“बागबाहरा के झोलाछाप डॉक्टरों के ‘लीडर’ चेतन साहू… आखिर माजरा क्या है…?” कथित अवैध क्लीनिकों को लेकर स्वास्थ्य विभाग की भूमिका पर उठे सवाल..!

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“बागबाहरा के झोलाछाप डॉक्टरों के ‘लीडर’ चेतन साहू… आखिर माजरा क्या है…?” कथित अवैध क्लीनिकों को लेकर स्वास्थ्य विभाग की भूमिका पर उठे सवाल..!

ग्रामीणों की सेहत से खिलवाड़ या प्रशासनिक लापरवाही? शिकारीपाली के कथित अवैध क्लीनिक मामले ने पकड़ी तूल, स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल

​प्रधान संपादक मयंक गुप्ता/ 30 अक्टूबर 2026/दिन शुक्रवार
महासमुंद/तेंदुकोना (छत्तीसगढ़)
​छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के तेंदुकोना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले ग्राम शिकारीपाली में एक कथित अवैध क्लीनिक के संचालन को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। यह मामला महज एक दुकान या संस्थान के संचालन तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण अंचलों में स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता, झोलाछाप संस्कृति, कथित संगठनों के दबाव और स्वास्थ्य विभाग की मौन साठगांठ पर गंभीर सवालिया निशान खड़े करता है। स्थानीय स्तर पर उठ रही शिकायतों और चर्चाओं के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर किसकी शह पर यह कथित क्लीनिक संचालित हो रहा है और वहां आने वाले मरीजों की जिंदगी से क्यों खिलवाड़ किया जा रहा है?

​क्लीनिक संचालक अरुण मलिक की योग्यता पर संदेह, दस्तावेजों के नाम पर ‘यूनियन’ का पैंतरा

​इस पूरे प्रकरण के केंद्र में क्लीनिक संचालक अरुण मलिक का नाम सामने आया है। जब मीडिया और स्थानीय जागरूक लोगों की टीम ने शिकारीपाली स्थित इस कथित क्लीनिक पहुंचकर संचालक से उसकी चिकित्सकीय योग्यता, डिग्री, वैध पंजीयन (Registration) और क्लीनिक संचालन से जुड़े कानूनी दस्तावेजों की मांग की, तो वहां हैरान करने वाला वाकया सामने आया।

​दस्तावेज दिखाने के बजाय कथित तौर पर एक अज्ञात ‘यूनियन’ या संगठन का हवाला दिया गया। साथ ही यह भी ताकीद की गई कि यदि इस मामले में कोई भी जानकारी चाहिए या पूछताछ करनी है, तो सीधे तौर पर चेतन कुमार साहू से संपर्क किया जाए।

​यहाँ यह सवाल लाजिमी है कि क्या किसी भी मेडिकल प्रतिष्ठान की वैधानिकता का पैमाना कोई संगठन या यूनियन होती है? नियमतः किसी भी क्लीनिक के संचालन के लिए संचालक के पास मान्यता प्राप्त मेडिकल डिग्री, संबंधित मेडिकल काउंसिल का वैध पंजीयन और स्वास्थ्य विभाग की अनुमति होनी चाहिए। किसी संगठन का नाम लेकर दस्तावेजों को छिपाना सीधे तौर पर दाल में कुछ काला होने की ओर इशारा करता है।

​चेतन कुमार साहू और कथित संगठन की भूमिका पर संशय

​प्रकरण में बरबसपुर निवासी चेतन कुमार साहू का नाम एक ऐसे संदिग्ध संगठन या यूनियन से जोड़कर चर्चा में है, जो कथित तौर पर अयोग्य और झोलाछाप चिकित्सकों के संरक्षण से जुड़ा बताया जा रहा है। हालांकि, इस संगठन की वास्तविक पहचान, इसका कानूनी पंजीयन, इसके पदाधिकारी और इसमें चेतन कुमार साहू की प्रत्यक्ष भूमिका क्या है, यह बिना आधिकारिक और निष्पक्ष जांच के स्पष्ट नहीं हो सकता।

​लेकिन, जिस तरह से कानूनी और प्रशासनिक सवालों से बचने के लिए संगठनों का आड़ लिया जा रहा है, उसने प्रशासनिक अमले की कार्यशैली को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है। क्या किसी संगठन का दबाव स्वास्थ्य विभाग के नियमों से ऊपर है?

​राजनीतिक मुलाकात और संरक्षण के कयास

​मामले के तूल पकड़ने के बाद यह भी चर्चा जोरों पर है कि खल्लारी विधानसभा क्षेत्र के विधायक द्वारिकाधीश यादव से कथित यूनियन से जुड़े कुछ लोगों की मुलाकात हुई है। हालांकि, इस मुलाकात के पीछे के असली कारणों, उसमें शामिल चेहरों और बातचीत के विषयों पर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

​राजनीतिक जानकारों का मानना है कि किसी जनप्रतिनिधि से शिष्टाचार भेंट या मुलाकात को तुरंत

‘राजनीतिक संरक्षण’ का नाम दे देना जल्दबाजी होगी। फिर भी, यदि इस आड़ में स्वास्थ्य जैसे संवेदनशील मुद्दे पर प्रशासनिक कार्रवाई को प्रभावित करने का प्रयास किया जा रहा है, तो यह गंभीर चिंता का विषय है। जनप्रतिनिधियों और प्रशासन दोनों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इस तरह के मामलों में राजनीति से ऊपर उठकर आम जनता के हित को प्राथमिकता दी जाए।

​ग्रामीण मरीजों की जिंदगी दांव पर: कौन लेगा जिम्मेदारी?

​शहरों की तुलना में ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं की भारी कमी होती है। गरीब और भोले-भाले ग्रामीण छोटी-मोटी बीमारियों के इलाज के लिए इन्हीं स्थानीय और कथित क्लीनिकों पर निर्भर रहते हैं।

​यदि कोई अयोग्य व्यक्ति बिना किसी चिकित्सकीय ज्ञान के लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ कर रहा है, तो यह किसी बड़े खतरे से खाली नहीं है। गलत इंजेक्शन, प्रतिबंधित या अत्यधिक एंटीबायोटिक्स और गलत दवाओं का इस्तेमाल मरीजों के लिए जानलेवा साबित हो सकता है। संक्रमण, गंभीर ड्रग रिएक्शन और शारीरिक जटिलताओं का खतरा हर वक्त बना रहता है। ऐसे में स्वास्थ्य विभाग की यह नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी बनती है कि वह समय-समय पर ग्रामीण क्षेत्रों में औचक निरीक्षण करे, लेकिन विभाग की चुप्पी कई अनकहे सवाल छोड़ रही है।

​इन 5 बिंदुओं पर निष्पक्ष जांच और त्वरित कार्रवाई की सख्त जरूरत

​स्थानीय ग्रामीणों और प्रबुद्धजनों ने इस पूरे मामले की तह तक जाने के लिए निम्नलिखित पांच बिंदुओं पर निष्पक्ष जांच की मांग की है:

1 ​चिकित्सकीय योग्यता का सत्यापन: क्लीनिक में इलाज करने वाले व्यक्ति की शैक्षणिक डिग्रियों, मेडिकल काउंसिल के वैध पंजीयन और प्रैक्टिस के कानूनी अधिकारों की गहन जांच हो।

2 ​क्लीनिक पंजीयन की वैधता: प्रतिष्ठान के पास स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय निकायों के वैध लाइसेंस व अनुमति पत्र हैं या नहीं, इसकी पुष्टि की जाए।

3 ​कथित यूनियन की कुंडली खंगाले प्रशासन: जिस संगठन या यूनियन का नाम लेकर धौंस जमाई जा रही है, उसका लीगल स्टेटस, पंजीयन और कार्यक्षेत्र सार्वजनिक किया जाए।

4 ​चेतन कुमार साहू व अन्य की भूमिका: क्लीनिक संचालक द्वारा उनका नाम लेने के पीछे के वास्तविक संबंधों और तथ्यों की पारदर्शी जांच हो।

5 ​जांच रिपोर्ट सार्वजनिक हो: विभाग केवल कागजी खानापूर्ति न करे, बल्कि जांच के निष्कर्ष और दोषियों पर की गई कानूनी कार्रवाई को सार्वजनिक करे ताकि जनता का भरोसा कायम रहे।

​निष्कर्ष और चेतावनी

​शिकारीपाली का यह प्रकरण केवल एक क्लीनिक की अनियमितता का मामला नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण स्वास्थ्य सुरक्षा तंत्र की पोल खोलता है। यदि समय रहते प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग ने कड़ा रुख नहीं अपनाया, तो यह नासूर पूरे क्षेत्र में फैल जाएगा।

​‘बेबाक बयान न्यूज़’ की स्पष्ट मांग है कि महासमुंद और बागबाहरा क्षेत्र के स्वास्थ्य अधिकारी इस मामले में बिना किसी दबाव के तुरंत संज्ञान लें, शिकारीपाली के कथित क्लीनिक के दस्तावेजों की जांच करें और दूध का दूध, पानी का पानी करें। ग्रामीणों की सेहत और जान किसी भी संगठन के दबाव या प्रशासनिक लापरवाही से बढ़कर है।

​अब देखना यह होगा कि स्वास्थ्य विभाग की नींद कब खुलती है और कब तक इस कथित क्लीनिक पर प्रशासन का हंटर चलता है या फिर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है।

​प्रधान संपादक: मयंक गुप्ता
बेबाक बयान न्यूज़
हर बात खुलकर, हर राज खुलकरi

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