साहब, जवाब दो.! महासमुंद में 39 लाख के ‘कोरोना खेल’ का असली खिलाड़ी कौन है..?
नोटिस के बाद भी समृद्धि शर्मा -दिलीप मनहरे पर एक्शन क्यों नहीं लिया गया ..?
39 लाख रुपये की सैनिटाइजर, मास्क और स्वच्छता सामग्री खरीदी की जांच का क्या हुआ? 26 जून 2024 को कारण बताओ नोटिस जारी होने की बात, लेकिन अंतिम कार्रवाई का विवरण अब भी सवालों के घेरे में
प्रधान संपादक मयंक गुप्ता
12 अक्टूबर 2026 | सोमवार
महासमुंद, छत्तीसगढ़।
महासमुंद जिले की जनपद पंचायत में कोरोना काल के दौरान हुई कथित खरीदी और 39 लाख रुपये के भुगतान का पुराना प्रकरण एक बार फिर प्रशासनिक जवाबदेही के केंद्र में है। सरकारी धन से सैनिटाइजर, मास्क और स्वच्छता सामग्री की खरीदी के नाम पर किए गए भुगतान को लेकर उठे सवालों का स्पष्ट और दस्तावेजी जवाब अब भी सामने आना जरूरी है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि इस मामले में कारण बताओ नोटिस जारी किए गए थे, तो उसके बाद जांच कहां तक पहुंची और अंतिम कार्रवाई का निर्णय क्या हुआ..?
यह मामला केवल पुराने बिल-वाउचर का नहीं, बल्कि सरकारी खरीद प्रक्रिया, भुगतान की पारदर्शिता और जिम्मेदार अधिकारियों-कर्मचारियों की जवाबदेही से जुड़ा है। कोरोना जैसी आपातकालीन परिस्थिति में खरीदी की आवश्यकता अपनी जगह थी, लेकिन सार्वजनिक धन के उपयोग में नियमों का पालन और खर्च का सत्यापन भी उतना ही अनिवार्य था।
39 लाख रुपये का प्रकरण: समृद्धि शर्मा और दिलीप मनहरे पर उठे सवाल
उपलब्ध प्रकरण-विवरण के अनुसार, वर्ष 2019-20 में कोरोना काल के दौरान सैनिटाइजर, मास्क और स्वच्छता सामग्री की खरीदी के नाम पर लगभग 39 लाख रुपये के भुगतान का मामला सामने आया था। इस खरीदी की प्रक्रिया, सामान्य सभा के प्रस्ताव, वेंडर चयन, बिल-वाउचर और वित्तीय नियमों के पालन को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं।
इस मामले में तत्कालीन जनपद पंचायत के संकाय शाखा में पदस्थ समृद्धि शर्मा और लिपिक दिलीप मनहरे को जिला पंचायत महासमुंद की ओर से 26 जून 2024 को कारण बताओ नोटिस जारी किए जाने की बात सामने आई थी। बताया गया था कि संबंधित व्यक्तियों से तीन दिनों के भीतर जवाब मांगा गया था और संतोषजनक जवाब नहीं मिलने की स्थिति में नियमानुसार अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी गई थी।
हालांकि, नोटिस जारी होने की बात अपने आप में किसी व्यक्ति को दोषी साबित नहीं करती। संबंधित नोटिस, जवाब, जांच प्रतिवेदन और अंतिम आदेश की प्रमाणित प्रतियां सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि किसकी क्या भूमिका थी और प्रशासन ने क्या निष्कर्ष निकाला।
अब मुख्य सवाल यही है—समृद्धि शर्मा और दिलीप मनहरे से मांगे गए जवाबों पर प्रशासन ने क्या निर्णय लिया? क्या जांच पूरी हो चुकी है, या मामला अब भी लंबित है..?
जांच के केंद्र में पांच अहम सवाल
इस 39 लाख रुपये के प्रकरण में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए निम्न बिंदुओं पर स्पष्ट जानकारी सामने आनी चाहिए—
खरीदी की वैधानिकता: क्या संबंधित खरीदी के लिए सामान्य सभा या सक्षम प्राधिकारी की विधिवत स्वीकृति ली गई थी? क्या खरीदी प्रक्रिया निर्धारित वित्तीय नियमों के अनुरूप थी..?
बिल और भुगतान का सत्यापन: क्या भुगतान से संबंधित बिल, वाउचर, बैंक रिकॉर्ड और वेंडर के दस्तावेजों की जांच की गई..?
सामग्री की वास्तविक आपूर्ति: क्या सैनिटाइजर, मास्क और स्वच्छता सामग्री की मात्रा, गुणवत्ता तथा वास्तविक आपूर्ति का भौतिक सत्यापन किया गया?
कारण बताओ नोटिस पर निर्णय: 26 जून 2024 को जारी बताए जा रहे नोटिस के जवाब में संबंधित पक्षों ने क्या स्पष्टीकरण दिया? उस पर जांच अधिकारी या सक्षम प्राधिकारी ने क्या निष्कर्ष निकाला..?
जिम्मेदारी और अंतिम आदेश: क्या किसी अधिकारी, कर्मचारी या अन्य संबंधित व्यक्ति की भूमिका निर्धारित की गई? यदि अनियमितता प्रमाणित हुई, तो क्या कार्रवाई की गई? और यदि आरोप प्रमाणित नहीं हुए, तो क्या प्रकरण को अंतिम रूप से बंद करने का आदेश जारी हुआ..?
नोटिस के बाद दो साल से अधिक का सवाल: फाइल आगे बढ़ी या जवाबदेही अटकी..?
26 जून 2024 को नोटिस जारी किए जाने का विवरण यदि आधिकारिक अभिलेखों से पुष्ट होता है, तो 12 अक्टूबर 2026 तक इस मामले की वर्तमान स्थिति जानना सार्वजनिक हित का महत्वपूर्ण विषय है।
प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि नोटिस के बाद जवाब प्राप्त हुए या नहीं, जांच किस अधिकारी को सौंपी गई, जांच प्रतिवेदन कब तैयार हुआ और अंतिम निर्णय किस स्तर पर लंबित है।
यदि जांच पूरी हो चुकी है, तो निष्कर्ष और कार्रवाई का विवरण सार्वजनिक किया जाना चाहिए। यदि जांच लंबित है, तो देरी का कारण और उसे पूरा करने की समयसीमा बताई जानी चाहिए। केवल नोटिस जारी कर देना जवाबदेही का अंतिम चरण नहीं है; मामले का निष्पक्ष परीक्षण और नियमानुसार निर्णय भी जरूरी है।
क्या वेंडर और भुगतान से जुड़े दस्तावेजों की स्वतंत्र जांच हुई..?
इस प्रकरण में भुगतान प्राप्त करने वाले वेंडर की पहचान, बिलों की वैधता, बैंक लेन-देन और सामग्री की आपूर्ति से जुड़े अभिलेख महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इन दस्तावेजों की जांच से ही यह पता चल सकेगा कि सरकारी राशि का उपयोग वास्तविक खरीदी के लिए हुआ या कहीं प्रक्रिया संबंधी अनियमितता हुई।
यदि अभिलेखों में विसंगतियां पाई गई हैं, तो उनकी जिम्मेदारी साक्ष्यों के आधार पर तय की जानी चाहिए। वहीं, यदि सभी भुगतान और आपूर्तियां नियमसम्मत पाई गई हैं, तो संबंधित पक्षों को भी स्पष्ट निष्कर्ष के माध्यम से स्थिति बताई जानी चाहिए।
जांच का उद्देश्य किसी को पहले से दोषी ठहराना नहीं, बल्कि तथ्यों के आधार पर जिम्मेदारी तय करना और सरकारी धन के उपयोग का हिसाब जनता के सामने लाना है।
महासमुंद प्रशासन से सीधे सवाल
जिला पंचायत महासमुंद और संबंधित सक्षम अधिकारियों को इस प्रकरण पर निम्न बिंदुओं पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए—
39 लाख रुपये की कोरोना कालीन खरीदी की जांच वर्तमान में किस स्तर पर है..?
समृद्धि शर्मा और दिलीप मनहरे को जारी किए जाने की बात सामने आए कारण बताओ नोटिस पर क्या अंतिम निर्णय लिया गया..?
क्या संबंधित वेंडर के बिल, भुगतान रिकॉर्ड और सामग्री आपूर्ति का सत्यापन पूरा हो चुका है..?
क्या जांच में किसी प्रकार की वित्तीय या प्रक्रियागत अनियमितता प्रमाणित हुई..?
यदि कार्रवाई की गई है, तो आदेश की तारीख और कार्रवाई का विवरण क्या है..?
यदि नहीं, तो प्रकरण लंबित रहने का कारण क्या है..?
बेबाक बयान न्यूज की पड़ताल जारी
जनता के पैसे का हिसाब जनता तक पहुंचना चाहिए। 39 लाख रुपये के इस पुराने प्रकरण में न तो केवल नोटिस जारी होने को दोष सिद्ध होने का प्रमाण माना जा सकता है और न ही अंतिम कार्रवाई की जानकारी के अभाव को अपने आप क्लीन चिट समझा जा सकता है।
जरूरत है निष्पक्ष जांच, दस्तावेजी पारदर्शिता और समयबद्ध निर्णय की। यदि किसी की भूमिका प्रमाणित होती है, तो नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए; यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते, तो संबंधित पक्षों को भी स्पष्ट निष्कर्ष के साथ राहत मिलनी चाहिए।
अब महासमुंद प्रशासन को बताना चाहिए—39 लाख रुपये के कोरोना खरीदी प्रकरण में जांच कहां तक पहुंची, जवाबदेही किसकी तय हुई और अंतिम आदेश कब जारी होगा..?
बेबाक बयान न्यूज इस मामले में आधिकारिक अभिलेखों, जांच की स्थिति और संबंधित पक्षों के जवाब के आधार पर पड़ताल जारी रखेगा।
