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महासमुंद के किसानों का ऐलान: धान का MSP 3358 रुपये प्रति क्विंटल करो, पुरानी बकाया राशि तुरंत दो वरना आंदोलन तय – मानिक साहू

महासमुंद के किसानों का ऐलान: धान का MSP 3358 रुपये प्रति क्विंटल करो, पुरानी बकाया राशि तुरंत दो वरना आंदोलन तय – मानिक साहू

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता / 10 अक्टूबर 2026 / दिन शनिवार
महासमुंद। खेती की लागत आसमान छू रही है, लेकिन फसल का सही दाम नहीं मिल रहा। इस दोहरी मार से परेशान महासमुंद के किसानों ने अब चुप रहने से इनकार कर दिया है। महासमुंद किसान कांग्रेस के जिलाध्यक्ष मानिक साहू के नेतृत्व में किसानों ने प्रदेश के मुख्यमंत्री के नाम एक जोरदार ज्ञापन सौंपकर साफ चेतावनी दी है कि अगर उनकी जायज मांगें नहीं मानी गईं तो व्यापक आंदोलन तय है।

क्या हैं किसान की मुख्य मांगें..?

किसानों ने सबसे पहले धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) बढ़ाकर 3358 रुपये प्रति क्विंटल करने की मांग रखी है। उनका कहना है कि खाद, बीज, दवा, डीजल और मजदूरी की बढ़ती कीमतों ने खेती को घाटे का सौदा बना दिया है। ऐसे में पुराना MSP किसानों को राहत नहीं दे पा रहा।

इसके अलावा ज्ञापन में ये महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए गए हैं:

पुरानी बकाया अंतर राशि का तुरंत भुगतान: वित्तीय वर्ष 2024-25 की 117 रुपये प्रति क्विंटल और 2025-26 की 186 रुपये प्रति क्विंटल की अंतर राशि तुरंत किसानों के खाते में भेजी जाए।

राजीव गांधी किसान न्याय योजना की लंबित चौथी किस्त का अविलंब भुगतान किया जाए।

2026-27 में केंद्र सरकार द्वारा MSP में की जाने वाली किसी भी वृद्धि का पूरा लाभ सीधे किसानों तक पहुंचे।

पूरे देश और प्रदेश में समर्थन मूल्य गारंटी कानून लागू किया जाए, ताकि MSP कानूनी रूप से बाध्यकारी बने और किसानों का शोषण बंद हो।

15 नवंबर की बाध्यता पर भी सवाल

ज्ञापन में धान खरीदी की समय-सीमा को लेकर भी गंभीर आपत्ति जताई गई है। महासमुंद जिले के बागबाहरा समेत कई मैदानी इलाकों में अक्टूबर के अंत तक धान की कटाई पूरी हो जाती है। ऐसे में 15 नवंबर तक इंतजार करना किसानों के लिए बहुत जोखिम भरा है।

किसानों का कहना है कि बेमौसम बारिश, नमी और भंडारण की कमी के कारण खेत या घर में पड़ी फसल खराब होने का खतरा हमेशा बना रहता है। इसलिए खरीदी की शुरुआत स्थानीय फसल कटाई के समय के हिसाब से ही होनी चाहिए, न कि एक तय तारीख के इंतजार में।

चेतावनी साफ है

जिलाध्यक्ष मानिक साहू ने साफ कहा कि किसानों की ये मांगें न तो कोई राजनीतिक नारा हैं और न ही अव्यावहारिक। ये जमीनी हकीकत पर आधारित हैं। अगर शासन ने इन पर सहानुभूतिपूर्वक और जल्द फैसला नहीं लिया, तो किसान वर्ग को आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ेगा।

महासमुंद के किसान अब इंतजार नहीं करना चाहते। वे चाहते हैं कि लागत के हिसाब से सही दाम मिले, पुरानी बकाया राशि समय पर पहुंचे और MSP को कानूनी सुरक्षा मिले। अब गेंद सरकार के पाले में है।

महासमुंद में मानवता की मिसाल बाइक की टक्कर से तड़प रहे बेजुबान के लिए देवदूत बने विहिप-बजरंग दल के कार्यकर्ता, वन विभाग और डॉक्टरों ने मिलकर बचाई जान

महासमुंद में मानवता की मिसाल बाइक की टक्कर से तड़प रहे बेजुबान के लिए देवदूत बने विहिप-बजरंग दल के कार्यकर्ता, वन विभाग और डॉक्टरों ने मिलकर बचाई जान

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता/ 09 अक्टूबर 2026 / दिन शुक्रवार
​महासमुंद। कलेक्टर कार्यालय के समीप एक भीषण हादसे में गंभीर रूप से घायल बेजुबान की जान बचाकर बजरंग दल के कार्यकर्ताओं, वन विभाग और पशु चिकित्सा विभाग की टीम ने तत्परता और जीवदया का अनुपम उदाहरण पेश किया है।

​दर्दनाक हादसे के बाद आक्रामक हो गया था बंदरों का झुंड

प्राप्त जानकारी के अनुसार, शुक्रवार को जिला कलेक्टर कार्यालय के आसपास के मार्ग पर सड़क पार कर रहा एक बंदर तेज रफ्तार मोटरसाइकिल की चपेट में आ गया। दुर्घटना इतनी भीषण थी कि बंदर सड़क पर लहूलुहान होकर तड़पने लगा। इस बीच, घायल साथी की चीख-पुकार सुनकर दर्जनों बंदरों का झुंड वहां इकट्ठा हो गया और आक्रामक रुख अपनाते हुए घायल बंदर को घेरकर बैठ गया। इसके कारण राहगीरों का वहां पहुंचना और रेस्क्यू करना बेहद खतरनाक हो चुका था।

​जेसीबी की मदद से हटी भीड़, बोरी में रेस्क्यू कर पहुंचाया फॉरेस्ट ऑफिस

घटना की भनक लगते ही विश्व हिंदू परिषद बजरंग दल के नगर संयोजक कान्हा प्रधान बिना देर किए मौके पर पहुंचे। स्थिति की संवेदनशीलता को देखते हुए उन्होंने तुरंत जिला गौ रक्षा प्रमुख सुमन सेंद्रे को सूचित किया। इसी दौरान उस मार्ग से गुजर रही नगर पालिका की जेसीबी मशीन को रुकवाया गया। जेसीबी की मदद से बंदरों के झुंड को सूझबूझ के साथ सुरक्षित दूर हटाया गया। इसके बाद कार्यकर्ताओं ने तत्परता दिखाते हुए घायल बंदर को बोरी में सुरक्षित रखकर सीधे वन विभाग कार्यालय पहुंचाया।

​चिकित्सकीय टीम का त्वरित एक्शन, शुरू हुआ इलाज

बंदर को फॉरेस्ट ऑफिस पहुंचाते ही सुमन सेंद्रे ने उपसंचालक पशु चिकित्सा केंद्र महासमुंद के वरिष्ठ पशु चिकित्सक डॉ. प्रमोद कोसरिया को फोन कर स्थिति से अवगत कराया। सूचना मिलते ही डॉ. कोसरिया तुरंत मेडिकल किट के साथ फॉरेस्ट ऑफिस पहुंचे और घायल बंदर का प्राथमिक उपचार व घावों की ड्रेसिंग की।

​इनकी रही सराहनीय उपस्थिति

रेस्क्यू और इलाज की इस पूरी प्रक्रिया में वन विभाग से कौशलेंद्र आदिल एवं अन्य कर्मचारी मुस्तैद रहे। वहीं विश्व हिंदू परिषद बजरंग दल की ओर से जिला गौ रक्षा प्रमुख सुमन सेंद्रे, नगर संयोजक कान्हा प्रधान, अखिलेश साहू समेत बड़ी संख्या में कार्यकर्ता मौजूद रहे। प्रशासनिक अधिकारियों और स्थानीय नागरिकों ने युवाओं की इस त्वरित पहल और जीवदया की खुले दिल से प्रशंसा की है।

महासमुंद पुलिस तबादला आदेश पर सवाल एसपी के तबादला आदेश पर बड़ा सवाल..!

महासमुंद पुलिस तबादला आदेश पर सवाल
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आदेश में बसना ट्रांसफर, फिर भी महासमुंद सिटी कोतवाली में जमे प्रधान आरक्षक हरिश कुमार कंवर
महीनों बाद भी नहीं हुई रवानगी..? दूसरे जवानों ने माना आदेश, एक कर्मचारी को क्यों मिली अलग छूट—पुलिस प्रशासन से जवाब की मांग

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता/ 09 अक्टूबर 2026 / दिन शुक्रवार
महासमुंद (छत्तीसगढ़)।
महासमुंद जिला पुलिस प्रशासन में जारी स्थानांतरण आदेश के पालन को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। पुलिस अधीक्षक कार्यालय से जारी स्थानांतरण आदेश क्रमांक पुअ/महा/स्था/एम-2315/26, दिनांक 20 मार्च 2026 में थाना महासमुंद में पदस्थ प्रधान आरक्षक हरिश कुमार कंवर, बैज नंबर 871 का स्थानांतरण थाना बसना किया गया था। दस्तावेज में स्थानांतरित कर्मचारियों को नवीन पदस्थापना स्थल के लिए रवानगी देने तथा आमद की सूचना कार्यालय को भेजने संबंधी निर्देश भी दर्ज बताए जा रहे हैं।

लेकिन उपलब्ध जानकारी और लगाए गए आरोपों के मुताबिक, आदेश जारी होने के कई माह बाद भी हरिश कुमार कंवर महासमुंद सिटी कोतवाली में ही कार्यरत बताए जा रहे हैं। यदि यह स्थिति सही है, तो मामला केवल एक कर्मचारी के स्थानांतरण का नहीं, बल्कि वरिष्ठ अधिकारी के लिखित आदेश के अनुपालन और पुलिस विभाग की प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ जाता है।
स्थानांतरण सूची में क्रमांक 07 पर दर्ज है नाम
पुलिस अधीक्षक कार्यालय की बताई जा रही स्थानांतरण सूची में सरल क्रमांक 07 पर प्रधान आरक्षक हरिश कुमार कंवर का नाम दर्ज है। आदेश के अनुसार उनकी नवीन पदस्थापना थाना बसना की गई थी।

स्थानांतरण आदेशों का उद्देश्य पुलिस बल में प्रशासनिक आवश्यकता, कार्य-वितरण और विभागीय अनुशासन बनाए रखना होता है। ऐसे में यदि किसी कर्मचारी की रवानगी किसी कारण से रोक दी गई हो, तो उसके पीछे सक्षम अधिकारी का स्पष्ट आदेश या विधिवत संशोधन होना अपेक्षित है।

यहीं से सबसे बड़ा सवाल सामने आता है—यदि स्थानांतरण आदेश प्रभावी था, तो उसकी अनुपालना क्यों नहीं हुई..?

क्या रवानगी रोकी गई या आदेश में हुआ कोई संशोधन..?

इस पूरे मामले में पुलिस प्रशासन के सामने कुछ सीधे और महत्वपूर्ण प्रश्न हैं।

क्या प्रधान आरक्षक हरिश कुमार कंवर को स्थानांतरण आदेश के बावजूद महासमुंद में कार्य करने की अनुमति किसी सक्षम अधिकारी ने दी..?

क्या उनकी रवानगी स्थगित करने या स्थानांतरण संशोधित करने का कोई लिखित आदेश जारी हुआ
.?

यदि ऐसा कोई आदेश जारी हुआ है तो उसकी प्रति सार्वजनिक अथवा विभागीय रिकॉर्ड में उपलब्ध क्यों नहीं है..?

और यदि ऐसा कोई आदेश नहीं हुआ, तो फिर स्थानांतरण के महीनों बाद भी संबंधित कर्मचारी पुरानी पदस्थापना पर किस आधार पर कार्य कर रहे हैं..?

इन सवालों का स्पष्ट उत्तर ही पूरे मामले की वास्तविक स्थिति सामने ला सकता है।

बाकी कर्मचारियों ने माना आदेश, फिर इस मामले में स्थिति अलग क्यों..?

स्थानांतरण सूची में शामिल अन्य पुलिसकर्मियों के संबंध में विभागीय स्तर पर नवीन पदस्थापना पर आमद की प्रक्रिया पूरी होने की बात सामने आती रही है। ऐसे में एक ही आदेश में शामिल किसी कर्मचारी के मामले में अलग स्थिति होने पर स्वाभाविक रूप से प्रशासनिक समानता और आदेश पालन को लेकर सवाल उठते हैं।

पुलिस विभाग अनुशासन आधारित व्यवस्था है। निचले स्तर के कर्मचारी यदि स्थानांतरण आदेश का पालन करते हैं, तो वरिष्ठ अधिकारियों के लिखित आदेशों के पालन की अपेक्षा प्रत्येक कर्मचारी से समान रूप से की जाती है।

इसी कारण यह मामला अब विभागीय निगरानी के दायरे में आने की मांग कर रहा है।

ASP से पक्ष जानने का प्रयास, स्पष्ट जवाब का इंतजार

मामले में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक से संबंधित कर्मचारी की वर्तमान पदस्थापना, स्थानांतरण आदेश के पालन तथा रवानगी की स्थिति को लेकर पक्ष जानने का प्रयास किए जाने की बात सामने आई है।

यदि विभाग के पास रवानगी रोकने, स्थानांतरण संशोधित करने अथवा किसी विशेष प्रशासनिक कारण से कर्मचारी को वर्तमान स्थान पर बनाए रखने का वैध आदेश है, तो उसे स्पष्ट किया जाना चाहिए।

वहीं यदि ऐसा कोई आदेश नहीं है, तो पुलिस अधीक्षक कार्यालय द्वारा जारी मूल स्थानांतरण आदेश के अनुपालन की स्थिति की विभागीय जांच होना स्वाभाविक प्रशासनिक प्रक्रिया होगी।

मामले में इन बिंदुओं की जांच जरूरी

इस पूरे प्रकरण में निष्पक्ष जांच के लिए पुलिस प्रशासन निम्न रिकॉर्ड की जांच कर सकता है—

20 मार्च 2026 के स्थानांतरण आदेश की मूल प्रति।

प्रधान आरक्षक हरिश कुमार कंवर की रवानगी संबंधी प्रविष्टि।

थाना बसना में उनकी आमद संबंधी रिकॉर्ड।

सिटी कोतवाली महासमुंद की उपस्थिति एवं ड्यूटी रजिस्टर।

स्थानांतरण रोकने अथवा संशोधित करने संबंधी कोई लिखित आदेश।

रक्षित केंद्र/आरआई स्तर से जारी रवानगी संबंधी दस्तावेज।

संबंधित अधिकारी द्वारा आदेश अनुपालन की रिपोर्ट।

इन दस्तावेजों की जांच से यह स्पष्ट हो सकता है कि मामला प्रशासनिक प्रक्रिया में हुई चूक का है अथवा किसी सक्षम आदेश के कारण संबंधित कर्मचारी की पदस्थापना यथावत रखी गई।

अब एसपी कार्यालय की कार्रवाई पर नजर

इस प्रकरण ने जिला पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं। यदि स्थानांतरण आदेश प्रभावी होने के बावजूद उसकी अनुपालना नहीं हुई है, तो विभागीय स्तर पर इसकी वजह स्पष्ट होना आवश्यक है।

वहीं यदि हरिश कुमार कंवर को महासमुंद में ही बनाए रखने के लिए कोई सक्षम आदेश जारी हुआ है, तो उस आदेश की स्थिति भी स्पष्ट की जानी चाहिए, ताकि अनावश्यक भ्रम की स्थिति समाप्त हो।

मुद्दा किसी एक कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई की मांग भर का नहीं, बल्कि पुलिस विभाग के लिखित प्रशासनिक आदेशों की पारदर्शी अनुपालना का है।

अब देखना होगा कि पुलिस अधीक्षक कार्यालय इस मामले में उपलब्ध रिकॉर्ड की जांच कर स्थिति स्पष्ट करता है या नहीं।

बेबाक बयान का सवाल सीधा है—यदि स्थानांतरण आदेश लागू था, तो रवानगी क्यों नहीं हुई? और यदि रवानगी रोकने का आदेश था, तो वह आदेश किस सक्षम अधिकारी ने जारी किया..?

इन दोनों सवालों का आधिकारिक जवाब ही पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर सामने ला सकता है।

अभिनय जगत का एक सशक्त अध्याय समाप्त महान अभिनेता नाना पाटेकर का 75 वर्ष की आयु में निधन

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अभिनय जगत का एक सशक्त अध्याय समाप्त महान अभिनेता नाना पाटेकर का 75 वर्ष की आयु में निधन

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता/ 08 अक्टूबर 2026 / गुरुवार
रायपुर / ​भारतीय सिनेमा के दिग्गज और अपनी बहुमुखी प्रतिभा व संवाद अदायगी के लिए जाने जाने वाले अभिनेता नाना पाटेकर (विश्वनाथ पाटेकर) का 8 अक्टूबर 2026 को 75 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। गोवा स्थित उनके आवास पर दिल का दौरा (कार्डियक अरेस्ट) पड़ने के कारण उनका देहांत हुआ। उनके निधन की खबर से हिंदी और मराठी सिनेमा जगत के साथ-साथ पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत देश की कई जानी-मानी हस्तियों और फिल्म इंडस्ट्री के सहयोगियों ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है।

​शुरुआती जीवन और संघर्ष: पोस्टर पेंटिंग से रंगमंच तक का सफर

​नाना पाटेकर का जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मुरुड-जंजीरा में एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। बचपन में ही आर्थिक तंगी का सामना करने के कारण उन्हें काफी कम उम्र से काम करना पड़ा।

​प्रारंभिक संघर्ष: अपनी पढ़ाई का खर्च उठाने और परिवार की आर्थिक मदद के लिए वे सिनेमा के पोस्टर पेंट करने और फिल्में देखने आने वालों के लिए चाय बेचने का काम भी करते थे।

​रंगमंच से जुड़ाव: मुंबई के सर जे. जे. इंस्टीट्यूट ऑफ एप्लाइड आर्ट से व्यावसायिक कला (Commercial Art) की पढ़ाई करने के बाद, उन्होंने थिएटर (रंगमंच) की दुनिया में कदम रखा। मराठी नाटकों में उनके सशक्त अभिनय ने उन्हें जल्द ही पहचान दिलाई।

​बॉलीवुड और मराठी सिनेमा में सिनेमाई सफर

​नाना पाटेकर ने 1978 में फिल्म ‘गमन’ से अपने अभिनय करियर की शुरुआत की थी। हालांकि, 1980 के दशक के अंत में उन्हें बड़ी सफलता मिली।

​सफलता का दौर: 1989 में आई विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म ‘परिंदा’ में उनके द्वारा निभाए गए “अन्ना” के खलनायक किरदार ने उन्हें रातों-रात स्टार बना दिया।

​क्रांतिवीर और प्रतिष्ठित संवाद: 1994 में आई फिल्म ‘क्रांतिवीर’ उनके करियर का मील का पत्थर साबित हुई। इस फिल्म में उनकी तीखी और जोशीली संवाद अदायगी (Dialogue Delivery) ने उन्हें भारतीय सिनेमा के सबसे प्रभावशाली अभिनेताओं में शुमार कर दिया।

​निर्देशन और अन्य भूमिकाएँ: उन्होंने 1991 में ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ फिल्म का निर्देशन भी किया, जिसके लिए उन्होंने भारतीय सेना के साथ दो साल का विशेष प्रशिक्षण लिया था।

​विभिन्न विधाओं में अभिनय: केवल गंभीर और उग्र भूमिकाएँ ही नहीं, बल्कि ‘वेलकम’ (उदय शेट्टी) और ‘ब्लफ़मास्टर’ जैसी फिल्मों में उनकी कॉमिक टाइमिंग ने भी दर्शकों का दिल जीता। मराठी सिनेमा में उनकी फिल्म ‘नटसम्राट’ (2016) और ‘डॉ. प्रकाश बाबा आमटे’ को सर्वकालिक उत्कृष्ट अभिनय माना जाता है।

​प्रमुख पुरस्कार और उपलब्धियाँ

​अपने लगभग पांच दशक लंबे करियर में नाना पाटेकर को कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया:

प्रमुख पुरस्कार और उपलब्धियाँ

​अपने लगभग पांच दशक लंबे करियर में नाना पाटेकर को कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया:

पुरस्कारवर्ष/फिल्म
पद्म श्री2013 (कला के क्षेत्र में योगदान के लिए)

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ अभिनेता)क्रांतिवीर (1994)

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार

(सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता)परिंदा (1989) और अग्निसाक्षी (1996)

फिल्मफेयर पुरस्कार विभिन्न श्रेणियों में कई बार सम्मानित

सामाजिक कार्य: नाम फाउंडेशन (Naam Foundation)

​नाना पाटेकर न केवल एक महान कलाकार थे, बल्कि एक संवेदनशील समाजसेवक भी थे।

​किसानों के लिए पहल: महाराष्ट्र में पड़े भीषण सूखे के दौरान जब किसान आत्महत्या कर रहे थे, तब नाना पाटेकर ने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर 2015 में ‘नाम फाउंडेशन’ की स्थापना की।

​जल संरक्षण और पुनर्वास: इस संस्था के जरिए उन्होंने हजारों पीड़ित किसान परिवारों को आर्थिक सहायता दी, नदियां और तालाब खुदवाए, और गांवों में जल संरक्षण के लिए अभूतपूर्व कार्य किए। उनकी इस सामाजिक पहल के लिए देशवासी उनका बहुत सम्मान करते हैं।

​एक युग का अंत

​नाना पाटेकर की गिनती उन गिने-चुने अभिनेताओं में होती थी, जिन्होंने बिना किसी पारंपरिक हीरो वाली छवि के, अपने निडर अंदाज, अद्वितीय संवाद अदायगी और दमदार अभिनय के बल पर सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाई। उनका जाना भारतीय कला और सामाजिक क्षेत्र के लिए एक अपूरणीय क्षति है।

अभिनय जगत का एक सशक्त अध्याय समाप्त महान अभिनेता नाना पाटेकर का 75 वर्ष की आयु में निधन

अभिनय जगत का एक सशक्त अध्याय समाप्त महान अभिनेता नाना पाटेकर का 75 वर्ष की आयु में निधन

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता/ 08 अक्टूबर 2026 / गुरुवार
रायपुर / ​भारतीय सिनेमा के दिग्गज और अपनी बहुमुखी प्रतिभा व संवाद अदायगी के लिए जाने जाने वाले अभिनेता नाना पाटेकर (विश्वनाथ पाटेकर) का 8 अक्टूबर 2026 को 75 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। गोवा स्थित उनके आवास पर दिल का दौरा (कार्डियक अरेस्ट) पड़ने के कारण उनका देहांत हुआ। उनके निधन की खबर से हिंदी और मराठी सिनेमा जगत के साथ-साथ पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत देश की कई जानी-मानी हस्तियों और फिल्म इंडस्ट्री के सहयोगियों ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है।

​शुरुआती जीवन और संघर्ष: पोस्टर पेंटिंग से रंगमंच तक का सफर

​नाना पाटेकर का जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मुरुड-जंजीरा में एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। बचपन में ही आर्थिक तंगी का सामना करने के कारण उन्हें काफी कम उम्र से काम करना पड़ा।

​प्रारंभिक संघर्ष: अपनी पढ़ाई का खर्च उठाने और परिवार की आर्थिक मदद के लिए वे सिनेमा के पोस्टर पेंट करने और फिल्में देखने आने वालों के लिए चाय बेचने का काम भी करते थे।

​रंगमंच से जुड़ाव: मुंबई के सर जे. जे. इंस्टीट्यूट ऑफ एप्लाइड आर्ट से व्यावसायिक कला (Commercial Art) की पढ़ाई करने के बाद, उन्होंने थिएटर (रंगमंच) की दुनिया में कदम रखा। मराठी नाटकों में उनके सशक्त अभिनय ने उन्हें जल्द ही पहचान दिलाई।

​बॉलीवुड और मराठी सिनेमा में सिनेमाई सफर

​नाना पाटेकर ने 1978 में फिल्म ‘गमन’ से अपने अभिनय करियर की शुरुआत की थी। हालांकि, 1980 के दशक के अंत में उन्हें बड़ी सफलता मिली।

​सफलता का दौर: 1989 में आई विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म ‘परिंदा’ में उनके द्वारा निभाए गए “अन्ना” के खलनायक किरदार ने उन्हें रातों-रात स्टार बना दिया।

​क्रांतिवीर और प्रतिष्ठित संवाद: 1994 में आई फिल्म ‘क्रांतिवीर’ उनके करियर का मील का पत्थर साबित हुई। इस फिल्म में उनकी तीखी और जोशीली संवाद अदायगी (Dialogue Delivery) ने उन्हें भारतीय सिनेमा के सबसे प्रभावशाली अभिनेताओं में शुमार कर दिया।

​निर्देशन और अन्य भूमिकाएँ: उन्होंने 1991 में ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ फिल्म का निर्देशन भी किया, जिसके लिए उन्होंने भारतीय सेना के साथ दो साल का विशेष प्रशिक्षण लिया था।

​विभिन्न विधाओं में अभिनय: केवल गंभीर और उग्र भूमिकाएँ ही नहीं, बल्कि ‘वेलकम’ (उदय शेट्टी) और ‘ब्लफ़मास्टर’ जैसी फिल्मों में उनकी कॉमिक टाइमिंग ने भी दर्शकों का दिल जीता। मराठी सिनेमा में उनकी फिल्म ‘नटसम्राट’ (2016) और ‘डॉ. प्रकाश बाबा आमटे’ को सर्वकालिक उत्कृष्ट अभिनय माना जाता है।

​प्रमुख पुरस्कार और उपलब्धियाँ

​अपने लगभग पांच दशक लंबे करियर में नाना पाटेकर को कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया:

प्रमुख पुरस्कार और उपलब्धियाँ

​अपने लगभग पांच दशक लंबे करियर में नाना पाटेकर को कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया:

पुरस्कारवर्ष/फिल्म
पद्म श्री2013 (कला के क्षेत्र में योगदान के लिए)

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ अभिनेता)क्रांतिवीर (1994)

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार

(सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता)परिंदा (1989) और अग्निसाक्षी (1996)

फिल्मफेयर पुरस्कार विभिन्न श्रेणियों में कई बार सम्मानित

सामाजिक कार्य: नाम फाउंडेशन (Naam Foundation)

​नाना पाटेकर न केवल एक महान कलाकार थे, बल्कि एक संवेदनशील समाजसेवक भी थे।

​किसानों के लिए पहल: महाराष्ट्र में पड़े भीषण सूखे के दौरान जब किसान आत्महत्या कर रहे थे, तब नाना पाटेकर ने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर 2015 में ‘नाम फाउंडेशन’ की स्थापना की।

​जल संरक्षण और पुनर्वास: इस संस्था के जरिए उन्होंने हजारों पीड़ित किसान परिवारों को आर्थिक सहायता दी, नदियां और तालाब खुदवाए, और गांवों में जल संरक्षण के लिए अभूतपूर्व कार्य किए। उनकी इस सामाजिक पहल के लिए देशवासी उनका बहुत सम्मान करते हैं।

​एक युग का अंत

​नाना पाटेकर की गिनती उन गिने-चुने अभिनेताओं में होती थी, जिन्होंने बिना किसी पारंपरिक हीरो वाली छवि के, अपने निडर अंदाज, अद्वितीय संवाद अदायगी और दमदार अभिनय के बल पर सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाई। उनका जाना भारतीय कला और सामाजिक क्षेत्र के लिए एक अपूरणीय क्षति है।

पत्रकारिता से राष्ट्रीय पटल पर छाए अजीत यादव – ‘अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार फाउंडेशन’ के बने राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, दिग्गजों और समर्थकों ने दी बधाई

पत्रकारिता से राष्ट्रीय पटल पर छाए अजीत यादव – ‘अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार फाउंडेशन’ के बने राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, दिग्गजों और समर्थकों ने दी बधाई

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता/08 अक्टूबर 2026 / दिन गुरुवार
​रायपुर / नई दिल्ली
​पत्रकारिता के जरिए समाज के अंतिम व्यक्ति की आवाज को बुलंद करने वाले ‘न्यू भारत एक्सप्रेस’ के प्रधान संपादक अजीत यादव ने अब मानवाधिकारों के संरक्षण की दिशा में एक नया और बड़ा कदम बढ़ाया है। निष्पक्ष पत्रकारिता और जनसेवा के प्रति उनकी निष्ठा को देखते हुए उन्हें ‘अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार फाउंडेशन’ का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया है। इस घोषणा के बाद से ही छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश सहित देश भर के सामाजिक, राजनीतिक और पत्रकारिता जगत में उत्साह की लहर है।

​संगठन का विस्तार और नई जिम्मेदारी

​अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार फाउंडेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष जय सिंह प्रधान के नेतृत्व में संगठन का व्यापक स्तर पर विस्तार किया जा रहा है। इस विस्तार का मुख्य उद्देश्य आम नागरिकों को उनके मौलिक अधिकारों, कानून और संवैधानिक शक्तियों के प्रति जागरूक करना है। इसी कड़ी में अजीत यादव के वृहद सामाजिक अनुभवों को देखते हुए उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की महत्वपूर्ण कमान सौंपी गई है। इसे केवल एक प्रशासनिक पद के रूप में नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर जनसेवा के दायरे को बढ़ाने के एक बड़े अवसर के रूप में देखा जा रहा है।

​”पद नहीं, अंतिम व्यक्ति तक अधिकार पहुंचाना ही ध्येय”: अजीत यादव

​अपनी इस नियुक्ति पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अजीत यादव ने संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष जय सिंह प्रधान और सभी केंद्रीय पदाधिकारियों का आभार जताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका लक्ष्य पद तक सीमित रहना नहीं है, बल्कि मानवाधिकारों की वास्तविक सार्थकता को धरातल पर उतारना है।

​अजीत यादव ने अपनी प्राथमिकताओं को साझा करते हुए कहा कि,

​जागरूकता अभियान: शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, व्यवसाय, कानूनी सहायता और नशामुक्ति जैसे गंभीर विषयों पर जन-जागरूकता अभियान चलाए जाएंगे।

​सरकारी योजनाओं का लाभ: जानकारी के अभाव में अक्सर जरूरतमंद लोग केंद्र व राज्य सरकारों की जनकल्याणकारी योजनाओं से वंचित रह जाते हैं। पात्र हितग्राहियों तक सही जानकारी पहुंचाकर उन्हें सशक्त बनाना मुख्य ध्येय होगा।

​जमीनी स्तर पर संगठन: छत्तीसगढ़ के सुदूर और ग्रामीण इलाकों में मजबूत टीम का गठन किया जाएगा ताकि न्याय और जागरूकता की पहुंच अंतिम व्यक्ति तक हो सके।

​बधाई देने वालों का लगा तांता

​अजीत यादव की इस उपलब्धि पर देश के विभिन्न राज्यों से शुभकामनाओं का सिलसिला जारी है। सूत्रों के अनुसार, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और उनकी धर्मपत्नी श्रीमती कौशल्या देवी ने भी उन्हें इस नई जिम्मेदारी के लिए बधाई एवं शुभकामनाएं प्रेषित की हैं।

​इसके अलावा सामाजिक कार्यकर्ताओं, अधिवक्ताओं और मीडिया जगत से जुड़े प्रमुख हस्तियों—जिनमें जितेन्द्र सिंह क्षत्रिय, सिंह तोमर, कैलाश यादव, धन्नू यादव, राजेंद्र सिंह क्षत्री, गजेंद्र सिंह यादव, अधिवक्ता कपूर यादव, निल सिंह तोमर, मयंक गुप्ता, सुनील साय, महेश राम, राहुल कुमार, माधव यादव, संपादक प्रकाश कुमार यादव, जलेश यादव, सूर्या ठाकुर, अजय जायसवाल, सरिता राजपूत, कविता साहू, डॉ. सविता, डॉ. कमला देवी, अनिल कुमार, महेश कुमार, दिनेश कुमार, अंकित सिंह, मिलेश, त्रिलोचन यादव, संजय कुमार, कुंदन सिंह, रोमशंकर यादव, रवि सिंह और सूर्या साय शामिल हैं—ने उन्हें उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएं दी हैं।

​उम्मीदों की नई सुबह

​पत्रकारिता के जरिए अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने वाले अजीत यादव के सामने अब मानवाधिकारों को छत्तीसगढ़ के वनांचल और ग्रामीण इलाकों तक पहुँचाने की बड़ी चुनौती और अवसर है। अब देखना यह होगा कि आने वाले समय में वे अपने इस नए दायित्व के माध्यम से समाज के वंचित वर्गों को न्याय और अधिकार दिलाने में कितनी नई इबारत लिखते हैं।

महासमुंद में प्रशासनिक संरक्षण का खेल..!CEO अनुपमा आनंद (IAS) और DDP नितिन कौड़ो चुप क्यों हैं..?

महासमुंद में प्रशासनिक संरक्षण का खेल..!
CEO अनुपमा आनंद (IAS) और DDP नितिन कौड़ो चुप क्यों हैं..?

जांच पूरी, सबूत पक्के… फिर भी मोतीलाल मेहरा पर गाज क्यों नहीं गिर रही..?

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता/08 अक्टूबर 2026 / दिन गुरुवार
महासमुंद (छत्तीसगढ़)।
महासमुंद जिले की पंचायत व्यवस्था में एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक जवाबदेही और पंचायतों में नियमों के पालन को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शिकायतकर्ता द्वारा लगातार इस मामले से जुड़े संबंधित अधिकारियों को जब पूछा जाता है तो जवाब जिला सीईओ सुश्री अनुपमा आनंद डीडीपी नितिन कौड़ो के ऊपर थोपती है तो डीडीपी साहब जिला सीईओ मेडम के ऊपर थोप देते है। आखिर ऐसा क्या और किसका दबाव है कि ये दोनों शीर्षासन पर बैठकर कुछ नहीं कर पा रहे है ऐसे अधिकारियों के कारण भ्रष्टाचारियों को संरक्षण मिलता है और वही लोग आज लाखों का झोल झाल करते है वहीं आगे चलकर करोड़ों अरबों रुपये की हेराफेरी को अंजाम देने में कोई कसर नहीं छोड़ते है। ग्राम पंचायत खैरा में पदस्थ पंचायत सचिव मोती मेहरा (मोतीलाल मेहरा) के विरुद्ध शासकीय कर्तव्यों की कथित उपेक्षा, मूल पदस्थापना से अनुपस्थित रहने, दूसरी ग्राम पंचायत की कार्यवाही में हस्तक्षेप करने और शासन के निर्देशों की अवहेलना के आरोप लगाए गए हैं।

मामले की शिकायत के बाद जनपद स्तर पर जांच टीम गठित हुई, 06 अगस्त 2026 को जांच प्रक्रिया पूरी हुई और ग्रामीणों के बयान तथा दस्तावेज जांच अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत किए गए। इसके बावजूद शिकायतकर्ता का आरोप है कि अब तक संबंधित सचिव के विरुद्ध कोई स्पष्ट दंडात्मक कार्रवाई सामने नहीं आई है।

यही सवाल अब पूरे मामले का सबसे बड़ा मुद्दा बन गया है—

यदि जांच में लगाए गए आरोपों की पुष्टि हुई है तो कार्रवाई क्यों लंबित है? और यदि आरोप प्रमाणित नहीं हुए हैं तो जांच के निष्कर्ष सार्वजनिक क्यों नहीं किए जा रहे हैं?

24 जून की ग्राम सभा से शुरू हुआ पूरा विवाद

शिकायत में उल्लेखित घटनाक्रम के अनुसार 24 जून 2026 को प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण से संबंधित महत्वपूर्ण ग्राम सभा आयोजित की जानी थी।

आरोप है कि उस समय ग्राम पंचायत खैरा में पदस्थ पंचायत सचिव मोती मेहरा अपने मूल कार्यस्थल पर उपस्थित नहीं रहे।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि सचिव खैरा की ग्राम सभा में अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाय ग्राम पंचायत खट्टी पहुंच गए, जहां उनकी पत्नी श्रीमती अनिता मेहरा सरपंच हैं।

यहीं से विवाद ने गंभीर रूप ले लिया।

शिकायत के अनुसार खट्टी पंचायत में सचिव द्वारा पंचायत की कार्यवाही में हस्तक्षेप किया गया तथा ग्रामीणों के साथ कथित तौर पर विवाद और अभद्र व्यवहार की स्थिति बनी। इन आरोपों को लेकर बाद में जिला पंचायत स्तर पर शिकायत प्रस्तुत की गई।

सरपंच पत्नी की पंचायत में सचिव पति की भूमिका पर सवाल

मामले का सबसे संवेदनशील पहलू यह है कि जिस ग्राम पंचायत खट्टी में हस्तक्षेप का आरोप लगाया गया है, वहां मोती मेहरा की पत्नी अनिता मेहरा सरपंच हैं।
शिकायतकर्ता का कहना है कि महिला जनप्रतिनिधियों के शासकीय कार्यों में उनके पति अथवा रिश्तेदारों के हस्तक्षेप को लेकर शासन स्तर से स्पष्ट निर्देश जारी किए जा चुके हैं।
इसी आधार पर सवाल उठाया गया है कि यदि किसी पंचायत में महिला सरपंच निर्वाचित है तो उसके पति द्वारा पंचायत की आधिकारिक कार्यवाही में कथित हस्तक्षेप किस नियम के तहत स्वीकार्य हो सकता है?

हालांकि, इस पूरे मामले में अंतिम निष्कर्ष संबंधित विभागीय जांच और सक्षम अधिकारी के निर्णय के बाद ही स्पष्ट होगा।

15 जुलाई की शिकायत के बाद जांच टीम गठित

मामले की गंभीरता को देखते हुए शिकायतकर्ता मयंक गुप्ता द्वारा 15 जुलाई 2026 को जिला पंचायत मुख्य कार्यपालन अधिकारी के समक्ष शिकायत प्रस्तुत किए जाने की बात कही गई है।

इसके बाद जनपद पंचायत महासमुंद द्वारा जांच टीम गठित की गई। शिकायत में जांच आदेश क्रमांक पंचा./शिक्षा/2026/1594 का उल्लेख किया गया है।

इसके बाद 06 अगस्त 2026 को ग्राम पंचायत खट्टी के पंचायत भवन में जांच प्रक्रिया आयोजित की गई।

जांच के दौरान ग्रामीणों ने क्या कहा..?

शिकायतकर्ता के अनुसार जांच अधिकारी के समक्ष कई महत्वपूर्ण दस्तावेज और तथ्य प्रस्तुत किए गए।

इनमें—

ग्राम सभा एवं पंचायत कार्यवाही से संबंधित
दस्तावेज,

उपस्थिति रजिस्टर की प्रविष्टियां,

बैठक के फोटोग्राफ,

संबंधित शासनादेशों की प्रतियां,

ग्रामीणों के बयान तथा
शिकायत से जुड़े अन्य

दस्तावेज
शामिल बताए गए हैं।

शिकायतकर्ता का दावा है कि दर्जनों ग्रामीण जांच के दौरान उपस्थित हुए और उन्होंने सचिव के कथित हस्तक्षेप तथा घटनाक्रम से संबंधित अपने बयान दर्ज कराए।

अब सवाल यह है कि इन बयानों और दस्तावेजों के आधार पर जांच अधिकारी ने क्या निष्कर्ष निकाला..?

जांच पूरी… फिर कार्रवाई कहां अटकी..?

यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल है।

शिकायतकर्ता का कहना है कि जांच प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद अब तक आरोपी सचिव के विरुद्ध निलंबन अथवा अन्य दंडात्मक कार्रवाई की स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है।

इसी को लेकर अब जिला पंचायत की मुख्य कार्यपालन अधिकारी अनुपमा आनंद (IAS) और उप संचालक पंचायत नितिन कौड़ो की भूमिका पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी अधिकारी की चुप्पी या कार्रवाई में देरी को अपने आप संरक्षण का प्रमाण नहीं माना जा सकता। कार्रवाई प्रशासनिक प्रक्रिया, जांच रिपोर्ट, सक्षम प्राधिकारी और विभागीय नियमों के आधार पर होती है।

फिर भी, यदि जांच वास्तव में पूरी हो चुकी है तो उसकी स्थिति और आगे की कार्रवाई को लेकर प्रशासन की ओर से स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक होना जरूरी है।

बेबाक सवाल: जांच रिपोर्ट पर फैसला कब..?

इस मामले में अब क्षेत्रवासियों और शिकायतकर्ता की ओर से प्रशासन से कई सवाल पूछे जा रहे हैं—

1.यदि आरोप सही पाए गए हैं तो कार्रवाई क्यों लंबित है..?

यदि जांच में पंचायत सचिव द्वारा कर्तव्य में लापरवाही अथवा दूसरी पंचायत की कार्यवाही में अनधिकृत हस्तक्षेप प्रमाणित हुआ है, तो विभागीय कार्रवाई की स्थिति क्या है?

2.जांच रिपोर्ट का निष्कर्ष क्या है..?

06 अगस्त को हुई जांच के बाद जांच अधिकारी ने क्या रिपोर्ट प्रस्तुत की? क्या रिपोर्ट जिला पंचायत कार्यालय तक पहुंच चुकी है..?

3.दोष सिद्ध नहीं हुआ तो स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं की जा रही..?

यदि जांच में आरोप प्रमाणित नहीं हुए हैं तो प्रशासन को शिकायतकर्ता और ग्रामीणों को इसकी स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए।

4.24 जून की ग्राम सभा में सचिव की उपस्थिति का रिकॉर्ड क्या कहता है..?

मूल पदस्थापना ग्राम पंचायत खैरा में उस दिन सचिव की उपस्थिति क्या थी? इसका प्रमाणित रिकॉर्ड क्या है?

5.खट्टी पंचायत में सचिव की भूमिका क्या थी..?

यदि मोती मेहरा खैरा में पदस्थ थे तो 24 जून को खट्टी पंचायत में उनकी उपस्थिति और भूमिका का प्रशासनिक आधार क्या था..?

क्या प्रशासनिक प्रक्रिया में देरी बन रही है सबसे बड़ा सवाल..?

पंचायती राज व्यवस्था का आधार ही स्थानीय भागीदारी, ग्राम सभा और प्रशासनिक जवाबदेही है। ऐसे में किसी पंचायत सचिव पर गंभीर आरोप लगने और जांच प्रक्रिया पूरी होने के बाद यदि लंबे समय तक कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट नहीं होती, तो स्वाभाविक रूप से ग्रामीणों के बीच सवाल खड़े होते हैं।

मामला किसी एक सचिव या एक पंचायत तक सीमित नहीं है। यह सवाल इस बात से जुड़ा है कि क्या पंचायत व्यवस्था में शासन के नियम सभी के लिए समान रूप से लागू हो रहे हैं..?

ग्रामीणों की मांग—निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच और कार्रवाई

शिकायतकर्ता एवं क्षेत्रवासियों ने मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष समीक्षा की जाए। यदि जांच में आरोप प्रमाणित पाए जाते हैं तो संबंधित पंचायत सचिव के विरुद्ध छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम, सेवा नियमों एवं लागू लोक सेवक आचरण नियमों के तहत नियमानुसार कार्रवाई की जाए।

साथ ही जांच रिपोर्ट की स्थिति सार्वजनिक करने तथा मामले में किसी प्रकार का प्रशासनिक दबाव अथवा हस्तक्षेप है तो उसकी भी जांच किए जाने की मांग उठ रही है।

सबसे बड़ा सवाल: चुप्पी किसकी और जवाबदेही किसकी..?

ग्राम पंचायत खैरा से शुरू हुआ यह विवाद अब जिला पंचायत कार्यालय तक पहुंच चुका है। शिकायत, जांच, ग्रामीणों के बयान और दस्तावेजों के बाद भी यदि कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट नहीं है तो प्रशासन को सामने आकर बताना चाहिए कि मामला वर्तमान में किस स्तर पर लंबित है और आगे क्या कार्रवाई प्रस्तावित है।

बेबाक बयान का सवाल सीधा है—

“जांच हो चुकी है तो फैसला कब होगा?”

“यदि आरोप गलत हैं तो क्लीन चिट कब मिलेगी?”
“और यदि आरोप सही हैं तो कार्रवाई कब होगी?”

यही जवाब अब महासमुंद के ग्रामीण और शिकायतकर्ता प्रशासन से मांग रहे हैं।

महासमुंद में खाकी और हरे तंत्र पर हमला: तमोरा में अतिक्रमणकारियों ने वन अमले को घेरा, रेंजर-डिप्टी रेंजर को 5 घंटे तक बंधक बनाकर पीटा

महासमुंद में खाकी और हरे तंत्र पर हमला: तमोरा में अतिक्रमणकारियों ने वन अमले को घेरा, रेंजर-डिप्टी रेंजर को 5 घंटे तक बंधक बनाकर पीटा

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता/07 अक्टूबर 2026/दिन बुधवार
​महासमुंद। छत्तीसगढ़ के महासमुंद वनमण्डल अंतर्गत बागबाहरा परिक्षेत्र में कानून व्यवस्था और वन सुरक्षा को चुनौती देने वाली एक बेहद सनसनीखेज घटना सामने आई है। आरक्षित वन क्षेत्र के ढोड परिसर (कक्ष क्रमांक 95-96) में अवैध शिकार की सूचना पर गश्त करने पहुंचे वन अमले पर अतिक्रमणकारियों ने जानलेवा हमला कर दिया। इस दौरान भीड़ ने वनपरिक्षेत्राधिकारी (रेंजर) और उपवनक्षेत्रपाल (डिप्टी रेंजर) को बंधक बना लिया और उनके साथ जम कर मारपीट की।

​करीब पांच घंटे तक चले इस हाई-वोल्टेज ड्रामे के बाद पुलिस और वन विभाग की संयुक्त टीम ने कड़ी मशक्कत के बाद दोनों अधिकारियों को सुरक्षित बाहर निकाला। घटना के बाद से पूरे वन महकमे में दहशत का माहौल है।

​गश्त के दौरान लाठी-डंडों से किया हमला

​मिली जानकारी के अनुसार, 6 अक्टूबर 2026 की रात बागबाहरा वनपरिक्षेत्राधिकारी नवीन वर्मा अपने स्टाफ—उपवनक्षेत्रपाल नवीन शर्मा, वनरक्षक टोमन दीवान, वॉचर महेश चंद्राकर व पूनम साहू तथा चालक हरदेव वर्मा के साथ ढोड परिसर में जंगली सुअर के अवैध शिकार और मांस बिक्री की गुप्त सूचना पर गश्त पर थे।

​इसी दौरान तमोरा क्षेत्र के अतिक्रमणकारियों ने लाठी-डंडों से लैस होकर वन अमले को चारों तरफ से घेर लिया। शराब के नशे में धुत आरोपियों ने अधिकारियों के साथ गाली-गलौज और मारपीट शुरू कर दी। अचानक हुए इस हमले और हमलावरों की भारी संख्या को देखते हुए कुछ कर्मचारियों ने भागकर अपनी जान बचाई, जबकि रेंजर नवीन वर्मा और डिप्टी रेंजर नवीन शर्मा मौके पर ही फंस गए।

​मोबाइल-पर्स छीना, खेत के मकान में 5 घंटे रखा बंधक

​आरोप है कि उपद्रवियों ने दोनों अधिकारियों की बेरहमी से पिटाई की, जिससे वे लहूलुहान हो गए। हमलावरों ने रेंजर का पर्स और डिप्टी रेंजर का मोबाइल फोन भी छीन लिया। इसके बाद दोनों अधिकारियों को जबरन तमोरा वनखंड से लगे एक खेत में स्थित छोटे से मकान में ले जाकर बंद कर दिया गया।

​अधिकारियों को शाम करीब 7:30 बजे से रात 12:30 बजे तक (लगभग 5 घंटे) बंधक बनाकर रखा गया। संकट की इस घड़ी में रेंजर ने किसी तरह व्हाट्सऐप के जरिए उच्च अधिकारियों और बागबाहरा व खल्लारी थाना प्रभारियों को घटना का संदेश भेजा।

​पुलिस सुरक्षा घेरा बनाकर अधिकारियों को कराया मुक्त

​सूचना मिलते ही महासमुंद और बागबाहरा से भारी पुलिस बल तथा वन अमला मौके पर पहुंचा। शुरुआत में परिजनों और ग्रामीणों ने पुलिस की समझाइश को दरकिनार करते हुए अधिकारियों को छोड़ने से साफ इनकार कर दिया और पुलिस टीम के साथ भी बहस की। स्थिति बिगड़ती देख पुलिस और वन अमले ने एक मजबूत सुरक्षा घेरा (कॉर्डन) तैयार किया और दोनों बंधक अधिकारियों को सुरक्षित बाहर निकाला।

​तत्काल दोनों घायलों को डॉक्टरी परीक्षण और इलाज के लिए अस्पताल भेजा गया। अधिकारियों का कहना है कि यदि समय पर अतिरिक्त बल नहीं पहुंचता तो एक बड़ा हादसा हो सकता था।

​पुरानी रंजिश और अतिक्रमण का विवाद

​इस क्षेत्र में वनभूमि पर अवैध कब्जे को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है:

​मार्च 2026: अतिक्रमण के प्रयासों पर वन विभाग ने अपराध प्रकरण (क्र. 19940/12 से 16) दर्ज किए थे।

​मई 2026: प्लांटेशन की तैयारी के दौरान अमले से मारपीट और शासकीय कार्य में बाधा डालने पर खल्लारी थाने में FIR (क्र. 0055/2026) दर्ज कराई गई थी।

​जुलाई 2026: वनभूमि पर दोबारा जुताई करने तथा सागौन व बाँस के पौधों को नुकसान पहुंचाने पर पुनः 5 मामले (क्र. 19940/17 से 21) दर्ज हुए थे।

​दिसंबर 2025: जिला प्रशासन और पुलिस की मौजूदगी में अतिक्रमणकारियों को सख्त हिदायत भी दी गई थी।

​वैधानिक कार्रवाई जारी, महकमे में आक्रोश

​इस पूरी घटना में शासकीय कार्य में बाधा, जानलेवा हमला, डकैती/छीनझपट, अभद्र व्यवहार और अवैध रूप से बंधक बनाने जैसे गंभीर अपराधों के तहत मामला दर्ज कर कार्रवाई की जा रही है। पुलिस प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर संलिप्त आरोपियों की पहचान कर रही है।

​वन विभाग ने स्पष्ट किया है कि इस प्रकार के जानलेवा हमलों के बावजूद वन संपदा और वन्यजीवों की रक्षा के लिए उनका अभियान रुकने वाला नहीं है। विभाग ने आम जनता से भी अपील की है कि वे वन क्षेत्रों में कानून व्यवस्था बनाए रखने में सहयोग करें और किसी भी अवैध गतिविधि की सूचना तुरंत प्रशासन को दें।

महासमुंद जनपद पंचायत में DSC का बड़ा ‘खेल’: समृद्धी शर्मा और महेंद्र वर्मा के इर्द-गिर्द घूमती वित्तीय अनियमितताओं की कहानी..!

महासमुंद जनपद पंचायत में DSC का बड़ा ‘खेल’: समृद्धी शर्मा और महेंद्र वर्मा के इर्द-गिर्द घूमती वित्तीय अनियमितताओं की कहानी..!

​विशेष खोजी रिपोर्ट | प्रधान संपादक मयंक गुप्ता / 07 अक्टूबर 2026 /दिन बुधवार
महासमुंद (छत्तीसगढ़)
​महासमुंद जिले की पंचायत व्यवस्था में वित्तीय पारदर्शिता, फर्जी बिल-वाउचर और डिजिटल अधिकारों के दुरुपयोग का मामला अब एक विकराल रूप ले चुका है। ग्राम पंचायत बेलसोंडा में 17.60 लाख रुपये के गबन के आरोपों के साथ-साथ जनपद की पुरानी 39 लाख रुपये की जांच फाइलों के बीच एक चौंकाने वाला सच उजागर हो रहा है—पंचायतों के करोड़ों रुपये के बजट और भुगतान प्रणाली की चाबी कथित तौर पर जनपद पंचायत महासमुंद की संकाय शाखा में पदस्थ कर्मचारी श्रीमती समृद्धि शर्मा और उनके सहयोगी महेंद्र कुमार वर्मा के पास केंद्रित है।
​यह रिपोर्ट दर्शाती है कि कैसे डिजिटल सिग्नेचर (DSC) और फाइलों के रखरखाव का इस्तेमाल कर पंचायतों के विकास कोष का दुरुपयोग किया जा रहा है।

​1. DSC खेल के ‘मास्टरमाइंड’: समृद्धि शर्मा और महेंद्र कुमार वर्मा पर गंभीर आरोप

​जनपद पंचायत महासमुंद की संकाय शाखा में कार्यरत श्रीमती समृद्धि शर्मा और महेंद्र कुमार वर्मा की कार्यप्रणाली लंबे समय से विवादों के घेरे में रही है। प्रशासनिक सूत्रों और शिकायतों के आधार पर इस पूरे ‘पेमेंट सिंडिकेट’ के मुख्य सूत्रधार यही दोनों कर्मचारी बताए जा रहे हैं।

​डिजिटल सिग्नेचर (DSC) पर अनाधिकृत कब्जा

नियमानुसार सरपंच और सचिव का डिजिटल सिग्नेचर (DSC) संबंधित पंचायत प्रतिनिधियों के अपने पास होना चाहिए। परंतु 04 अगस्त 2026 को प्रस्तुत शिकायत में आरोप लगाया गया है कि श्रीमती समृद्धि शर्मा और महेंद्र कुमार वर्मा कई ग्राम पंचायतों के DSC अपने पास दबाकर रखते हैं।

​कोरे व अपूर्ण बिलों पर दबाव बनाकर भुगतान: आरोप है कि DSC अपने कब्जे में रखकर पंचायतों के कोरे व फर्जी बिल-वाउचर तैयार कराए जाते हैं और मनमाने तरीके से राशि आहरित की जाती है।

​ब्लैकमेलिंग और धमकियां: यदि कोई सरपंच या सचिव अपना DSC वापस मांगता है, तो उसे पंचायत के अन्य वैध भुगतानों को रोकने या अटकाने की धमकियां दी जाती हैं। यह ‘खेल’ बीते कई सालों से बेधड़क चलाया जा रहा है।

​2. बेलसोंडा पंचायत: 313 पन्नों के साक्ष्य और 17.60 लाख की संदिग्ध निकासी

​जनपद के इसी ढर्रे का प्रत्यक्ष उदाहरण ग्राम पंचायत बेलसोंडा में देखने को मिला है, जहाँ पूर्व सरपंच श्रीमती भामिनी पोखन चंद्राकर ने 313 पन्नों के प्रामाणिक साक्ष्यों के साथ वर्तमान सरपंच प्रीति ढीमर और सचिव नेहा उपाध्याय के विरुद्ध अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) महासमुंद को शिकायत सौंपी है।

​45 लाख में से 17.60 लाख का फर्जीवाड़ा: 15वें वित्त आयोग, मूलभूत मद एवं करों से प्राप्त कुल 45 लाख रुपये में से 17.60 लाख रुपये बिना किसी वैध विकास कार्य या भौतिक सत्यापन के निकाले गए।

​पारिवारिक खातों में राशि ट्रांसफर: कथित फर्जी भुगतान सरपंच के पति (त्रिभुवन ढीमर), पुत्र (मोहित ढीमर) की फर्मों, वार्ड पंचों व अन्य रिश्तेदारों के खातों में पहुंचा।

​साक्ष्यों से छेड़छाड़ की आशंका: रिकॉर्ड्स को सुरक्षित रखने हेतु बेलसोंडा पंचायत भवन को तत्काल सील करने की मांग की गई है।

​3. 39 लाख का पुराना कोरोना घोटाला: दबाई गईं जांच फाइलें

​वर्ष 2019-20 में कोरोना काल के दौरान मास्क, सैनिटाइजर व सामग्री खरीदी के नाम पर हुए 39 लाख रुपये के कथित घोटाले की फाइलें आज भी जिला पंचायत कार्यालय में लंबित हैं।

​जनपद CEO मिषा कोसले द्वारा जांच पूरी कर रिपोर्ट जिला पंचायत कार्यालय को सौंप दी गई है।

​इसके बावजूद जिला पंचायत CEO एस. आलोक और वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा अंतिम आदेश जारी न होना इस बात का संकेत है कि संकाय शाखा के कर्मचारियों और उनके सहयोगियों को प्रशासनिक संरक्षण मिल रहा है।

​4. खैरा-खट्टी विवाद: प्रशासनिक हस्तक्षेप का उदाहरण

​24 जून 2026 को आयोजित ग्राम सभाओं के दौरान खैरा-खट्टी पंचायत प्रकरण में सचिव मोती मेहरा पर अपनी मूल पंचायत छोड़कर अपनी पत्नी (सरपंच, खट्टी पंचायत) की बैठक में जाकर हस्तक्षेप करने के आरोप लगे। 06 अगस्त 2026 की प्रशासनिक जांच के बावजूद इसकी रिपोर्ट भी ठंडे बस्ते में डाल दी गई है।

​5. महासमुंद प्रशासन से 7 सीधे और तीखे सवाल

​श्रीमती समृद्धि शर्मा और महेंद्र कुमार वर्मा के पास विभिन्न पंचायतों के डिजिटल सिग्नेचर (DSC) रखने की अनुमति किस नियम के तहत दी गई..?

2 ​DSC के जरिए कोरे व अपूर्ण बिलों से फर्जी भुगतान कराने के आरोपों पर संकाय शाखा के इन कर्मचारियों के विरुद्ध अब तक एफआईआर (FIR) या विभागीय जांच क्यों शुरू नहीं हुई..?

3 – ​39 लाख रुपये की जांच रिपोर्ट पर अंतिम फैसला लेने में जिला पंचायत प्रशासन को किस बात की अड़चन है..?

4 ​क्या बेलसोंडा पंचायत के 313 पन्नों के दस्तावेजों के साथ-साथ संकाय शाखा के बैंक खातों और DSC लॉगिन हिस्ट्री की जांच की जाएगी..?

5 ​क्या जांच प्रभावित होने से बचाने के लिए संदिग्ध कर्मचारियों का तबादला या निलंबन किया जाएगा..?

6 ​खैरा-खट्टी प्रकरण में 06 अगस्त 2026 को दर्ज बयानों के आधार पर क्या कार्रवाई प्रस्तावित है..?

7 ​जनपद पंचायत क्षेत्र में वर्षों से चल रहे इस ‘पेमेंट खेल’ में और कौन-कौन से उच्च अधिकारी शामिल हैं..?

​निष्कर्ष एवं कानूनी कार्रवाई की चेतावनी

​महासमुंद जनपद पंचायत क्षेत्र में शासकीय राशि का बंदरबांट अब बर्दाश्त से बाहर होता जा रहा है। समृद्धि शर्मा और महेंद्र वर्मा जैसे कर्मचारियों द्वारा DSC के नाम पर चलाई जा रही व्यवस्था पर यदि कलेक्टर महासमुंद, आयुक्त (रायपुर संभाग), पंचायत संचालनालय और एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) सख्त रुख नहीं अपनाते हैं, तो शिकायतकर्ता मामले को बिलासपुर उच्च न्यायालय (High Court) ले जाने की तैयारी में हैं।

हर्बल लाइफ का ‘सुपर कोच’ गुरु “गिरीश साहू” बना सरकारी गुरुजी ..!

हर्बल लाइफ का ‘सुपर कोच’ गुरु “गिरीश साहू” बना सरकारी गुरुजी ..!

सरकारी स्कूल में बच्चों को पढ़ाने वाला शिक्षक नेटवर्क मार्केटिंग में सक्रिय होने के आरोपों से घिरा; बालोद से महासमुंद तक ‘सुपर कोच’ की भूमिका पर उठे सवाल

विशेष रिपोर्ट | प्रधान संपादक मयंक गुप्ता / 06 अक्टूबर 2026/ दिन मंगलवार
महासमुंद/बालोद छत्तीसगढ़
शिक्षा विभाग में सरकारी सेवा और निजी नेटवर्क मार्केटिंग गतिविधियों के बीच संभावित टकराव को लेकर एक मामला सामने आया है। विकासखंड डौंडी के शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला बेलौदा में पदस्थ शिक्षक गिरीश साहू, जो मूलतः महासमुंद जिले के इमलीभांठा क्षेत्र के निवासी बताए जा रहे हैं, उनके खिलाफ हर्बल लाइफ न्यूट्रिशन से जुड़कर नेटवर्क मार्केटिंग गतिविधियां संचालित करने और स्वयं को ‘सुपर कोच’ के रूप में प्रचारित करने के गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

शिकायतकर्ता द्वारा जिला शिक्षा अधिकारी और कलेक्टर के समक्ष दिए गए आवेदन में आरोप लगाया गया है कि शिक्षक सरकारी सेवा में रहते हुए हर्बल लाइफ से संबंधित प्रचार-प्रसार, नेटवर्किंग और कथित रूप से उत्पादों की बिक्री/प्रमोशन में सक्रिय हैं। शिकायत के साथ सोशल मीडिया पोस्ट, स्क्रीनशॉट और वीडियो जैसे डिजिटल साक्ष्य लगाए जाने की बात भी कही गई है।

बालोद में शिक्षक, महासमुंद में भी ‘सुपर कोच’?

इस पूरे मामले का सबसे अहम पहलू यह बताया जा रहा है कि गिरीश साहू केवल बालोद जिले में ही हर्बल लाइफ की नेटवर्किंग गतिविधियों से जुड़े नहीं बताए जा रहे, बल्कि महासमुंद जिले में भी उनके ‘सुपर कोच’ के रूप में सक्रिय रहने के आरोप सामने आए हैं।

यानी सवाल सिर्फ निजी कंपनी से जुड़ने तक सीमित नहीं है। सवाल यह भी है कि एक सरकारी शिक्षक की प्राथमिक जिम्मेदारी विद्यालय में शिक्षण कार्य है, तो फिर सरकारी सेवा के साथ नेटवर्क मार्केटिंग की गतिविधियों के लिए कितना समय और किस स्तर तक सक्रियता उचित है..?

‘एक्स्ट्रा इनकम’ के सपने का नेटवर्क

हर्बल लाइफ जैसी नेटवर्क मार्केटिंग व्यवस्था में लोगों को अतिरिक्त आय, बेहतर जीवनशैली और आर्थिक स्वतंत्रता के सपने दिखाकर नेटवर्क से जोड़ने के आरोप अक्सर सामने आते रहे हैं। महासमुंद क्षेत्र में भी शिकायत के अनुसार लोगों को हेल्थ और वेल्थ से जुड़े दावों के साथ नेटवर्किंग से जोड़ने का प्रयास किया गया।

हालांकि किसी भी उत्पाद अथवा कंपनी के संबंध में अंतिम निष्कर्ष जांच के बाद ही निकाला जा सकता है, लेकिन सरकारी कर्मचारी द्वारा ऐसी व्यावसायिक गतिविधियों में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष भागीदारी का आरोप अपने आप में विभागीय जांच का विषय जरूर बनता है।

बिना मेडिकल डिग्री ‘हेल्थ’ सलाह देने का आरोप

शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि शिक्षक द्वारा सोशल मीडिया एवं अन्य माध्यमों से स्वयं को ‘हेल्थ कोऑर्डिनेटर’, ‘डिजिटल क्रिएटर’ या ‘कोच’ के रूप में प्रस्तुत किया जाता है और लोगों को हेल्थ सप्लीमेंट्स के संबंध में सलाह दी जाती है।

यहां बड़ा सवाल यह है कि यदि कोई व्यक्ति चिकित्सक या मान्यता प्राप्त पोषण विशेषज्ञ नहीं है, तो क्या उसे किसी व्यक्ति की बीमारी, उपचार अथवा स्वास्थ्य स्थिति के संबंध में चिकित्सकीय सलाह देने का अधिकार है.?

यदि ऐसे दावे वास्तव में किए गए हैं, तो संबंधित विभागों द्वारा इसकी वैधानिकता की जांच किया जाना आवश्यक है।

कमाई पत्नी के खाते में होने की सफाई भी चर्चा में

शिकायत से जुड़े पक्ष के अनुसार जब शिक्षक से नेटवर्किंग से होने वाली आय को लेकर सवाल किए गए तो कथित तौर पर यह जवाब दिया गया कि कमाई उनकी नहीं बल्कि उनकी पत्नी के खाते में आती है।

लेकिन शिकायतकर्ता का दावा है कि सोशल मीडिया पर कंपनी से संबंधित प्रचार और नेटवर्किंग गतिविधियों में शिक्षक की स्वयं की सक्रियता के डिजिटल साक्ष्य मौजूद हैं।

यही वजह है कि अब सवाल केवल खाते में पैसा आने का नहीं, बल्कि यह पता लगाने का है कि व्यावसायिक गतिविधि वास्तव में कौन संचालित कर रहा था और सरकारी सेवा में रहते हुए उसमें संबंधित शिक्षक की भूमिका क्या थी..?

महासमुंद का दूसरा मामला और गंभीर सवाल

इसी प्रकरण से जुड़े आरोपों में महासमुंद के श्रीराम वाटिका, ईमलीभांठा क्षेत्र की एक दुखद घटना का भी उल्लेख किया गया है। मृतक दिनेश साहू की माता श्रीमती खेमिन साहू द्वारा पुलिस प्रशासन के समक्ष शिकायत देकर अपने बेटे की मृत्यु के कारणों और उससे जुड़े व्यक्तियों की भूमिका की जांच की मांग किए जाने की बात सामने आई है।

शिकायत में मृतक की पत्नी, एक व्यक्ति तथा शिक्षक गिरीश साहू के बीच कथित संबंधों और हर्बल लाइफ नेटवर्किंग गतिविधियों का उल्लेख किया गया है। शिकायतकर्ता परिवार ने इन घटनाक्रमों को अपने बेटे की मानसिक परेशानी से जोड़ते हुए जांच की मांग की है।

हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि इस रिपोर्ट में नहीं की जा रही है और दिनेश साहू की आत्महत्या को किसी व्यक्ति अथवा हर्बल लाइफ गतिविधि से सीधे जोड़ने का निष्कर्ष जांच के बिना निकालना उचित नहीं होगा। पुलिस जांच में यदि कोई आपराधिक अथवा अन्य जिम्मेदारी सामने आती है, तभी उस पर अंतिम टिप्पणी की जा सकती है।

13 अगस्त 2025 की घटना, लेकिन शिकायत के सवाल अब भी कायम

शिकायत के अनुसार दिनेश साहू ने 13 अगस्त 2025 की रात आत्महत्या की थी।

उनकी मां द्वारा पुलिस अधीक्षक महासमुंद के समक्ष शिकायत प्रस्तुत कर मामले की निष्पक्ष जांच की मांग किए जाने का दावा है।

अब सवाल यह है कि शिकायत पर पुलिस स्तर पर क्या जांच हुई? किन बिंदुओं पर जांच की गई?

क्या संबंधित व्यक्तियों के बयान लिए गए? क्या मोबाइल चैट, सोशल मीडिया गतिविधियों और अन्य डिजिटल साक्ष्यों की जांच हुई..?

यदि शिकायत अब भी लंबित है, तो परिवार को जांच की स्थिति की स्पष्ट जानकारी मिलना जरूरी है।

सरकारी शिक्षक की ‘सुपर कोच’ भूमिका पर विभागीय जांच जरूरी

सरकारी शिक्षक के मामले में सबसे महत्वपूर्ण बिंदु छत्तीसगढ़ सिविल सेवा आचरण नियमों के तहत उनकी निजी व्यावसायिक गतिविधियों की वैधानिकता है।

क्या शिक्षक ने किसी सक्षम अधिकारी से अनुमति ली थी..?

क्या उन्होंने नेटवर्क मार्केटिंग अथवा किसी निजी व्यावसायिक गतिविधि में स्वयं को अधिकृत रूप से जोड़ा था..?

क्या उनकी सोशल मीडिया गतिविधियां वास्तविक व्यावसायिक प्रचार का हिस्सा थीं..?

क्या इससे उनके सरकारी शिक्षकीय दायित्व प्रभावित हुए..?

और सबसे महत्वपूर्ण—क्या ‘सुपर कोच’ के रूप में उनकी भूमिका सरकारी सेवा के आचरण नियमों के अनुरूप है..?

इन सवालों का जवाब केवल विभागीय जांच से ही स्पष्ट हो सकता है।

शिक्षामंत्री से जांच और कड़ी कार्रवाई की मांग

इस पूरे मामले को लेकर छत्तीसगढ़ के शिक्षामंत्री से मांग की गई है कि सरकारी सेवा में रहते हुए निजी नेटवर्क मार्केटिंग गतिविधियों में संलिप्तता के आरोपों की निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच कराई जाए।

यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित शिक्षक के विरुद्ध सेवा नियमों के अनुसार कठोर विभागीय कार्रवाई की जानी चाहिए। शिकायतकर्ता पक्ष की मांग है कि सरकारी स्कूल को छोड़कर निजी नेटवर्किंग को प्राथमिकता देने वाले ऐसे मामलों पर विभाग स्पष्ट नीति और कार्रवाई सुनिश्चित करे।

अब बड़ा सवाल—‘सुपर कोच’ या सरकारी शिक्षक?

इस पूरे मामले का केंद्र यही सवाल है।

क्या सरकारी शिक्षक का काम बच्चों को शिक्षा देना है या निजी नेटवर्क मार्केटिंग में ‘सुपर कोच’ बनकर नेटवर्क तैयार करना..?

अगर आरोप गलत हैं तो जांच के बाद शिक्षक को क्लीन चिट मिलनी चाहिए।
अगर आरोप सही हैं तो सरकारी सेवा में रहते हुए निजी व्यावसायिक गतिविधियों पर नियमों के मुताबिक कार्रवाई होनी चाहिए।

क्योंकि मामला केवल एक शिक्षक या एक कंपनी तक सीमित नहीं है। मामला उस भरोसे का है जो अभिभावक और समाज एक सरकारी शिक्षक पर करते हैं।

हर्बल लाइफ के ‘सुपर कोच’ से जुड़े आरोपों की निष्पक्ष जांच ही अब इस पूरे मामले की असली तस्वीर सामने ला सकती है।