समृद्धि का रहस्यमयी जाल: डिजिटल हस्ताक्षरों पर कब्ज़ा, फर्जी बिलों की बारिश और 39 लाख के पुराने घोटाले का नया अध्याय

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समृद्धि का रहस्यमयी जाल: डिजिटल हस्ताक्षरों पर कब्ज़ा, फर्जी बिलों की बारिश और 39 लाख के पुराने घोटाले का नया अध्याय

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता
महासमुंद (छत्तीसगढ़) | 09 सितंबर 2026/बुधवार
जनपद पंचायत महासमुंद में शासकीय खजाने की रखवाली करने वाले तंत्र में एक ऐसा रहस्यमयी खेल चल रहा है, जिसमें डिजिटल हस्ताक्षर (DSC) को हथियार बनाकर फर्जी भुगतानों का साम्राज्य खड़ा कर लिया गया है। सरपंचों और सचिवों के डिजिटल सिग्नेचर सर्टिफिकेट अवैध रूप से अपने कब्जे में रखकर भुगतान की पूरी प्रक्रिया को नियंत्रित करने का आरोप एक महिला कर्मचारी पर लगा है। यह ताजा मामला सिर्फ मौजूदा अनियमितताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि कोरोना काल के 39 लाख रुपये के बहुचर्चित घोटाले से भी सीधे जुड़ता नजर आ रहा है।

DSC पर अवैध कब्ज़ा और ब्लैकमेलिंग का खुला खेल

आधिकारिक शिकायत पत्र (क्रमांक 01, दिनांक 04 अगस्त 2026) के अनुसार, जनपद पंचायत महासमुंद की संकाय शाखा में पदस्थ श्रीमती समृद्धि शर्मा के खिलाफ विभिन्न ग्राम पंचायतों के सरपंचों और सचिवों ने गंभीर आरोप लगाए हैं। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि उनके डिजिटल सिग्नेचर सर्टिफिकेट अवैध रूप से अपने पास जमा रख लिए गए हैं। इन DSC के जरिए भुगतान की पूरी प्रक्रिया खुद संचालित की जा रही है।
कार्य से जुड़े वैध दस्तावेजों के बजाय अपूर्ण और कोरे बिल-वाउचर अपलोड करके शासकीय धनराशि निकाल ली जा रही है। जब सरपंच या सचिव अपनी DSC वापस मांगते हैं, तो उन्हें टरकाया जाता है। शिकायतों में यह भी उल्लेख है कि खुलेआम धमकी दी जाती है—“यदि भुगतान हमारे माध्यम से नहीं हुआ तो DSC निरस्त कर दी जाएगी या पंचायत का भुगतान रोक दिया जाएगा।” यह स्थिति न केवल वित्तीय नियमों का उल्लंघन है, बल्कि पंचायती राज व्यवस्था की स्वायत्तता पर भी सीधा प्रहार है।

39 लाख के पुराने घोटाले से जुड़ते तार

ताजा DSC कांड ने वर्ष 2019-20 के कोरोना काल के 15वें वित्त आयोग की 39 लाख रुपये की राशि के गबन को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। महामारी के दौरान जब लॉकडाउन और धारा 144 लागू थी, तब सैनिटाइजर, मास्क और सुरक्षा सामग्री खरीदने के नाम पर फर्जी बिल-वाउचर लगाकर केंद्रीय राशि का बंदरबांट किया गया था।
वर्तमान में DSC दबाकर फर्जी भुगतान का जो तरीका अपनाया जा रहा है, उससे यही संकेत मिलता है कि उस पुराने घोटाले में भी संकाय शाखा और संबंधित कर्मचारियों की भूमिका रही होगी। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि इसी सिंडिकेट को बचाने के लिए उच्च स्तर पर फाइलों को दबाने की कोशिशें जारी हैं।

जांच रिपोर्ट जमा, फिर भी कार्यवाही शून्य

39 लाख रुपये के घोटाले की जांच पिछले दो वर्षों से लगभग ठप पड़ी हुई है। कभी जांच अधिकारी का तबादला हो जाता है, कभी वे सेवानिवृत्त हो जाते हैं। हाल ही में शिकायतकर्ताओं ने वर्तमान जनपद पंचायत मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) मिषा कोसले से मुलाकात की। उन्होंने बताया कि उन्होंने अपने स्तर पर निष्पक्ष जांच पूरी करके रिपोर्ट जिला पंचायत कार्यालय में जमा कर दी है।
अब सवाल यह उठता है कि जब जनपद CEO की जांच रिपोर्ट जमा हो चुकी है, तो जिला पंचायत के वर्तमान मुख्य कार्यपालन अधिकारी एस.आलोक और उनका अमला कार्यवाही करने से क्यों बच रहा है..? शिकायतकर्ताओं के अनुसार, जब इस विषय पर जानकारी मांगी जाती है, तो गैर-जिम्मेदाराना जवाब दिया जाता है—“इसमें और क्या कार्यवाही करेंगे?” क्या जिला पंचायत कार्यालय के किसी कर्मचारी की संलिप्तता के कारण कार्रवाई रोकी जा रही है? यह सवाल अभी भी अनुत्तरित है।

शासन-प्रशासन को चेतावनी

जनता के हक का पैसा
डकारना और फर्जी दस्तावेजों के सहारे शासकीय खजाने को चूना लगाना गंभीर अपराध है। केंद्र सरकार की योजनाओं के पैसे का इस तरह गबन प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा है।

यदि शासन-प्रशासन द्वारा इस पूरे प्रकरण में संलिप्त अधिकारियों और कर्मचारियों पर त्वरित, निष्पक्ष जांच कर कड़ी दंडात्मक और विधिक कार्रवाई (FIR सहित) नहीं की गई, तो आने वाले दिनों में नए-नए मामलों और काली करतूतों का सिलसिलेवार खुलासा किया जाता रहेगा। पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग अब सिर्फ शिकायतकर्ताओं की नहीं, बल्कि पूरे जनपद की आम जनता की भी बन गई है।

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