हर्बल लाइफ का ‘सुपर कोच’ गुरु “गिरीश साहू” बना सरकारी गुरुजी ..!

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हर्बल लाइफ का ‘सुपर कोच’ गुरु “गिरीश साहू” बना सरकारी गुरुजी ..!

सरकारी स्कूल में बच्चों को पढ़ाने वाला शिक्षक नेटवर्क मार्केटिंग में सक्रिय होने के आरोपों से घिरा; बालोद से महासमुंद तक ‘सुपर कोच’ की भूमिका पर उठे सवाल

विशेष रिपोर्ट | प्रधान संपादक मयंक गुप्ता / 06 अक्टूबर 2026/ दिन मंगलवार
महासमुंद/बालोद छत्तीसगढ़
शिक्षा विभाग में सरकारी सेवा और निजी नेटवर्क मार्केटिंग गतिविधियों के बीच संभावित टकराव को लेकर एक मामला सामने आया है। विकासखंड डौंडी के शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला बेलौदा में पदस्थ शिक्षक गिरीश साहू, जो मूलतः महासमुंद जिले के इमलीभांठा क्षेत्र के निवासी बताए जा रहे हैं, उनके खिलाफ हर्बल लाइफ न्यूट्रिशन से जुड़कर नेटवर्क मार्केटिंग गतिविधियां संचालित करने और स्वयं को ‘सुपर कोच’ के रूप में प्रचारित करने के गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

शिकायतकर्ता द्वारा जिला शिक्षा अधिकारी और कलेक्टर के समक्ष दिए गए आवेदन में आरोप लगाया गया है कि शिक्षक सरकारी सेवा में रहते हुए हर्बल लाइफ से संबंधित प्रचार-प्रसार, नेटवर्किंग और कथित रूप से उत्पादों की बिक्री/प्रमोशन में सक्रिय हैं। शिकायत के साथ सोशल मीडिया पोस्ट, स्क्रीनशॉट और वीडियो जैसे डिजिटल साक्ष्य लगाए जाने की बात भी कही गई है।

बालोद में शिक्षक, महासमुंद में भी ‘सुपर कोच’?

इस पूरे मामले का सबसे अहम पहलू यह बताया जा रहा है कि गिरीश साहू केवल बालोद जिले में ही हर्बल लाइफ की नेटवर्किंग गतिविधियों से जुड़े नहीं बताए जा रहे, बल्कि महासमुंद जिले में भी उनके ‘सुपर कोच’ के रूप में सक्रिय रहने के आरोप सामने आए हैं।

यानी सवाल सिर्फ निजी कंपनी से जुड़ने तक सीमित नहीं है। सवाल यह भी है कि एक सरकारी शिक्षक की प्राथमिक जिम्मेदारी विद्यालय में शिक्षण कार्य है, तो फिर सरकारी सेवा के साथ नेटवर्क मार्केटिंग की गतिविधियों के लिए कितना समय और किस स्तर तक सक्रियता उचित है..?

‘एक्स्ट्रा इनकम’ के सपने का नेटवर्क

हर्बल लाइफ जैसी नेटवर्क मार्केटिंग व्यवस्था में लोगों को अतिरिक्त आय, बेहतर जीवनशैली और आर्थिक स्वतंत्रता के सपने दिखाकर नेटवर्क से जोड़ने के आरोप अक्सर सामने आते रहे हैं। महासमुंद क्षेत्र में भी शिकायत के अनुसार लोगों को हेल्थ और वेल्थ से जुड़े दावों के साथ नेटवर्किंग से जोड़ने का प्रयास किया गया।

हालांकि किसी भी उत्पाद अथवा कंपनी के संबंध में अंतिम निष्कर्ष जांच के बाद ही निकाला जा सकता है, लेकिन सरकारी कर्मचारी द्वारा ऐसी व्यावसायिक गतिविधियों में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष भागीदारी का आरोप अपने आप में विभागीय जांच का विषय जरूर बनता है।

बिना मेडिकल डिग्री ‘हेल्थ’ सलाह देने का आरोप

शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि शिक्षक द्वारा सोशल मीडिया एवं अन्य माध्यमों से स्वयं को ‘हेल्थ कोऑर्डिनेटर’, ‘डिजिटल क्रिएटर’ या ‘कोच’ के रूप में प्रस्तुत किया जाता है और लोगों को हेल्थ सप्लीमेंट्स के संबंध में सलाह दी जाती है।

यहां बड़ा सवाल यह है कि यदि कोई व्यक्ति चिकित्सक या मान्यता प्राप्त पोषण विशेषज्ञ नहीं है, तो क्या उसे किसी व्यक्ति की बीमारी, उपचार अथवा स्वास्थ्य स्थिति के संबंध में चिकित्सकीय सलाह देने का अधिकार है.?

यदि ऐसे दावे वास्तव में किए गए हैं, तो संबंधित विभागों द्वारा इसकी वैधानिकता की जांच किया जाना आवश्यक है।

कमाई पत्नी के खाते में होने की सफाई भी चर्चा में

शिकायत से जुड़े पक्ष के अनुसार जब शिक्षक से नेटवर्किंग से होने वाली आय को लेकर सवाल किए गए तो कथित तौर पर यह जवाब दिया गया कि कमाई उनकी नहीं बल्कि उनकी पत्नी के खाते में आती है।

लेकिन शिकायतकर्ता का दावा है कि सोशल मीडिया पर कंपनी से संबंधित प्रचार और नेटवर्किंग गतिविधियों में शिक्षक की स्वयं की सक्रियता के डिजिटल साक्ष्य मौजूद हैं।

यही वजह है कि अब सवाल केवल खाते में पैसा आने का नहीं, बल्कि यह पता लगाने का है कि व्यावसायिक गतिविधि वास्तव में कौन संचालित कर रहा था और सरकारी सेवा में रहते हुए उसमें संबंधित शिक्षक की भूमिका क्या थी..?

महासमुंद का दूसरा मामला और गंभीर सवाल

इसी प्रकरण से जुड़े आरोपों में महासमुंद के श्रीराम वाटिका, ईमलीभांठा क्षेत्र की एक दुखद घटना का भी उल्लेख किया गया है। मृतक दिनेश साहू की माता श्रीमती खेमिन साहू द्वारा पुलिस प्रशासन के समक्ष शिकायत देकर अपने बेटे की मृत्यु के कारणों और उससे जुड़े व्यक्तियों की भूमिका की जांच की मांग किए जाने की बात सामने आई है।

शिकायत में मृतक की पत्नी, एक व्यक्ति तथा शिक्षक गिरीश साहू के बीच कथित संबंधों और हर्बल लाइफ नेटवर्किंग गतिविधियों का उल्लेख किया गया है। शिकायतकर्ता परिवार ने इन घटनाक्रमों को अपने बेटे की मानसिक परेशानी से जोड़ते हुए जांच की मांग की है।

हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि इस रिपोर्ट में नहीं की जा रही है और दिनेश साहू की आत्महत्या को किसी व्यक्ति अथवा हर्बल लाइफ गतिविधि से सीधे जोड़ने का निष्कर्ष जांच के बिना निकालना उचित नहीं होगा। पुलिस जांच में यदि कोई आपराधिक अथवा अन्य जिम्मेदारी सामने आती है, तभी उस पर अंतिम टिप्पणी की जा सकती है।

13 अगस्त 2025 की घटना, लेकिन शिकायत के सवाल अब भी कायम

शिकायत के अनुसार दिनेश साहू ने 13 अगस्त 2025 की रात आत्महत्या की थी।

उनकी मां द्वारा पुलिस अधीक्षक महासमुंद के समक्ष शिकायत प्रस्तुत कर मामले की निष्पक्ष जांच की मांग किए जाने का दावा है।

अब सवाल यह है कि शिकायत पर पुलिस स्तर पर क्या जांच हुई? किन बिंदुओं पर जांच की गई?

क्या संबंधित व्यक्तियों के बयान लिए गए? क्या मोबाइल चैट, सोशल मीडिया गतिविधियों और अन्य डिजिटल साक्ष्यों की जांच हुई..?

यदि शिकायत अब भी लंबित है, तो परिवार को जांच की स्थिति की स्पष्ट जानकारी मिलना जरूरी है।

सरकारी शिक्षक की ‘सुपर कोच’ भूमिका पर विभागीय जांच जरूरी

सरकारी शिक्षक के मामले में सबसे महत्वपूर्ण बिंदु छत्तीसगढ़ सिविल सेवा आचरण नियमों के तहत उनकी निजी व्यावसायिक गतिविधियों की वैधानिकता है।

क्या शिक्षक ने किसी सक्षम अधिकारी से अनुमति ली थी..?

क्या उन्होंने नेटवर्क मार्केटिंग अथवा किसी निजी व्यावसायिक गतिविधि में स्वयं को अधिकृत रूप से जोड़ा था..?

क्या उनकी सोशल मीडिया गतिविधियां वास्तविक व्यावसायिक प्रचार का हिस्सा थीं..?

क्या इससे उनके सरकारी शिक्षकीय दायित्व प्रभावित हुए..?

और सबसे महत्वपूर्ण—क्या ‘सुपर कोच’ के रूप में उनकी भूमिका सरकारी सेवा के आचरण नियमों के अनुरूप है..?

इन सवालों का जवाब केवल विभागीय जांच से ही स्पष्ट हो सकता है।

शिक्षामंत्री से जांच और कड़ी कार्रवाई की मांग

इस पूरे मामले को लेकर छत्तीसगढ़ के शिक्षामंत्री से मांग की गई है कि सरकारी सेवा में रहते हुए निजी नेटवर्क मार्केटिंग गतिविधियों में संलिप्तता के आरोपों की निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच कराई जाए।

यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित शिक्षक के विरुद्ध सेवा नियमों के अनुसार कठोर विभागीय कार्रवाई की जानी चाहिए। शिकायतकर्ता पक्ष की मांग है कि सरकारी स्कूल को छोड़कर निजी नेटवर्किंग को प्राथमिकता देने वाले ऐसे मामलों पर विभाग स्पष्ट नीति और कार्रवाई सुनिश्चित करे।

अब बड़ा सवाल—‘सुपर कोच’ या सरकारी शिक्षक?

इस पूरे मामले का केंद्र यही सवाल है।

क्या सरकारी शिक्षक का काम बच्चों को शिक्षा देना है या निजी नेटवर्क मार्केटिंग में ‘सुपर कोच’ बनकर नेटवर्क तैयार करना..?

अगर आरोप गलत हैं तो जांच के बाद शिक्षक को क्लीन चिट मिलनी चाहिए।
अगर आरोप सही हैं तो सरकारी सेवा में रहते हुए निजी व्यावसायिक गतिविधियों पर नियमों के मुताबिक कार्रवाई होनी चाहिए।

क्योंकि मामला केवल एक शिक्षक या एक कंपनी तक सीमित नहीं है। मामला उस भरोसे का है जो अभिभावक और समाज एक सरकारी शिक्षक पर करते हैं।

हर्बल लाइफ के ‘सुपर कोच’ से जुड़े आरोपों की निष्पक्ष जांच ही अब इस पूरे मामले की असली तस्वीर सामने ला सकती है।

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