खैरझिटी पंचायत में सत्ता का संकट गहराया! अविश्वास प्रस्ताव के बाद हाईकोर्ट की रोक से अटकी सरपंच नियुक्ति, विकास कार्यों पर लगा ब्रेक

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खैरझिटी पंचायत में सत्ता का संकट गहराया! अविश्वास प्रस्ताव के बाद हाईकोर्ट की रोक से अटकी सरपंच नियुक्ति, विकास कार्यों पर लगा ब्रेक

सरपंच पद की कानूनी लड़ाई में उलझी पंचायत व्यवस्था; 27 जुलाई के पत्र में जनपद CEO ने मांगा मार्गदर्शन, ग्रामीणों के कामकाज को लेकर बढ़ी चिंता

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता/19 अक्टूबर 2026/ दिन सोमवार
महासमुंद, छत्तीसगढ़।
महासमुंद जिले की जनपद पंचायत महासमुंद के अंतर्गत ग्राम पंचायत खैरझिटी में सरपंच पद को लेकर पैदा हुआ विवाद अब कानूनी और प्रशासनिक पेचीदगी का रूप ले चुका है। अविश्वास प्रस्ताव पारित होने के बाद सरपंच पद रिक्त होने और स्थानापन्न सरपंच की नियुक्ति को लेकर उठे सवालों के बीच मामला छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर तक पहुंच गया है। हाईकोर्ट से अंतरिम राहत मिलने के बाद नियुक्ति प्रक्रिया पर रोक लगने की जानकारी सामने आई है। वहीं, पंचायत के कामकाज को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए जनपद पंचायत महासमुंद के मुख्य कार्यपालन अधिकारी ने जिला पंचायत के पंचायत विभाग से मार्गदर्शन मांगा है।

इस पूरे घटनाक्रम ने ग्राम पंचायत में प्रशासनिक व्यवस्था, विकास योजनाओं की निरंतरता और ग्रामीणों से जुड़े जरूरी कार्यों को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि कानूनी प्रक्रिया पूरी होने तक पंचायत का कामकाज किस व्यवस्था के तहत संचालित होगा और ग्रामीणों को राहत कब मिलेगी..?

अविश्वास प्रस्ताव के बाद शुरू हुआ विवाद

प्राप्त जानकारी के अनुसार, ग्राम पंचायत खैरझिटी की तत्कालीन सरपंच श्रीमती रामेश्वरी कुंजलाल चेलाक के विरुद्ध 17 अप्रैल 2026 को अविश्वास प्रस्ताव पारित किया गया था। इसके बाद उन्हें सरपंच पद से पृथक किए जाने की कार्रवाई हुई। इस घटनाक्रम के पश्चात पंचायत के नियमित संचालन के लिए स्थानापन्न अथवा कार्यवाहक सरपंच की व्यवस्था का प्रश्न सामने आया।

पंचायत में नेतृत्व की वैकल्पिक व्यवस्था को लेकर सहमति और प्रशासनिक प्रक्रिया का रास्ता स्पष्ट नहीं हो पाने के कारण मामला लगातार उलझता गया। स्थिति ऐसी बनी कि सरपंच पद की जिम्मेदारी किसे सौंपी जाए, इस पर प्रशासनिक स्तर पर निर्णय लेना चुनौतीपूर्ण हो गया।

ग्राम पंचायत में सरपंच की भूमिका केवल बैठकों तक सीमित नहीं होती। विकास कार्यों की निगरानी, पंचायत संबंधी प्रस्तावों पर कार्रवाई, विभिन्न योजनाओं का क्रियान्वयन और ग्रामीणों की समस्याओं के निराकरण में भी इस पद की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। ऐसे में पद से जुड़ा विवाद लंबा खिंचने पर पंचायत की कार्यप्रणाली प्रभावित होने की आशंका स्वाभाविक है।

आरक्षण बना नियुक्ति प्रक्रिया में अहम मुद्दा

मामले में एक महत्वपूर्ण पहलू ग्राम पंचायत खैरझिटी के सरपंच पद का आरक्षण है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यह पद अनुसूचित जाति महिला वर्ग के लिए आरक्षित है। इसी आरक्षण व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए स्थानापन्न सरपंच की नियुक्ति को लेकर प्रशासनिक स्तर पर सवाल उठे।

बताया गया है कि अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व), महासमुंद की ओर से प्रस्तुत जांच प्रतिवेदन के आधार पर उपसरपंच श्री टिकेलाल जलक्षत्री को स्थानापन्न सरपंच बनाने के लिए पंचायत द्वारा पारित प्रस्ताव को निरस्त कर दिया गया। इस कार्रवाई में छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम, 1993 की धारा 85 के प्रावधानों का उल्लेख किया गया है।

इस घटनाक्रम से स्पष्ट है कि मामला केवल पंचायत के भीतर पदभार सौंपने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें आरक्षण व्यवस्था, लागू कानूनी प्रावधानों और प्रशासनिक अधिकारों की व्याख्या भी महत्वपूर्ण है। हालांकि, संबंधित आदेश की संपूर्ण प्रति और उसमें दर्ज कानूनी आधार का स्वतंत्र परीक्षण किए बिना इस कार्रवाई की वैधानिकता पर अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

हाईकोर्ट पहुंचा मामला, नियुक्ति प्रक्रिया पर अंतरिम रोक

स्थानापन्न सरपंच की नियुक्ति को लेकर उत्पन्न विवाद के बीच श्रीमती रामेश्वरी कुंजलाल चेलाक ने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर में याचिका दायर की। उपलब्ध विवरण के अनुसार, यह मामला WPC No. 2804/2026 — Smt. Rameshwari Kunjlal Chelak Vs State of Chhattisgarh & Others के रूप में दर्ज है।

याचिका पर सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की पीठ द्वारा अंतरिम आदेश जारी किए जाने की जानकारी दी गई है। बताया गया है कि अगली सुनवाई तक संबंधित प्राधिकारियों को सरपंच नियुक्ति की प्रक्रिया में आगे कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया गया है।

इस अंतरिम आदेश के बाद नियुक्ति प्रक्रिया पर विराम लग गया। नतीजतन, पंचायत में वैकल्पिक नेतृत्व की व्यवस्था को लेकर प्रशासन के सामने नई चुनौती खड़ी हो गई है।

यहां यह समझना जरूरी है कि अंतरिम स्थगन आदेश का प्रभाव उसके वास्तविक शब्दों और दायरे पर निर्भर करता है। इसलिए आदेश की प्रमाणित प्रति के आधार पर ही यह स्पष्ट किया जा सकता है कि रोक किन अधिकारियों, किन कदमों और किस अवधि तक लागू है। मामले का अंतिम निर्णय अभी न्यायालय की आगामी कार्यवाही पर निर्भर करेगा।

27 जुलाई को जनपद CEO ने मांगा मार्गदर्शन

हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद प्रशासनिक स्तर पर आगे की कार्रवाई को लेकर मार्गदर्शन मांगे जाने का मामला भी सामने आया है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक, जनपद पंचायत महासमुंद के मुख्य कार्यपालन अधिकारी ने 27 जुलाई 2026 को पत्र क्रमांक 2053/निर्वा.शाखा/ज.पं./2026 के माध्यम से उपसंचालक (पंचायत), जिला महासमुंद को पत्र भेजा।

पत्र में न्यायालय के निर्देशों के मद्देनजर नियुक्ति प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाने की स्थिति का उल्लेख करते हुए ग्राम पंचायत के कार्यों को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए नियमानुसार आवश्यक दिशा-निर्देश मांगे गए हैं।

पत्र की प्रतिलिपि कलेक्टर महासमुंद, मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत, अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) तथा वर्तमान उपसरपंच और पंचों को भी भेजे जाने की जानकारी है।

इस पत्राचार से संकेत मिलता है कि प्रशासन पंचायत के नियमित संचालन के लिए लागू नियमों के अनुरूप रास्ता तलाश रहा है। लेकिन मार्गदर्शन के लिए पत्र जारी होना और उसके आधार पर कोई अंतिम प्रशासनिक व्यवस्था लागू होना दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। इसलिए यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित विभाग ने इस पत्र पर क्या निर्णय लिया और पंचायत के कामकाज को लेकर आगे कौन-से निर्देश जारी किए गए।

विकास कार्यों पर असर की आशंका, ग्रामीणों को इंतजार

पंचायत में सरपंच पद को लेकर विवाद लंबा खिंचने से ग्रामीणों के मन में कई सवाल उठना स्वाभाविक है। पंचायत के नियमित प्रशासनिक कार्य, विकास योजनाओं की प्रगति, प्रस्तावों पर निर्णय और जनहित से जुड़े मामलों का संचालन किस प्रकार होगा, यह स्पष्ट होना जरूरी है।

हालांकि, पंचायत के सभी विकास कार्य पूरी तरह बंद होने की पुष्टि के लिए संबंधित कार्यों की सूची, भुगतान की स्थिति, लंबित प्रस्तावों और विभागीय अभिलेखों की जांच आवश्यक है। इसके बावजूद नेतृत्व और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर अनिश्चितता दूर करना स्थानीय प्रशासन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

ग्रामीणों के हित में यह जरूरी है कि न्यायालय के आदेश का पालन करते हुए पंचायत के नियमित कार्यों के संचालन का वैधानिक रास्ता स्पष्ट किया जाए, ताकि पद से जुड़े विवाद का खामियाजा आम लोगों को न भुगतना पड़े।

अब प्रशासन के सामने तीन बड़े सवाल

खैरझिटी पंचायत के पूरे प्रकरण में अब तीन प्रमुख सवालों के जवाब सामने आना जरूरी है।

पहला सवाल: 27 जुलाई 2026 को भेजे गए मार्गदर्शन संबंधी पत्र पर उपसंचालक (पंचायत) अथवा जिला प्रशासन ने क्या निर्णय लिया..?

दूसरा सवाल: हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश के दायरे में रहते हुए पंचायत के दैनिक प्रशासनिक कार्यों और विकास योजनाओं के संचालन के लिए कौन-सी वैधानिक व्यवस्था उपलब्ध है..?

तीसरा सवाल: सरपंच पद से जुड़े विवाद की अगली सुनवाई कब होनी है और न्यायालय में अब तक की कार्यवाही की स्थिति क्या है..?

इन सवालों के जवाब सामने आने से ही पंचायत की वर्तमान स्थिति और आगे की दिशा को लेकर स्पष्टता आएगी।

निष्कर्ष: कानूनी प्रक्रिया के साथ पंचायत संचालन भी जरूरी

ग्राम पंचायत खैरझिटी का मामला अब केवल सरपंच पद के विवाद तक सीमित नहीं रह गया है। एक ओर हाईकोर्ट के आदेश का पालन करना प्रशासन की जिम्मेदारी है, तो दूसरी ओर पंचायत के जरूरी कामकाज और ग्रामीणों के हितों की अनदेखी न हो, यह सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

अब निगाहें जिला प्रशासन, पंचायत विभाग और हाईकोर्ट की आगामी कार्यवाही पर टिकी हैं। ग्रामीणों को उम्मीद है कि कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप जल्द ही ऐसी व्यवस्था स्पष्ट होगी, जिससे पंचायत का नियमित कामकाज प्रभावित न हो और विकास संबंधी गतिविधियों को आगे बढ़ाने का रास्ता खुले।

बेबाक बयान न्यूज की नजर इस पूरे मामले पर बनी रहेगी। संबंधित विभागों की प्रतिक्रिया, मार्गदर्शन पत्र पर हुई कार्रवाई और न्यायालय की आगामी कार्यवाही से जुड़ी प्रमाणित जानकारी सामने आने पर प्रकरण की आगे की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

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