महासमुंद में प्रशासनिक संरक्षण का खेल..!
CEO अनुपमा आनंद (IAS) और DDP नितिन कौड़ो चुप क्यों हैं..?
जांच पूरी, सबूत पक्के… फिर भी मोतीलाल मेहरा पर गाज क्यों नहीं गिर रही..?
प्रधान संपादक मयंक गुप्ता/08 अक्टूबर 2026 / दिन गुरुवार
महासमुंद (छत्तीसगढ़)।
महासमुंद जिले की पंचायत व्यवस्था में एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक जवाबदेही और पंचायतों में नियमों के पालन को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शिकायतकर्ता द्वारा लगातार इस मामले से जुड़े संबंधित अधिकारियों को जब पूछा जाता है तो जवाब जिला सीईओ सुश्री अनुपमा आनंद डीडीपी नितिन कौड़ो के ऊपर थोपती है तो डीडीपी साहब जिला सीईओ मेडम के ऊपर थोप देते है। आखिर ऐसा क्या और किसका दबाव है कि ये दोनों शीर्षासन पर बैठकर कुछ नहीं कर पा रहे है ऐसे अधिकारियों के कारण भ्रष्टाचारियों को संरक्षण मिलता है और वही लोग आज लाखों का झोल झाल करते है वहीं आगे चलकर करोड़ों अरबों रुपये की हेराफेरी को अंजाम देने में कोई कसर नहीं छोड़ते है। ग्राम पंचायत खैरा में पदस्थ पंचायत सचिव मोती मेहरा (मोतीलाल मेहरा) के विरुद्ध शासकीय कर्तव्यों की कथित उपेक्षा, मूल पदस्थापना से अनुपस्थित रहने, दूसरी ग्राम पंचायत की कार्यवाही में हस्तक्षेप करने और शासन के निर्देशों की अवहेलना के आरोप लगाए गए हैं।
मामले की शिकायत के बाद जनपद स्तर पर जांच टीम गठित हुई, 06 अगस्त 2026 को जांच प्रक्रिया पूरी हुई और ग्रामीणों के बयान तथा दस्तावेज जांच अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत किए गए। इसके बावजूद शिकायतकर्ता का आरोप है कि अब तक संबंधित सचिव के विरुद्ध कोई स्पष्ट दंडात्मक कार्रवाई सामने नहीं आई है।
यही सवाल अब पूरे मामले का सबसे बड़ा मुद्दा बन गया है—
यदि जांच में लगाए गए आरोपों की पुष्टि हुई है तो कार्रवाई क्यों लंबित है? और यदि आरोप प्रमाणित नहीं हुए हैं तो जांच के निष्कर्ष सार्वजनिक क्यों नहीं किए जा रहे हैं?
24 जून की ग्राम सभा से शुरू हुआ पूरा विवाद
शिकायत में उल्लेखित घटनाक्रम के अनुसार 24 जून 2026 को प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण से संबंधित महत्वपूर्ण ग्राम सभा आयोजित की जानी थी।
आरोप है कि उस समय ग्राम पंचायत खैरा में पदस्थ पंचायत सचिव मोती मेहरा अपने मूल कार्यस्थल पर उपस्थित नहीं रहे।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि सचिव खैरा की ग्राम सभा में अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाय ग्राम पंचायत खट्टी पहुंच गए, जहां उनकी पत्नी श्रीमती अनिता मेहरा सरपंच हैं।
यहीं से विवाद ने गंभीर रूप ले लिया।
शिकायत के अनुसार खट्टी पंचायत में सचिव द्वारा पंचायत की कार्यवाही में हस्तक्षेप किया गया तथा ग्रामीणों के साथ कथित तौर पर विवाद और अभद्र व्यवहार की स्थिति बनी। इन आरोपों को लेकर बाद में जिला पंचायत स्तर पर शिकायत प्रस्तुत की गई।
सरपंच पत्नी की पंचायत में सचिव पति की भूमिका पर सवाल
मामले का सबसे संवेदनशील पहलू यह है कि जिस ग्राम पंचायत खट्टी में हस्तक्षेप का आरोप लगाया गया है, वहां मोती मेहरा की पत्नी अनिता मेहरा सरपंच हैं।
शिकायतकर्ता का कहना है कि महिला जनप्रतिनिधियों के शासकीय कार्यों में उनके पति अथवा रिश्तेदारों के हस्तक्षेप को लेकर शासन स्तर से स्पष्ट निर्देश जारी किए जा चुके हैं।
इसी आधार पर सवाल उठाया गया है कि यदि किसी पंचायत में महिला सरपंच निर्वाचित है तो उसके पति द्वारा पंचायत की आधिकारिक कार्यवाही में कथित हस्तक्षेप किस नियम के तहत स्वीकार्य हो सकता है?
हालांकि, इस पूरे मामले में अंतिम निष्कर्ष संबंधित विभागीय जांच और सक्षम अधिकारी के निर्णय के बाद ही स्पष्ट होगा।
15 जुलाई की शिकायत के बाद जांच टीम गठित
मामले की गंभीरता को देखते हुए शिकायतकर्ता मयंक गुप्ता द्वारा 15 जुलाई 2026 को जिला पंचायत मुख्य कार्यपालन अधिकारी के समक्ष शिकायत प्रस्तुत किए जाने की बात कही गई है।
इसके बाद जनपद पंचायत महासमुंद द्वारा जांच टीम गठित की गई। शिकायत में जांच आदेश क्रमांक पंचा./शिक्षा/2026/1594 का उल्लेख किया गया है।
इसके बाद 06 अगस्त 2026 को ग्राम पंचायत खट्टी के पंचायत भवन में जांच प्रक्रिया आयोजित की गई।
जांच के दौरान ग्रामीणों ने क्या कहा..?
शिकायतकर्ता के अनुसार जांच अधिकारी के समक्ष कई महत्वपूर्ण दस्तावेज और तथ्य प्रस्तुत किए गए।
इनमें—
ग्राम सभा एवं पंचायत कार्यवाही से संबंधित
दस्तावेज,
उपस्थिति रजिस्टर की प्रविष्टियां,
बैठक के फोटोग्राफ,
संबंधित शासनादेशों की प्रतियां,
ग्रामीणों के बयान तथा
शिकायत से जुड़े अन्य
दस्तावेज
शामिल बताए गए हैं।
शिकायतकर्ता का दावा है कि दर्जनों ग्रामीण जांच के दौरान उपस्थित हुए और उन्होंने सचिव के कथित हस्तक्षेप तथा घटनाक्रम से संबंधित अपने बयान दर्ज कराए।
अब सवाल यह है कि इन बयानों और दस्तावेजों के आधार पर जांच अधिकारी ने क्या निष्कर्ष निकाला..?
जांच पूरी… फिर कार्रवाई कहां अटकी..?
यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल है।
शिकायतकर्ता का कहना है कि जांच प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद अब तक आरोपी सचिव के विरुद्ध निलंबन अथवा अन्य दंडात्मक कार्रवाई की स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है।
इसी को लेकर अब जिला पंचायत की मुख्य कार्यपालन अधिकारी अनुपमा आनंद (IAS) और उप संचालक पंचायत नितिन कौड़ो की भूमिका पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी अधिकारी की चुप्पी या कार्रवाई में देरी को अपने आप संरक्षण का प्रमाण नहीं माना जा सकता। कार्रवाई प्रशासनिक प्रक्रिया, जांच रिपोर्ट, सक्षम प्राधिकारी और विभागीय नियमों के आधार पर होती है।
फिर भी, यदि जांच वास्तव में पूरी हो चुकी है तो उसकी स्थिति और आगे की कार्रवाई को लेकर प्रशासन की ओर से स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक होना जरूरी है।
बेबाक सवाल: जांच रिपोर्ट पर फैसला कब..?
इस मामले में अब क्षेत्रवासियों और शिकायतकर्ता की ओर से प्रशासन से कई सवाल पूछे जा रहे हैं—
1.यदि आरोप सही पाए गए हैं तो कार्रवाई क्यों लंबित है..?
यदि जांच में पंचायत सचिव द्वारा कर्तव्य में लापरवाही अथवा दूसरी पंचायत की कार्यवाही में अनधिकृत हस्तक्षेप प्रमाणित हुआ है, तो विभागीय कार्रवाई की स्थिति क्या है?
2.जांच रिपोर्ट का निष्कर्ष क्या है..?
06 अगस्त को हुई जांच के बाद जांच अधिकारी ने क्या रिपोर्ट प्रस्तुत की? क्या रिपोर्ट जिला पंचायत कार्यालय तक पहुंच चुकी है..?
3.दोष सिद्ध नहीं हुआ तो स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं की जा रही..?
यदि जांच में आरोप प्रमाणित नहीं हुए हैं तो प्रशासन को शिकायतकर्ता और ग्रामीणों को इसकी स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए।
4.24 जून की ग्राम सभा में सचिव की उपस्थिति का रिकॉर्ड क्या कहता है..?
मूल पदस्थापना ग्राम पंचायत खैरा में उस दिन सचिव की उपस्थिति क्या थी? इसका प्रमाणित रिकॉर्ड क्या है?
5.खट्टी पंचायत में सचिव की भूमिका क्या थी..?
यदि मोती मेहरा खैरा में पदस्थ थे तो 24 जून को खट्टी पंचायत में उनकी उपस्थिति और भूमिका का प्रशासनिक आधार क्या था..?
क्या प्रशासनिक प्रक्रिया में देरी बन रही है सबसे बड़ा सवाल..?
पंचायती राज व्यवस्था का आधार ही स्थानीय भागीदारी, ग्राम सभा और प्रशासनिक जवाबदेही है। ऐसे में किसी पंचायत सचिव पर गंभीर आरोप लगने और जांच प्रक्रिया पूरी होने के बाद यदि लंबे समय तक कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट नहीं होती, तो स्वाभाविक रूप से ग्रामीणों के बीच सवाल खड़े होते हैं।
मामला किसी एक सचिव या एक पंचायत तक सीमित नहीं है। यह सवाल इस बात से जुड़ा है कि क्या पंचायत व्यवस्था में शासन के नियम सभी के लिए समान रूप से लागू हो रहे हैं..?
ग्रामीणों की मांग—निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच और कार्रवाई
शिकायतकर्ता एवं क्षेत्रवासियों ने मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष समीक्षा की जाए। यदि जांच में आरोप प्रमाणित पाए जाते हैं तो संबंधित पंचायत सचिव के विरुद्ध छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम, सेवा नियमों एवं लागू लोक सेवक आचरण नियमों के तहत नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
साथ ही जांच रिपोर्ट की स्थिति सार्वजनिक करने तथा मामले में किसी प्रकार का प्रशासनिक दबाव अथवा हस्तक्षेप है तो उसकी भी जांच किए जाने की मांग उठ रही है।
सबसे बड़ा सवाल: चुप्पी किसकी और जवाबदेही किसकी..?
ग्राम पंचायत खैरा से शुरू हुआ यह विवाद अब जिला पंचायत कार्यालय तक पहुंच चुका है। शिकायत, जांच, ग्रामीणों के बयान और दस्तावेजों के बाद भी यदि कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट नहीं है तो प्रशासन को सामने आकर बताना चाहिए कि मामला वर्तमान में किस स्तर पर लंबित है और आगे क्या कार्रवाई प्रस्तावित है।
बेबाक बयान का सवाल सीधा है—
“जांच हो चुकी है तो फैसला कब होगा?”
“यदि आरोप गलत हैं तो क्लीन चिट कब मिलेगी?”
“और यदि आरोप सही हैं तो कार्रवाई कब होगी?”
यही जवाब अब महासमुंद के ग्रामीण और शिकायतकर्ता प्रशासन से मांग रहे हैं।
