष और आदेश की जानकारी सामने आनी चाहिए। वहीं, यदि किसी अन्य विभाग या सक्षम प्राधिकारी के स्तर पर निर्णय लंबित है, तो उसकी स्थिति भी स्पष्ट की जानी चाहिए।

सवाल यह नहीं कि केवल नोटिस जारी हुआ था; सवाल यह है कि नोटिस के बाद जांच कहां तक पहुंची और जवाबदेही तय करने के लिए क्या कार्रवाई हुई?

इस मामले में किसी अधिकारी या कर्मचारी को दोषी ठहराने से पहले जांच के निष्कर्ष और संबंधित पक्षों का जवाब सामने आना आवश्यक है। लेकिन सार्वजनिक धन से जुड़े मामले में कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट करना प्रशासनिक पारदर्शिता की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

पुलिस अधीक्षक, कलेक्टर और ACB/EOW से जांच की मांग

इस मामले को लेकर बेबाक बयान न्यूज़ के प्रधान संपादक मयंक गुप्ता द्वारा पुलिस अधीक्षक, जिला कलेक्टर महासमुंद तथा भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB)/आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (EOW), रायपुर के समक्ष शिकायत आवेदन प्रस्तुत किए जाने की जानकारी दी गई है।

शिकायत के माध्यम से मामले की निष्पक्ष जांच कराकर वित्तीय लेन-देन की वास्तविक स्थिति सामने लाने और यदि आरोप प्रमाणित हों, तो संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई करने की मांग की गई है।

शिकायत में प्रमुख रूप से निम्न मांगें उठाई गई हैं।

निष्पक्ष जांच: खरीदी की मूल नस्ती, स्वीकृति आदेश, बिल-वाउचर, बैंक रिकॉर्ड और सामग्री की आपूर्ति से जुड़े दस्तावेजों की जांच कराई जाए।

जिम्मेदारी तय हो: भुगतान की स्वीकृति देने, बिलों का परीक्षण करने और सामग्री की प्राप्ति दर्ज करने वाले संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका की जांच की जाए।

आपराधिक कार्रवाई पर निर्णय: यदि जांच में धोखाधड़ी, जालसाजी, आपराधिक षड्यंत्र या भ्रष्टाचार से संबंधित अपराध के पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं, तो सक्षम प्राधिकारी द्वारा लागू कानूनों के तहत FIR और आगे की कार्रवाई पर निर्णय लिया जाए।

विभागीय कार्रवाई: यदि विभागीय जांच में कदाचार प्रमाणित होता है, तो संबंधित सेवा नियमों के अनुसार कार्रवाई की जाए।

राशि की वसूली: यदि सरकारी धन का अनुचित भुगतान या नुकसान प्रमाणित होता है, तो विधिसम्मत प्रक्रिया के तहत जिम्मेदार पक्षों से वसूली की कार्रवाई की जाए।

वित्तीय एवं फॉरेंसिक जांच: आवश्यकता के अनुसार बिल-वाउचर, बैंक लेन-देन और आपूर्ति संबंधी अभिलेखों का स्वतंत्र परीक्षण कराया जाए।

क्या दो साल बाद भी अंतिम कार्रवाई का इंतजार?

26 जून 2024 को कारण बताओ नोटिस जारी किए जाने के विवरण और अब तक अंतिम कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट नहीं होने के आरोप के बीच यह मामला प्रशासनिक जवाबदेही का महत्वपूर्ण प्रश्न बन गया है। हालांकि, अंतिम आदेश जारी हुआ है या नहीं, विभागीय जांच की क्या स्थिति है और किसी स्तर पर कार्रवाई की गई है या नहीं—इन तथ्यों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।

यदि प्रकरण में अब तक कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है, तो संबंधित विभाग को विलंब के कारण स्पष्ट करने चाहिए। वहीं, यदि जांच पूरी हो चुकी है, तो उसके निष्कर्ष और की गई कार्रवाई की जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए, ताकि तथ्यों के आधार पर स्थिति स्पष्ट हो सके।

सरकारी धन जनता के करों और सार्वजनिक संसाधनों से जुड़ा होता है। इसलिए ऐसी खरीदी में पारदर्शिता, दस्तावेजों का सत्यापन और समयबद्ध कार्रवाई केवल विभागीय औपचारिकता नहीं, बल्कि सार्वजनिक जवाबदेही का हिस्सा है।

प्रशासन से सीधे सवाल

₹39 लाख की कथित अनियमितता से जुड़े मामले की वर्तमान स्थिति क्या है?

26 जून 2024 को जारी कारण बताओ नोटिस के बाद संबंधित पक्षों के जवाबों पर क्या निर्णय लिया गया?

क्या खरीदी, भुगतान और सामग्री की आपूर्ति का स्वतंत्र सत्यापन कराया गया?

मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जिला पंचायत महासमुंद और उप संचालक पंचायत के स्तर पर फाइल की क्या स्थिति है?

यदि आरोप प्रमाणित पाए गए हैं, तो अब तक क्या विभागीय, वित्तीय या कानूनी कार्रवाई की गई है?

यदि कोई कार्रवाई नहीं हुई है, तो देरी के कारण क्या हैं और अंतिम निर्णय कब तक लिया जाएगा?

अब जवाबदेही तय करने की जरूरत

महासमुंद जनपद पंचायत के कोरोना कालीन खरीदी प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है—दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच, आरोपों की पुष्टि या खंडन और जिम्मेदारी का स्पष्ट निर्धारण। केवल आरोपों के आधार पर किसी को दोषी ठहराना उचित नहीं है, लेकिन गंभीर वित्तीय सवालों को अनिश्चितकाल तक लंबित रखना भी सार्वजनिक हित में नहीं होगा।

शिकायतकर्ता की ओर से मामले में त्वरित जांच और आवश्यक कानूनी कार्रवाई की मांग की गई है। साथ ही, कार्रवाई नहीं होने की स्थिति में मामले को उच्च न्यायालय छत्तीसगढ़ तथा सक्षम विशेष न्यायालय के समक्ष ले जाने की चेतावनी दिए जाने की जानकारी भी सामने आई है।

अब देखना होगा कि जिला प्रशासन, जिला पंचायत और संबंधित विभाग इस मामले में क्या आधिकारिक जानकारी देते हैं और कथित ₹39 लाख की खरीदी से जुड़े सवालों का जवाब किस तरह सामने आता है।

बेबाक बयान न्यूज़ का पक्ष: इस समाचार में उठाए गए वित्तीय अनियमितता संबंधी बिंदु शिकायत और उपलब्ध विवरण पर आधारित हैं। संबंधित अधिकारियों, कर्मचारियों तथा अन्य पक्षों का आधिकारिक जवाब और जांच का अंतिम निष्कर्ष सामने आने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाना चाहिए।

बेलसोंडा पंचायत में बिलों का ‘खेल’! खाली और अधूरे बिलों से लाखों के आहरण का आरोप, 313 पन्नों की शिकायत पर कार्रवाई का इंतजार; SDM कार्यालय घेराव की चेतावनी

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पूर्व सरपंच भामिनी पोखन चंद्राकर ने पंचायत के वित्तीय लेन-देन पर उठाए गंभीर सवाल; RTI से मिले दस्तावेजों के आधार पर जांच की मांग, जनदर्शन में प्रशासन को कार्रवाई के लिए अल्टीमेटम

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता/21 अक्टूबर 2026 / दिन बुधवार
महासमुंद/बेलसोंडा। महासमुंद जिले की ग्राम पंचायत बेलसोंडा में कथित वित्तीय अनियमितताओं को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। पंचायत के सरकारी धन के उपयोग, बिलों की वैधता और भुगतान संबंधी अभिलेखों को लेकर उठे सवालों ने स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक जवाबदेही को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। पूर्व सरपंच श्रीमती भामिनी पोखन चंद्राकर ने वर्तमान सरपंच एवं सचिव पर कथित तौर पर संदिग्ध बिलों के माध्यम से पंचायत की राशि निकालने के गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने इन आरोपों के समर्थन में सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त दस्तावेजों का हवाला देते हुए विस्तृत जांच और जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की मांग की है।

पूर्व सरपंच का कहना है कि 5 अक्टूबर 2026 को 313 पन्नों के दस्तावेजी साक्ष्यों के साथ संबंधित अधिकारियों के समक्ष लिखित शिकायत प्रस्तुत की गई थी। इसके बावजूद अब तक अपेक्षित कार्रवाई सामने नहीं आने से शिकायतकर्ताओं में नाराजगी बढ़ रही है। उनका आरोप है कि जब बड़ी संख्या में दस्तावेज उपलब्ध कराए गए हैं, तो मामले की प्राथमिक जांच कर अभिलेखों की सत्यता और भुगतान की वैधता स्पष्ट की जानी चाहिए।

हालांकि, शिकायत में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र जांच और प्रशासनिक स्तर पर उनका सत्यापन होना अभी आवश्यक है। वर्तमान सरपंच, सचिव तथा संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आने के बाद ही मामले की पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।

313 पन्नों की शिकायत के बाद भी जांच की स्थिति पर सवाल

पूर्व सरपंच भामिनी पोखन चंद्राकर के अनुसार, उन्होंने पंचायत में कथित वित्तीय गड़बड़ियों से जुड़े दस्तावेजों को एकत्रित कर 5 अक्टूबर को अधिकारियों को शिकायत सौंपी थी। शिकायत में पंचायत के भुगतान अभिलेखों, बिलों और राशि निकासी की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं।

शिकायतकर्ता का कहना है कि दस्तावेजों की संख्या और आरोपों की गंभीरता को देखते हुए मामले में समयबद्ध जांच होनी चाहिए थी। उनके मुताबिक, शिकायत के बाद भी कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट नहीं होने से ग्रामीणों के बीच असंतोष बढ़ रहा है।

इस पूरे प्रकरण में अब सबसे अहम सवाल यह है कि शिकायत मिलने के बाद संबंधित विभाग ने कौन-से कदम उठाए? क्या दस्तावेजों का प्रारंभिक परीक्षण किया गया है? क्या पंचायत के मूल अभिलेख सुरक्षित रखे गए हैं? और क्या भुगतान से संबंधित प्रविष्टियों का बैंक रिकॉर्ड तथा स्वीकृत कार्यों से मिलान कराया गया है?

इन सवालों का जवाब जांच और आधिकारिक जानकारी से ही सामने आ सकेगा।

खाली बिल पर हस्ताक्षर का दावा, भुगतान प्रक्रिया पर उठे सवाल

पूर्व सरपंच ने RTI से प्राप्त प्रमाणित जानकारी का हवाला देते हुए दावा किया है कि पंचायत के रिकॉर्ड में एक ऐसा बिल मिला है, जिसमें विवरण दर्ज नहीं होने के बावजूद सरपंच और सचिव के हस्ताक्षर मौजूद हैं। यदि दस्तावेजों की जांच में यह बात प्रमाणित होती है, तो यह भुगतान प्रक्रिया और अभिलेखों के रखरखाव से जुड़ा गंभीर विषय हो सकता है।

शिकायतकर्ता के अनुसार, कुछ अन्य बिलों में भी भुगतान के उद्देश्य, संबंधित व्यक्ति अथवा कार्य का पूरा विवरण स्पष्ट नहीं है। ऐसे दस्तावेजों के आधार पर राशि का आहरण हुआ है या नहीं, भुगतान किस मद से किया गया और उसके पीछे सक्षम स्वीकृति थी या नहीं—इन सभी बिंदुओं की जांच आवश्यक है।

पंचायत के वित्तीय लेन-देन में बिल, भुगतान स्वीकृति, कार्य का विवरण, माप या प्राप्ति संबंधी रिकॉर्ड और बैंक प्रविष्टियां महत्वपूर्ण साक्ष्य होते हैं। इसलिए केवल बिल की प्रति देखकर अंतिम निष्कर्ष निकालने के बजाय मूल दस्तावेजों और वास्तविक भुगतान का मिलान कराना जरूरी है।

₹29 हजार से ₹57,500 तक की रकम का उल्लेख

शिकायत में अलग-अलग राशियों के बिलों का उल्लेख किए जाने की बात सामने आई है। पूर्व सरपंच के अनुसार, इनमें ₹29,000, ₹20,880, ₹16,800, ₹29,800 और ₹57,500 जैसी रकम शामिल हैं।

शिकायतकर्ता ने इन भुगतानों की वैधता पर सवाल उठाते हुए मांग की है कि प्रत्येक बिल के आधार पर संबंधित कार्य, सामग्री की खरीद, भुगतान प्राप्त करने वाले व्यक्ति तथा राशि निकासी की तारीख का सत्यापन किया जाए।

जांच के दौरान यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि संबंधित खर्च पंचायत की स्वीकृत योजना और निर्धारित वित्तीय नियमों के अनुरूप थे या नहीं। यदि किसी बिल में आवश्यक विवरण नहीं हैं, तो यह पता लगाना महत्वपूर्ण होगा कि भुगतान किस आधार पर स्वीकृत किया गया और संबंधित अधिकारियों ने अभिलेखों की जांच किस प्रकार की।

फिलहाल इन राशियों को लेकर लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है। इसलिए जांच रिपोर्ट और आधिकारिक अभिलेख सामने आने के बाद ही किसी वित्तीय अनियमितता की वास्तविक प्रकृति तथा जिम्मेदारी निर्धारित की जा सकेगी।

पंचों को बाहर ले जाने की चर्चा, रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की मांग

पूर्व सरपंच की ओर से यह आशंका भी व्यक्त की गई है कि सोमवार को वर्तमान सरपंच और सचिव द्वारा सभी पंचों को अचानक बाहर ले जाया गया। शिकायतकर्ता ने इस घटनाक्रम के संदर्भ में पंचायत के दस्तावेजों में संभावित बदलाव अथवा अभिलेखों से छेड़छाड़ की आशंका जताई है।

हालांकि, पंचों को बाहर ले जाने की घटना और अभिलेखों से किसी तरह की छेड़छाड़ के बीच संबंध होने की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। ऐसे में इस आशंका को तथ्य मानने के बजाय प्रशासन द्वारा रिकॉर्ड की स्थिति की जांच करना जरूरी है।

ग्रामीणों की मांग है कि पंचायत के मूल बिल, कैशबुक, बैंक स्टेटमेंट, भुगतान वाउचर, प्रस्ताव रजिस्टर, कार्यों से संबंधित अभिलेख तथा अन्य वित्तीय दस्तावेज सुरक्षित रखे जाएं। जरूरत पड़ने पर इनकी प्रमाणित प्रतियां लेकर मूल रिकॉर्ड से मिलान कराया जाए, ताकि जांच के दौरान किसी महत्वपूर्ण साक्ष्य के नष्ट होने या उसमें बदलाव की आशंका न रहे।

₹11 लाख की कथित रिकवरी का पुराना मामला भी चर्चा में

इस विवाद के बीच पूर्व सरपंच ने जनपद पंचायत की पूर्व उपाध्यक्ष हुल्दी चंद्राकर से संबंधित कथित ₹11 लाख की रिकवरी का मुद्दा भी उठाया है। उनके अनुसार, तत्कालीन SDM द्वारा वसूली के संबंध में आदेश जारी किया गया था, लेकिन उस पर अब तक प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।

शिकायतकर्ता ने इस मामले की वर्तमान स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है। यदि वसूली का आदेश जारी हुआ था, तो प्रशासन को यह बताना चाहिए कि आदेश के अनुपालन में अब तक क्या कार्रवाई की गई, वसूली की कितनी राशि जमा हुई और शेष राशि के संबंध में क्या प्रक्रिया अपनाई जा रही है।

इस पुराने प्रकरण के आदेश, उसकी वर्तमान वैधानिक स्थिति और अनुपालन संबंधी अभिलेखों की जांच भी आवश्यक है। केवल आरोप या पूर्व आदेश का उल्लेख अपने आप में वर्तमान स्थिति का प्रमाण नहीं है; वास्तविक स्थिति संबंधित दस्तावेजों से ही स्पष्ट होगी।

जनदर्शन में शिकायत, शाम तक कार्रवाई की मांग

मामले को लेकर पूर्व सरपंच और ग्रामीणों की ओर से कलेक्टर के जनदर्शन में आवेदन प्रस्तुत कर तत्काल जांच की मांग किए जाने की बात कही गई है। शिकायतकर्ताओं ने प्रशासन से मांग की है कि आरोपों की गंभीरता को देखते हुए संबंधित अभिलेखों की जांच कराई जाए और जिम्मेदारी तय करने के लिए निष्पक्ष प्रक्रिया अपनाई जाए।

पूर्व सरपंच एवं ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो वे आंदोलन का रास्ता अपनाएंगे और SDM कार्यालय के घेराव की तैयारी करेंगे। इस चेतावनी के बाद पंचायत से जुड़े मामले में प्रशासन की अगली कार्रवाई पर सबकी नजरें टिकी हैं।

अब प्रशासन के सामने ये प्रमुख सवाल

बेलसोंडा पंचायत के इस प्रकरण में प्रशासन से निम्न बिंदुओं पर स्पष्टता अपेक्षित है—
5 अक्टूबर 2026 को प्रस्तुत 313 पन्नों की शिकायत पर अब तक क्या कार्रवाई हुई?

कथित खाली और अधूरे बिलों के आधार पर भुगतान हुआ है या नहीं?

उल्लेखित राशियों का भुगतान किस कार्य, सामग्री अथवा वित्तीय मद के अंतर्गत किया गया?

पंचायत के मूल अभिलेख सुरक्षित हैं या नहीं, और क्या उनका स्वतंत्र सत्यापन कराया जाएगा?

कथित ₹11 लाख की रिकवरी के आदेश की वर्तमान स्थिति क्या है?

जांच में अनियमितता प्रमाणित होने पर संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध क्या नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी?

निष्पक्ष जांच से ही सामने आएगी सच्चाई

ग्राम पंचायत बेलसोंडा का यह मामला केवल कुछ बिलों की वैधता तक सीमित नहीं है। यह पंचायत स्तर पर सार्वजनिक धन के उपयोग, दस्तावेजों की पारदर्शिता और शिकायतों पर प्रशासनिक कार्रवाई की जवाबदेही से भी जुड़ा है।

यदि शिकायत में लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं, तो नियमानुसार जिम्मेदारी तय कर आवश्यक कार्रवाई की जानी चाहिए। वहीं, यदि दस्तावेजों के परीक्षण में आरोप प्रमाणित नहीं होते, तो वास्तविक स्थिति भी सार्वजनिक की जानी चाहिए, ताकि किसी व्यक्ति के विरुद्ध बिना प्रमाण निष्कर्ष न निकाला जाए।

अब निगाहें जिला प्रशासन और SDM कार्यालय पर हैं। क्या 313 पन्नों में प्रस्तुत दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच शुरू होगी? क्या कथित अनियमितताओं से जुड़े रिकॉर्ड का सत्यापन कर वास्तविक स्थिति सामने लाई जाएगी? या फिर शिकायतकर्ता आंदोलन के लिए मजबूर होंगे?

इन सवालों का जवाब प्रशासनिक कार्रवाई और जांच के निष्कर्षों से ही मिलेगा। फिलहाल बेलसोंडा पंचायत में उठे सवालों के बीच ग्रामीणों को पारदर्शी जांच और जवाबदेही का इंतजार है।

बसना के चिंटू ढाबा की बिरयानी में मृत टिड्डा मिलने का आरोप, मचा हड़कंप..! पत्रकार ने CM हेल्पलाइन 1076 में की शिकायत, खाद्य सुरक्षा जांच की मांग

बसना के चिंटू ढाबा की बिरयानी में मृत टिड्डा मिलने का आरोप, मचा हड़कंप..! पत्रकार ने CM हेल्पलाइन 1076 में की शिकायत, खाद्य सुरक्षा जांच की मांग

बिरयानी की थाली में कीड़ा मिलने से भोजन की स्वच्छता पर उठे सवाल; संचालक के जवाब से असंतुष्ट पत्रकार ने उठाया मामला, CCTV फुटेज सुरक्षित रखने और खाद्य नमूने की जांच कराने की मांग

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता/
बसना/महासमुंद, 20 अक्टूबर 2026/ दिन मंगलवार
महासमुंद जिले के बसना स्थित बस स्टैंड के पास संचालित चिंटू वीरे दा रेस्टोरेंट (चिंटू ढाबा) में परोसी गई बिरयानी में मृत टिड्डा मिलने का आरोप सामने आया है। मंगलवार को सामने आई इस घटना ने होटल-ढाबों में भोजन की स्वच्छता, रसोई की साफ-सफाई और खाद्य सुरक्षा मानकों के पालन को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामले को लेकर स्थानीय पत्रकार केशव सिदार ने छत्तीसगढ़ शासन की मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 1076 पर शिकायत दर्ज कराते हुए संबंधित प्रतिष्ठान की जांच और नियमानुसार कार्रवाई की मांग की है।

शिकायतकर्ता के अनुसार, भोजन की थाली में मृत टिड्डा दिखाई देने के बाद जब ढाबा संचालक से इसकी शिकायत की गई, तो उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं मिला। हालांकि, घटना की वास्तविक स्थिति, भोजन में कीड़ा मिलने के कारण और प्रतिष्ठान की जिम्मेदारी का निर्धारण संबंधित विभाग की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।

क्या है पूरा मामला..? तीन प्लेट बिरयानी का दिया था ऑर्डर

प्राप्त जानकारी के अनुसार, बसना क्षेत्र के पत्रकार केशव सिदार अपने साथी प्रदीप देवांगन और हेमंत तांडी के साथ मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 को सुबह लगभग 11 बजे बसना बस स्टैंड के समीप स्थित चिंटू ढाबा पहुंचे थे। यहां तीन प्लेट बिरयानी का ऑर्डर दिया गया।

बताया गया है कि भोजन करना शुरू करने के दौरान पत्रकार केशव सिदार की बिरयानी की थाली में एक मृत टिड्डा दिखाई दिया। इसके बाद भोजन की गुणवत्ता और तैयार करने के दौरान बरती गई सावधानियों को लेकर सवाल उठने लगे।

शिकायतकर्ता के मुताबिक, उन्होंने तत्काल इस मामले को ढाबा संचालक के संज्ञान में लाया। आरोप है कि संचालक की ओर से संतोषजनक समाधान देने के बजाय यह कहा गया कि, “मैंने जानबूझकर नहीं किया है।”

इस कथित जवाब से असंतुष्ट होकर पत्रकार ने मामले को संबंधित प्रशासनिक व्यवस्था तक पहुंचाने का निर्णय लिया। फिलहाल, भोजन में टिड्डा मिलने के आरोप की स्वतंत्र पुष्टि और संचालक का विस्तृत पक्ष सामने आना बाकी है।

CM हेल्पलाइन 1076 तक पहुंचा मामला, शिकायत में उठाईं तीन प्रमुख मांगें

ढाबे में भोजन की स्वच्छता को लेकर उठे सवाल के बाद पत्रकार केशव सिदार ने मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 1076 पर ऑनलाइन शिकायत दर्ज कराई। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, शिकायत का टोकन नंबर WP261000242243 बताया गया है।

शिकायतकर्ता ने मामले की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए मुख्य रूप से तीन मांगें रखी हैं।

1.रसोई और खाद्य सामग्री की जांच हो

ढाबे की रसोई, खाद्य सामग्री के भंडारण, भोजन तैयार करने की प्रक्रिया तथा ग्राहकों को खाना परोसने वाले स्थान की जांच कराई जाए। साथ ही यह भी देखा जाए कि साफ-सफाई और खाद्य सुरक्षा से जुड़े निर्धारित मानकों का पालन किया जा रहा है या नहीं।

2.संबंधित समय का CCTV फुटेज सुरक्षित रखा जाए

शिकायत में घटना के समय के CCTV फुटेज की जांच कराने और उसे सुरक्षित रखने की मांग की गई है, ताकि घटनाक्रम की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने में मदद मिल सके। यदि फुटेज उपलब्ध है, तो संबंधित विभाग उसकी जांच कर सकता है।

3.भोजन के नमूने की जांच कर नियमानुसार कार्रवाई हो

शिकायतकर्ता ने भोजन के नमूने की जांच कराने और खाद्य सुरक्षा मानकों के उल्लंघन की पुष्टि होने पर लागू कानून के तहत कार्रवाई करने की मांग की है। जांच के दौरान प्रतिष्ठान की स्वच्छता व्यवस्था और भोजन तैयार करने की प्रक्रिया का परीक्षण भी महत्वपूर्ण होगा।

खाद्य सुरक्षा पर सवाल: यात्रियों और आम नागरिकों की सेहत कितनी सुरक्षित..?

बस स्टैंड जैसे सार्वजनिक स्थानों के आसपास संचालित होटल और ढाबे यात्रियों, स्थानीय नागरिकों तथा अन्य लोगों के लिए भोजन की महत्वपूर्ण व्यवस्था होते हैं। ऐसे प्रतिष्ठानों में साफ-सफाई और सुरक्षित खाद्य सामग्री का इस्तेमाल केवल व्यावसायिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि ग्राहकों के स्वास्थ्य से जुड़ा विषय भी है।

भोजन में किसी कीड़े या बाहरी वस्तु के मिलने की शिकायत को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। ऐसी स्थिति में भोजन की तैयारी, भंडारण, रसोई की स्वच्छता और परोसने की प्रक्रिया की जांच से यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि कहीं खाद्य सुरक्षा संबंधी लापरवाही तो नहीं हुई है।

हालांकि, एक शिकायत के आधार पर पूरे प्रतिष्ठान की व्यवस्था को दोषपूर्ण घोषित करना उचित नहीं होगा। वास्तविक स्थिति सामने लाने के लिए संबंधित अधिकारियों की जांच, उपलब्ध साक्ष्य और प्रतिष्ठान का पक्ष महत्वपूर्ण रहेगा।

अब खाद्य सुरक्षा विभाग की भूमिका पर नजर

इस मामले में अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि शिकायत पर संबंधित विभाग क्या कदम उठाता है। क्या खाद्य सुरक्षा अधिकारी मौके पर पहुंचकर रसोई और खाद्य सामग्री की जांच करेंगे? क्या उपलब्ध होने पर संबंधित समय के CCTV फुटेज की पड़ताल की जाएगी? और क्या भोजन के नमूने की जांच कराई जाएगी..?

इन सवालों के जवाब विभागीय कार्रवाई के बाद ही सामने आएंगे। शिकायतकर्ता के अनुसार, मामला मुख्यमंत्री हेल्पलाइन पर दर्ज कराया गया है। शिकायत की वर्तमान स्थिति, विभाग को सौंपे जाने और किसी निरीक्षण या कार्रवाई की पुष्टि स्वतंत्र रूप से होना अभी बाकी है।

फिलहाल, चिंटू ढाबा में बिरयानी की थाली में मृत टिड्डा मिलने का आरोप जांच का विषय है। यदि जांच में खाद्य सुरक्षा मानकों का उल्लंघन पाया जाता है, तो संबंधित कानून के तहत नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। वहीं, प्रतिष्ठान को भी अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना आवश्यक है।

अब निगाहें संबंधित विभाग की जांच और कार्रवाई पर टिकी हैं। जांच से ही स्पष्ट होगा कि यह भोजन तैयार करने के दौरान हुई लापरवाही का मामला था या घटना के पीछे कोई अन्य कारण था।
बेबाक बयान न्यूज — हर बात खुलकर, हर राज खुलकर।

खैरझिटी पंचायत में सत्ता का संकट गहराया! अविश्वास प्रस्ताव के बाद हाईकोर्ट की रोक से अटकी सरपंच नियुक्ति, विकास कार्यों पर लगा ब्रेक

खैरझिटी पंचायत में सत्ता का संकट गहराया! अविश्वास प्रस्ताव के बाद हाईकोर्ट की रोक से अटकी सरपंच नियुक्ति, विकास कार्यों पर लगा ब्रेक

सरपंच पद की कानूनी लड़ाई में उलझी पंचायत व्यवस्था; 27 जुलाई के पत्र में जनपद CEO ने मांगा मार्गदर्शन, ग्रामीणों के कामकाज को लेकर बढ़ी चिंता

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता/19 अक्टूबर 2026/ दिन सोमवार
महासमुंद, छत्तीसगढ़।
महासमुंद जिले की जनपद पंचायत महासमुंद के अंतर्गत ग्राम पंचायत खैरझिटी में सरपंच पद को लेकर पैदा हुआ विवाद अब कानूनी और प्रशासनिक पेचीदगी का रूप ले चुका है। अविश्वास प्रस्ताव पारित होने के बाद सरपंच पद रिक्त होने और स्थानापन्न सरपंच की नियुक्ति को लेकर उठे सवालों के बीच मामला छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर तक पहुंच गया है। हाईकोर्ट से अंतरिम राहत मिलने के बाद नियुक्ति प्रक्रिया पर रोक लगने की जानकारी सामने आई है। वहीं, पंचायत के कामकाज को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए जनपद पंचायत महासमुंद के मुख्य कार्यपालन अधिकारी ने जिला पंचायत के पंचायत विभाग से मार्गदर्शन मांगा है।

इस पूरे घटनाक्रम ने ग्राम पंचायत में प्रशासनिक व्यवस्था, विकास योजनाओं की निरंतरता और ग्रामीणों से जुड़े जरूरी कार्यों को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि कानूनी प्रक्रिया पूरी होने तक पंचायत का कामकाज किस व्यवस्था के तहत संचालित होगा और ग्रामीणों को राहत कब मिलेगी..?

अविश्वास प्रस्ताव के बाद शुरू हुआ विवाद

प्राप्त जानकारी के अनुसार, ग्राम पंचायत खैरझिटी की तत्कालीन सरपंच श्रीमती रामेश्वरी कुंजलाल चेलाक के विरुद्ध 17 अप्रैल 2026 को अविश्वास प्रस्ताव पारित किया गया था। इसके बाद उन्हें सरपंच पद से पृथक किए जाने की कार्रवाई हुई। इस घटनाक्रम के पश्चात पंचायत के नियमित संचालन के लिए स्थानापन्न अथवा कार्यवाहक सरपंच की व्यवस्था का प्रश्न सामने आया।

पंचायत में नेतृत्व की वैकल्पिक व्यवस्था को लेकर सहमति और प्रशासनिक प्रक्रिया का रास्ता स्पष्ट नहीं हो पाने के कारण मामला लगातार उलझता गया। स्थिति ऐसी बनी कि सरपंच पद की जिम्मेदारी किसे सौंपी जाए, इस पर प्रशासनिक स्तर पर निर्णय लेना चुनौतीपूर्ण हो गया।

ग्राम पंचायत में सरपंच की भूमिका केवल बैठकों तक सीमित नहीं होती। विकास कार्यों की निगरानी, पंचायत संबंधी प्रस्तावों पर कार्रवाई, विभिन्न योजनाओं का क्रियान्वयन और ग्रामीणों की समस्याओं के निराकरण में भी इस पद की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। ऐसे में पद से जुड़ा विवाद लंबा खिंचने पर पंचायत की कार्यप्रणाली प्रभावित होने की आशंका स्वाभाविक है।

आरक्षण बना नियुक्ति प्रक्रिया में अहम मुद्दा

मामले में एक महत्वपूर्ण पहलू ग्राम पंचायत खैरझिटी के सरपंच पद का आरक्षण है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यह पद अनुसूचित जाति महिला वर्ग के लिए आरक्षित है। इसी आरक्षण व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए स्थानापन्न सरपंच की नियुक्ति को लेकर प्रशासनिक स्तर पर सवाल उठे।

बताया गया है कि अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व), महासमुंद की ओर से प्रस्तुत जांच प्रतिवेदन के आधार पर उपसरपंच श्री टिकेलाल जलक्षत्री को स्थानापन्न सरपंच बनाने के लिए पंचायत द्वारा पारित प्रस्ताव को निरस्त कर दिया गया। इस कार्रवाई में छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम, 1993 की धारा 85 के प्रावधानों का उल्लेख किया गया है।

इस घटनाक्रम से स्पष्ट है कि मामला केवल पंचायत के भीतर पदभार सौंपने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें आरक्षण व्यवस्था, लागू कानूनी प्रावधानों और प्रशासनिक अधिकारों की व्याख्या भी महत्वपूर्ण है। हालांकि, संबंधित आदेश की संपूर्ण प्रति और उसमें दर्ज कानूनी आधार का स्वतंत्र परीक्षण किए बिना इस कार्रवाई की वैधानिकता पर अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

हाईकोर्ट पहुंचा मामला, नियुक्ति प्रक्रिया पर अंतरिम रोक

स्थानापन्न सरपंच की नियुक्ति को लेकर उत्पन्न विवाद के बीच श्रीमती रामेश्वरी कुंजलाल चेलाक ने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर में याचिका दायर की। उपलब्ध विवरण के अनुसार, यह मामला WPC No. 2804/2026 — Smt. Rameshwari Kunjlal Chelak Vs State of Chhattisgarh & Others के रूप में दर्ज है।

याचिका पर सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की पीठ द्वारा अंतरिम आदेश जारी किए जाने की जानकारी दी गई है। बताया गया है कि अगली सुनवाई तक संबंधित प्राधिकारियों को सरपंच नियुक्ति की प्रक्रिया में आगे कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया गया है।

इस अंतरिम आदेश के बाद नियुक्ति प्रक्रिया पर विराम लग गया। नतीजतन, पंचायत में वैकल्पिक नेतृत्व की व्यवस्था को लेकर प्रशासन के सामने नई चुनौती खड़ी हो गई है।

यहां यह समझना जरूरी है कि अंतरिम स्थगन आदेश का प्रभाव उसके वास्तविक शब्दों और दायरे पर निर्भर करता है। इसलिए आदेश की प्रमाणित प्रति के आधार पर ही यह स्पष्ट किया जा सकता है कि रोक किन अधिकारियों, किन कदमों और किस अवधि तक लागू है। मामले का अंतिम निर्णय अभी न्यायालय की आगामी कार्यवाही पर निर्भर करेगा।

27 जुलाई को जनपद CEO ने मांगा मार्गदर्शन

हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद प्रशासनिक स्तर पर आगे की कार्रवाई को लेकर मार्गदर्शन मांगे जाने का मामला भी सामने आया है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक, जनपद पंचायत महासमुंद के मुख्य कार्यपालन अधिकारी ने 27 जुलाई 2026 को पत्र क्रमांक 2053/निर्वा.शाखा/ज.पं./2026 के माध्यम से उपसंचालक (पंचायत), जिला महासमुंद को पत्र भेजा।

पत्र में न्यायालय के निर्देशों के मद्देनजर नियुक्ति प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाने की स्थिति का उल्लेख करते हुए ग्राम पंचायत के कार्यों को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए नियमानुसार आवश्यक दिशा-निर्देश मांगे गए हैं।

पत्र की प्रतिलिपि कलेक्टर महासमुंद, मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत, अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) तथा वर्तमान उपसरपंच और पंचों को भी भेजे जाने की जानकारी है।

इस पत्राचार से संकेत मिलता है कि प्रशासन पंचायत के नियमित संचालन के लिए लागू नियमों के अनुरूप रास्ता तलाश रहा है। लेकिन मार्गदर्शन के लिए पत्र जारी होना और उसके आधार पर कोई अंतिम प्रशासनिक व्यवस्था लागू होना दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। इसलिए यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित विभाग ने इस पत्र पर क्या निर्णय लिया और पंचायत के कामकाज को लेकर आगे कौन-से निर्देश जारी किए गए।

विकास कार्यों पर असर की आशंका, ग्रामीणों को इंतजार

पंचायत में सरपंच पद को लेकर विवाद लंबा खिंचने से ग्रामीणों के मन में कई सवाल उठना स्वाभाविक है। पंचायत के नियमित प्रशासनिक कार्य, विकास योजनाओं की प्रगति, प्रस्तावों पर निर्णय और जनहित से जुड़े मामलों का संचालन किस प्रकार होगा, यह स्पष्ट होना जरूरी है।

हालांकि, पंचायत के सभी विकास कार्य पूरी तरह बंद होने की पुष्टि के लिए संबंधित कार्यों की सूची, भुगतान की स्थिति, लंबित प्रस्तावों और विभागीय अभिलेखों की जांच आवश्यक है। इसके बावजूद नेतृत्व और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर अनिश्चितता दूर करना स्थानीय प्रशासन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

ग्रामीणों के हित में यह जरूरी है कि न्यायालय के आदेश का पालन करते हुए पंचायत के नियमित कार्यों के संचालन का वैधानिक रास्ता स्पष्ट किया जाए, ताकि पद से जुड़े विवाद का खामियाजा आम लोगों को न भुगतना पड़े।

अब प्रशासन के सामने तीन बड़े सवाल

खैरझिटी पंचायत के पूरे प्रकरण में अब तीन प्रमुख सवालों के जवाब सामने आना जरूरी है।

पहला सवाल: 27 जुलाई 2026 को भेजे गए मार्गदर्शन संबंधी पत्र पर उपसंचालक (पंचायत) अथवा जिला प्रशासन ने क्या निर्णय लिया..?

दूसरा सवाल: हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश के दायरे में रहते हुए पंचायत के दैनिक प्रशासनिक कार्यों और विकास योजनाओं के संचालन के लिए कौन-सी वैधानिक व्यवस्था उपलब्ध है..?

तीसरा सवाल: सरपंच पद से जुड़े विवाद की अगली सुनवाई कब होनी है और न्यायालय में अब तक की कार्यवाही की स्थिति क्या है..?

इन सवालों के जवाब सामने आने से ही पंचायत की वर्तमान स्थिति और आगे की दिशा को लेकर स्पष्टता आएगी।

निष्कर्ष: कानूनी प्रक्रिया के साथ पंचायत संचालन भी जरूरी

ग्राम पंचायत खैरझिटी का मामला अब केवल सरपंच पद के विवाद तक सीमित नहीं रह गया है। एक ओर हाईकोर्ट के आदेश का पालन करना प्रशासन की जिम्मेदारी है, तो दूसरी ओर पंचायत के जरूरी कामकाज और ग्रामीणों के हितों की अनदेखी न हो, यह सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

अब निगाहें जिला प्रशासन, पंचायत विभाग और हाईकोर्ट की आगामी कार्यवाही पर टिकी हैं। ग्रामीणों को उम्मीद है कि कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप जल्द ही ऐसी व्यवस्था स्पष्ट होगी, जिससे पंचायत का नियमित कामकाज प्रभावित न हो और विकास संबंधी गतिविधियों को आगे बढ़ाने का रास्ता खुले।

बेबाक बयान न्यूज की नजर इस पूरे मामले पर बनी रहेगी। संबंधित विभागों की प्रतिक्रिया, मार्गदर्शन पत्र पर हुई कार्रवाई और न्यायालय की आगामी कार्यवाही से जुड़ी प्रमाणित जानकारी सामने आने पर प्रकरण की आगे की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

महासमुंद में आस्था के दरबार पर शुल्क का विवाद..! अम्बेडकर चौक में ‘शीघ्र दर्शन’ के नाम पर 10–20 रुपये की पर्ची काटने का आरोप, श्रद्धालुओं में नाराजगी

महासमुंद में आस्था के दरबार पर शुल्क का विवाद..! अम्बेडकर चौक में ‘शीघ्र दर्शन’ के नाम पर 10–20 रुपये की पर्ची काटने का आरोप, श्रद्धालुओं में नाराजगी

समिति की पारदर्शिता और प्रशासन की निगरानी पर उठे सवाल

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता/16 अक्टूबर 2026 / दिन शुक्रवार
महासमुंद। शारदीय नवरात्रि के पावन अवसर पर महासमुंद शहर माता रानी की भक्ति, श्रद्धा और धार्मिक उत्साह में सराबोर है। शहर के विभिन्न चौक-चौराहों पर आकर्षक दुर्गा पंडाल, मनमोहक झांकियां और धार्मिक कलाकृतियां श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं। मां राजराजेश्वरी महामाया के दरबार से लेकर अलग-अलग पूजा स्थलों तक भक्तों की आवाजाही जारी है। लेकिन इसी धार्मिक माहौल के बीच तुमगांव ढाल स्थित अम्बेडकर चौक में बनाई गई ‘माता वैष्णो देवी गुफा दर्शन’ की झांकी को लेकर शुल्क वसूली का विवाद सामने आया है।

आरोप है कि यहां ‘शीघ्र दर्शन’, ‘सामान्य दर्शन’ और दान के नाम पर 10 रुपये तथा 20 रुपये की पर्चियां काटी जा रही हैं। इस व्यवस्था को लेकर कुछ श्रद्धालुओं और स्थानीय नागरिकों ने आपत्ति जताई है। उनका सवाल है कि जब धार्मिक आयोजन का उद्देश्य लोगों को आस्था से जोड़ना और

श्रद्धालुओं को माता रानी के दर्शन कराना है, तो दर्शन व्यवस्था में अलग-अलग शुल्क लेने का आधार क्या है? हालांकि, इस मामले में समिति का पक्ष, शुल्क की आधिकारिक स्थिति और प्रशासन की प्रतिक्रिया सामने आना अभी बाकी है।

अम्बेडकर चौक की गुफा झांकी बनी आकर्षण, लेकिन शुल्क व्यवस्था पर विवाद

तुमगांव ढाल स्थित अम्बेडकर चौक पर ‘जय मां भवानी दुर्गा पूजा समिति’ के नाम से माता वैष्णो देवी गुफा दर्शन की झांकी तैयार किए जाने की जानकारी सामने आई है। धार्मिक स्वरूप में बनाई गई इस झांकी को देखने के लिए श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। नवरात्रि के दौरान ऐसी झांकियां लोगों को धार्मिक परंपराओं से जोड़ने और पर्व की रौनक बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

लेकिन झांकी के सामने टेंट लगाकर दर्शनार्थियों से कथित तौर पर 10 और 20 रुपये की पर्चियां काटे जाने की व्यवस्था ने विवाद खड़ा कर दिया है। स्थानीय लोगों के अनुसार, पर्चियों पर ‘शीघ्र दर्शन’, ‘सामान्य दर्शन’ अथवा ‘दान पत्र’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जा रहा है।

अब इस पूरे मामले में यह स्पष्ट होना जरूरी है कि संबंधित राशि अनिवार्य प्रवेश शुल्क के रूप में ली जा रही है, किसी विशेष सुविधा के लिए निर्धारित की गई है या स्वैच्छिक दान के तौर पर मांगी जा रही है। इन तीनों व्यवस्थाओं की प्रकृति अलग-अलग है। इसलिए वास्तविक स्थिति सामने आए बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।

रसीद पर पदाधिकारियों का नाम और संपर्क विवरण नहीं होने का आरोप

इस विवाद का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू समिति की पारदर्शिता से जुड़ा है। स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि इस्तेमाल की जा रही रसीद पुस्तिका पर समिति के जिम्मेदार पदाधिकारियों के नाम और संपर्क संबंधी जानकारी स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं है।

यदि रसीद पर समिति की पहचान, जिम्मेदार व्यक्ति और राशि प्राप्त करने का उद्देश्य स्पष्ट नहीं है, तो श्रद्धालुओं के मन में स्वाभाविक रूप से सवाल उठ सकते हैं। धार्मिक आयोजनों में आर्थिक सहयोग लेने की स्थिति में भी लोगों को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि उनसे किस उद्देश्य से राशि मांगी जा रही है और प्राप्त धन का हिसाब कौन रख रहा है।

ऐसे में संबंधित समिति को सामने आकर रसीद व्यवस्था, शुल्क निर्धारण और दान संग्रह के उद्देश्य पर स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए, ताकि किसी तरह की गलतफहमी की गुंजाइश न रहे।

अन्य पंडालों में निःशुल्क दर्शन, फिर यहां अलग व्यवस्था क्यों..?

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि महासमुंद शहर के अन्य स्थानों पर भी नवरात्रि के दौरान भव्य दुर्गा पंडाल और आकर्षक धार्मिक झांकियां स्थापित की गई हैं। उनके मुताबिक, कई स्थानों पर श्रद्धालु बिना प्रवेश शुल्क दिए माता रानी के दर्शन कर रहे हैं।

इसी तुलना के कारण अम्बेडकर चौक की व्यवस्था को लेकर सवाल उठ रहे हैं। लोगों का कहना है कि यदि यहां दर्शन के लिए कोई शुल्क निर्धारित किया गया है, तो उसकी स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए। वहीं, यदि राशि स्वैच्छिक दान के रूप में ली जा रही है, तो श्रद्धालुओं पर भुगतान करने का दबाव नहीं होना चाहिए।

हालांकि, अलग-अलग पूजा समितियों की व्यवस्थाएं एक जैसी हों, यह आवश्यक नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि किसी भी शुल्क या दान की प्रकृति स्पष्ट हो, श्रद्धालुओं को भ्रमित न किया जाए और लागू नियमों का पालन किया जाए।

आस्था के नाम पर आर्थिक लेन-देन की निगरानी कौन करेगा..?

नवरात्रि जैसे बड़े धार्मिक पर्व पर हजारों लोग परिवार सहित दर्शन के लिए निकलते हैं। ऐसे अवसरों पर पूजा समितियों की जिम्मेदारी केवल झांकी सजाने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि भीड़ प्रबंधन, सुरक्षा, स्वच्छता और आर्थिक पारदर्शिता भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

अम्बेडकर चौक के मामले में अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या संबंधित समिति ने शुल्क या दान संग्रह की व्यवस्था के संबंध में स्थानीय प्रशासन को जानकारी दी है? क्या पर्चियों पर पर्याप्त विवरण दर्ज है? क्या दर्शनार्थियों को यह बताया जा रहा है कि राशि देना अनिवार्य है या पूरी तरह स्वैच्छिक?

इन सवालों का जवाब संबंधित समिति और प्रशासन की जांच अथवा आधिकारिक स्पष्टीकरण से ही सामने आ सकता है। केवल आरोपों के आधार पर इसे अवैध वसूली घोषित करना उचित नहीं होगा, लेकिन शिकायतों की निष्पक्ष जांच और तथ्यात्मक स्थिति स्पष्ट करना भी आवश्यक है।

जिला प्रशासन और पुलिस से निष्पक्ष जांच की अपेक्षा

इस मामले में जिला प्रशासन, स्थानीय पुलिस और संबंधित निकाय के अधिकारियों से अपेक्षा है कि वे शिकायतों की जानकारी लेकर वास्तविक स्थिति की जांच करें। यदि शुल्क लिया जा रहा है, तो उसका आधार, अनुमति संबंधी स्थिति और रसीद की पारदर्शिता नियमानुसार परखी जानी चाहिए। यदि दान स्वैच्छिक है, तो श्रद्धालुओं को इसकी स्पष्ट जानकारी दी जानी चाहिए।

जांच के दौरान पूजा समिति का पक्ष भी सुना जाना चाहिए, ताकि किसी निर्दोष व्यक्ति या संस्था पर एकतरफा आरोप न लगे। यदि किसी नियम का उल्लंघन प्रमाणित होता है, तो संबंधित प्रावधानों के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है।

अब जवाब का इंतजार: श्रद्धालुओं की सुविधा या शुल्क को लेकर भ्रम..?

अम्बेडकर चौक की ‘माता वैष्णो देवी गुफा दर्शन’ झांकी को लेकर उठे सवालों का समाधान तथ्यों और पारदर्शिता से ही संभव है। समिति की ओर से स्पष्ट जानकारी और प्रशासन की ओर से निष्पक्ष जांच सामने आने पर ही यह तय हो सकेगा कि पर्चियों के जरिए राशि किस उद्देश्य से ली जा रही थी और व्यवस्था में किसी सुधार की आवश्यकता है या नहीं।
सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या श्रद्धालुओं को दर्शन और दान के बीच का अंतर स्पष्ट रूप से बताया जा रहा है?
नवरात्रि का पर्व श्रद्धा, सेवा और सामाजिक सद्भाव का प्रतीक है। ऐसे में धार्मिक आयोजनों से जुड़े हर आर्थिक लेन-देन में स्पष्टता और जवाबदेही बनी रहनी चाहिए, ताकि भक्तों की आस्था के साथ किसी प्रकार का भ्रम या असंतोष पैदा न हो।

बेबाक बयान न्यूज की नजर इस मामले पर बनी रहेगी। संबंधित समिति और प्रशासन का पक्ष सामने आने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।

​महासमुंद कृषि विभाग में ट्रांसफर और अटैचमेंट का बड़ा खेल: जितेंद्र पटेल और भूषण साहू के स्थानांतरण पर मचा घमासान; पूर्व विधायक विनोद चंद्राकर ने उप संचालक F.R. कश्यप पर FIR दर्ज करने की उठाई मांग

​महासमुंद कृषि विभाग में ट्रांसफर और अटैचमेंट का बड़ा खेल: जितेंद्र पटेल और भूषण साहू के स्थानांतरण पर मचा घमासान; पूर्व विधायक विनोद चंद्राकर ने उप संचालक F.R. कश्यप पर FIR दर्ज करने की उठाई मांग

​प्रधान संपादक मयंक गुप्ता/
दिनांक 14 अक्टूबर 2026 (बुधवार)
स्थान: महासमुंद, छत्तीसगढ़

​महासमुंद जिले का कृषि विभाग इन दिनों वित्तीय अनियमितताओं, खरीदी प्रक्रिया में भ्रष्टाचार और अधिकारियों-कर्मचारियों के संलग्नीकरण (अटैचमेंट) तथा स्थानांतरण आदेशों की आड़ में चल रही मनमानी को लेकर विवादों के चरम पर है। विभाग के भीतर चल रहा यह प्रशासनिक खेल अब जनहित, सरकारी योजनाओं और किसानों के अधिकारों से जुड़कर जिले का सबसे बड़ा मुद्दा बन चुका है।

​इस पूरे प्रकरण में पूर्व विधायक विनोद सेवनलाल चंद्राकर ने बेहद कड़े तेवर अपनाते हुए महासमुंद कृषि विभाग में पदस्थ उप संचालक फागुराम कश्यप (F.R. कश्यप) के विरुद्ध तत्काल एफआईआर (FIR) दर्ज किए जाने की मांग उठाई है। पूर्व विधायक द्वारा उच्चस्तरीय निष्पक्ष जांच और आपराधिक मामला दर्ज करने की मांग से प्रशासनिक महकमे में हड़कंप मच गया है।

​1. ट्रांसफर और रिलीविंग का दोहरा खेल: जितेंद्र पटेल और भूषण साहू का मामला मुख्य केंद्र

​विभाग के भीतर शासकीय आदेशों की किस तरह धज्जियां उड़ाई जा रही हैं, इसका सबसे बड़ा प्रमाण दो कर्मचारियों— जितेंद्र कुमार पटेल और भूषण कुमार साहू के स्थानांतरण व संलग्नीकरण से जुड़ा विवाद है:

​1. जितेंद्र कुमार पटेल का पिथौरा स्थानांतरण एवं भारमुक्ति का मामला

ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी जितेंद्र कुमार पटेल की मूल पदस्थापना विकासखंड पिथौरा है। वे लंबे समय से महासमुंद जिला कार्यालय में संलग्नीकरण (अटैचमेंट) पर जमे हुए हैं। उप संचालक कार्यालय द्वारा 13 अक्टूबर 2025 को ही उन्हें पिथौरा के लिए भारमुक्त (रिलीव) करने का आदेश जारी किया जा चुका था। इसके बावजूद, एक साल से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी उन्हें मूल पदस्थापना स्थल पिथौरा नहीं भेजा गया।

​विरोध व चेतावनी: छत्तीसगढ़ कृषि स्नातक शासकीय कृषि अधिकारी संघ और मैदानी कर्मचारियों ने जितेंद्र पटेल को तत्काल उनकी मूल पदस्थापना पिथौरा भेजने की मांग की है। कर्मचारियों ने चेतावनी दी है कि यदि उन्हें तत्काल रिलीव नहीं किया गया तो वे उग्र आंदोलन करने को बाध्य होंगे।

​2. भूषण कुमार साहू का बलौदाबाजार-भाटापारा स्थानांतरण व मेडिकल लीव का विवाद

दूसरी ओर, ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी भूषण कुमार साहू (विकासखंड महासमुंद) का स्थानांतरण छत्तीसगढ़ शासन, कृषि विकास एवं किसान कल्याण तथा जैव प्रौद्योगिकी विभाग के प्रशासनिक आदेश (क्रमांक ई.एस.टी.बी.-102/432/2025-ओ/ओ जॉइंट डीआईआर, क्र.सं. 35) के तहत

उप संचालक कृषि बलौदाबाजार-भाटापारा के अधीन किया गया है।

संचालनालय कृषि (रायपुर) के पत्र (दिनांक 29/01/2026) में रिक्तता का हवाला देते हुए भारमुक्त न करने का बिंदु स्वीकृत होने के बाद भी, उप संचालक फागुराम कश्यप द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि उप संचालक कश्यप ने भूषण साहू को नियमानुसार रिलीव करने के बजाय

मेडिकल लीव (चिकित्सा अवकाश)

पर रहने का निर्देश दिया और यहाँ तक आश्वासन दे दिया— “घबराने की जरूरत नहीं है, कुछ समय पश्चात मैं तुमको मुख्यमंत्री छत्तीसगढ़ शासन से आदेश दिलवा दूंगा।”

​बड़ा सवाल: उप संचालक श्री कश्यप आखिर अपने पसंदीदा कर्मचारियों को रिलीव करने या मूल पदस्थापना में भेजने से क्यों कतरा रहे हैं? विभागीय गलियारों में चर्चा है कि यदि इन अधिकारियों को रिलीव कर दिया गया तो ‘कमीशनखोरी’ और अवैध आय के चक्र पर पूर्ण विराम लग जाएगा। उप संचालक का यह रवैया उन्हें जिले में ‘कलेक्टर’ से भी ऊपर स्थापित करने जैसा दिखाई दे रहा है।

​2. कृषि उपकरणों की खरीदी व जैविक खेती मिशन में भ्रष्टाचार के आरोप
​नियमों की अनदेखी

कृषि विभाग में बीज, कृषि यंत्रों और अन्य सामग्रियों की खरीदी में भारी वित्तीय अनियमितता के आरोप लगे हैं। निर्धारित निविदा प्रक्रियाओं और बाजार दरों को ताक पर रखकर महँगे दामों पर सामग्री खरीदी गई।
​जैविक खेती मिशन (2021-2024): जैविक खेती मिशन के तहत स्वीकृत घटकों के स्थान पर किसानों को बैटरी चालित स्प्रेयर खरीदने के लिए मजबूर किया गया, जिसमें भारी कमीशनखोरी की शिकायतें हैं।

​3. फर्जी प्रशिक्षण बिल और LRP मानदेय से अवैध वसूली
​फर्जी बिलिंग

विभिन्न योजनाओं के तहत प्रशिक्षण कार्यक्रमों के नाम पर ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी जितेंद्र पटेल, प्रभारी वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी गंगाप्रसाद शरणागत एवं ‘आत्मा’ योजना के ऑपरेटर की सांठगांठ से फर्जी बिल बनाकर शासकीय राशि के गबन का आरोप है।
​LRP मानदेय में अवैध कटौती: परंपरागत कृषि विकास योजना के तहत लोकल रिसोर्स पर्सन (LRP) को मिलने वाले 50 हजार रुपये के मानदेय से ऑनलाइन, नकद और चेक के माध्यम से अवैध वसूली की उच्चस्तरीय जांच की मांग की जा रही है।

​4. किसानों का कथित अपमान एवं किसान संघ का आक्रोश

​भारतीय किसान संघ (महासमुंद) ने उप संचालक F.R. कश्यप पर किसानों से दुर्व्यवहार और अमर्यादित आचरण का आरोप लगाया है। कौशल्या तिवारी, शोभ कुमार साहू, रूपेश कुमार, भेख लाल साहू, नेम लाल चंद्राकर, अश्वनी साहू, सोहन, चगन साहू, हेमंत साहू और कुंदन सहित कई किसानों ने जिला कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर सख्त दंडात्मक कार्रवाई की मांग की है।

​जिला प्रशासन (कलेक्टर विनय कुमार लंगेह) से प्रमुख अपेक्षाएं

1 ​उप संचालक पर FIR

पूर्व विधायक विनोद चंद्राकर की मांग पर संज्ञान लेते हुए F.R. कश्यप के विरुद्ध दंडात्मक व कानूनी कार्रवाई की जाए।

2 ​स्थानांतरण आदेशों का तत्काल पालन

जितेंद्र कुमार पटेल को उनकी मूल पदस्थापना पिथौरा तथा भूषण कुमार साहू को बलौदाबाजार-भाटापारा भेजने संबंधी आदेशों व प्रशासनिक स्थिति को पारदर्शी बनाया जाए।

3 ​वित्तीय अनियमितताओं की स्वतंत्र जांच

2021 से 2024 तक की खरीदी, फर्जी प्रशिक्षण बिलों और LRP मानदेय वसूली का पारदर्शी लेखा-परीक्षण (Audit) कराया जाए।

​महासमुंद में ‘अधिकारियों का फुटबॉल खेल’: CEO और DDP की सुस्ती के बाद अब कलेक्टर विनय कुमार लंगेह के पाले में गेंद..!

​महासमुंद में ‘अधिकारियों का फुटबॉल खेल’: CEO और DDP की सुस्ती के बाद अब कलेक्टर विनय कुमार लंगेह के पाले में गेंद..!

​क्या जिले के ‘प्रशासनिक मुखिया’ करेंगे न्याय? जांच में पक्के सबूतों के बावजूद सचिव मोतीलाल मेहरा पर मेहरबानी क्यों? कलेक्टर के कड़े रुख का इंतजार!

​प्रधान संपादक मयंक गुप्ता / 13 अक्टूबर 2026 / दिन मंगलवार
महासमुंद (छत्तीसगढ़)
​छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में पंचायती राज व्यवस्था और प्रशासनिक पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। ग्राम पंचायत खैरा में पदस्थ विवादित सचिव मोतीलाल (मोती) मेहरा के खिलाफ गंभीर आरोपों की जांच पूरी होने और पुख्ता सबूत मिलने के बावजूद दंडात्मक कार्रवाई का लटकना अब जिला प्रशासन की नीयत पर सवाल खड़े कर रहा है।

​हैरानी की बात यह है कि जब भी शिकायतकर्ता इस मामले पर अपडेट मांगता है, तो जिला पंचायत की मुख्य कार्यपालन अधिकारी (IAS) सुश्री अनुपमा आनंद और उप संचालक पंचायत (DDP) नितिन कौड़ो एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालकर ‘फाइलों का फुटबॉल’ खेलने में मशगूल नजर आते हैं।

​ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है—जब निचले स्तर के अधिकारी जिम्मेदारी से भाग रहे हों, तो जिले के ‘प्रशासनिक पितामह’ यानी कलेक्टर विनय कुमार लंगेह खुद आगे आकर इस मामले में संज्ञान क्यों नहीं लेते?

​24 जून की ‘ग्राम सभा’ और ‘पति-सरपंच’ संस्कृति का खुला खेल

​पूरे विवाद की शुरुआत 24 जून 2026 को हुई, जब प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) जैसी जनहितकारी योजना की समीक्षा के लिए ग्राम पंचायत खैरा में महत्वपूर्ण ग्राम सभा बुलाई गई थी। नियमानुसार खैरा के सचिव मोतीलाल मेहरा को वहाँ उपस्थित रहना था।

​लेकिन आरोप हैं कि सचिव महोदय खैरा की ग्राम सभा को ठेंगा दिखाकर ग्राम पंचायत खट्टी पहुँच गए। खट्टी पंचायत में जाने की वजह कोई शासकीय कार्य नहीं, बल्कि यह थी कि वहाँ की सरपंच उनकी पत्नी श्रीमती अनिता मेहरा हैं।

​अनाधिकृत दखल: खट्टी पहुँचकर सचिव महोदय पर शासकीय कार्यवाही में अनुचित हस्तक्षेप करने और ग्रामीणों से अभद्र व्यवहार करने के आरोप लगे।

​नियमों की अवहेलना: शासन के स्पष्ट आदेश हैं कि महिला जनप्रतिनिधियों के काम में उनके पति या रिश्तेदार हस्तक्षेप नहीं करेंगे। इसके बावजूद शासकीय पद पर तैनात पति का दूसरी पंचायत में ‘सुपर-सरपंच’ की भूमिका में दिखना प्रशासनिक ढिलाई को दर्शाता है।

​06 अगस्त को जांच संपन्न, फिर भी कार्रवाई पर ‘ब्रेक’

​मामले की गंभीरता को देखते हुए 15 जुलाई 2026 को शिकायत दर्ज कराई गई, जिसके बाद जनपद पंचायत महासमुंद द्वारा जांच टीम गठित की गई (जांच आदेश क्रमांक: पंचा./शिक्षा/2026/1594)।

​06 अगस्त 2026 को ग्राम पंचायत खट्टी के भवन में खुली जांच हुई। दर्जनों ग्रामीणों ने उपस्थित होकर अपने बयान दर्ज कराए। जांच टीम के समक्ष

​उपस्थिति रजिस्टर की फोटोकॉपी,

​बैठक की तस्वीरें,

​खैरा ग्राम सभा से अनुपस्थिति के पुख्ता प्रमाण,

​और गवाहों के दर्ज बयान सौंपे गए।

​सबूत चीख-चीखकर सचिव की लापरवाही और अनाधिकृत हस्तक्षेप की तस्दीक कर रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद फाइलों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है।

​’फाइलों के फुटबॉल’ के बीच Collector साहब से 5 बेबाक सवाल

​जब जिला पंचायत के अधिकारी कार्रवाई करने से कतरा रहे हैं और मामला एक टेबल से दूसरे टेबल पर टहलाया जा रहा है, तो अब जिले के सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी कलेक्टर विनय कुमार लंगेह के नेतृत्व पर ही सबकी निगाहें टिक गई हैं। क्षेत्रवासी और शिकायतकर्ता उनसे सीधे सवाल पूछ रहे हैं:

1 ​क्या कलेक्टर साहब संज्ञान लेंगे..?

जिला पंचायत सीईओ और डीडीपी के बीच झूल रही फाइल पर जिले के मुखिया होने के नाते कलेक्टर विनय कुमार लंगेह खुद अंतिम निर्णय कब करवाएंगे?

2 ​जांच रिपोर्ट पर चुप्पी क्यों..?

यदि 06 अगस्त की जांच में आरोप प्रमाणित हो चुके हैं, तो दोषी सचिव पर कार्रवाई रोकने वाला ‘अदृश्य हाथ’ किसका है?

3 ​निर्दोष हैं तो रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं..?

यदि सचिव पर लगे आरोप सही नहीं पाए गए, तो प्रशासन क्लीन चिट देकर मामले का पटाक्षेप सार्वजनिक रूप से क्यों नहीं करता?

4 ​’सुशासन’ के दावों का क्या..?

क्या महासमुंद जिले में सुशासन का मतलब सिर्फ फाइलों की अदला-बदली है, या फिर दोषियों पर कड़ा प्रहार भी होगा..?

5 ​पारदर्शिता पर भरोसा कब लौटेगा..?

ग्रामीणों के बयानों और दस्तावेजों को नजरअंदाज कर भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देने वाली इस परिपाटी पर कलेक्टर साहब कब नकेल कसेंगे?

​निष्कर्ष: अब कलेक्टर विनय कुमार लंगेह के ‘कड़े फैसले’ का इंतजार

​पंचायती राज व्यवस्था का आधार ही जनता का भरोसा और प्रशासनिक जवाबदेही है। जब निचले स्तर के अधिकारी अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हैं, तो जनता अपने जिले के कलेक्टर की ओर उम्मीद से देखती है।

​महासमुंद की जनता अब कलेक्टर विनय कुमार लंगेह से यह उम्मीद लगाए बैठी है कि वे इस ‘प्रशासनिक सुस्ती’ और ‘फाइलों के खेल’ का संज्ञान लेंगे, जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक करवाएंगे और दोषी सचिव के खिलाफ कड़ा दंडात्मक कदम उठाकर जिले में प्रशासनिक अनुशासन की मिसाल पेश करेंगे।

​सीधा सवाल: “क्या कलेक्टर विनय कुमार लंगेह इस मामले में निष्पक्ष हस्तक्षेप कर भ्रष्टाचारियों को कड़ा संदेश देंगे, या फाइलों का यह फुटबॉल मैच ऐसे ही चलता रहेगा?”

महासमुंद में तेज रफ्तार का कहर..! दो सगे भाइयों की जिंदगी दांव पर, एक वेंटिलेटर पर तो दूसरा गंभीर रुप से घायल; हादसे के बाद कार छिपाने और नंबर प्लेट गायब करने के आरोप

महासमुंद में तेज रफ्तार का कहर..! दो सगे भाइयों की जिंदगी दांव पर, एक वेंटिलेटर पर तो दूसरा गंभीर रुप से घायल; हादसे के बाद कार छिपाने और नंबर प्लेट गायब करने के आरोप

सरपंच प्रतिनिधि के रिश्तेदार पर दुर्घटना का आरोप, पीड़ित परिवार को महज 20 हजार रुपये देने की बात आई सामने; पुलिस की जांच और कार्रवाई पर उठे गंभीर सवाल

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता
13 अक्टूबर 2026 | मंगलवार
महासमुंद, छत्तीसगढ़।
महासमुंद जिले में सड़क सुरक्षा और कानून के निष्पक्ष पालन को लेकर एक गंभीर मामला सामने आया है। खल्लारी थाना क्षेत्र के अवराडबरी नेशनल हाईवे पर हुए सड़क हादसे में दो सगे भाई गंभीर रूप से घायल हो गए। इनमें बड़े भाई दीनदयाल यादव की हालत बेहद नाजुक बताई जा रही है। परिजनों के अनुसार, वह अस्पताल में वेंटिलेटर सपोर्ट पर हैं और कोमा की स्थिति में जिंदगी की जंग लड़ रहे हैं। वहीं, छोटे भाई थानेश्वर यादव की भी कई हड्डियां टूटने से हालत गंभीर हो गई।

इस हादसे ने दो परिवारों की खुशियों को गहरे संकट में डाल दिया है। एक ओर तीन छोटी बेटियों के पिता दीनदयाल यादव के जीवन को लेकर परिवार चिंतित है, तो दूसरी ओर महज दो महीने की बच्ची के पिता थानेश्वर यादव भी गंभीर चोटों से जूझ रहे हैं। दोनों भाई मेहनत-मजदूरी कर अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे।

मामले को लेकर अब दुर्घटना के कारणों के साथ-साथ कथित समझौते, दुर्घटनाग्रस्त कार की स्थिति और साक्ष्यों से छेड़छाड़ के आरोपों की निष्पक्ष जांच की मांग उठ रही है। सबसे अहम सवाल यह है कि क्या पूरे मामले में कानून के अनुसार कार्रवाई होगी और पीड़ित परिवार को न्याय मिल पाएगा?

कैसे हुआ दर्दनाक हादसा..?

प्राप्त जानकारी और परिजनों के बताए घटनाक्रम के अनुसार, 9 अक्टूबर 2026 को सुबह लगभग 11 से 12 बजे के बीच खल्लारी थाना क्षेत्र के अवराडबरी नेशनल हाईवे पर यह दुर्घटना हुई।
बताया गया है कि ग्राम बोइरगांव निवासी 22 वर्षीय खुशहाल सिन्हा मारुति सुजुकी एस-क्रॉस कार क्रमांक CG 05 AG 2103 चला रहा था। आरोप है कि कार तेज रफ्तार में और लापरवाहीपूर्वक चलाई जा रही थी।

इसी दौरान होंडा शाइन मोटरसाइकिल क्रमांक CG 06 P 7387 पर सवार दो सगे भाई दीनदयाल यादव (34 वर्ष) और थानेश्वर यादव (32 वर्ष) अपने गृह ग्राम कोल्दा में आयोजित पितर-खेदी कार्यक्रम में शामिल होने जा रहे थे। बताया जाता है कि दोनों अपने काम से छुट्टी लेकर घर लौट रहे थे, तभी कार की चपेट में आ गए।

टक्कर इतनी जोरदार थी कि दोनों भाई गंभीर रूप से घायल हो गए। घटना के बाद उन्हें तत्काल चिकित्सा सहायता की आवश्यकता पड़ी। हादसे की वास्तविक परिस्थितियों, वाहनों की गति और टक्कर के कारणों का निर्धारण पुलिस की निष्पक्ष जांच तथा उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाना जरूरी है।

एक भाई वेंटिलेटर पर, दूसरे की कई हड्डियां टूटीं

हादसे के बाद डायल 112 की सहायता से दोनों घायलों को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बागबाहरा ले जाए जाने की जानकारी सामने आई है। वहां से उनकी गंभीर स्थिति को देखते हुए महासमुंद रेफर किया गया। बाद में उन्हें लभरा खुर्द स्थित सोहम हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया।

अस्पताल के डॉक्टर युगल चंद्राकर की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, दीनदयाल यादव के सिर में गंभीर चोट आई है। उनकी हालत नाजुक है और उन्हें वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया है। उनके कोमा में होने की बात भी बताई गई है।
वहीं, थानेश्वर यादव की दोनों जांघों और हाथ की हड्डियां टूटने की जानकारी दी गई है। उनकी आगे की चिकित्सा और स्वास्थ्य में सुधार के संबंध में अस्पताल की सलाह के अनुसार निर्णय लिया जाएगा।

यह केवल एक सड़क दुर्घटना नहीं, बल्कि उन परिवारों के सामने खड़ा गंभीर मानवीय संकट है, जिनकी रोजी-रोटी दोनों भाइयों की मेहनत पर निर्भर थी।

तीन बेटियों और दो महीने की मासूम का भविष्य चिंता में

दीनदयाल यादव की तीन छोटी बेटियां हैं। दूसरी ओर, थानेश्वर यादव की महज दो महीने की एक मासूम बच्ची है। परिवार के लिए यह हादसा आर्थिक और भावनात्मक रूप से बेहद कठिन परिस्थिति लेकर आया है।

जानकारी के अनुसार, दोनों भाई महासमुंद के होटल स्वर्ण और होटल आकाशिया में काम करते थे। अपनी मेहनत की कमाई से घर चलाने वाले इन भाइयों के गंभीर रूप से घायल होने से परिवार की आय पर संकट खड़ा हो गया है।

ऐसे में पीड़ित परिवार को चिकित्सा सहायता, कानूनी प्रक्रिया की जानकारी और दुर्घटना से संबंधित बीमा दावे के लिए आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराने में मदद मिलना महत्वपूर्ण है। हालांकि, किसी भी आर्थिक सहायता या मुआवजे का निर्धारण संबंधित नियमों, बीमा शर्तों और मामले के तथ्यों के आधार पर ही होगा।

सरपंच प्रतिनिधि के बयान ने खड़े किए सवाल

मामले में एक और पहलू चर्चा में है। मीडिया से बातचीत के दौरान ग्राम पंचायत अवराडबरी के सरपंच प्रतिनिधि मुकुंद सिन्हा के कथित बयान को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, मुकुंद सिन्हा आरोपी युवक खुशहाल सिन्हा के ननिहाल पक्ष से संबंधित बताए जा रहे हैं। आरोप है कि उन्होंने घायल परिवार को 20 हजार रुपये देने की बात कही और इससे अधिक आर्थिक सहायता देने से इनकार किया।

उनके नाम से यह कथन भी सामने आया है कि एफआईआर दर्ज होने पर बीमा कंपनी खर्च उठाएगी और उन्हें इस मामले की चिंता नहीं रहेगी।

यदि बातचीत में वास्तव में ऐसे शब्द कहे गए हैं, तो उनकी परिस्थितियों और संदर्भ की पुष्टि आवश्यक है। किसी व्यक्ति के कथित बयान को अंतिम तथ्य मानने से पहले उसकी स्वतंत्र पुष्टि तथा संबंधित पक्ष का जवाब लिया जाना चाहिए।

फिर भी, गंभीर रूप से घायल दो व्यक्तियों के मामले में आर्थिक सहायता, चिकित्सा खर्च और कानूनी जिम्मेदारी को लेकर स्पष्टता होना जरूरी है। किसी भी पक्ष की आर्थिक हैसियत या राजनीतिक-सामाजिक प्रभाव कानून से ऊपर नहीं हो सकता।

दुर्घटनाग्रस्त कार कहां है? वाहन को लेकर उठे गंभीर सवाल

इस प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण सवाल दुर्घटना में शामिल चारपहिया वाहन की वर्तमान स्थिति को लेकर सामने आया है।

आरोप है कि दुर्घटना में क्षतिग्रस्त मोटरसाइकिल खल्लारी थाने में रखी गई है, जबकि हादसे में शामिल बताई जा रही मारुति सुजुकी एस-क्रॉस कार को आरोपी के गृह ग्राम बोइरगांव में तुला राम देवांगन के घर पर रखा गया है।

यदि कार वास्तव में पुलिस की विधिवत जब्ती और जांच प्रक्रिया से बाहर किसी निजी स्थान पर रखी गई है, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि ऐसा किस परिस्थिति में हुआ और क्या वाहन को सुरक्षित रखने के लिए पुलिस ने कोई निर्देश जारी किया था।

दुर्घटना में शामिल वाहनों की जांच महत्वपूर्ण साक्ष्य जुटाने का हिस्सा है। वाहन की क्षति, टक्कर के निशान, तकनीकी परीक्षण और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर दुर्घटना की परिस्थितियों का पता लगाया जा सकता है।

इसलिए पुलिस को वाहन की स्थिति, जब्ती की कार्रवाई और तकनीकी परीक्षण के संबंध में स्पष्ट जानकारी सामने लानी चाहिए।

नंबर प्लेट तोड़कर गायब करने का आरोप, जांच से खुलेगा सच

मामले में यह आरोप भी सामने आया है कि दुर्घटना के बाद कार की नंबर प्लेट को तोड़कर गायब कर दिया गया। इस संबंध में भीमखोज निवासी वरुण पप्पू सिन्हा का नाम लिया जा रहा है।
हालांकि, इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि और पुलिस रिकॉर्ड से सत्यापन आवश्यक है। फिलहाल इसे प्रमाणित तथ्य के बजाय जांच का विषय माना जाना चाहिए।
यदि दुर्घटना के बाद वाहन की नंबर प्लेट हटाई गई या साक्ष्यों के साथ जानबूझकर छेड़छाड़ की गई, तो पुलिस को इसकी गंभीरता से जांच करनी चाहिए। घटनास्थल की तस्वीरें, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, वाहन की पहचान, उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज और अन्य तकनीकी साक्ष्य इस मामले में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

पुलिस को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि वाहन की पहचान किस आधार पर की गई, उसकी वर्तमान स्थिति क्या है और क्या संबंधित व्यक्तियों से पूछताछ की गई है।

थाना प्रभारी नहीं मिले, पुलिस की कार्रवाई पर उठे सवाल

मामले की जानकारी लेने के लिए मीडिया टीम के खल्लारी थाना पहुंचने पर थाना प्रभारी के उपलब्ध नहीं होने की बात भी सामने आई है।

हालांकि, किसी अधिकारी का किसी समय कार्यालय में मौजूद नहीं होना अपने आप में लापरवाही का प्रमाण नहीं है। लेकिन गंभीर दुर्घटना और साक्ष्यों से छेड़छाड़ के आरोपों के बीच पुलिस की कार्रवाई के बारे में स्पष्ट जानकारी मिलना आवश्यक है।

पीड़ित परिवार और आम जनता यह जानना चाहती है कि दुर्घटना के संबंध में क्या रिपोर्ट दर्ज हुई है, वाहन की जांच की गई है या नहीं, आरोपी चालक के विरुद्ध क्या कार्रवाई हुई है और कथित नंबर प्लेट प्रकरण की जांच किस स्तर पर है।

इन सवालों का जवाब पुलिस के आधिकारिक बयान और दस्तावेजों से ही सामने आना चाहिए।

पुलिस अधीक्षक से निष्पक्ष जांच की मांग

इस पूरे प्रकरण में महासमुंद पुलिस अधीक्षक से निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने की मांग उठती है। मामले की गंभीरता को देखते हुए निम्न बिंदुओं पर स्पष्टता आवश्यक है:
दुर्घटना के संबंध में दर्ज रिपोर्ट, लागू कानूनी धाराओं और अब तक की कार्रवाई की जानकारी सार्वजनिक की जाए।

दुर्घटना में शामिल कार और मोटरसाइकिल की स्थिति स्पष्ट कर आवश्यक तकनीकी जांच कराई जाए।

नंबर प्लेट तोड़ने या साक्ष्यों से छेड़छाड़ के आरोपों की निष्पक्ष जांच की जाए।

प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज और अन्य साक्ष्यों का परीक्षण किया जाए।

पीड़ित परिवार को चिकित्सा दस्तावेजों, बीमा दावे और वैधानिक मुआवजे की प्रक्रिया में नियमानुसार सहायता उपलब्ध कराई जाए।
इन बिंदुओं की जांच से न केवल दुर्घटना की वास्तविक परिस्थितियां स्पष्ट हो सकती हैं, बल्कि किसी भी प्रकार के संदेह को दूर करने में भी मदद मिलेगी।

बड़ा सवाल: क्या पीड़ित परिवार को मिलेगा न्याय..?

दो सगे भाई अस्पताल में गंभीर चोटों से जूझ रहे हैं। एक की हालत नाजुक बताई जा रही है, जबकि दूसरा कई फ्रैक्चर के कारण उपचाराधीन है। उनके घरों में छोटी बच्चियां और एक दो महीने की मासूम बच्ची अपने पिता और परिवार के भविष्य से जुड़ी अनिश्चितता के बीच हैं।

ऐसी स्थिति में सबसे जरूरी है कि जांच तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर हो, न कि किसी के सामाजिक प्रभाव या पारिवारिक संबंधों के आधार पर।

क्या दुर्घटना में शामिल वाहन की स्थिति स्पष्ट की जाएगी? क्या नंबर प्लेट गायब होने के आरोप की जांच होगी? क्या पुलिस अब तक की कार्रवाई का विवरण सामने लाएगी? और क्या पीड़ित परिवार को न्यायिक प्रक्रिया में समय पर सहायता मिलेगी..?

इन सवालों के जवाब संबंधित पुलिस अधिकारियों की आधिकारिक प्रतिक्रिया और जांच के निष्कर्षों से ही मिल सकेंगे।

बेबाक बयान न्यूज इस मामले में सभी संबंधित पक्षों का पक्ष सामने आने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित करेगा। उद्देश्य किसी को दोषी घोषित करना नहीं, बल्कि गंभीर दुर्घटना से जुड़े सवालों की निष्पक्ष जांच, पारदर्शिता और पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने की आवश्यकता को सामने लाना है।

​​”महासमुंद कृषि विभाग के उप संचालक फागुराम कश्यप का जलवा बरकरार, ‘कलेक्टर जैसा रौब’ और रसूख के साथ डटे हुये है …!!

​​”महासमुंद कृषि विभाग के उप संचालक फागुराम कश्यप का जलवा बरकरार, ‘कलेक्टर जैसा रौब’ और रसूख के साथ डटे हुये है …!!

नोटिस और स्पष्टीकरण की लंबी सूची फिर भी कोई कार्यवाही नहीं, सिस्टम पर बड़ा सवाल..?

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता/ 12 अक्टूबर 2026/ दिन सोमवार
​महासमुंद / ​छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में कृषि विभाग और जलग्रहण क्षेत्र प्रबंधन (WDC-PMKSY 2.0) भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अराजकता का अड्डा बनता नजर आ रहा है। पूरे मामले की सुई अब जिले के उप संचालक कृषि (DDA) फागुराम कश्यप की कार्यप्रणाली और उनकी संदिग्ध भूमिका की ओर घूम गई है।

​सरायपाली विधानसभा की महिला विधायक श्रीमती चातुरी नंद द्वारा विधानसभा में मुद्दा उठाए जाने, राज्य स्तर से कारण-बताओ नोटिस जारी होने और विभाग में वित्तीय घोटालों की भरमार के बावजूद फागुराम कश्यप पर कार्रवाई न होना, इस आशंका को मजबूत करता है कि कश्यप के नेतृत्व में जिले में भ्रष्टाचार को खुला बढ़ावा दिया जा रहा है।

​1. फागुराम कश्यप को किसका संरक्षण? विधायक श्रीमती चातुरी नंद के बयानों से हड़कंप

​सरायपाली विधायक श्रीमती चातुरी नंद ने विभागीय गलियारों में मचे घमासान के बीच बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं। विधायक का स्पष्ट कहना है कि उप संचालक कृषि फागुराम कश्यप को शासकीय नोटिस जारी होने और उनके कार्यकाल के दौरान लगातार गंभीर धांधली उजागर होने के बाद भी विभागीय स्तर पर कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई।

​प्रशासनिक संरक्षण का आरोप: विधायक के अनुसार, फागुराम कश्यप को उच्च स्तर पर “प्रशासनिक संरक्षण” प्राप्त है, जिसके दम पर वे विभागीय नियमों और वित्तीय पारदर्शिता को दरकिनार कर खुलेआम काम कर रहे हैं।

​सदन से सड़क तक गूंज: विधानसभा में मामला उठने के बावजूद कश्यप की कुर्सी का सुरक्षित रहना यह दर्शाता है कि कृषि विभाग में उच्चाधिकारियों की मिलीभगत किस कदर गहरी है।

​2. WDC-PMKSY 2.0 में करोड़ों/लाखों का गबन: उप संचालक की निगरानी पर सवाल

​छ.ग. राज्य जलग्रहण क्षेत्र प्रबंधन एजेंसी (SLNA) द्वारा महासमुंद के उप संचालक कृषि सह परियोजना प्रबंधक (WCDC) को जारी ‘कारण-बताओ नोटिस’ से यह साफ हो गया है कि फागुराम कश्यप के प्रशासनिक नियंत्रण में योजनाओं में भारी वित्तीय अनियमितता हुई है।

​निजी खातों में सरकारी पैसा: कश्यप के अधीन कार्यरत WDT कर्मचारियों द्वारा मजदूरी भुगतान की राशि को सीधे अपने निजी बैंक खातों में ट्रांसफर किया गया।

​₹18.95 लाख का अवैध आहरण: शासकीय वित्त निर्देशों का उल्लंघन करते हुए ₹18,95,849/- जैसी बड़ी राशि का ई-पेमेंट के बिना गबन किया गया।

​वेंडरों पर मेहरबानी व फर्जीवाड़ा: नियमों के खिलाफ जाकर ₹10 लाख का एडवांस भुगतान किया गया, बिना जियो-टैगिंग के काम दिखाए गए, और बिना सत्यापन के एक ही वेंडर को बार-बार भुगतान कर सरकारी खजाने को चूना लगाया गया।

​इन तमाम वित्तीय अनियमितताओं के दौरान परियोजना प्रमुख के रूप में फागुराम कश्यप की मौन स्वीकृति और जांच न कराना उनके सीधे संरक्षण की ओर इशारा करता है।

​3. जैविक खेती और DMF में ‘कश्यप का दोहरा खेल’: पात्र किसान ठगे गए

​बागबाहरा विकासखंड सहित पूरे जिले में कृषि योजनाओं के वितरण में बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा सामने आया है।

​एक ही किसान को दोहरा लाभ: वर्ष 2024-25 में ‘जैविक खेती मिशन’ के तहत दिए गए बैटरी स्प्रेयर की सूची में शामिल किसानों को ही वर्ष 2025-26 में ‘DMF मद’ से दोबारा मशीनें बांट दी गईं।

​दस्तावेजी साक्ष्य: जैविक खेती योजना की सूची के स्पष्ट कॉलम से यह प्रमाणित होता है कि उप संचालक कार्यालय की नाक के नीचे किस प्रकार अपात्रों पर सरकारी खजाना लुटाया गया और वास्तविक जरूरतमंद किसानों को वंचित रखा गया।

​PMKKKY नियमों का उल्लंघन: खनन प्रभावित क्षेत्रों के लिए सुरक्षित DMF बजट का कश्यप के कार्यकाल में अनधिकृत रूप से गैर-प्रभावित क्षेत्रों में बंदरबांट किया गया।

​4. कमार जनजातीय किसान की मौत: क्या कश्यप की शह पर हुई लीपापोती..?

​बागबाहरा के ग्राम बैहाडीह के विशेष संरक्षित कमार जनजाति के किसान की कृषि विभाग के ओडिशा (कालाहांडी) अध्ययन भ्रमण के दौरान हुई संदिग्ध मौत ने इस मामले को और अधिक संवेदनशील बना दिया है।

​अधिकारियों को बचाने का खेल: आरोप है कि उप संचालक फागुराम कश्यप के संरक्षण में कार्यरत बागबाहरा के प्रभारी senior अधिकारी श्री गंगा प्रसाद शरणागत ने इस पूरी घटना को दबाने और वरिष्ठ अधिकारियों व मीडिया से छिपाने का प्रयास किया।

​बिना पारदर्शी जांच के शव रवाना: जनजातीय किसान की मृत्यु किन परिस्थितियों में हुई, इसका खुलासा किए बिना मामले में लीपापोती की गई और अब तक किसी अधिकारी पर FIR दर्ज नहीं कराई गई है।

​जनहित में उठीं मुख्य मांगें

1 ​उप संचालक फागुराम कश्यप का तत्काल निलंबन: प्रशासनिक संरक्षण के आरोपों और वित्तीय घोटालों की निष्पक्ष जांच हेतु फागुराम कश्यप को तुरंत पद से हटाया जाए।

2 ​घोटाले की उच्चस्तरीय / EOW जांच: WDC-PMKSY 2.0 और DMF मद में हुए लाखों रुपये के गबन की निष्पक्ष एजेंसी से जांच कराकर कश्यप व संबंधित कर्मियों से राशि की वसूली की जाए।

3 ​कमार किसान की मौत पर FIR: अध्ययन भ्रमण के दौरान हुई मौत के जिम्मेदार विभागीय अधिकारियों पर गैर-इरादतन हत्या व लापरवाही की FIR दर्ज कराई जाए।

4 ​दोहरे वितरण की जांच: जैविक खेती और DMF योजना की सूचियों के मिलान के आधार पर फर्जीवाड़ा करने वाले अधिकारियों की सेवा समाप्त की जाए।

​संपादकीय दृष्टिकोण: महासमुंद कृषि विभाग में सामने आ रहे एक के बाद एक घोटालों से यह साफ है कि उप संचालक फागुराम कश्यप के कार्यकाल में भ्रष्टाचार ने संस्थागत रूप ले लिया है। अब देखना यह होगावी कि राज्य शासन और जिला प्रशासन महिला विधायक के आरोपों व आधिकारिक नोटिसों पर संज्ञान लेकर क्या कड़ा एक्शन उठाता है।

साहब, जवाब दो.! महासमुंद में 39 लाख के ‘कोरोना खेल’ का असली खिलाड़ी कौन है..?

साहब, जवाब दो.! महासमुंद में 39 लाख के ‘कोरोना खेल’ का असली खिलाड़ी कौन है..?

नोटिस के बाद भी समृद्धि शर्मा -दिलीप मनहरे पर एक्शन क्यों नहीं लिया गया ..?

39 लाख रुपये की सैनिटाइजर, मास्क और स्वच्छता सामग्री खरीदी की जांच का क्या हुआ? 26 जून 2024 को कारण बताओ नोटिस जारी होने की बात, लेकिन अंतिम कार्रवाई का विवरण अब भी सवालों के घेरे में

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता
12 अक्टूबर 2026 | सोमवार
महासमुंद, छत्तीसगढ़।
महासमुंद जिले की जनपद पंचायत में कोरोना काल के दौरान हुई कथित खरीदी और 39 लाख रुपये के भुगतान का पुराना प्रकरण एक बार फिर प्रशासनिक जवाबदेही के केंद्र में है। सरकारी धन से सैनिटाइजर, मास्क और स्वच्छता सामग्री की खरीदी के नाम पर किए गए भुगतान को लेकर उठे सवालों का स्पष्ट और दस्तावेजी जवाब अब भी सामने आना जरूरी है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि इस मामले में कारण बताओ नोटिस जारी किए गए थे, तो उसके बाद जांच कहां तक पहुंची और अंतिम कार्रवाई का निर्णय क्या हुआ..?

यह मामला केवल पुराने बिल-वाउचर का नहीं, बल्कि सरकारी खरीद प्रक्रिया, भुगतान की पारदर्शिता और जिम्मेदार अधिकारियों-कर्मचारियों की जवाबदेही से जुड़ा है। कोरोना जैसी आपातकालीन परिस्थिति में खरीदी की आवश्यकता अपनी जगह थी, लेकिन सार्वजनिक धन के उपयोग में नियमों का पालन और खर्च का सत्यापन भी उतना ही अनिवार्य था।

39 लाख रुपये का प्रकरण: समृद्धि शर्मा और दिलीप मनहरे पर उठे सवाल

उपलब्ध प्रकरण-विवरण के अनुसार, वर्ष 2019-20 में कोरोना काल के दौरान सैनिटाइजर, मास्क और स्वच्छता सामग्री की खरीदी के नाम पर लगभग 39 लाख रुपये के भुगतान का मामला सामने आया था। इस खरीदी की प्रक्रिया, सामान्य सभा के प्रस्ताव, वेंडर चयन, बिल-वाउचर और वित्तीय नियमों के पालन को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं।

इस मामले में तत्कालीन जनपद पंचायत के संकाय शाखा में पदस्थ समृद्धि शर्मा और लिपिक दिलीप मनहरे को जिला पंचायत महासमुंद की ओर से 26 जून 2024 को कारण बताओ नोटिस जारी किए जाने की बात सामने आई थी। बताया गया था कि संबंधित व्यक्तियों से तीन दिनों के भीतर जवाब मांगा गया था और संतोषजनक जवाब नहीं मिलने की स्थिति में नियमानुसार अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी गई थी।

हालांकि, नोटिस जारी होने की बात अपने आप में किसी व्यक्ति को दोषी साबित नहीं करती। संबंधित नोटिस, जवाब, जांच प्रतिवेदन और अंतिम आदेश की प्रमाणित प्रतियां सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि किसकी क्या भूमिका थी और प्रशासन ने क्या निष्कर्ष निकाला।

अब मुख्य सवाल यही है—समृद्धि शर्मा और दिलीप मनहरे से मांगे गए जवाबों पर प्रशासन ने क्या निर्णय लिया? क्या जांच पूरी हो चुकी है, या मामला अब भी लंबित है..?

जांच के केंद्र में पांच अहम सवाल

इस 39 लाख रुपये के प्रकरण में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए निम्न बिंदुओं पर स्पष्ट जानकारी सामने आनी चाहिए—

खरीदी की वैधानिकता: क्या संबंधित खरीदी के लिए सामान्य सभा या सक्षम प्राधिकारी की विधिवत स्वीकृति ली गई थी? क्या खरीदी प्रक्रिया निर्धारित वित्तीय नियमों के अनुरूप थी..?

बिल और भुगतान का सत्यापन: क्या भुगतान से संबंधित बिल, वाउचर, बैंक रिकॉर्ड और वेंडर के दस्तावेजों की जांच की गई..?

सामग्री की वास्तविक आपूर्ति: क्या सैनिटाइजर, मास्क और स्वच्छता सामग्री की मात्रा, गुणवत्ता तथा वास्तविक आपूर्ति का भौतिक सत्यापन किया गया?

कारण बताओ नोटिस पर निर्णय: 26 जून 2024 को जारी बताए जा रहे नोटिस के जवाब में संबंधित पक्षों ने क्या स्पष्टीकरण दिया? उस पर जांच अधिकारी या सक्षम प्राधिकारी ने क्या निष्कर्ष निकाला..?

जिम्मेदारी और अंतिम आदेश: क्या किसी अधिकारी, कर्मचारी या अन्य संबंधित व्यक्ति की भूमिका निर्धारित की गई? यदि अनियमितता प्रमाणित हुई, तो क्या कार्रवाई की गई? और यदि आरोप प्रमाणित नहीं हुए, तो क्या प्रकरण को अंतिम रूप से बंद करने का आदेश जारी हुआ..?

नोटिस के बाद दो साल से अधिक का सवाल: फाइल आगे बढ़ी या जवाबदेही अटकी..?

26 जून 2024 को नोटिस जारी किए जाने का विवरण यदि आधिकारिक अभिलेखों से पुष्ट होता है, तो 12 अक्टूबर 2026 तक इस मामले की वर्तमान स्थिति जानना सार्वजनिक हित का महत्वपूर्ण विषय है।

प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि नोटिस के बाद जवाब प्राप्त हुए या नहीं, जांच किस अधिकारी को सौंपी गई, जांच प्रतिवेदन कब तैयार हुआ और अंतिम निर्णय किस स्तर पर लंबित है।

यदि जांच पूरी हो चुकी है, तो निष्कर्ष और कार्रवाई का विवरण सार्वजनिक किया जाना चाहिए। यदि जांच लंबित है, तो देरी का कारण और उसे पूरा करने की समयसीमा बताई जानी चाहिए। केवल नोटिस जारी कर देना जवाबदेही का अंतिम चरण नहीं है; मामले का निष्पक्ष परीक्षण और नियमानुसार निर्णय भी जरूरी है।

क्या वेंडर और भुगतान से जुड़े दस्तावेजों की स्वतंत्र जांच हुई..?

इस प्रकरण में भुगतान प्राप्त करने वाले वेंडर की पहचान, बिलों की वैधता, बैंक लेन-देन और सामग्री की आपूर्ति से जुड़े अभिलेख महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इन दस्तावेजों की जांच से ही यह पता चल सकेगा कि सरकारी राशि का उपयोग वास्तविक खरीदी के लिए हुआ या कहीं प्रक्रिया संबंधी अनियमितता हुई।

यदि अभिलेखों में विसंगतियां पाई गई हैं, तो उनकी जिम्मेदारी साक्ष्यों के आधार पर तय की जानी चाहिए। वहीं, यदि सभी भुगतान और आपूर्तियां नियमसम्मत पाई गई हैं, तो संबंधित पक्षों को भी स्पष्ट निष्कर्ष के माध्यम से स्थिति बताई जानी चाहिए।

जांच का उद्देश्य किसी को पहले से दोषी ठहराना नहीं, बल्कि तथ्यों के आधार पर जिम्मेदारी तय करना और सरकारी धन के उपयोग का हिसाब जनता के सामने लाना है।

महासमुंद प्रशासन से सीधे सवाल

जिला पंचायत महासमुंद और संबंधित सक्षम अधिकारियों को इस प्रकरण पर निम्न बिंदुओं पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए—

39 लाख रुपये की कोरोना कालीन खरीदी की जांच वर्तमान में किस स्तर पर है..?

समृद्धि शर्मा और दिलीप मनहरे को जारी किए जाने की बात सामने आए कारण बताओ नोटिस पर क्या अंतिम निर्णय लिया गया..?

क्या संबंधित वेंडर के बिल, भुगतान रिकॉर्ड और सामग्री आपूर्ति का सत्यापन पूरा हो चुका है..?

क्या जांच में किसी प्रकार की वित्तीय या प्रक्रियागत अनियमितता प्रमाणित हुई..?

यदि कार्रवाई की गई है, तो आदेश की तारीख और कार्रवाई का विवरण क्या है..?

यदि नहीं, तो प्रकरण लंबित रहने का कारण क्या है..?

बेबाक बयान न्यूज की पड़ताल जारी

जनता के पैसे का हिसाब जनता तक पहुंचना चाहिए। 39 लाख रुपये के इस पुराने प्रकरण में न तो केवल नोटिस जारी होने को दोष सिद्ध होने का प्रमाण माना जा सकता है और न ही अंतिम कार्रवाई की जानकारी के अभाव को अपने आप क्लीन चिट समझा जा सकता है।

जरूरत है निष्पक्ष जांच, दस्तावेजी पारदर्शिता और समयबद्ध निर्णय की। यदि किसी की भूमिका प्रमाणित होती है, तो नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए; यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते, तो संबंधित पक्षों को भी स्पष्ट निष्कर्ष के साथ राहत मिलनी चाहिए।

अब महासमुंद प्रशासन को बताना चाहिए—39 लाख रुपये के कोरोना खरीदी प्रकरण में जांच कहां तक पहुंची, जवाबदेही किसकी तय हुई और अंतिम आदेश कब जारी होगा..?

बेबाक बयान न्यूज इस मामले में आधिकारिक अभिलेखों, जांच की स्थिति और संबंधित पक्षों के जवाब के आधार पर पड़ताल जारी रखेगा।