महासमुंद जिला पंचायत में फैला ‘सन्नाटा’ या साठगांठ का ‘साया’..? जांच में दोषी सिद्ध, ग्रामीणों की गवाही पक्की… फिर भी जिला CEO की ‘रहस्यमयी चुप्पी’ पर उठे तीखे सवाल..!
खास रिपोर्ट: मयंक गुप्ता (प्रधान संपादक, बेबाक बयान)
दिनांक: 08 सितंबर 2026
स्थान: महासमुंद (छत्तीसगढ़)
महासमुंद। क्या महासमुंद जिला पंचायत में नियम-कानून ताक पर रख दिए गए हैं..? क्या छत्तीसगढ़ की पंचायती राज व्यवस्था में पारदर्शिता का ढिंढोरा पीटने वाले आला अधिकारी खुद भ्रष्टाचारियों और मनचले कर्मचारियों की ढाल बन चुके हैं..? ग्राम पंचायत खैरा और खट्टी के चर्चित ‘सचिव कांड’ में अब तक की प्रशासनिक निष्क्रियता तो यही इशारा कर रही है।
घटना के पूरे ढाई महीने बीत चुके हैं, जांच टीम ने 6 अगस्त को ही अपनी रिपोर्ट में दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया, दर्जनों ग्रामीणों ने कड़े शब्दों में गवाही दर्ज कराई, लेकिन इसके बावजूद महासमुंद जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) और उप संचालक (पंचायत) का ‘कार्रवाई मीटर’ शून्य पर अटका हुआ है।
आखिर किस दबाव या ‘खास नजर-ए-करम’ के तहत दोषी सचिव को खुलेआम अभयदान दिया जा रहा है..?
कांड का पूरा लेखा-जोखा: जब अपनी पंचायत छोड़ पत्नी के ‘शक्ति केंद्र’ पहुंचे सचिव साहब
24 जून 2026 की मनमानी: शासन के स्पष्ट आदेश थे कि ‘प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण’ के तहत अति-महत्वपूर्ण ग्राम सभा में अपनी मूल पदस्थापना ग्राम पंचायत खैरा में सचिव मोतीलाल मेहरा मौजूद रहें। लेकिन साहब ने शासकीय आदेशों की धज्जियां उड़ाते हुए खैरा का बहिष्कार किया और पहुंच गए अपनी धर्मपत्नी (सरपंच श्रीमती अनिता मेहरा) की पंचायत खट्टी।
शासकीय नियमों को ठेंगा: ग्राम पंचायत खट्टी में अपनी पत्नी के पद का धौंस जमाते हुए सचिव मोती मेहरा ने न सिर्फ पंचायत की आधिकारिक कार्यवाही में अवैध हस्तक्षेप किया, बल्कि ग्रामीणों से सीधे भिड़ गए।
26.05.2010 के आदेश का खुला उल्लंघन: शासन का नियम साफ कहता है कि महिला प्रतिनिधियों के कार्यों में पति या रिश्तेदार का हस्तक्षेप पूरी तरह प्रतिबंधित है। एक सरकारी लोक सेवक द्वारा दूसरी पंचायत में जाकर गुंडागर्दी और मनमानी करना अनुशासनहीनता का सबसे घिनौना उदाहरण है।
6 अगस्त की जांच: सबूत पक्के, गवाही ठोस… फिर फाइलों पर धूल क्यों..?
शिकायतकर्ता मयंक गुप्ता की शिकायत पर जनपद पंचायत द्वारा गठित जांच टीम ने 06 अगस्त 2026 को खट्टी के पंचायत भवन में जांच पूरी की थी।
दर्जनों ग्रामीणों ने खोला मोर्चा: ग्रामीणों ने मौके पर उपस्थित होकर सचिव के अनुचित दबाव, अभद्र व्यवहार और मूल पदस्थापना से नदारद रहने की पुष्टि की।
पुख्ता साक्ष्य समर्पित: बैठक के फोटोग्राफ, रजिस्टर की प्रविष्टियां और सरकारी आदेशों की धज्जियां उड़ाने के सबूत जांच अधिकारी को सौंप दिए गए।
सबूत हाथ में हैं, बयान दर्ज हैं… फिर भी जिला पंचायत CEO और उप संचालक की कलम क्यों ठिठक रही है..?
जनता के चुभते सवाल: दोषी कौन—जिला CEO या उप संचालक..?
1 कागजी नियम या असली शह? जब महिला सरपंच के शासकीय कार्यों में पति के हस्तक्षेप पर पूर्ण पाबंदी है, तो वर्दीधारी लोक सेवक (सचिव) पर अब तक FIR या निलंबन की गाज क्यों नहीं गिरी..?
2 कुर्सी का दबाव या पर्दे के पीछे का खेल? जांच रिपोर्ट ठंडे बस्ते में डालना इस बात का साफ संकेत है कि या तो जिला पंचायत के जिम्मेदार अधिकारी किसी राजनीतिक/वित्तीय दबाव में हैं, या फिर दोषी सचिव को बचाने की सुनियोजित साठगांठ जारी है।
3 संवैधानिक संस्था का अपमान कब तक? ग्राम सभा जैसी पवित्र संस्था का अपमान करके दूसरी पंचायत में उपद्रव मचाने वाले सचिव के हौसले इतने बुलंद क्यों हैं..?
आक्रोशित ग्रामीणों और जागरूक जनता की सीधी चेतावनी
क्षेत्र के ग्रामीणों और शिकायतकर्ता का साफ कहना है कि छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम और लोक सेवक आचरण नियमों की सरेआम धज्जियां उड़ाने वाले सचिव मोती मेहरा को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाए।
यदि जिला प्रशासन और जिला पंचायत CEO अब भी अपनी ‘रहस्यमयी चुप्पी’ नहीं तोड़ते हैं, तो यह मान लिया जाएगा कि महासमुंद में भ्रष्टाचार और स्वेच्छाचारिता को सीधे जिला पंचायत कार्यालय से ही संरक्षण मिल रहा है!
