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महासमुंद में चक्रवात ‘अर्नब’ का अलर्ट! कलेक्टर विनय लंगेह ने संभाली कमान, 24 घंटे कंट्रोल रूम सक्रिय; लोगों से घरों में सुरक्षित रहने की अपील

महासमुंद में चक्रवात ‘अर्नब’ का अलर्ट! कलेक्टर विनय लंगेह ने संभाली कमान, 24 घंटे कंट्रोल रूम सक्रिय; लोगों से घरों में सुरक्षित रहने की अपील

तेज हवाओं, बारिश और संभावित आपात स्थिति से निपटने प्रशासन ने कसी कमर; स्वास्थ्य, पुलिस, बिजली विभाग और बचाव दलों को सतर्क रहने के निर्देश

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता | महासमुंद | 27 अक्टूबर 2026/दिन मंगलवार
महासमुंद। बंगाल की खाड़ी में सक्रिय चक्रवात ‘अर्नब’ के संभावित प्रभाव को देखते हुए महासमुंद जिला प्रशासन ने सतर्कता बढ़ा दी है। आगामी दिनों में मौसम में बदलाव, बारिश और गरज-चमक की आशंका के मद्देनजर जिला प्रशासन ने संबंधित विभागों को आपात परिस्थितियों से निपटने के लिए तैयार रहने के निर्देश दिए हैं। आम नागरिकों की सुरक्षा, संभावित जनहानि और पशुहानि की रोकथाम तथा जरूरत पड़ने पर तत्काल राहत पहुंचाने को प्राथमिकता दी जा रही है।
कलेक्टर विनय कुमार लंगेह ने मंगलवार, 27 अक्टूबर को समय-सीमा की बैठक में अधिकारियों को निर्देशित किया कि मौसम की परिस्थितियों को गंभीरता से लेते हुए अपने-अपने विभागों की तैयारियों की समीक्षा करें। किसी भी आपात स्थिति में राहत एवं बचाव कार्यों में देरी नहीं होनी चाहिए। उन्होंने नागरिकों से भी अपील की है कि आगामी तीन दिनों तक विशेष सावधानी बरतें और अत्यंत आवश्यक होने पर ही घर से बाहर निकलें।

मौसम के बदलते मिजाज पर प्रशासन की नजर

भारत मौसम विज्ञान विभाग के उपलब्ध पूर्वानुमान के अनुसार महासमुंद में 27 अक्टूबर को सामान्यतः बादल छाए रहने के साथ बारिश अथवा गरज-चमक की संभावना है। 28 और 29 अक्टूबर को भी बादल छाए रहने तथा कुछ समय के लिए बारिश या गरज के साथ बौछारें पड़ने के आसार जताए गए हैं। ऐसे में स्थानीय स्तर पर मौसम में होने वाले बदलाव को देखते हुए सतर्कता बरतना जरूरी है।

चक्रवात अर्नब के संबंध में मौसम विभाग के 26 अक्टूबर के बुलेटिन में इसके अत्यंत गंभीर चक्रवाती तूफान के रूप में विकसित होने और 28 अक्टूबर की सुबह आंध्र प्रदेश के तट की ओर बढ़ने का पूर्वानुमान दिया गया था। इसके व्यापक प्रभाव में दक्षिण एवं मध्य छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों में भी मौसम प्रभावित होने की संभावना जताई गई है।

हालांकि, महासमुंद जिले में बारिश और हवा की वास्तविक तीव्रता स्थानीय मौसम परिस्थितियों तथा विभाग की आगामी चेतावनियों पर निर्भर करेगी। इसलिए नागरिकों को अफवाहों से बचते हुए आधिकारिक मौसम पूर्वानुमान और जिला प्रशासन की सूचनाओं पर ध्यान देने की जरूरत है।

स्वास्थ्य से लेकर बिजली विभाग तक, सभी को अलर्ट रहने के निर्देश

कलेक्टर श्री लंगेह ने संभावित आपात परिस्थितियों से निपटने के लिए विभिन्न विभागों को जिम्मेदारियां सौंपते हुए आवश्यक तैयारियां सुनिश्चित करने को कहा है।

स्वास्थ्य विभाग: आपात स्थिति में तत्काल चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने के लिए रैपिड रिस्पांस टीम तैयार रखी जाए।

पुलिस विभाग: कानून-व्यवस्था बनाए रखने, जरूरत पड़ने पर लोगों की सहायता करने और आपात सूचनाओं पर त्वरित कार्रवाई के लिए सतर्क रहे।

विद्युत विभाग: तेज हवाओं या बारिश के कारण बिजली आपूर्ति बाधित होने जैसी संभावित समस्याओं से निपटने के लिए आवश्यक संसाधन और कर्मचारी तैयार रखें।

एसडीआरएफ एवं होमगार्ड: आवश्यकता के अनुसार राहत एवं बचाव कार्यों के लिए जवानों की तैनाती सुनिश्चित की जाए।

सभी संबंधित विभाग: आपसी समन्वय के साथ काम करें, ताकि आपदा की स्थिति में राहत पहुंचाने और जरूरी सेवाएं बहाल करने में देरी न हो।

प्रशासन का जोर इस बात पर है कि किसी भी संभावित आपात स्थिति में संबंधित विभागों के बीच सूचना का आदान-प्रदान तत्काल हो और प्रभावित लोगों तक सहायता समय पर पहुंचाई जा सके।

24 घंटे चालू रहेगा जिला स्तरीय कंट्रोल रूम

आपातकालीन सूचनाओं को तत्काल संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाने और राहत कार्यों के समन्वय के लिए जिला स्तर पर कंट्रोल रूम स्थापित किया गया है। प्रशासन के अनुसार यह कंट्रोल रूम 24 घंटे सक्रिय रहेगा।

जिला स्तरीय कंट्रोल रूम का संपर्क नंबर

07723-223305 किसी भी आपात स्थिति या आवश्यक सूचना के लिए संपर्क करें।

कलेक्टर ने सभी तहसीलों में भी कंट्रोल रूम की व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। इसका उद्देश्य स्थानीय स्तर पर मिलने वाली सूचनाओं पर त्वरित कार्रवाई करना और जरूरतमंदों तक राहत पहुंचाने की प्रक्रिया को प्रभावी बनाना है।

गांवों से शहरों तक मुनादी कराने के निर्देश

प्रशासन ने ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में लोगों को समय रहते सतर्क करने के लिए कोटवारों के माध्यम से मुनादी कराने के निर्देश दिए हैं। इसका उद्देश्य मौसम संबंधी सावधानियों और प्रशासनिक दिशा-निर्देशों को आम नागरिकों तक पहुंचाना है।

कलेक्टर ने अधिकारियों को निर्देशित किया है कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में उपलब्ध संसाधनों, कर्मचारियों और जरूरी व्यवस्थाओं की समीक्षा करें। संभावित जलभराव, तेज हवाओं से होने वाली परेशानियों तथा अन्य आपात परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए स्थानीय स्तर पर आवश्यक तैयारी रखी जाए।

प्रशासन की ओर से राहत एवं बचाव दलों को जरूरत पड़ने पर तत्काल कार्रवाई के लिए तैयार रखने पर भी जोर दिया गया है।

कलेक्टर की अपील—बेवजह बाहर न निकलें, अफवाहों से बचें

कलेक्टर विनय कुमार लंगेह ने जिलेवासियों से अपील की है कि 27 से 29 अक्टूबर के दौरान मौसम की स्थिति को देखते हुए विशेष सावधानी बरतें। अत्यंत जरूरी होने पर ही घर से बाहर निकलें और मौसम विभाग की चेतावनियों का पालन करें।

उन्होंने नागरिकों को सलाह दी है कि खराब मौसम के दौरान खुले स्थानों, पेड़ों और बिजली के खंभों के आसपास अनावश्यक रूप से न रुकें। गरज-चमक के समय खुले मैदानों और जलस्रोतों से दूर रहें। तेज हवा या बारिश के दौरान सुरक्षित स्थान पर रहें तथा बिजली के तार टूटने या किसी अन्य खतरे की स्थिति में उससे दूरी बनाए रखें और संबंधित विभाग को सूचना दें।

किसी भी आपात स्थिति में घबराने के बजाय जिला स्तरीय कंट्रोल रूम से संपर्क करें। सोशल मीडिया पर प्रसारित अपुष्ट संदेशों और अफवाहों पर भरोसा न करें तथा केवल आधिकारिक सूचनाओं के आधार पर निर्णय लें।

जनहानि रोकना प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकता

कलेक्टर श्री लंगेह ने अधिकारियों को स्पष्ट किया है कि संभावित चक्रवात के प्रभाव के दौरान नागरिकों और पशुओं की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। सभी विभागों को आपसी समन्वय बनाए रखते हुए परिस्थितियों के अनुसार तत्काल कदम उठाने होंगे।

जिला प्रशासन ने मौसम की स्थिति पर नजर रखते हुए आवश्यक एहतियाती तैयारियां करने की बात कही है। ऐसे समय में प्रशासनिक सतर्कता के साथ नागरिकों की जागरूकता भी महत्वपूर्ण है। मौसम संबंधी निर्देशों का पालन, अनावश्यक आवाजाही से परहेज और आपात स्थिति में समय पर सूचना देना संभावित जोखिमों को कम करने में मददगार हो सकता है।

फिलहाल जिलेवासियों से यही अपील है—सतर्क रहें, सुरक्षित रहें और किसी भी आपात स्थिति में प्रशासन द्वारा जारी निर्देशों का पालन करें।

स्रोत एवं मौसम अपडेट: भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के 26–27 अक्टूबर 2026 के उपलब्ध पूर्वानुमान तथा जिला प्रशासन द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के आधार पर समाचार तैयार किया गया है।

GeM टेंडर में ‘सर्टिफिकेट का अड़ंगा’ या सिस्टम की चूक? छत्तीसगढ़ उद्यानिकी विभाग पर गंभीर सवाल, पांच दिन चक्कर लगाने के आरोप से मचा बवाल..!

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GeM टेंडर में ‘सर्टिफिकेट का अड़ंगा’ या सिस्टम की चूक? छत्तीसगढ़ उद्यानिकी विभाग पर गंभीर सवाल, पांच दिन चक्कर लगाने के आरोप से मचा बवाल..!

साइट विजिट प्रमाणपत्र नहीं मिलने से दावेदार कंपनी की बोली प्रक्रिया प्रभावित होने का दावा; पसंदीदा फर्म को लाभ पहुंचाने की आशंका, निष्पक्ष जांच और जिम्मेदारी तय करने की उठी मांग

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता | 27 अक्टूबर 2026/दिन मंगलवार /| रायपुर, छत्तीसगढ़
रायपुर। सरकारी खरीदी में पारदर्शिता, समान अवसर और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए ऑनलाइन टेंडर प्रणाली लागू की गई है। लेकिन जब किसी निविदा में भाग लेने के लिए निर्धारित दस्तावेज ही समय पर उपलब्ध नहीं होने का आरोप सामने आए, तो पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। छत्तीसगढ़ के उद्यानिकी विभाग से संबंधित GeM टेंडर को लेकर ऐसा ही एक मामला सामने आया है, जिसमें एक दावेदार कंपनी के प्रतिनिधियों ने विभागीय अधिकारियों और कर्मचारियों पर कथित टालमटोल, सहयोग नहीं करने और निर्धारित प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न करने के आरोप लगाए हैं।

शिकायतकर्ता पक्ष का कहना है कि संबंधित उद्यानिकी नर्सरी के स्थल का निरीक्षण करने के बाद जारी किया जाने वाला साइट विजिट प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिए उन्होंने लगातार पांच दिनों तक प्रयास किया। इसके बावजूद, उनके दावे के अनुसार, बोली जमा करने की अंतिम समय-सीमा तक प्रमाणपत्र पर हस्ताक्षर नहीं किए गए। कंपनी के प्रतिनिधियों ने इस घटनाक्रम को सामान्य प्रशासनिक देरी मानने के बजाय पूरी निविदा प्रक्रिया में समान अवसर मिलने से जुड़ा गंभीर प्रश्न बताया है।

हालांकि, अभी तक इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि, विभागीय जांच के निष्कर्ष अथवा संबंधित अधिकारियों का आधिकारिक पक्ष उपलब्ध नहीं है। इसलिए मामले में वास्तविक स्थिति दस्तावेजों, शिकायत और विभागीय जवाब के परीक्षण के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।

टेंडर प्रक्रिया पर सवाल, प्रमाणपत्र बना विवाद की वजह

प्राप्त शिकायत संबंधी जानकारी के अनुसार, यह मामला GeM निविदा क्रमांक GEM/2026/B/8119298 से जुड़ा बताया गया है। शिकायतकर्ता कंपनी के प्रतिनिधियों का दावा है कि निविदा की शर्तों के तहत संबंधित स्थल का दौरा करना और साइट विजिट प्रमाणपत्र प्राप्त कर उसे आवश्यक दस्तावेजों के साथ जमा करना जरूरी था।

उनका आरोप है कि जब उन्होंने इस शर्त को पूरा करने के लिए संबंधित नर्सरी के गार्डन सुपरिंटेंडेंट से संपर्क किया, तो उन्हें प्रमाणपत्र उपलब्ध कराने के बजाय बार-बार बाद में आने के लिए कहा गया। प्रतिनिधियों के मुताबिक, वे लगातार पांच दिनों तक इस काम के लिए प्रयास करते रहे, लेकिन अंतिम समय-सीमा तक समस्या का समाधान नहीं हो पाया।

अब इस मामले में सबसे अहम सवाल यही है कि यदि प्रमाणपत्र निविदा की अनिवार्य शर्त थी, तो उसे जारी करने की जिम्मेदारी किस अधिकारी को सौंपी गई थी? क्या इसके लिए कोई निर्धारित प्रक्रिया और समय-सीमा थी? और यदि किसी कारण से प्रमाणपत्र जारी नहीं किया जा सकता था, तो संबंधित आवेदक को लिखित रूप में इसकी जानकारी क्यों नहीं दी गई..?

इन सवालों के जवाब मिलने के बाद ही यह तय हो सकेगा कि मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही का है या प्रक्रिया में किसी गंभीर अनियमितता की आशंका भी है।

पांच दिन की दौड़भाग के बाद भी नहीं हुआ समाधान..!

शिकायतकर्ता कंपनी के प्रतिनिधियों के अनुसार, साइट विजिट प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिए उन्हें कई बार संबंधित नर्सरी जाना पड़ा। उनका कहना है कि प्रत्येक बार उन्हें बाद में आने की बात कहकर लौटा दिया गया।

प्रतिनिधियों का दावा है कि उन्होंने अपनी ओर से निर्धारित औपचारिकता पूरी करने का प्रयास किया, लेकिन प्रमाणपत्र पर हस्ताक्षर नहीं होने के कारण उनके सामने बोली जमा करने की प्रक्रिया पूरी करने में कठिनाई पैदा हुई।

यदि शिकायतकर्ता के दावे दस्तावेजों और अन्य साक्ष्यों से सही साबित होते हैं, तो यह केवल एक कंपनी की परेशानी का मामला नहीं रहेगा। यह उस व्यवस्था की जवाबदेही का प्रश्न भी बनेगा, जिसमें सरकारी निविदा में भाग लेने वाले प्रत्येक पात्र दावेदार को निर्धारित शर्तें पूरी करने के लिए समान अवसर मिलना चाहिए।

यह भी जांच का विषय है कि संबंधित प्रतिनिधियों ने किन तारीखों पर संपर्क किया, क्या उन्होंने लिखित आवेदन दिया था, क्या प्रमाणपत्र के लिए कोई आधिकारिक अनुरोध दर्ज हुआ और क्या विभागीय स्तर पर उसका कोई रिकॉर्ड उपलब्ध है।

उप संचालक कार्यालय तक पहुंची शिकायत, फिर भी राहत नहीं मिलने का आरोप

शिकायतकर्ता पक्ष के मुताबिक, नर्सरी स्तर पर समाधान नहीं मिलने के बाद वे उप संचालक उद्यानिकी कार्यालय पहुंचे। प्रतिनिधियों ने आरोप लगाया कि वहां मौजूद अधिकारी श्री पैकरा ने भी उनकी समस्या का समाधान नहीं किया।

उनके अनुसार, अधिकारी ने कथित तौर पर यह कहते हुए हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया कि मामला संबंधित गार्डन सुपरिंटेंडेंट के अधिकार क्षेत्र का है और वे जहां चाहें शिकायत कर सकते हैं।

यह कथन फिलहाल शिकायतकर्ता पक्ष के हवाले से सामने आया है। संबंधित अधिकारी का पक्ष सामने आना जरूरी है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि उनके समक्ष किस प्रकार की शिकायत रखी गई थी, प्रमाणपत्र जारी करने का अधिकार किसके पास था और क्या शिकायत पर कोई वैकल्पिक प्रक्रिया बताई गई थी।

यदि किसी अधिकारी के पास प्रमाणपत्र जारी करने का अधिकार नहीं था, तो भी शिकायतकर्ता को उचित प्रक्रिया, जिम्मेदार अधिकारी और शिकायत दर्ज कराने के माध्यम के बारे में मार्गदर्शन दिया जाना चाहिए था या नहीं—यह प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा महत्वपूर्ण सवाल है।

क्या किसी कंपनी को प्रतिस्पर्धा से बाहर होने का नुकसान हुआ..?

शिकायतकर्ता प्रतिनिधियों ने आशंका जताई है कि प्रमाणपत्र समय पर नहीं मिलने के कारण उनकी कंपनी निविदा प्रक्रिया में प्रभावी रूप से भाग लेने से वंचित रह गई। उन्होंने यह भी संदेह व्यक्त किया है कि इस घटनाक्रम से किसी दूसरी कंपनी को अनुचित लाभ मिल सकता था।

हालांकि, किसी पसंदीदा कंपनी को लाभ पहुंचाने का आरोप अभी प्रमाणित नहीं है। इस आशंका की जांच के लिए यह देखना जरूरी होगा कि कितनी कंपनियों ने निविदा में भाग लिया, किन कंपनियों ने साइट विजिट प्रमाणपत्र जमा किया, किसे प्रमाणपत्र जारी किए गए और तकनीकी मूल्यांकन में किन आधारों पर पात्रता तय की गई।

जांच में यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया सभी संभावित बोलीदाताओं के लिए समान थी या नहीं। यदि किसी कंपनी को समय पर दस्तावेज उपलब्ध कराया गया और दूसरी कंपनी को समान परिस्थितियों में नहीं मिला, तो उसके पीछे का कारण रिकॉर्ड के आधार पर सामने आना चाहिए।

केवल आशंका के आधार पर किसी अधिकारी या कंपनी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन शिकायत में उठाए गए सवालों की निष्पक्ष जांच करना भी उतना ही आवश्यक है।

GeM टेंडर की ऑनलाइन व्यवस्था और जमीनी प्रक्रिया में तालमेल जरूरी

GeM यानी Government e-Marketplace सरकारी विभागों की खरीद प्रक्रिया के लिए डिजिटल मंच है। ऑनलाइन निविदा का उद्देश्य प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित, पारदर्शी और प्रतिस्पर्धात्मक बनाना है। लेकिन निविदा से जुड़ी कुछ शर्तें यदि स्थल निरीक्षण, भौतिक सत्यापन या विभागीय प्रमाणपत्र पर निर्भर करती हैं, तो उन्हें पूरा कराने की व्यवस्था भी स्पष्ट और समयबद्ध होनी चाहिए।

ऐसी स्थिति में संबंधित विभाग की जिम्मेदारी केवल निविदा जारी करने तक सीमित नहीं रहती। आवश्यक दस्तावेजों के संबंध में स्पष्ट दिशा-निर्देश, जिम्मेदार अधिकारी की जानकारी और शिकायतों के निवारण की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

इस प्रकरण में जांच के दौरान यह देखना जरूरी होगा कि साइट विजिट प्रमाणपत्र वास्तव में निविदा की अनिवार्य शर्त था या नहीं, उसके प्रारूप और जारी करने की प्रक्रिया में क्या प्रावधान थे तथा दस्तावेज उपलब्ध कराने में किसी स्तर पर अनावश्यक देरी हुई या नहीं।

यदि कोई दावेदार समय रहते निर्धारित औपचारिकता पूरी करना चाहता था, लेकिन विभागीय स्तर पर उसे आवश्यक सहयोग नहीं मिला, तो यह स्थिति निविदा की निष्पक्षता को प्रभावित कर सकती है। दूसरी ओर, यदि प्रमाणपत्र जारी करने में कोई वैध प्रक्रियागत बाधा थी, तो उसका रिकॉर्ड और कारण भी सार्वजनिक जवाबदेही के दायरे में आने चाहिए।

सार्वजनिक टेंडर रिकॉर्ड में भी दस्तावेजों का मिलान जरूरी

इस मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य का आधिकारिक दस्तावेजों से मिलान किया जाना आवश्यक है। सार्वजनिक निविदा-सूची में GEM/2026/B/8119298 के लिए कार्य का विवरण भूमिगत जल निकासी और जल-स्रोत प्रणाली की आपूर्ति एवं स्थापना से संबंधित बताया गया है। उसी सूची में बोली जमा करने की अंतिम तिथि 24 अक्टूबर 2026 दर्ज है। यह विवरण निविदा संबंधी एक सार्वजनिक तृतीय-पक्ष सूची में उपलब्ध है। https://www.tendershark.com/details/chhattisgarh-tender/directorate-of-horticulture-and-farm-forestry/0b984c3a-f07b-416a-adb8-2c9dd76ee729

वहीं, शिकायत में इस निविदा को परागांव उद्यानिकी नर्सरी से जोड़कर साइट विजिट प्रमाणपत्र का मुद्दा उठाया गया है। इसलिए अंतिम समाचार में निविदा के वास्तविक कार्यस्थल, विभागीय कार्यालय, शर्तों और प्रमाणपत्र की अनिवार्यता की पुष्टि मूल GeM निविदा दस्तावेजों से करना आवश्यक है। उपलब्ध सार्वजनिक सूची अकेले यह प्रमाणित नहीं करती कि शिकायत में वर्णित प्रत्येक घटना सही है या प्रमाणपत्र न मिलने के कारण ही कोई बोलीदाता प्रक्रिया से बाहर हुआ।

यह दस्तावेजी मिलान इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि निविदा क्रमांक, कार्यस्थल और अंतिम तिथि में किसी भी प्रकार की त्रुटि समाचार की विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकती है।

जांच के दायरे में आने चाहिए ये पांच प्रमुख बिंदु

1.प्रमाणपत्र जारी करने की जिम्मेदारी: संबंधित साइट विजिट प्रमाणपत्र जारी करने और उस पर हस्ताक्षर करने के लिए अधिकृत अधिकारी कौन था..?

2.संपर्क और आवेदन का रिकॉर्ड: क्या कंपनी के प्रतिनिधियों ने पांच दिनों तक संपर्क किया था? क्या उनके आवेदन, ईमेल, पत्राचार या फोन संपर्क का कोई सत्यापन योग्य रिकॉर्ड उपलब्ध है..?

3.सभी दावेदारों के साथ समान व्यवहार: क्या अन्य बोलीदाताओं को प्रमाणपत्र समय पर उपलब्ध कराए गए? यदि हां, तो संबंधित रिकॉर्ड में कोई असमानता दिखाई देती है या नहीं..?

4.बोली पर पड़ा वास्तविक प्रभाव: क्या प्रमाणपत्र नहीं मिलने के कारण कंपनी की बोली जमा नहीं हो सकी, तकनीकी रूप से अस्वीकार हुई या किसी अन्य कारण से प्रक्रिया में शामिल नहीं हो पाई..?

5.उच्चाधिकारियों की भूमिका: शिकायत मिलने पर उप संचालक कार्यालय ने क्या कार्रवाई की? क्या मामले को लिखित रूप में दर्ज कर संबंधित अधिकारी से जवाब मांगा गया..?

इन बिंदुओं पर तथ्यात्मक जांच होने से यह स्पष्ट हो सकता है कि मामला प्रशासनिक लापरवाही, प्रक्रिया संबंधी भ्रम या किसी गंभीर अनियमितता से जुड़ा है।

उच्चस्तरीय जांच और जवाबदेही तय करने की मांग

शिकायतकर्ता पक्ष की मांग है कि संबंधित निविदा की प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच कराई जाए और प्रमाणपत्र जारी करने में हुई कथित देरी की जिम्मेदारी तय की जाए। इसके साथ ही, यदि किसी स्तर पर नियमों के उल्लंघन या किसी बोलीदाता के साथ असमान व्यवहार की पुष्टि होती है, तो नियमानुसार उचित कार्रवाई की जाए।

जांच के लिए मूल निविदा दस्तावेज, साइट विजिट प्रमाणपत्र का प्रारूप, आवेदन एवं पत्राचार, प्रमाणपत्र जारी करने का रिकॉर्ड, तकनीकी मूल्यांकन और निविदा से संबंधित अन्य अभिलेखों की समीक्षा उपयोगी होगी। जरूरत पड़ने पर संबंधित अधिकारियों और कंपनी के प्रतिनिधियों के बयान भी दर्ज किए जा सकते हैं।

यदि जांच में यह सामने आता है कि किसी पात्र बोलीदाता को विभागीय स्तर पर आवश्यक दस्तावेज जानबूझकर उपलब्ध नहीं कराया गया और इससे प्रतिस्पर्धा प्रभावित हुई, तो सक्षम प्राधिकारी को लागू नियमों के अनुसार सुधारात्मक कदम उठाने चाहिए। निविदा निरस्त करने या दोबारा आमंत्रित करने का निर्णय भी जांच के निष्कर्ष और लागू प्रावधानों के आधार पर ही लिया जाना चाहिए।

अब विभाग के जवाब पर टिकी निगाहें

GeM टेंडर से जुड़े इस प्रकरण में फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात आरोपों की गंभीरता के साथ-साथ उनकी निष्पक्ष पुष्टि है। यदि शिकायतकर्ता का दावा सही पाया जाता है, तो यह सरकारी निविदाओं में आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराने, अधिकारियों की जवाबदेही और समान अवसर सुनिश्चित करने की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करेगा।

अब देखना होगा कि उद्यानिकी विभाग शिकायत पर क्या रुख अपनाता है, संबंधित अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगा जाता है या नहीं और निविदा के दस्तावेजों की जांच के बाद क्या निष्कर्ष सामने आते हैं।

फिलहाल मुख्य सवाल यही है—जब किसी निविदा में प्रमाणपत्र अनिवार्य हो, तो उसे समय पर उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी किसकी है और यदि उसी दस्तावेज के अभाव में किसी दावेदार का अवसर प्रभावित हो जाए, तो जवाबदेही कौन तय करेगा।

इस मामले में पक्ष लेने कैलाश सिंह पैकरा (DDH) को 9406375470 से संपर्क करने पर किसी प्रकार से कोई जवाब नहीं दिया गया और न ही फोन उठाया गया।

एक नंबरी मुख्यमंत्री के राज्य हो रहे है, दो नंबरी कामकाज – विनोद चंद्राकर

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10 साल का संलग्नीकरण, प्रशिक्षण के बिलों पर सवाल और LRP के मानदेय से कथित वसूली! कलेक्टर को सौंपी शिकायत ने बढ़ाई विभागीय जवाबदेही की चुनौती

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता | 24 अक्टूबर 2026 /दिन शनिवार/महासमुंद, छत्तीसगढ़
महासमुंद। जिले के कृषि विभाग में कथित वित्तीय अनियमितताओं, सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन, अधिकारियों-कर्मचारियों के संलग्नीकरण और किसानों के साथ व्यवहार को लेकर विवाद गहराता नजर आ रहा है। विभाग की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवालों के बीच महासमुंद के पूर्व विधायक विनोद सेवनलाल चंद्राकर की शिकायत ने मामले को नया राजनीतिक और प्रशासनिक मोड़ दे दिया है। पूर्व विधायक ने उप संचालक कृषि फागुराम राम कश्यप (F.R. कश्यप) के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करने की मांग उठाई है। साथ ही, कृषि विभाग में लंबे समय से संलग्न ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी जितेंद्र पटेल की पदस्थापना, विभिन्न योजनाओं के खर्च और कथित अवैध वसूली के आरोपों की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की गई है।
पूर्व विधायक की ओर से कलेक्टर को सौंपे गए शिकायत पत्र में विभागीय व्यवस्था से जुड़े कई गंभीर मुद्दे उठाए गए हैं। शिकायत के अनुसार, पत्र क्रमांक कार्या.पु.वि.महा./2025/323, दिनांक 15 अप्रैल 2025 के माध्यम से कृषि विभाग में कथित वित्तीय अनियमितताओं की जांच, संलग्नीकरण समाप्त करने और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की गई थी। अब इन आरोपों के आधार पर यह सवाल उठ रहा है कि शिकायत पर क्या कार्रवाई हुई, संबंधित अभिलेखों की जांच किस स्तर तक पहुंची और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही कब तय होगी?
हालांकि, शिकायत में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और किसी भी अधिकारी की आपराधिक जिम्मेदारी का निर्धारण जांच एवं सक्षम न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही किया जा सकता है।

1.दस साल से कार्यालय में संलग्न रहने का आरोप, मूल पदस्थापना पिथौरा में

शिकायत का एक प्रमुख मुद्दा ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी जितेंद्र पटेल का लंबे समय से उप संचालक कृषि कार्यालय महासमुंद में संलग्न रहना है। पूर्व विधायक की शिकायत के अनुसार, पटेल की मूल पदस्थापना कार्यालय वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी, पिथौरा में है, लेकिन वह लगभग दस वर्षों से जिला कार्यालय में संलग्न होकर काम कर रहे हैं।

शिकायत में यह भी सवाल उठाया गया है कि राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, स्वायल हेल्थ कार्ड योजना, जैविक खेती मिशन और परंपरागत कृषि विकास योजना जैसे महत्वपूर्ण कार्यक्रमों की जिम्मेदारियां लंबे समय तक एक ही कर्मचारी के पास रहने से विभागीय कार्यप्रणाली और पारदर्शिता पर क्या प्रभाव पड़ा?

यदि संबंधित अवधि में संलग्नीकरण की अनुमति, कार्य-विभाजन और जिम्मेदारियों से जुड़े नियमों का पालन नहीं हुआ है, तो इसकी जांच आवश्यक है। प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि संलग्नीकरण किन आदेशों के आधार पर जारी रहा और समय-समय पर इसकी समीक्षा की गई या नहीं।

2.उप संचालक F.R. कश्यप के खिलाफ FIR की मांग, जांच पर टिकी निगाहें

पूर्व विधायक विनोद सेवनलाल चंद्राकर ने उप संचालक कृषि F.R. कश्यप के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करने की मांग की है। उनका आरोप है कि विभाग में कथित वित्तीय अनियमितताओं और प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े मामलों की गंभीरता को देखते हुए निष्पक्ष जांच और जवाबदेही तय करना जरूरी है।

यह मांग ऐसे समय सामने आई है, जब कृषि उपकरणों की खरीदी, योजनाओं के अंतर्गत सामग्री वितरण, प्रशिक्षण कार्यक्रमों के व्यय और कर्मचारियों के संलग्नीकरण को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।

अब महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि कलेक्टर और संबंधित विभागीय अधिकारी शिकायत में दर्ज प्रत्येक बिंदु का परीक्षण किस प्रकार कराते हैं। यदि दस्तावेजी जांच में प्रथमदृष्टया संज्ञेय अपराध के पर्याप्त आधार सामने आते हैं, तो कानून के अनुरूप कार्रवाई की जानी चाहिए।
सिर्फ आरोप लगना किसी को दोषी साबित नहीं करता, लेकिन गंभीर शिकायतों की निष्पक्ष जांच और उस पर हुई कार्रवाई की जानकारी सार्वजनिक करना प्रशासनिक पारदर्शिता के लिए महत्वपूर्ण है।

3.कृषि उपकरणों की खरीदी पर सवाल: दरें, बिल और भुगतान खंगालने की मांग

कृषि विभाग में बीज, कृषि उपकरणों और अन्य सामग्रियों की खरीदी को लेकर भी शिकायत में अनियमितताओं की आशंका जताई गई है। आरोप है कि कुछ खरीदी प्रक्रियाओं में निर्धारित नियमों, वित्तीय स्वीकृतियों और दर निर्धारण की प्रक्रिया का समुचित पालन नहीं किया गया तथा सामग्री की कीमतों को लेकर सवाल खड़े हुए हैं।

इन आरोपों की वास्तविकता सामने लाने के लिए संबंधित वर्षों के निविदा दस्तावेज, स्वीकृति आदेश, तुलनात्मक दर-पत्रक, आपूर्तिकर्ताओं के बिल, भुगतान विवरण और स्टॉक रजिस्टर की जांच जरूरी होगी।

यह भी देखा जाना चाहिए कि खरीदी गई सामग्री वास्तव में प्राप्त हुई या नहीं, उसका वितरण किन लाभार्थियों को किया गया और दर्ज मात्रा का भौतिक सत्यापन उपलब्ध अभिलेखों से मेल खाता है या नहीं।

यदि खरीदी प्रक्रिया में अनियमितता पाई जाती है, तो उसकी प्रकृति और जिम्मेदारी निर्धारित कर नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।

4.जैविक खेती मिशन: किसानों को निर्धारित सामग्री मिली या खरीद का दबाव बनाया गया..?

वर्ष 2021 से 2024 के बीच जैविक खेती मिशन के अंतर्गत स्वीकृत गतिविधियों और किसानों को मिलने वाली सुविधाओं को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।

शिकायत में आरोप लगाया गया है कि निर्धारित घटकों की सामग्री उपलब्ध कराने के बजाय कुछ किसानों को बैटरी चालित स्प्रेयर खरीदने के लिए बाध्य किया गया। इस प्रक्रिया में कथित कमीशनखोरी की आशंका भी व्यक्त की गई है।

इन आरोपों की जांच के लिए योजना की स्वीकृत शर्तों, लाभार्थियों की सूची, सामग्री वितरण पंजी, खरीद बिलों और किसानों के बयानों का मिलान किया जाना चाहिए। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि किसानों को सामग्री उपलब्ध कराने का निर्धारित तरीका क्या था और वास्तविक वितरण उसी के अनुरूप हुआ या नहीं।

यदि किसानों पर नियमों के विपरीत खरीद का दबाव बनाए जाने अथवा किसी प्रकार की अवैध राशि लिए जाने के प्रमाण मिलते हैं, तो संबंधित व्यक्तियों की भूमिका की जांच कर उचित कार्रवाई की जानी चाहिए।

5.प्रशिक्षण कार्यक्रमों के खर्च पर संदेह: उपस्थिति से लेकर बैंक भुगतान तक हो सत्यापन

कृषि विभाग की योजनाओं के अंतर्गत आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रमों और अन्य गतिविधियों के खर्च को लेकर भी शिकायत में गंभीर आरोप लगाए गए हैं। शिकायतकर्ता की ओर से ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी जितेंद्र पटेल, प्रभारी वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी बागबाहरा गंगाप्रसाद शरणागत तथा आत्मा योजना से जुड़े एक ऑपरेटर की भूमिका की जांच की मांग की गई है।

आरोप है कि प्रशिक्षण मद में कथित तौर पर फर्जी बिलों के माध्यम से शासकीय राशि का आहरण किया गया। हालांकि, इस संबंध में अंतिम निष्कर्ष दस्तावेजों और जांच के आधार पर ही निकाला जा सकता है।

प्रशासन को प्रशिक्षण की तिथियों, आयोजन स्थल, प्रतिभागियों की सूची, उपस्थिति रजिस्टर, भोजन एवं सामग्री के बिल, भुगतान स्वीकृति और बैंक लेन-देन का मिलान कराना चाहिए। यदि प्रशिक्षण वास्तव में आयोजित हुए थे, तो उनकी पुष्टि संबंधित प्रतिभागियों और उपलब्ध रिकॉर्ड से की जा सकती है।

सवाल सीधा है—यदि खर्च वास्तविक था, तो उसके समर्थन में रिकॉर्ड क्या कहते हैं? और यदि दस्तावेजों में विसंगति मिलती है, तो उसके लिए जिम्मेदार कौन होगा..?

6.LRP के मानदेय से कथित वसूली: डिजिटल लेन-देन की जांच की मांग

शिकायत का सबसे संवेदनशील पहलू परंपरागत कृषि विकास योजना के अंतर्गत कार्यरत एलआरपी यानी लोकल रिसोर्स पर्सन के मानदेय से कथित अवैध वसूली का आरोप है।

शिकायत के अनुसार, प्रति क्लस्टर लगभग 50 हजार रुपये के मानदेय से संबंधित भुगतान के बाद कुछ राशि वापस लिए जाने की आशंका जताई गई है। पूर्व विधायक ने इस संबंध में डिजिटल लेन-देन के स्क्रीनशॉट भी शिकायत के साथ संलग्न किए जाने का उल्लेख किया है।

शिकायत में प्रस्तुत विवरण के अनुसार, 3 नवंबर 2023 को फोनपे के माध्यम से जितेंद्र पटेल के नाम से दर्शाए गए खाते में 10 हजार रुपये और 5 हजार रुपये के दो अलग-अलग लेन-देन का उल्लेख है। इसके अलावा, 11 दिसंबर 2020 को राजेश कुमार मिर्धा और अन्य खातों में 25-25 हजार रुपये के दो पृथक यूपीआई लेन-देन का भी हवाला दिया गया है।
इन लेन-देन का उल्लेख शिकायत में होना अपने आप में अवैध वसूली का निर्णायक प्रमाण नहीं है। इसके लिए भुगतान का वास्तविक उद्देश्य, संबंधित खाताधारकों की भूमिका, धन के स्रोत और प्राप्ति, लेन-देन की परिस्थितियों तथा एलआरपी के बयानों की जांच आवश्यक होगी।

यदि डिजिटल साक्ष्य और अन्य दस्तावेज किसी गैरकानूनी लेन-देन की पुष्टि करते हैं, तो संबंधित व्यक्तियों की जिम्मेदारी तय करते हुए कानून के अनुरूप कार्रवाई की जानी चाहिए।

7.एक ही शाखा में लंबे समय तक पदस्थापना: कार्य-विभाजन और संपत्ति की जांच की मांग

पूर्व विधायक ने शिकायत में लंबे समय से एक ही कार्यालय या शाखा में कार्यरत कर्मचारियों की पदस्थापना और विभागीय जिम्मेदारियों की समीक्षा की मांग भी उठाई है।

शिकायत के अनुसार, एक ही कर्मचारी के पास वर्षों तक महत्वपूर्ण योजनाओं का प्रभार बने रहने से कार्यप्रणाली की पारदर्शिता और निगरानी को लेकर सवाल उत्पन्न होते हैं। इसी संदर्भ में संबंधित कर्मचारियों की पदस्थापना, कार्य-विभाजन, योजना संबंधी निर्णयों और वित्तीय जिम्मेदारियों की जांच की मांग की गई है।

शिकायत में संबंधित अवधि के दौरान अर्जित संपत्ति और वित्तीय लेन-देन की जांच कराने की मांग भी शामिल है। ऐसी जांच सक्षम प्राधिकारी द्वारा लागू नियमों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही की जानी चाहिए।

8.13 अक्टूबर 2025 का भारमुक्त आदेश: फिर भी जिला कार्यालय में काम करने का आरोप

जितेंद्र पटेल के संलग्नीकरण का मुद्दा प्रशासनिक जवाबदेही के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। उपलब्ध शिकायत विवरण के अनुसार, उप संचालक कार्यालय की ओर से 13 अक्टूबर 2025 को उन्हें भारमुक्त करने संबंधी आदेश जारी किए जाने का उल्लेख है। इसके बावजूद उनके जिला कार्यालय महासमुंद में कार्यरत बने रहने को लेकर सवाल उठाए गए हैं।

इस मामले में सबसे पहले संबंधित आदेश की प्रमाणित प्रति, उसके पालन की स्थिति, कार्यमुक्ति की वास्तविक तारीख और उसके बाद जारी किसी संशोधित या स्थगन आदेश की जांच की जानी चाहिए।

यदि भारमुक्ति आदेश प्रभावी था और उसका पालन नहीं हुआ, तो यह स्पष्ट करना आवश्यक होगा कि ऐसा किन परिस्थितियों में हुआ और इसकी जिम्मेदारी किसकी थी। वहीं, यदि बाद में कोई वैधानिक आदेश जारी हुआ था, तो उसका विवरण भी सामने आना चाहिए।

9.किसानों के व्यवहार संबंधी आरोप: भारतीय किसान संघ ने भी उठाए सवाल

कृषि विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर किसानों के साथ कथित दुर्व्यवहार का मुद्दा भी सामने आया है। शिकायत विवरण के अनुसार, भारतीय किसान संघ की महासमुंद जिला इकाई से जुड़े किसानों ने उप संचालक कृषि F.R. कश्यप के व्यवहार पर आपत्ति जताते हुए जिला कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा है।
ज्ञापन में कौशल्या तिवारी, शोभ कुमार साहू, रूपेश कुमार, भेख लाल साहू, नेम लाल चंद्राकर, अश्वनी साहू, सोहन, चगन साहू, हेमंत साहू और कुंदन सहित अन्य किसानों के नामों का उल्लेख किया गया है।
किसानों की शिकायतों की निष्पक्ष सुनवाई होना जरूरी है। प्रशासन को संबंधित पक्षों के बयान लेकर यह स्पष्ट करना चाहिए कि कार्यालय में किसानों को किन समस्याओं का सामना करना पड़ा और शिकायतों के समाधान के लिए क्या कदम उठाए गए।
कृषि विभाग का काम किसानों को योजनाओं की जानकारी देना, तकनीकी सहायता उपलब्ध कराना और उनकी समस्याओं का समाधान करना है। ऐसे में किसानों के सम्मान और शिकायत निवारण की व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।

10.कृषि अधिकारियों के संगठन की नाराजगी,
आंदोलन की चेतावनी

ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी जितेंद्र पटेल को उनकी मूल पदस्थापना पिथौरा भेजने की मांग को लेकर कृषि कर्मचारियों के बीच भी असंतोष की बात सामने आई है।

शिकायत विवरण के अनुसार, छत्तीसगढ़ कृषि स्नातक शासकीय कृषि अधिकारी संघ और मैदानी कर्मचारियों की ओर से इस संबंध में मांग उठाई गई है। मांग पूरी नहीं होने की स्थिति में आंदोलन की चेतावनी दिए जाने का भी उल्लेख है।
यदि विभाग के भीतर पदस्थापना और कार्य-विभाजन को लेकर विवाद बढ़ता है, तो इसका असर मैदानी स्तर पर योजनाओं के क्रियान्वयन और किसानों को मिलने वाली सेवाओं पर पड़ सकता है। इसलिए प्रशासन को संबंधित आदेशों की स्थिति स्पष्ट करते हुए विवाद का नियमसम्मत समाधान निकालना चाहिए।

11.कलेक्टर के सामने प्रमुख सवाल: शिकायत पर अब तक क्या कार्रवाई हुई..?

पूर्व विधायक की शिकायत और विभागीय कार्यप्रणाली को लेकर उठे सवालों के बीच अब जिला प्रशासन की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। मामले में पारदर्शिता लाने के लिए निम्न बिंदुओं पर आधिकारिक जानकारी सामने आना जरूरी है—

FIR की मांग: उप संचालक F.R. कश्यप के विरुद्ध लगाए गए आरोपों की जांच किस स्तर पर है और कानूनी कार्रवाई के लिए क्या निर्णय लिया गया..?

वित्तीय परीक्षण: कृषि उपकरणों की खरीदी, दर निर्धारण और सामग्री वितरण के रिकॉर्ड का परीक्षण कराया गया है या नहीं..?

LRP भुगतान: शिकायत में उल्लिखित डिजिटल लेन-देन का सत्यापन हुआ है या नहीं? भुगतान का वास्तविक उद्देश्य क्या था..?

प्रशिक्षण व्यय: प्रशिक्षण कार्यक्रमों के बिल, उपस्थिति रजिस्टर और भुगतान विवरण का मिलान कराया गया है या नहीं..?

संलग्नीकरण: जितेंद्र पटेल के संबंध में 13 अक्टूबर 2025 को जारी भारमुक्ति आदेश का पालन हुआ या नहीं..?

किसानों की शिकायत: भारतीय किसान संघ के ज्ञापन पर क्या कार्रवाई की गई और शिकायतकर्ताओं को क्या जवाब दिया गया..?

जवाबदेही: जांच में अनियमितता पाए जाने पर संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों के विरुद्ध क्या कार्रवाई प्रस्तावित है..?

इन सवालों के जवाब केवल विभागीय स्पष्टीकरण से नहीं, बल्कि प्रमाणित दस्तावेजों, निष्पक्ष जांच और कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट होने से ही मिल सकेंगे।

धान खरीदी से पहले कृषि विभाग की कार्यप्रणाली पर निगाहें

धान खरीदी का मौसम नजदीक होने के साथ कृषि विभाग की प्रशासनिक व्यवस्था और मैदानी कार्यों का सुचारु संचालन बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। किसानों को समय पर तकनीकी मार्गदर्शन, योजनाओं का लाभ और विभागीय सहायता मिलना जरूरी है।
ऐसे समय में वित्तीय अनियमितताओं के आरोप, संलग्नीकरण को लेकर विवाद और किसानों की शिकायतें प्रशासन के लिए गंभीर चुनौती हैं। मामले की निष्पक्ष जांच से न केवल आरोपों की वास्तविकता सामने आएगी, बल्कि विभागीय कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही भी सुनिश्चित हो सकेगी।

अब निगाहें कलेक्टर विनय कुमार लंगेह और संबंधित विभागीय अधिकारियों के अगले कदम पर हैं।

क्या शिकायत में उठाए गए सवालों की स्वतंत्र जांच कराई जाएगी? क्या डिजिटल लेन-देन और वित्तीय रिकॉर्ड का सत्यापन होगा? क्या संलग्नीकरण आदेश की स्थिति सार्वजनिक की जाएगी? और क्या जांच में दोषी पाए जाने वालों पर नियमानुसार कार्रवाई होगी?
इन सवालों का जवाब आने वाले दिनों में इस पूरे प्रकरण की दिशा तय कर सकता है।

बेबाक बयान न्यूज | हर बात खुलकर, हर राज खुलकर।

दृश्यम मूवी की तर्ज पर कोरोना काल के गर्भ में “कफ़न” पहन “दफन” हो गया “39 लाख” का भूत

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नोटिस के दो साल बाद भी जवाबदेही पर सवाल, CEO जिला पंचायत और उप संचालक पंचायत की कार्यप्रणाली पर उठी उंगलियां!

सैनिटाइजर, मास्क और स्वच्छता सामग्री की खरीदी से जुड़ा मामला फिर चर्चा में; 26 जून 2024 को जारी हुए थे कारण बताओ नोटिस, अब जांच के निष्कर्ष और अंतिम कार्रवाई सार्वजनिक करने की मांग

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता | बेबाक बयान न्यूज़ / 23 अक्टूबर 2026/दिन शुक्रवार
महासमुंद, छत्तीसगढ़। यह एक बहुचर्चित सस्पेंस थ्रीलर मूवी दृश्यम से कम नहीं आंका जा सकता है।
क्यों इस 39 लाख के मूवी को ऐसा तैयार किया गया है जब जब कोई सबूत मिलेगा उसको फिर से दफन करने में महारत हासिल किये हुए कलाकार अपनी कलाकृति से नए स्क्रिप्ट के रूप में सामने आ जाता है।
बता दे कि, पूरे पंचायत जगत में यह चर्चा का विषय बना हुआ है कि, जिस करारोपण अधिकारी लिपिक दिलीप कुमार मनहरे को जांच अधिकारी बनाकर शिकायत मिलने पर जांच टीम गठित की जाती है और ग्राम पंचायतों में जांच अधिकारी बन रौब दिखाते हुए सरपंचों को कहा जाता है कि, ज्यादा नेतागिरी करोगे तो धारा 40 के तहत निपटा दूंगा। जबकि जांचकर्ता अधिकारी द्वारा किए गए कृत्य में स्वयं आरोप सिद्ध होने पर भी आज दिवस तक किसी प्रकार से कोई कार्यवाही नहीं होना अपने आप में प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है।
कहां जाता है कि, जब जब जिस जिस युगों में महामारी किसी भी रूप में जन्म लेती है तो उस युग के जीवंत जीवों को नफ़ा और नुकसान तो सहना ही पड़ता है कोई रोता है तो तो कोई उन रोते हुए परिवारों को लूटने में पीछे नहीं हटते । इसी लिए कहा जाता है कि, कोई भी महामारी किसी को बहुत आगे ले जाती है और किसी को बहुत पीछे छोड़ जाती है। ताजा उदाहरण सम्पूर्ण प्रदेश में व्याप्त कोरोना महामारी के दौर में सरकारी धन से की गई खरीदी और उसके भुगतान की पारदर्शिता को लेकर महासमुंद जनपद पंचायत का एक पुराना मामला एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। सैनिटाइजर, मास्क और स्वच्छता सामग्री की खरीदी से संबंधित लगभग 39 लाख रुपये के कथित वित्तीय अनियमितता प्रकरण में कारण बताओ नोटिस जारी होने के बावजूद अंतिम कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट नहीं होने का आरोप लगाया जा रहा है। ऐसे में सवाल केवल खरीदी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी है कि संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों से जवाब मांगने के बाद प्रशासन ने आगे क्या कदम उठाए?

इस मामले में मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जिला पंचायत महासमुंद तथा उप संचालक पंचायत की कार्यप्रणाली को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। यदि प्रकरण में अनियमितताओं को लेकर नोटिस जारी किए गए थे, तो उनकी जांच का निष्कर्ष क्या निकला? संबंधित पक्षों के जवाबों का परीक्षण किस स्तर पर हुआ? और यदि नियमों का उल्लंघन प्रमाणित पाया गया, तो जिम्मेदारी निर्धारित करने तथा आगे की कार्रवाई में देरी क्यों हुई? इन सवालों का स्पष्ट जवाब सामने आना जरूरी है।

कोरोना काल की खरीदी पर संदेह, ₹39 लाख के खर्च का हिसाब मांग रहे सवाल

उपलब्ध विवरण के अनुसार, वर्ष 2019-20 के दौरान जनपद पंचायत महासमुंद में कोरोना संक्रमण की रोकथाम और स्वच्छता व्यवस्था के लिए सैनिटाइजर, मास्क तथा अन्य आवश्यक सामग्री की खरीदी की गई थी। इसी खरीदी और भुगतान प्रक्रिया को लेकर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं।

शिकायत में आरोप लगाया गया है कि खरीदी के दौरान निर्धारित प्रक्रियाओं का समुचित पालन नहीं किया गया। भुगतान की स्वीकृति, वेंडरों के चयन, बिल-वाउचर की वैधता और सामग्री की वास्तविक आपूर्ति जैसे बिंदुओं पर जांच की आवश्यकता जताई गई है।

हालांकि, इन आरोपों को अंतिम रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता। इसकी वास्तविक स्थिति संबंधित खरीदी की मूल नस्ती, स्वीकृति आदेश, भुगतान अभिलेख, स्टॉक रजिस्टर और जांच रिपोर्ट के परीक्षण से ही स्पष्ट होगी।

खरीदी प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों को लेकर उठे ये सवाल

मामले से संबंधित शिकायत में कई बिंदुओं पर आपत्ति जताई गई है। इनमें प्रमुख रूप से निम्न सवाल शामिल हैं:

1.क्या नियमों के अनुसार हुई थी खरीदी?

क्या सैनिटाइजर, मास्क और स्वच्छता सामग्री की खरीदी के लिए सक्षम अधिकारी की विधिवत स्वीकृति ली गई थी? क्या लागू भंडार क्रय नियमों और निर्धारित वित्तीय प्रक्रियाओं का पालन किया गया था? यदि किसी विशेष परिस्थिति में सामान्य प्रक्रिया से अलग व्यवस्था अपनाई गई, तो क्या उसके समर्थन में वैध आदेश और दस्तावेज मौजूद हैं?

2.भुगतान की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी थी?

शिकायत में आरोप है कि भुगतान प्रक्रिया में आवश्यक औपचारिकताओं की अनदेखी की गई। ऐसे में यह स्पष्ट होना चाहिए कि भुगतान किन फर्मों या वेंडरों को किया गया, भुगतान की स्वीकृति किस अधिकारी ने दी और प्रत्येक भुगतान के समर्थन में कौन-कौन से दस्तावेज उपलब्ध हैं।

3.खरीदी गई सामग्री की वास्तविक आपूर्ति हुई या नहीं?

सरकारी धन से खरीदी गई सामग्री की मात्रा, गुणवत्ता और वितरण का सत्यापन महत्वपूर्ण है। क्या संबंधित सामग्री का स्टॉक रजिस्टर में विधिवत संधारण हुआ? क्या सामग्री प्राप्त होने के प्रमाण, वितरण सूची और भौतिक सत्यापन रिपोर्ट उपलब्ध हैं? यदि सामग्री की आपूर्ति हुई थी, तो उसके दस्तावेज सार्वजनिक जांच के लिए महत्वपूर्ण होंगे।

4.बिल-वाउचर और बैंक रिकॉर्ड की जांच हुई या नहीं?

किसी भी वित्तीय अनियमितता के आरोप की निष्पक्ष जांच के लिए मूल बिल, वाउचर, भुगतान आदेश, बैंक विवरण और संबंधित फर्मों के अभिलेखों का मिलान आवश्यक है। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि इन दस्तावेजों की जांच किसी सक्षम अधिकारी या लेखा परीक्षण दल ने की थी या नहीं।

इन बिंदुओं पर प्रमाण आधारित जांच ही तय कर सकती है कि मामला प्रक्रियागत चूक का है या इसमें कोई गंभीर वित्तीय अनियमितता हुई है।

26 जून 2024 को जारी हुए थे कारण बताओ नोटिस

इस प्रकरण का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जिला पंचायत महासमुंद द्वारा 26 जून 2024 को तत्कालीन संकाय शाखा प्रभारी समृद्धि शर्मा तथा तत्कालीन लिपिक दिलीप मनहरे को अलग-अलग कारण बताओ नोटिस जारी किए जाने की जानकारी सामने आई है।

बताया गया है कि नोटिस में खरीदी और भुगतान प्रक्रिया से संबंधित आपत्तियां दर्ज करते हुए संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों से तीन दिनों के भीतर जवाब मांगा गया था। उपलब्ध विवरण के अनुसार, नोटिस में संतोषजनक जवाब नहीं मिलने की स्थिति में निलंबन और अनुशासनात्मक कार्रवाई किए जाने की बात भी कही गई थी।

यदि नोटिस में निर्धारित समयसीमा के भीतर जवाब मांगे गए थे, तो अब यह जानना जरूरी है कि संबंधित पक्षों ने जवाब प्रस्तुत किए या नहीं। जवाब प्रस्तुत किए जाने की स्थिति में उनका परीक्षण किस अधिकारी ने किया?
क्या जांच अधिकारी नियुक्त किया गया? क्या आरोपों की पुष्टि या खारिज करने के लिए दस्तावेजों की जांच हुई? और क्या किसी सक्षम प्राधिकारी ने अंतिम आदेश जारी किया?
इन सवालों के जवाब के बिना केवल नोटिस जारी होने को अंतिम कार्रवाई नहीं माना जा सकता।

CEO जिला पंचायत और उप संचालक पंचायत की भूमिका पर सवाल

मामले में मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जिला पंचायत महासमुंद तथा उप संचालक पंचायत की कार्यप्रणाली को लेकर जवाबदेही संबंधी प्रश्न उठाए जा रहे हैं। खासकर यह जानना महत्वपूर्ण है कि नोटिस जारी होने के बाद प्रकरण किस स्तर पर लंबित रहा और उसकी वर्तमान प्रशासनिक स्थिति क्या है।

यदि संबंधित अधिकारियों के समक्ष जांच और कार्रवाई की फाइल लंबित रही है, तो उसके कारण स्पष्ट किए जाने चाहिए। यदि जांच पूरी हो चुकी है, तो उसके निष्कर्ष और आदेश की जानकारी सामने आनी चाहिए। वहीं, यदि किसी अन्य विभाग या सक्षम प्राधिकारी के स्तर पर निर्णय लंबित है, तो उसकी स्थिति भी स्पष्ट की जानी चाहिए।

सवाल यह नहीं कि केवल नोटिस जारी हुआ था; सवाल यह है कि नोटिस के बाद जांच कहां तक पहुंची और जवाबदेही तय करने के लिए क्या कार्रवाई हुई?

इस मामले में किसी अधिकारी या कर्मचारी को दोषी ठहराने से पहले जांच के निष्कर्ष और संबंधित पक्षों का जवाब सामने आना आवश्यक है। लेकिन सार्वजनिक धन से जुड़े मामले में कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट करना प्रशासनिक पारदर्शिता की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

पुलिस अधीक्षक, कलेक्टर और ACB/EOW से जांच की मांग

इस मामले को लेकर बेबाक बयान न्यूज़ के प्रधान संपादक मयंक गुप्ता द्वारा पुलिस अधीक्षक, जिला कलेक्टर महासमुंद तथा भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB)/आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (EOW), रायपुर के समक्ष शिकायत आवेदन प्रस्तुत किए जाने की जानकारी दी गई है।

शिकायत के माध्यम से मामले की निष्पक्ष जांच कराकर वित्तीय लेन-देन की वास्तविक स्थिति सामने लाने और यदि आरोप प्रमाणित हों, तो संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई करने की मांग की गई है।

शिकायत में प्रमुख रूप से निम्न मांगें उठाई गई हैं।

निष्पक्ष जांच: खरीदी की मूल नस्ती, स्वीकृति आदेश, बिल-वाउचर, बैंक रिकॉर्ड और सामग्री की आपूर्ति से जुड़े दस्तावेजों की जांच कराई जाए।

जिम्मेदारी तय हो: भुगतान की स्वीकृति देने, बिलों का परीक्षण करने और सामग्री की प्राप्ति दर्ज करने वाले संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका की जांच की जाए।

आपराधिक कार्रवाई पर निर्णय: यदि जांच में धोखाधड़ी, जालसाजी, आपराधिक षड्यंत्र या भ्रष्टाचार से संबंधित अपराध के पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं, तो सक्षम प्राधिकारी द्वारा लागू कानूनों के तहत FIR और आगे की कार्रवाई पर निर्णय लिया जाए।

विभागीय कार्रवाई: यदि विभागीय जांच में कदाचार प्रमाणित होता है, तो संबंधित सेवा नियमों के अनुसार कार्रवाई की जाए।

राशि की वसूली: यदि सरकारी धन का अनुचित भुगतान या नुकसान प्रमाणित होता है, तो विधिसम्मत प्रक्रिया के तहत जिम्मेदार पक्षों से वसूली की कार्रवाई की जाए।

वित्तीय एवं फॉरेंसिक जांच: आवश्यकता के अनुसार बिल-वाउचर, बैंक लेन-देन और आपूर्ति संबंधी अभिलेखों का स्वतंत्र परीक्षण कराया जाए।

क्या दो साल बाद भी अंतिम कार्रवाई का इंतजार?

26 जून 2024 को कारण बताओ नोटिस जारी किए जाने के विवरण और अब तक अंतिम कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट नहीं होने के आरोप के बीच यह मामला प्रशासनिक जवाबदेही का महत्वपूर्ण प्रश्न बन गया है। हालांकि, अंतिम आदेश जारी हुआ है या नहीं, विभागीय जांच की क्या स्थिति है और किसी स्तर पर कार्रवाई की गई है या नहीं—इन तथ्यों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।

यदि प्रकरण में अब तक कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है, तो संबंधित विभाग को विलंब के कारण स्पष्ट करने चाहिए। वहीं, यदि जांच पूरी हो चुकी है, तो उसके निष्कर्ष और की गई कार्रवाई की जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए, ताकि तथ्यों के आधार पर स्थिति स्पष्ट हो सके।

सरकारी धन जनता के करों और सार्वजनिक संसाधनों से जुड़ा होता है। इसलिए ऐसी खरीदी में पारदर्शिता, दस्तावेजों का सत्यापन और समयबद्ध कार्रवाई केवल विभागीय औपचारिकता नहीं, बल्कि सार्वजनिक जवाबदेही का हिस्सा है।

प्रशासन से सीधे सवाल

₹39 लाख की कथित अनियमितता से जुड़े मामले की वर्तमान स्थिति क्या है?

26 जून 2024 को जारी कारण बताओ नोटिस के बाद संबंधित पक्षों के जवाबों पर क्या निर्णय लिया गया?

क्या खरीदी, भुगतान और सामग्री की आपूर्ति का स्वतंत्र सत्यापन कराया गया?

मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जिला पंचायत महासमुंद और उप संचालक पंचायत के स्तर पर फाइल की क्या स्थिति है?

यदि आरोप प्रमाणित पाए गए हैं, तो अब तक क्या विभागीय, वित्तीय या कानूनी कार्रवाई की गई है?

यदि कोई कार्रवाई नहीं हुई है, तो देरी के कारण क्या हैं और अंतिम निर्णय कब तक लिया जाएगा?

अब जवाबदेही तय करने की जरूरत

महासमुंद जनपद पंचायत के कोरोना कालीन खरीदी प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है—दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच, आरोपों की पुष्टि या खंडन और जिम्मेदारी का स्पष्ट निर्धारण। केवल आरोपों के आधार पर किसी को दोषी ठहराना उचित नहीं है, लेकिन गंभीर वित्तीय सवालों को अनिश्चितकाल तक लंबित रखना भी सार्वजनिक हित में नहीं होगा।

शिकायतकर्ता की ओर से मामले में त्वरित जांच और आवश्यक कानूनी कार्रवाई की मांग की गई है। साथ ही, कार्रवाई नहीं होने की स्थिति में मामले को उच्च न्यायालय छत्तीसगढ़ तथा सक्षम विशेष न्यायालय के समक्ष ले जाने की चेतावनी दिए जाने की जानकारी भी सामने आई है।

अब देखना होगा कि जिला प्रशासन, जिला पंचायत और संबंधित विभाग इस मामले में क्या आधिकारिक जानकारी देते हैं और कथित ₹39 लाख की खरीदी से जुड़े सवालों का जवाब किस तरह सामने आता है।

बेबाक बयान न्यूज़ का पक्ष: इस समाचार में उठाए गए वित्तीय अनियमितता संबंधी बिंदु शिकायत और उपलब्ध विवरण पर आधारित हैं। संबंधित अधिकारियों, कर्मचारियों तथा अन्य पक्षों का आधिकारिक जवाब और जांच का अंतिम निष्कर्ष सामने आने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाना चाहिए।

बेलसोंडा पंचायत में बिलों का ‘खेल’! खाली और अधूरे बिलों से लाखों के आहरण का आरोप, 313 पन्नों की शिकायत पर कार्रवाई का इंतजार; SDM कार्यालय घेराव की चेतावनी

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पूर्व सरपंच भामिनी पोखन चंद्राकर ने पंचायत के वित्तीय लेन-देन पर उठाए गंभीर सवाल; RTI से मिले दस्तावेजों के आधार पर जांच की मांग, जनदर्शन में प्रशासन को कार्रवाई के लिए अल्टीमेटम

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता/21 अक्टूबर 2026 / दिन बुधवार
महासमुंद/बेलसोंडा। महासमुंद जिले की ग्राम पंचायत बेलसोंडा में कथित वित्तीय अनियमितताओं को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। पंचायत के सरकारी धन के उपयोग, बिलों की वैधता और भुगतान संबंधी अभिलेखों को लेकर उठे सवालों ने स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक जवाबदेही को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। पूर्व सरपंच श्रीमती भामिनी पोखन चंद्राकर ने वर्तमान सरपंच एवं सचिव पर कथित तौर पर संदिग्ध बिलों के माध्यम से पंचायत की राशि निकालने के गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने इन आरोपों के समर्थन में सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त दस्तावेजों का हवाला देते हुए विस्तृत जांच और जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की मांग की है।

पूर्व सरपंच का कहना है कि 5 अक्टूबर 2026 को 313 पन्नों के दस्तावेजी साक्ष्यों के साथ संबंधित अधिकारियों के समक्ष लिखित शिकायत प्रस्तुत की गई थी। इसके बावजूद अब तक अपेक्षित कार्रवाई सामने नहीं आने से शिकायतकर्ताओं में नाराजगी बढ़ रही है। उनका आरोप है कि जब बड़ी संख्या में दस्तावेज उपलब्ध कराए गए हैं, तो मामले की प्राथमिक जांच कर अभिलेखों की सत्यता और भुगतान की वैधता स्पष्ट की जानी चाहिए।

हालांकि, शिकायत में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र जांच और प्रशासनिक स्तर पर उनका सत्यापन होना अभी आवश्यक है। वर्तमान सरपंच, सचिव तथा संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आने के बाद ही मामले की पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।

313 पन्नों की शिकायत के बाद भी जांच की स्थिति पर सवाल

पूर्व सरपंच भामिनी पोखन चंद्राकर के अनुसार, उन्होंने पंचायत में कथित वित्तीय गड़बड़ियों से जुड़े दस्तावेजों को एकत्रित कर 5 अक्टूबर को अधिकारियों को शिकायत सौंपी थी। शिकायत में पंचायत के भुगतान अभिलेखों, बिलों और राशि निकासी की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं।

शिकायतकर्ता का कहना है कि दस्तावेजों की संख्या और आरोपों की गंभीरता को देखते हुए मामले में समयबद्ध जांच होनी चाहिए थी। उनके मुताबिक, शिकायत के बाद भी कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट नहीं होने से ग्रामीणों के बीच असंतोष बढ़ रहा है।

इस पूरे प्रकरण में अब सबसे अहम सवाल यह है कि शिकायत मिलने के बाद संबंधित विभाग ने कौन-से कदम उठाए? क्या दस्तावेजों का प्रारंभिक परीक्षण किया गया है? क्या पंचायत के मूल अभिलेख सुरक्षित रखे गए हैं? और क्या भुगतान से संबंधित प्रविष्टियों का बैंक रिकॉर्ड तथा स्वीकृत कार्यों से मिलान कराया गया है?

इन सवालों का जवाब जांच और आधिकारिक जानकारी से ही सामने आ सकेगा।

खाली बिल पर हस्ताक्षर का दावा, भुगतान प्रक्रिया पर उठे सवाल

पूर्व सरपंच ने RTI से प्राप्त प्रमाणित जानकारी का हवाला देते हुए दावा किया है कि पंचायत के रिकॉर्ड में एक ऐसा बिल मिला है, जिसमें विवरण दर्ज नहीं होने के बावजूद सरपंच और सचिव के हस्ताक्षर मौजूद हैं। यदि दस्तावेजों की जांच में यह बात प्रमाणित होती है, तो यह भुगतान प्रक्रिया और अभिलेखों के रखरखाव से जुड़ा गंभीर विषय हो सकता है।

शिकायतकर्ता के अनुसार, कुछ अन्य बिलों में भी भुगतान के उद्देश्य, संबंधित व्यक्ति अथवा कार्य का पूरा विवरण स्पष्ट नहीं है। ऐसे दस्तावेजों के आधार पर राशि का आहरण हुआ है या नहीं, भुगतान किस मद से किया गया और उसके पीछे सक्षम स्वीकृति थी या नहीं—इन सभी बिंदुओं की जांच आवश्यक है।

पंचायत के वित्तीय लेन-देन में बिल, भुगतान स्वीकृति, कार्य का विवरण, माप या प्राप्ति संबंधी रिकॉर्ड और बैंक प्रविष्टियां महत्वपूर्ण साक्ष्य होते हैं। इसलिए केवल बिल की प्रति देखकर अंतिम निष्कर्ष निकालने के बजाय मूल दस्तावेजों और वास्तविक भुगतान का मिलान कराना जरूरी है।

₹29 हजार से ₹57,500 तक की रकम का उल्लेख

शिकायत में अलग-अलग राशियों के बिलों का उल्लेख किए जाने की बात सामने आई है। पूर्व सरपंच के अनुसार, इनमें ₹29,000, ₹20,880, ₹16,800, ₹29,800 और ₹57,500 जैसी रकम शामिल हैं।

शिकायतकर्ता ने इन भुगतानों की वैधता पर सवाल उठाते हुए मांग की है कि प्रत्येक बिल के आधार पर संबंधित कार्य, सामग्री की खरीद, भुगतान प्राप्त करने वाले व्यक्ति तथा राशि निकासी की तारीख का सत्यापन किया जाए।

जांच के दौरान यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि संबंधित खर्च पंचायत की स्वीकृत योजना और निर्धारित वित्तीय नियमों के अनुरूप थे या नहीं। यदि किसी बिल में आवश्यक विवरण नहीं हैं, तो यह पता लगाना महत्वपूर्ण होगा कि भुगतान किस आधार पर स्वीकृत किया गया और संबंधित अधिकारियों ने अभिलेखों की जांच किस प्रकार की।

फिलहाल इन राशियों को लेकर लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है। इसलिए जांच रिपोर्ट और आधिकारिक अभिलेख सामने आने के बाद ही किसी वित्तीय अनियमितता की वास्तविक प्रकृति तथा जिम्मेदारी निर्धारित की जा सकेगी।

पंचों को बाहर ले जाने की चर्चा, रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की मांग

पूर्व सरपंच की ओर से यह आशंका भी व्यक्त की गई है कि सोमवार को वर्तमान सरपंच और सचिव द्वारा सभी पंचों को अचानक बाहर ले जाया गया। शिकायतकर्ता ने इस घटनाक्रम के संदर्भ में पंचायत के दस्तावेजों में संभावित बदलाव अथवा अभिलेखों से छेड़छाड़ की आशंका जताई है।

हालांकि, पंचों को बाहर ले जाने की घटना और अभिलेखों से किसी तरह की छेड़छाड़ के बीच संबंध होने की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। ऐसे में इस आशंका को तथ्य मानने के बजाय प्रशासन द्वारा रिकॉर्ड की स्थिति की जांच करना जरूरी है।

ग्रामीणों की मांग है कि पंचायत के मूल बिल, कैशबुक, बैंक स्टेटमेंट, भुगतान वाउचर, प्रस्ताव रजिस्टर, कार्यों से संबंधित अभिलेख तथा अन्य वित्तीय दस्तावेज सुरक्षित रखे जाएं। जरूरत पड़ने पर इनकी प्रमाणित प्रतियां लेकर मूल रिकॉर्ड से मिलान कराया जाए, ताकि जांच के दौरान किसी महत्वपूर्ण साक्ष्य के नष्ट होने या उसमें बदलाव की आशंका न रहे।

₹11 लाख की कथित रिकवरी का पुराना मामला भी चर्चा में

इस विवाद के बीच पूर्व सरपंच ने जनपद पंचायत की पूर्व उपाध्यक्ष हुल्दी चंद्राकर से संबंधित कथित ₹11 लाख की रिकवरी का मुद्दा भी उठाया है। उनके अनुसार, तत्कालीन SDM द्वारा वसूली के संबंध में आदेश जारी किया गया था, लेकिन उस पर अब तक प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।

शिकायतकर्ता ने इस मामले की वर्तमान स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है। यदि वसूली का आदेश जारी हुआ था, तो प्रशासन को यह बताना चाहिए कि आदेश के अनुपालन में अब तक क्या कार्रवाई की गई, वसूली की कितनी राशि जमा हुई और शेष राशि के संबंध में क्या प्रक्रिया अपनाई जा रही है।

इस पुराने प्रकरण के आदेश, उसकी वर्तमान वैधानिक स्थिति और अनुपालन संबंधी अभिलेखों की जांच भी आवश्यक है। केवल आरोप या पूर्व आदेश का उल्लेख अपने आप में वर्तमान स्थिति का प्रमाण नहीं है; वास्तविक स्थिति संबंधित दस्तावेजों से ही स्पष्ट होगी।

जनदर्शन में शिकायत, शाम तक कार्रवाई की मांग

मामले को लेकर पूर्व सरपंच और ग्रामीणों की ओर से कलेक्टर के जनदर्शन में आवेदन प्रस्तुत कर तत्काल जांच की मांग किए जाने की बात कही गई है। शिकायतकर्ताओं ने प्रशासन से मांग की है कि आरोपों की गंभीरता को देखते हुए संबंधित अभिलेखों की जांच कराई जाए और जिम्मेदारी तय करने के लिए निष्पक्ष प्रक्रिया अपनाई जाए।

पूर्व सरपंच एवं ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो वे आंदोलन का रास्ता अपनाएंगे और SDM कार्यालय के घेराव की तैयारी करेंगे। इस चेतावनी के बाद पंचायत से जुड़े मामले में प्रशासन की अगली कार्रवाई पर सबकी नजरें टिकी हैं।

अब प्रशासन के सामने ये प्रमुख सवाल

बेलसोंडा पंचायत के इस प्रकरण में प्रशासन से निम्न बिंदुओं पर स्पष्टता अपेक्षित है—
5 अक्टूबर 2026 को प्रस्तुत 313 पन्नों की शिकायत पर अब तक क्या कार्रवाई हुई?

कथित खाली और अधूरे बिलों के आधार पर भुगतान हुआ है या नहीं?

उल्लेखित राशियों का भुगतान किस कार्य, सामग्री अथवा वित्तीय मद के अंतर्गत किया गया?

पंचायत के मूल अभिलेख सुरक्षित हैं या नहीं, और क्या उनका स्वतंत्र सत्यापन कराया जाएगा?

कथित ₹11 लाख की रिकवरी के आदेश की वर्तमान स्थिति क्या है?

जांच में अनियमितता प्रमाणित होने पर संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध क्या नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी?

निष्पक्ष जांच से ही सामने आएगी सच्चाई

ग्राम पंचायत बेलसोंडा का यह मामला केवल कुछ बिलों की वैधता तक सीमित नहीं है। यह पंचायत स्तर पर सार्वजनिक धन के उपयोग, दस्तावेजों की पारदर्शिता और शिकायतों पर प्रशासनिक कार्रवाई की जवाबदेही से भी जुड़ा है।

यदि शिकायत में लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं, तो नियमानुसार जिम्मेदारी तय कर आवश्यक कार्रवाई की जानी चाहिए। वहीं, यदि दस्तावेजों के परीक्षण में आरोप प्रमाणित नहीं होते, तो वास्तविक स्थिति भी सार्वजनिक की जानी चाहिए, ताकि किसी व्यक्ति के विरुद्ध बिना प्रमाण निष्कर्ष न निकाला जाए।

अब निगाहें जिला प्रशासन और SDM कार्यालय पर हैं। क्या 313 पन्नों में प्रस्तुत दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच शुरू होगी? क्या कथित अनियमितताओं से जुड़े रिकॉर्ड का सत्यापन कर वास्तविक स्थिति सामने लाई जाएगी? या फिर शिकायतकर्ता आंदोलन के लिए मजबूर होंगे?

इन सवालों का जवाब प्रशासनिक कार्रवाई और जांच के निष्कर्षों से ही मिलेगा। फिलहाल बेलसोंडा पंचायत में उठे सवालों के बीच ग्रामीणों को पारदर्शी जांच और जवाबदेही का इंतजार है।

बसना के चिंटू ढाबा की बिरयानी में मृत टिड्डा मिलने का आरोप, मचा हड़कंप..! पत्रकार ने CM हेल्पलाइन 1076 में की शिकायत, खाद्य सुरक्षा जांच की मांग

बसना के चिंटू ढाबा की बिरयानी में मृत टिड्डा मिलने का आरोप, मचा हड़कंप..! पत्रकार ने CM हेल्पलाइन 1076 में की शिकायत, खाद्य सुरक्षा जांच की मांग

बिरयानी की थाली में कीड़ा मिलने से भोजन की स्वच्छता पर उठे सवाल; संचालक के जवाब से असंतुष्ट पत्रकार ने उठाया मामला, CCTV फुटेज सुरक्षित रखने और खाद्य नमूने की जांच कराने की मांग

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता/
बसना/महासमुंद, 20 अक्टूबर 2026/ दिन मंगलवार
महासमुंद जिले के बसना स्थित बस स्टैंड के पास संचालित चिंटू वीरे दा रेस्टोरेंट (चिंटू ढाबा) में परोसी गई बिरयानी में मृत टिड्डा मिलने का आरोप सामने आया है। मंगलवार को सामने आई इस घटना ने होटल-ढाबों में भोजन की स्वच्छता, रसोई की साफ-सफाई और खाद्य सुरक्षा मानकों के पालन को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामले को लेकर स्थानीय पत्रकार केशव सिदार ने छत्तीसगढ़ शासन की मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 1076 पर शिकायत दर्ज कराते हुए संबंधित प्रतिष्ठान की जांच और नियमानुसार कार्रवाई की मांग की है।

शिकायतकर्ता के अनुसार, भोजन की थाली में मृत टिड्डा दिखाई देने के बाद जब ढाबा संचालक से इसकी शिकायत की गई, तो उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं मिला। हालांकि, घटना की वास्तविक स्थिति, भोजन में कीड़ा मिलने के कारण और प्रतिष्ठान की जिम्मेदारी का निर्धारण संबंधित विभाग की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।

क्या है पूरा मामला..? तीन प्लेट बिरयानी का दिया था ऑर्डर

प्राप्त जानकारी के अनुसार, बसना क्षेत्र के पत्रकार केशव सिदार अपने साथी प्रदीप देवांगन और हेमंत तांडी के साथ मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 को सुबह लगभग 11 बजे बसना बस स्टैंड के समीप स्थित चिंटू ढाबा पहुंचे थे। यहां तीन प्लेट बिरयानी का ऑर्डर दिया गया।

बताया गया है कि भोजन करना शुरू करने के दौरान पत्रकार केशव सिदार की बिरयानी की थाली में एक मृत टिड्डा दिखाई दिया। इसके बाद भोजन की गुणवत्ता और तैयार करने के दौरान बरती गई सावधानियों को लेकर सवाल उठने लगे।

शिकायतकर्ता के मुताबिक, उन्होंने तत्काल इस मामले को ढाबा संचालक के संज्ञान में लाया। आरोप है कि संचालक की ओर से संतोषजनक समाधान देने के बजाय यह कहा गया कि, “मैंने जानबूझकर नहीं किया है।”

इस कथित जवाब से असंतुष्ट होकर पत्रकार ने मामले को संबंधित प्रशासनिक व्यवस्था तक पहुंचाने का निर्णय लिया। फिलहाल, भोजन में टिड्डा मिलने के आरोप की स्वतंत्र पुष्टि और संचालक का विस्तृत पक्ष सामने आना बाकी है।

CM हेल्पलाइन 1076 तक पहुंचा मामला, शिकायत में उठाईं तीन प्रमुख मांगें

ढाबे में भोजन की स्वच्छता को लेकर उठे सवाल के बाद पत्रकार केशव सिदार ने मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 1076 पर ऑनलाइन शिकायत दर्ज कराई। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, शिकायत का टोकन नंबर WP261000242243 बताया गया है।

शिकायतकर्ता ने मामले की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए मुख्य रूप से तीन मांगें रखी हैं।

1.रसोई और खाद्य सामग्री की जांच हो

ढाबे की रसोई, खाद्य सामग्री के भंडारण, भोजन तैयार करने की प्रक्रिया तथा ग्राहकों को खाना परोसने वाले स्थान की जांच कराई जाए। साथ ही यह भी देखा जाए कि साफ-सफाई और खाद्य सुरक्षा से जुड़े निर्धारित मानकों का पालन किया जा रहा है या नहीं।

2.संबंधित समय का CCTV फुटेज सुरक्षित रखा जाए

शिकायत में घटना के समय के CCTV फुटेज की जांच कराने और उसे सुरक्षित रखने की मांग की गई है, ताकि घटनाक्रम की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने में मदद मिल सके। यदि फुटेज उपलब्ध है, तो संबंधित विभाग उसकी जांच कर सकता है।

3.भोजन के नमूने की जांच कर नियमानुसार कार्रवाई हो

शिकायतकर्ता ने भोजन के नमूने की जांच कराने और खाद्य सुरक्षा मानकों के उल्लंघन की पुष्टि होने पर लागू कानून के तहत कार्रवाई करने की मांग की है। जांच के दौरान प्रतिष्ठान की स्वच्छता व्यवस्था और भोजन तैयार करने की प्रक्रिया का परीक्षण भी महत्वपूर्ण होगा।

खाद्य सुरक्षा पर सवाल: यात्रियों और आम नागरिकों की सेहत कितनी सुरक्षित..?

बस स्टैंड जैसे सार्वजनिक स्थानों के आसपास संचालित होटल और ढाबे यात्रियों, स्थानीय नागरिकों तथा अन्य लोगों के लिए भोजन की महत्वपूर्ण व्यवस्था होते हैं। ऐसे प्रतिष्ठानों में साफ-सफाई और सुरक्षित खाद्य सामग्री का इस्तेमाल केवल व्यावसायिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि ग्राहकों के स्वास्थ्य से जुड़ा विषय भी है।

भोजन में किसी कीड़े या बाहरी वस्तु के मिलने की शिकायत को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। ऐसी स्थिति में भोजन की तैयारी, भंडारण, रसोई की स्वच्छता और परोसने की प्रक्रिया की जांच से यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि कहीं खाद्य सुरक्षा संबंधी लापरवाही तो नहीं हुई है।

हालांकि, एक शिकायत के आधार पर पूरे प्रतिष्ठान की व्यवस्था को दोषपूर्ण घोषित करना उचित नहीं होगा। वास्तविक स्थिति सामने लाने के लिए संबंधित अधिकारियों की जांच, उपलब्ध साक्ष्य और प्रतिष्ठान का पक्ष महत्वपूर्ण रहेगा।

अब खाद्य सुरक्षा विभाग की भूमिका पर नजर

इस मामले में अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि शिकायत पर संबंधित विभाग क्या कदम उठाता है। क्या खाद्य सुरक्षा अधिकारी मौके पर पहुंचकर रसोई और खाद्य सामग्री की जांच करेंगे? क्या उपलब्ध होने पर संबंधित समय के CCTV फुटेज की पड़ताल की जाएगी? और क्या भोजन के नमूने की जांच कराई जाएगी..?

इन सवालों के जवाब विभागीय कार्रवाई के बाद ही सामने आएंगे। शिकायतकर्ता के अनुसार, मामला मुख्यमंत्री हेल्पलाइन पर दर्ज कराया गया है। शिकायत की वर्तमान स्थिति, विभाग को सौंपे जाने और किसी निरीक्षण या कार्रवाई की पुष्टि स्वतंत्र रूप से होना अभी बाकी है।

फिलहाल, चिंटू ढाबा में बिरयानी की थाली में मृत टिड्डा मिलने का आरोप जांच का विषय है। यदि जांच में खाद्य सुरक्षा मानकों का उल्लंघन पाया जाता है, तो संबंधित कानून के तहत नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। वहीं, प्रतिष्ठान को भी अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना आवश्यक है।

अब निगाहें संबंधित विभाग की जांच और कार्रवाई पर टिकी हैं। जांच से ही स्पष्ट होगा कि यह भोजन तैयार करने के दौरान हुई लापरवाही का मामला था या घटना के पीछे कोई अन्य कारण था।
बेबाक बयान न्यूज — हर बात खुलकर, हर राज खुलकर।

खैरझिटी पंचायत में सत्ता का संकट गहराया! अविश्वास प्रस्ताव के बाद हाईकोर्ट की रोक से अटकी सरपंच नियुक्ति, विकास कार्यों पर लगा ब्रेक

खैरझिटी पंचायत में सत्ता का संकट गहराया! अविश्वास प्रस्ताव के बाद हाईकोर्ट की रोक से अटकी सरपंच नियुक्ति, विकास कार्यों पर लगा ब्रेक

सरपंच पद की कानूनी लड़ाई में उलझी पंचायत व्यवस्था; 27 जुलाई के पत्र में जनपद CEO ने मांगा मार्गदर्शन, ग्रामीणों के कामकाज को लेकर बढ़ी चिंता

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता/19 अक्टूबर 2026/ दिन सोमवार
महासमुंद, छत्तीसगढ़।
महासमुंद जिले की जनपद पंचायत महासमुंद के अंतर्गत ग्राम पंचायत खैरझिटी में सरपंच पद को लेकर पैदा हुआ विवाद अब कानूनी और प्रशासनिक पेचीदगी का रूप ले चुका है। अविश्वास प्रस्ताव पारित होने के बाद सरपंच पद रिक्त होने और स्थानापन्न सरपंच की नियुक्ति को लेकर उठे सवालों के बीच मामला छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर तक पहुंच गया है। हाईकोर्ट से अंतरिम राहत मिलने के बाद नियुक्ति प्रक्रिया पर रोक लगने की जानकारी सामने आई है। वहीं, पंचायत के कामकाज को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए जनपद पंचायत महासमुंद के मुख्य कार्यपालन अधिकारी ने जिला पंचायत के पंचायत विभाग से मार्गदर्शन मांगा है।

इस पूरे घटनाक्रम ने ग्राम पंचायत में प्रशासनिक व्यवस्था, विकास योजनाओं की निरंतरता और ग्रामीणों से जुड़े जरूरी कार्यों को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि कानूनी प्रक्रिया पूरी होने तक पंचायत का कामकाज किस व्यवस्था के तहत संचालित होगा और ग्रामीणों को राहत कब मिलेगी..?

अविश्वास प्रस्ताव के बाद शुरू हुआ विवाद

प्राप्त जानकारी के अनुसार, ग्राम पंचायत खैरझिटी की तत्कालीन सरपंच श्रीमती रामेश्वरी कुंजलाल चेलाक के विरुद्ध 17 अप्रैल 2026 को अविश्वास प्रस्ताव पारित किया गया था। इसके बाद उन्हें सरपंच पद से पृथक किए जाने की कार्रवाई हुई। इस घटनाक्रम के पश्चात पंचायत के नियमित संचालन के लिए स्थानापन्न अथवा कार्यवाहक सरपंच की व्यवस्था का प्रश्न सामने आया।

पंचायत में नेतृत्व की वैकल्पिक व्यवस्था को लेकर सहमति और प्रशासनिक प्रक्रिया का रास्ता स्पष्ट नहीं हो पाने के कारण मामला लगातार उलझता गया। स्थिति ऐसी बनी कि सरपंच पद की जिम्मेदारी किसे सौंपी जाए, इस पर प्रशासनिक स्तर पर निर्णय लेना चुनौतीपूर्ण हो गया।

ग्राम पंचायत में सरपंच की भूमिका केवल बैठकों तक सीमित नहीं होती। विकास कार्यों की निगरानी, पंचायत संबंधी प्रस्तावों पर कार्रवाई, विभिन्न योजनाओं का क्रियान्वयन और ग्रामीणों की समस्याओं के निराकरण में भी इस पद की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। ऐसे में पद से जुड़ा विवाद लंबा खिंचने पर पंचायत की कार्यप्रणाली प्रभावित होने की आशंका स्वाभाविक है।

आरक्षण बना नियुक्ति प्रक्रिया में अहम मुद्दा

मामले में एक महत्वपूर्ण पहलू ग्राम पंचायत खैरझिटी के सरपंच पद का आरक्षण है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यह पद अनुसूचित जाति महिला वर्ग के लिए आरक्षित है। इसी आरक्षण व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए स्थानापन्न सरपंच की नियुक्ति को लेकर प्रशासनिक स्तर पर सवाल उठे।

बताया गया है कि अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व), महासमुंद की ओर से प्रस्तुत जांच प्रतिवेदन के आधार पर उपसरपंच श्री टिकेलाल जलक्षत्री को स्थानापन्न सरपंच बनाने के लिए पंचायत द्वारा पारित प्रस्ताव को निरस्त कर दिया गया। इस कार्रवाई में छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम, 1993 की धारा 85 के प्रावधानों का उल्लेख किया गया है।

इस घटनाक्रम से स्पष्ट है कि मामला केवल पंचायत के भीतर पदभार सौंपने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें आरक्षण व्यवस्था, लागू कानूनी प्रावधानों और प्रशासनिक अधिकारों की व्याख्या भी महत्वपूर्ण है। हालांकि, संबंधित आदेश की संपूर्ण प्रति और उसमें दर्ज कानूनी आधार का स्वतंत्र परीक्षण किए बिना इस कार्रवाई की वैधानिकता पर अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

हाईकोर्ट पहुंचा मामला, नियुक्ति प्रक्रिया पर अंतरिम रोक

स्थानापन्न सरपंच की नियुक्ति को लेकर उत्पन्न विवाद के बीच श्रीमती रामेश्वरी कुंजलाल चेलाक ने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर में याचिका दायर की। उपलब्ध विवरण के अनुसार, यह मामला WPC No. 2804/2026 — Smt. Rameshwari Kunjlal Chelak Vs State of Chhattisgarh & Others के रूप में दर्ज है।

याचिका पर सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की पीठ द्वारा अंतरिम आदेश जारी किए जाने की जानकारी दी गई है। बताया गया है कि अगली सुनवाई तक संबंधित प्राधिकारियों को सरपंच नियुक्ति की प्रक्रिया में आगे कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया गया है।

इस अंतरिम आदेश के बाद नियुक्ति प्रक्रिया पर विराम लग गया। नतीजतन, पंचायत में वैकल्पिक नेतृत्व की व्यवस्था को लेकर प्रशासन के सामने नई चुनौती खड़ी हो गई है।

यहां यह समझना जरूरी है कि अंतरिम स्थगन आदेश का प्रभाव उसके वास्तविक शब्दों और दायरे पर निर्भर करता है। इसलिए आदेश की प्रमाणित प्रति के आधार पर ही यह स्पष्ट किया जा सकता है कि रोक किन अधिकारियों, किन कदमों और किस अवधि तक लागू है। मामले का अंतिम निर्णय अभी न्यायालय की आगामी कार्यवाही पर निर्भर करेगा।

27 जुलाई को जनपद CEO ने मांगा मार्गदर्शन

हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद प्रशासनिक स्तर पर आगे की कार्रवाई को लेकर मार्गदर्शन मांगे जाने का मामला भी सामने आया है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक, जनपद पंचायत महासमुंद के मुख्य कार्यपालन अधिकारी ने 27 जुलाई 2026 को पत्र क्रमांक 2053/निर्वा.शाखा/ज.पं./2026 के माध्यम से उपसंचालक (पंचायत), जिला महासमुंद को पत्र भेजा।

पत्र में न्यायालय के निर्देशों के मद्देनजर नियुक्ति प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाने की स्थिति का उल्लेख करते हुए ग्राम पंचायत के कार्यों को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए नियमानुसार आवश्यक दिशा-निर्देश मांगे गए हैं।

पत्र की प्रतिलिपि कलेक्टर महासमुंद, मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत, अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) तथा वर्तमान उपसरपंच और पंचों को भी भेजे जाने की जानकारी है।

इस पत्राचार से संकेत मिलता है कि प्रशासन पंचायत के नियमित संचालन के लिए लागू नियमों के अनुरूप रास्ता तलाश रहा है। लेकिन मार्गदर्शन के लिए पत्र जारी होना और उसके आधार पर कोई अंतिम प्रशासनिक व्यवस्था लागू होना दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। इसलिए यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित विभाग ने इस पत्र पर क्या निर्णय लिया और पंचायत के कामकाज को लेकर आगे कौन-से निर्देश जारी किए गए।

विकास कार्यों पर असर की आशंका, ग्रामीणों को इंतजार

पंचायत में सरपंच पद को लेकर विवाद लंबा खिंचने से ग्रामीणों के मन में कई सवाल उठना स्वाभाविक है। पंचायत के नियमित प्रशासनिक कार्य, विकास योजनाओं की प्रगति, प्रस्तावों पर निर्णय और जनहित से जुड़े मामलों का संचालन किस प्रकार होगा, यह स्पष्ट होना जरूरी है।

हालांकि, पंचायत के सभी विकास कार्य पूरी तरह बंद होने की पुष्टि के लिए संबंधित कार्यों की सूची, भुगतान की स्थिति, लंबित प्रस्तावों और विभागीय अभिलेखों की जांच आवश्यक है। इसके बावजूद नेतृत्व और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर अनिश्चितता दूर करना स्थानीय प्रशासन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

ग्रामीणों के हित में यह जरूरी है कि न्यायालय के आदेश का पालन करते हुए पंचायत के नियमित कार्यों के संचालन का वैधानिक रास्ता स्पष्ट किया जाए, ताकि पद से जुड़े विवाद का खामियाजा आम लोगों को न भुगतना पड़े।

अब प्रशासन के सामने तीन बड़े सवाल

खैरझिटी पंचायत के पूरे प्रकरण में अब तीन प्रमुख सवालों के जवाब सामने आना जरूरी है।

पहला सवाल: 27 जुलाई 2026 को भेजे गए मार्गदर्शन संबंधी पत्र पर उपसंचालक (पंचायत) अथवा जिला प्रशासन ने क्या निर्णय लिया..?

दूसरा सवाल: हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश के दायरे में रहते हुए पंचायत के दैनिक प्रशासनिक कार्यों और विकास योजनाओं के संचालन के लिए कौन-सी वैधानिक व्यवस्था उपलब्ध है..?

तीसरा सवाल: सरपंच पद से जुड़े विवाद की अगली सुनवाई कब होनी है और न्यायालय में अब तक की कार्यवाही की स्थिति क्या है..?

इन सवालों के जवाब सामने आने से ही पंचायत की वर्तमान स्थिति और आगे की दिशा को लेकर स्पष्टता आएगी।

निष्कर्ष: कानूनी प्रक्रिया के साथ पंचायत संचालन भी जरूरी

ग्राम पंचायत खैरझिटी का मामला अब केवल सरपंच पद के विवाद तक सीमित नहीं रह गया है। एक ओर हाईकोर्ट के आदेश का पालन करना प्रशासन की जिम्मेदारी है, तो दूसरी ओर पंचायत के जरूरी कामकाज और ग्रामीणों के हितों की अनदेखी न हो, यह सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

अब निगाहें जिला प्रशासन, पंचायत विभाग और हाईकोर्ट की आगामी कार्यवाही पर टिकी हैं। ग्रामीणों को उम्मीद है कि कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप जल्द ही ऐसी व्यवस्था स्पष्ट होगी, जिससे पंचायत का नियमित कामकाज प्रभावित न हो और विकास संबंधी गतिविधियों को आगे बढ़ाने का रास्ता खुले।

बेबाक बयान न्यूज की नजर इस पूरे मामले पर बनी रहेगी। संबंधित विभागों की प्रतिक्रिया, मार्गदर्शन पत्र पर हुई कार्रवाई और न्यायालय की आगामी कार्यवाही से जुड़ी प्रमाणित जानकारी सामने आने पर प्रकरण की आगे की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

महासमुंद में आस्था के दरबार पर शुल्क का विवाद..! अम्बेडकर चौक में ‘शीघ्र दर्शन’ के नाम पर 10–20 रुपये की पर्ची काटने का आरोप, श्रद्धालुओं में नाराजगी

महासमुंद में आस्था के दरबार पर शुल्क का विवाद..! अम्बेडकर चौक में ‘शीघ्र दर्शन’ के नाम पर 10–20 रुपये की पर्ची काटने का आरोप, श्रद्धालुओं में नाराजगी

समिति की पारदर्शिता और प्रशासन की निगरानी पर उठे सवाल

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता/16 अक्टूबर 2026 / दिन शुक्रवार
महासमुंद। शारदीय नवरात्रि के पावन अवसर पर महासमुंद शहर माता रानी की भक्ति, श्रद्धा और धार्मिक उत्साह में सराबोर है। शहर के विभिन्न चौक-चौराहों पर आकर्षक दुर्गा पंडाल, मनमोहक झांकियां और धार्मिक कलाकृतियां श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं। मां राजराजेश्वरी महामाया के दरबार से लेकर अलग-अलग पूजा स्थलों तक भक्तों की आवाजाही जारी है। लेकिन इसी धार्मिक माहौल के बीच तुमगांव ढाल स्थित अम्बेडकर चौक में बनाई गई ‘माता वैष्णो देवी गुफा दर्शन’ की झांकी को लेकर शुल्क वसूली का विवाद सामने आया है।

आरोप है कि यहां ‘शीघ्र दर्शन’, ‘सामान्य दर्शन’ और दान के नाम पर 10 रुपये तथा 20 रुपये की पर्चियां काटी जा रही हैं। इस व्यवस्था को लेकर कुछ श्रद्धालुओं और स्थानीय नागरिकों ने आपत्ति जताई है। उनका सवाल है कि जब धार्मिक आयोजन का उद्देश्य लोगों को आस्था से जोड़ना और

श्रद्धालुओं को माता रानी के दर्शन कराना है, तो दर्शन व्यवस्था में अलग-अलग शुल्क लेने का आधार क्या है? हालांकि, इस मामले में समिति का पक्ष, शुल्क की आधिकारिक स्थिति और प्रशासन की प्रतिक्रिया सामने आना अभी बाकी है।

अम्बेडकर चौक की गुफा झांकी बनी आकर्षण, लेकिन शुल्क व्यवस्था पर विवाद

तुमगांव ढाल स्थित अम्बेडकर चौक पर ‘जय मां भवानी दुर्गा पूजा समिति’ के नाम से माता वैष्णो देवी गुफा दर्शन की झांकी तैयार किए जाने की जानकारी सामने आई है। धार्मिक स्वरूप में बनाई गई इस झांकी को देखने के लिए श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। नवरात्रि के दौरान ऐसी झांकियां लोगों को धार्मिक परंपराओं से जोड़ने और पर्व की रौनक बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

लेकिन झांकी के सामने टेंट लगाकर दर्शनार्थियों से कथित तौर पर 10 और 20 रुपये की पर्चियां काटे जाने की व्यवस्था ने विवाद खड़ा कर दिया है। स्थानीय लोगों के अनुसार, पर्चियों पर ‘शीघ्र दर्शन’, ‘सामान्य दर्शन’ अथवा ‘दान पत्र’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जा रहा है।

अब इस पूरे मामले में यह स्पष्ट होना जरूरी है कि संबंधित राशि अनिवार्य प्रवेश शुल्क के रूप में ली जा रही है, किसी विशेष सुविधा के लिए निर्धारित की गई है या स्वैच्छिक दान के तौर पर मांगी जा रही है। इन तीनों व्यवस्थाओं की प्रकृति अलग-अलग है। इसलिए वास्तविक स्थिति सामने आए बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।

रसीद पर पदाधिकारियों का नाम और संपर्क विवरण नहीं होने का आरोप

इस विवाद का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू समिति की पारदर्शिता से जुड़ा है। स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि इस्तेमाल की जा रही रसीद पुस्तिका पर समिति के जिम्मेदार पदाधिकारियों के नाम और संपर्क संबंधी जानकारी स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं है।

यदि रसीद पर समिति की पहचान, जिम्मेदार व्यक्ति और राशि प्राप्त करने का उद्देश्य स्पष्ट नहीं है, तो श्रद्धालुओं के मन में स्वाभाविक रूप से सवाल उठ सकते हैं। धार्मिक आयोजनों में आर्थिक सहयोग लेने की स्थिति में भी लोगों को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि उनसे किस उद्देश्य से राशि मांगी जा रही है और प्राप्त धन का हिसाब कौन रख रहा है।

ऐसे में संबंधित समिति को सामने आकर रसीद व्यवस्था, शुल्क निर्धारण और दान संग्रह के उद्देश्य पर स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए, ताकि किसी तरह की गलतफहमी की गुंजाइश न रहे।

अन्य पंडालों में निःशुल्क दर्शन, फिर यहां अलग व्यवस्था क्यों..?

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि महासमुंद शहर के अन्य स्थानों पर भी नवरात्रि के दौरान भव्य दुर्गा पंडाल और आकर्षक धार्मिक झांकियां स्थापित की गई हैं। उनके मुताबिक, कई स्थानों पर श्रद्धालु बिना प्रवेश शुल्क दिए माता रानी के दर्शन कर रहे हैं।

इसी तुलना के कारण अम्बेडकर चौक की व्यवस्था को लेकर सवाल उठ रहे हैं। लोगों का कहना है कि यदि यहां दर्शन के लिए कोई शुल्क निर्धारित किया गया है, तो उसकी स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए। वहीं, यदि राशि स्वैच्छिक दान के रूप में ली जा रही है, तो श्रद्धालुओं पर भुगतान करने का दबाव नहीं होना चाहिए।

हालांकि, अलग-अलग पूजा समितियों की व्यवस्थाएं एक जैसी हों, यह आवश्यक नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि किसी भी शुल्क या दान की प्रकृति स्पष्ट हो, श्रद्धालुओं को भ्रमित न किया जाए और लागू नियमों का पालन किया जाए।

आस्था के नाम पर आर्थिक लेन-देन की निगरानी कौन करेगा..?

नवरात्रि जैसे बड़े धार्मिक पर्व पर हजारों लोग परिवार सहित दर्शन के लिए निकलते हैं। ऐसे अवसरों पर पूजा समितियों की जिम्मेदारी केवल झांकी सजाने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि भीड़ प्रबंधन, सुरक्षा, स्वच्छता और आर्थिक पारदर्शिता भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

अम्बेडकर चौक के मामले में अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या संबंधित समिति ने शुल्क या दान संग्रह की व्यवस्था के संबंध में स्थानीय प्रशासन को जानकारी दी है? क्या पर्चियों पर पर्याप्त विवरण दर्ज है? क्या दर्शनार्थियों को यह बताया जा रहा है कि राशि देना अनिवार्य है या पूरी तरह स्वैच्छिक?

इन सवालों का जवाब संबंधित समिति और प्रशासन की जांच अथवा आधिकारिक स्पष्टीकरण से ही सामने आ सकता है। केवल आरोपों के आधार पर इसे अवैध वसूली घोषित करना उचित नहीं होगा, लेकिन शिकायतों की निष्पक्ष जांच और तथ्यात्मक स्थिति स्पष्ट करना भी आवश्यक है।

जिला प्रशासन और पुलिस से निष्पक्ष जांच की अपेक्षा

इस मामले में जिला प्रशासन, स्थानीय पुलिस और संबंधित निकाय के अधिकारियों से अपेक्षा है कि वे शिकायतों की जानकारी लेकर वास्तविक स्थिति की जांच करें। यदि शुल्क लिया जा रहा है, तो उसका आधार, अनुमति संबंधी स्थिति और रसीद की पारदर्शिता नियमानुसार परखी जानी चाहिए। यदि दान स्वैच्छिक है, तो श्रद्धालुओं को इसकी स्पष्ट जानकारी दी जानी चाहिए।

जांच के दौरान पूजा समिति का पक्ष भी सुना जाना चाहिए, ताकि किसी निर्दोष व्यक्ति या संस्था पर एकतरफा आरोप न लगे। यदि किसी नियम का उल्लंघन प्रमाणित होता है, तो संबंधित प्रावधानों के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है।

अब जवाब का इंतजार: श्रद्धालुओं की सुविधा या शुल्क को लेकर भ्रम..?

अम्बेडकर चौक की ‘माता वैष्णो देवी गुफा दर्शन’ झांकी को लेकर उठे सवालों का समाधान तथ्यों और पारदर्शिता से ही संभव है। समिति की ओर से स्पष्ट जानकारी और प्रशासन की ओर से निष्पक्ष जांच सामने आने पर ही यह तय हो सकेगा कि पर्चियों के जरिए राशि किस उद्देश्य से ली जा रही थी और व्यवस्था में किसी सुधार की आवश्यकता है या नहीं।
सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या श्रद्धालुओं को दर्शन और दान के बीच का अंतर स्पष्ट रूप से बताया जा रहा है?
नवरात्रि का पर्व श्रद्धा, सेवा और सामाजिक सद्भाव का प्रतीक है। ऐसे में धार्मिक आयोजनों से जुड़े हर आर्थिक लेन-देन में स्पष्टता और जवाबदेही बनी रहनी चाहिए, ताकि भक्तों की आस्था के साथ किसी प्रकार का भ्रम या असंतोष पैदा न हो।

बेबाक बयान न्यूज की नजर इस मामले पर बनी रहेगी। संबंधित समिति और प्रशासन का पक्ष सामने आने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।

​महासमुंद कृषि विभाग में ट्रांसफर और अटैचमेंट का बड़ा खेल: जितेंद्र पटेल और भूषण साहू के स्थानांतरण पर मचा घमासान; पूर्व विधायक विनोद चंद्राकर ने उप संचालक F.R. कश्यप पर FIR दर्ज करने की उठाई मांग

​महासमुंद कृषि विभाग में ट्रांसफर और अटैचमेंट का बड़ा खेल: जितेंद्र पटेल और भूषण साहू के स्थानांतरण पर मचा घमासान; पूर्व विधायक विनोद चंद्राकर ने उप संचालक F.R. कश्यप पर FIR दर्ज करने की उठाई मांग

​प्रधान संपादक मयंक गुप्ता/
दिनांक 14 अक्टूबर 2026 (बुधवार)
स्थान: महासमुंद, छत्तीसगढ़

​महासमुंद जिले का कृषि विभाग इन दिनों वित्तीय अनियमितताओं, खरीदी प्रक्रिया में भ्रष्टाचार और अधिकारियों-कर्मचारियों के संलग्नीकरण (अटैचमेंट) तथा स्थानांतरण आदेशों की आड़ में चल रही मनमानी को लेकर विवादों के चरम पर है। विभाग के भीतर चल रहा यह प्रशासनिक खेल अब जनहित, सरकारी योजनाओं और किसानों के अधिकारों से जुड़कर जिले का सबसे बड़ा मुद्दा बन चुका है।

​इस पूरे प्रकरण में पूर्व विधायक विनोद सेवनलाल चंद्राकर ने बेहद कड़े तेवर अपनाते हुए महासमुंद कृषि विभाग में पदस्थ उप संचालक फागुराम कश्यप (F.R. कश्यप) के विरुद्ध तत्काल एफआईआर (FIR) दर्ज किए जाने की मांग उठाई है। पूर्व विधायक द्वारा उच्चस्तरीय निष्पक्ष जांच और आपराधिक मामला दर्ज करने की मांग से प्रशासनिक महकमे में हड़कंप मच गया है।

​1. ट्रांसफर और रिलीविंग का दोहरा खेल: जितेंद्र पटेल और भूषण साहू का मामला मुख्य केंद्र

​विभाग के भीतर शासकीय आदेशों की किस तरह धज्जियां उड़ाई जा रही हैं, इसका सबसे बड़ा प्रमाण दो कर्मचारियों— जितेंद्र कुमार पटेल और भूषण कुमार साहू के स्थानांतरण व संलग्नीकरण से जुड़ा विवाद है:

​1. जितेंद्र कुमार पटेल का पिथौरा स्थानांतरण एवं भारमुक्ति का मामला

ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी जितेंद्र कुमार पटेल की मूल पदस्थापना विकासखंड पिथौरा है। वे लंबे समय से महासमुंद जिला कार्यालय में संलग्नीकरण (अटैचमेंट) पर जमे हुए हैं। उप संचालक कार्यालय द्वारा 13 अक्टूबर 2025 को ही उन्हें पिथौरा के लिए भारमुक्त (रिलीव) करने का आदेश जारी किया जा चुका था। इसके बावजूद, एक साल से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी उन्हें मूल पदस्थापना स्थल पिथौरा नहीं भेजा गया।

​विरोध व चेतावनी: छत्तीसगढ़ कृषि स्नातक शासकीय कृषि अधिकारी संघ और मैदानी कर्मचारियों ने जितेंद्र पटेल को तत्काल उनकी मूल पदस्थापना पिथौरा भेजने की मांग की है। कर्मचारियों ने चेतावनी दी है कि यदि उन्हें तत्काल रिलीव नहीं किया गया तो वे उग्र आंदोलन करने को बाध्य होंगे।

​2. भूषण कुमार साहू का बलौदाबाजार-भाटापारा स्थानांतरण व मेडिकल लीव का विवाद

दूसरी ओर, ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी भूषण कुमार साहू (विकासखंड महासमुंद) का स्थानांतरण छत्तीसगढ़ शासन, कृषि विकास एवं किसान कल्याण तथा जैव प्रौद्योगिकी विभाग के प्रशासनिक आदेश (क्रमांक ई.एस.टी.बी.-102/432/2025-ओ/ओ जॉइंट डीआईआर, क्र.सं. 35) के तहत

उप संचालक कृषि बलौदाबाजार-भाटापारा के अधीन किया गया है।

संचालनालय कृषि (रायपुर) के पत्र (दिनांक 29/01/2026) में रिक्तता का हवाला देते हुए भारमुक्त न करने का बिंदु स्वीकृत होने के बाद भी, उप संचालक फागुराम कश्यप द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि उप संचालक कश्यप ने भूषण साहू को नियमानुसार रिलीव करने के बजाय

मेडिकल लीव (चिकित्सा अवकाश)

पर रहने का निर्देश दिया और यहाँ तक आश्वासन दे दिया— “घबराने की जरूरत नहीं है, कुछ समय पश्चात मैं तुमको मुख्यमंत्री छत्तीसगढ़ शासन से आदेश दिलवा दूंगा।”

​बड़ा सवाल: उप संचालक श्री कश्यप आखिर अपने पसंदीदा कर्मचारियों को रिलीव करने या मूल पदस्थापना में भेजने से क्यों कतरा रहे हैं? विभागीय गलियारों में चर्चा है कि यदि इन अधिकारियों को रिलीव कर दिया गया तो ‘कमीशनखोरी’ और अवैध आय के चक्र पर पूर्ण विराम लग जाएगा। उप संचालक का यह रवैया उन्हें जिले में ‘कलेक्टर’ से भी ऊपर स्थापित करने जैसा दिखाई दे रहा है।

​2. कृषि उपकरणों की खरीदी व जैविक खेती मिशन में भ्रष्टाचार के आरोप
​नियमों की अनदेखी

कृषि विभाग में बीज, कृषि यंत्रों और अन्य सामग्रियों की खरीदी में भारी वित्तीय अनियमितता के आरोप लगे हैं। निर्धारित निविदा प्रक्रियाओं और बाजार दरों को ताक पर रखकर महँगे दामों पर सामग्री खरीदी गई।
​जैविक खेती मिशन (2021-2024): जैविक खेती मिशन के तहत स्वीकृत घटकों के स्थान पर किसानों को बैटरी चालित स्प्रेयर खरीदने के लिए मजबूर किया गया, जिसमें भारी कमीशनखोरी की शिकायतें हैं।

​3. फर्जी प्रशिक्षण बिल और LRP मानदेय से अवैध वसूली
​फर्जी बिलिंग

विभिन्न योजनाओं के तहत प्रशिक्षण कार्यक्रमों के नाम पर ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी जितेंद्र पटेल, प्रभारी वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी गंगाप्रसाद शरणागत एवं ‘आत्मा’ योजना के ऑपरेटर की सांठगांठ से फर्जी बिल बनाकर शासकीय राशि के गबन का आरोप है।
​LRP मानदेय में अवैध कटौती: परंपरागत कृषि विकास योजना के तहत लोकल रिसोर्स पर्सन (LRP) को मिलने वाले 50 हजार रुपये के मानदेय से ऑनलाइन, नकद और चेक के माध्यम से अवैध वसूली की उच्चस्तरीय जांच की मांग की जा रही है।

​4. किसानों का कथित अपमान एवं किसान संघ का आक्रोश

​भारतीय किसान संघ (महासमुंद) ने उप संचालक F.R. कश्यप पर किसानों से दुर्व्यवहार और अमर्यादित आचरण का आरोप लगाया है। कौशल्या तिवारी, शोभ कुमार साहू, रूपेश कुमार, भेख लाल साहू, नेम लाल चंद्राकर, अश्वनी साहू, सोहन, चगन साहू, हेमंत साहू और कुंदन सहित कई किसानों ने जिला कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर सख्त दंडात्मक कार्रवाई की मांग की है।

​जिला प्रशासन (कलेक्टर विनय कुमार लंगेह) से प्रमुख अपेक्षाएं

1 ​उप संचालक पर FIR

पूर्व विधायक विनोद चंद्राकर की मांग पर संज्ञान लेते हुए F.R. कश्यप के विरुद्ध दंडात्मक व कानूनी कार्रवाई की जाए।

2 ​स्थानांतरण आदेशों का तत्काल पालन

जितेंद्र कुमार पटेल को उनकी मूल पदस्थापना पिथौरा तथा भूषण कुमार साहू को बलौदाबाजार-भाटापारा भेजने संबंधी आदेशों व प्रशासनिक स्थिति को पारदर्शी बनाया जाए।

3 ​वित्तीय अनियमितताओं की स्वतंत्र जांच

2021 से 2024 तक की खरीदी, फर्जी प्रशिक्षण बिलों और LRP मानदेय वसूली का पारदर्शी लेखा-परीक्षण (Audit) कराया जाए।

​महासमुंद में ‘अधिकारियों का फुटबॉल खेल’: CEO और DDP की सुस्ती के बाद अब कलेक्टर विनय कुमार लंगेह के पाले में गेंद..!

​महासमुंद में ‘अधिकारियों का फुटबॉल खेल’: CEO और DDP की सुस्ती के बाद अब कलेक्टर विनय कुमार लंगेह के पाले में गेंद..!

​क्या जिले के ‘प्रशासनिक मुखिया’ करेंगे न्याय? जांच में पक्के सबूतों के बावजूद सचिव मोतीलाल मेहरा पर मेहरबानी क्यों? कलेक्टर के कड़े रुख का इंतजार!

​प्रधान संपादक मयंक गुप्ता / 13 अक्टूबर 2026 / दिन मंगलवार
महासमुंद (छत्तीसगढ़)
​छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में पंचायती राज व्यवस्था और प्रशासनिक पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। ग्राम पंचायत खैरा में पदस्थ विवादित सचिव मोतीलाल (मोती) मेहरा के खिलाफ गंभीर आरोपों की जांच पूरी होने और पुख्ता सबूत मिलने के बावजूद दंडात्मक कार्रवाई का लटकना अब जिला प्रशासन की नीयत पर सवाल खड़े कर रहा है।

​हैरानी की बात यह है कि जब भी शिकायतकर्ता इस मामले पर अपडेट मांगता है, तो जिला पंचायत की मुख्य कार्यपालन अधिकारी (IAS) सुश्री अनुपमा आनंद और उप संचालक पंचायत (DDP) नितिन कौड़ो एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालकर ‘फाइलों का फुटबॉल’ खेलने में मशगूल नजर आते हैं।

​ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है—जब निचले स्तर के अधिकारी जिम्मेदारी से भाग रहे हों, तो जिले के ‘प्रशासनिक पितामह’ यानी कलेक्टर विनय कुमार लंगेह खुद आगे आकर इस मामले में संज्ञान क्यों नहीं लेते?

​24 जून की ‘ग्राम सभा’ और ‘पति-सरपंच’ संस्कृति का खुला खेल

​पूरे विवाद की शुरुआत 24 जून 2026 को हुई, जब प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) जैसी जनहितकारी योजना की समीक्षा के लिए ग्राम पंचायत खैरा में महत्वपूर्ण ग्राम सभा बुलाई गई थी। नियमानुसार खैरा के सचिव मोतीलाल मेहरा को वहाँ उपस्थित रहना था।

​लेकिन आरोप हैं कि सचिव महोदय खैरा की ग्राम सभा को ठेंगा दिखाकर ग्राम पंचायत खट्टी पहुँच गए। खट्टी पंचायत में जाने की वजह कोई शासकीय कार्य नहीं, बल्कि यह थी कि वहाँ की सरपंच उनकी पत्नी श्रीमती अनिता मेहरा हैं।

​अनाधिकृत दखल: खट्टी पहुँचकर सचिव महोदय पर शासकीय कार्यवाही में अनुचित हस्तक्षेप करने और ग्रामीणों से अभद्र व्यवहार करने के आरोप लगे।

​नियमों की अवहेलना: शासन के स्पष्ट आदेश हैं कि महिला जनप्रतिनिधियों के काम में उनके पति या रिश्तेदार हस्तक्षेप नहीं करेंगे। इसके बावजूद शासकीय पद पर तैनात पति का दूसरी पंचायत में ‘सुपर-सरपंच’ की भूमिका में दिखना प्रशासनिक ढिलाई को दर्शाता है।

​06 अगस्त को जांच संपन्न, फिर भी कार्रवाई पर ‘ब्रेक’

​मामले की गंभीरता को देखते हुए 15 जुलाई 2026 को शिकायत दर्ज कराई गई, जिसके बाद जनपद पंचायत महासमुंद द्वारा जांच टीम गठित की गई (जांच आदेश क्रमांक: पंचा./शिक्षा/2026/1594)।

​06 अगस्त 2026 को ग्राम पंचायत खट्टी के भवन में खुली जांच हुई। दर्जनों ग्रामीणों ने उपस्थित होकर अपने बयान दर्ज कराए। जांच टीम के समक्ष

​उपस्थिति रजिस्टर की फोटोकॉपी,

​बैठक की तस्वीरें,

​खैरा ग्राम सभा से अनुपस्थिति के पुख्ता प्रमाण,

​और गवाहों के दर्ज बयान सौंपे गए।

​सबूत चीख-चीखकर सचिव की लापरवाही और अनाधिकृत हस्तक्षेप की तस्दीक कर रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद फाइलों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है।

​’फाइलों के फुटबॉल’ के बीच Collector साहब से 5 बेबाक सवाल

​जब जिला पंचायत के अधिकारी कार्रवाई करने से कतरा रहे हैं और मामला एक टेबल से दूसरे टेबल पर टहलाया जा रहा है, तो अब जिले के सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी कलेक्टर विनय कुमार लंगेह के नेतृत्व पर ही सबकी निगाहें टिक गई हैं। क्षेत्रवासी और शिकायतकर्ता उनसे सीधे सवाल पूछ रहे हैं:

1 ​क्या कलेक्टर साहब संज्ञान लेंगे..?

जिला पंचायत सीईओ और डीडीपी के बीच झूल रही फाइल पर जिले के मुखिया होने के नाते कलेक्टर विनय कुमार लंगेह खुद अंतिम निर्णय कब करवाएंगे?

2 ​जांच रिपोर्ट पर चुप्पी क्यों..?

यदि 06 अगस्त की जांच में आरोप प्रमाणित हो चुके हैं, तो दोषी सचिव पर कार्रवाई रोकने वाला ‘अदृश्य हाथ’ किसका है?

3 ​निर्दोष हैं तो रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं..?

यदि सचिव पर लगे आरोप सही नहीं पाए गए, तो प्रशासन क्लीन चिट देकर मामले का पटाक्षेप सार्वजनिक रूप से क्यों नहीं करता?

4 ​’सुशासन’ के दावों का क्या..?

क्या महासमुंद जिले में सुशासन का मतलब सिर्फ फाइलों की अदला-बदली है, या फिर दोषियों पर कड़ा प्रहार भी होगा..?

5 ​पारदर्शिता पर भरोसा कब लौटेगा..?

ग्रामीणों के बयानों और दस्तावेजों को नजरअंदाज कर भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देने वाली इस परिपाटी पर कलेक्टर साहब कब नकेल कसेंगे?

​निष्कर्ष: अब कलेक्टर विनय कुमार लंगेह के ‘कड़े फैसले’ का इंतजार

​पंचायती राज व्यवस्था का आधार ही जनता का भरोसा और प्रशासनिक जवाबदेही है। जब निचले स्तर के अधिकारी अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हैं, तो जनता अपने जिले के कलेक्टर की ओर उम्मीद से देखती है।

​महासमुंद की जनता अब कलेक्टर विनय कुमार लंगेह से यह उम्मीद लगाए बैठी है कि वे इस ‘प्रशासनिक सुस्ती’ और ‘फाइलों के खेल’ का संज्ञान लेंगे, जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक करवाएंगे और दोषी सचिव के खिलाफ कड़ा दंडात्मक कदम उठाकर जिले में प्रशासनिक अनुशासन की मिसाल पेश करेंगे।

​सीधा सवाल: “क्या कलेक्टर विनय कुमार लंगेह इस मामले में निष्पक्ष हस्तक्षेप कर भ्रष्टाचारियों को कड़ा संदेश देंगे, या फाइलों का यह फुटबॉल मैच ऐसे ही चलता रहेगा?”