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SC on Freebies: चुनाव में मुफ्त उपहारों के वादों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, मार्च में होगी बड़ी सुनवाई

नई दिल्ली | 05 फरवरी 2026 देश के चुनावी परिदृश्य में ‘मुफ्त की रेवड़ी’ (Freebies) का मुद्दा एक बार फिर से गर्मा गया है। सुप्रीम कोर्ट चुनाव मुफ्त उपहार के मामले पर अब आर-पार की सुनवाई के मूड में नजर आ रहा है। शीर्ष अदालत ने गुरुवार (5 फरवरी 2026) को एक अहम फैसला सुनाते हुए उस जनहित याचिका (PIL) को मार्च में सूचीबद्ध करने की अनुमति दे दी है, जो सीधे तौर पर लोकतंत्र की शुचिता और सरकारी खजाने के दुरुपयोग से जुड़ी है। इस याचिका में मांग की गई है कि चुनाव से पहले मतदाताओं को लुभाने के लिए “तर्कहीन मुफ्त उपहार” बांटने वाले या इसका वादा करने वाले राजनीतिक दलों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए, जिसमें उनका चुनाव चिह्न जब्त करना या पंजीकरण रद्द करना शामिल है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची की पीठ ने इस मामले की गंभीरता को स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ता को आश्वासन दिया कि यह एक महत्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दा है और इसे मार्च के अंतिम सप्ताह में विस्तृत चर्चा के लिए रखा जाएगा।

क्या है पूरा मामला?

यह कानूनी लड़ाई उस वक्त शुरू हुई थी जब जाने-माने वकील और याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की। याचिका का मुख्य आधार यह है कि राजनीतिक दल चुनाव जीतने के लिए जनता के टैक्स के पैसों (Public Funds) का इस्तेमाल निजी उपहार बांटने के वादे के रूप में करते हैं। याचिका में तर्क दिया गया है कि यह न केवल स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की भावना के खिलाफ है, बल्कि मतदाताओं के फैसले को अनुचित रूप से प्रभावित करने का एक तरीका भी है।

पीठ के सामने अपनी दलीलें रखते हुए उपाध्याय ने कहा कि मौजूदा दौर में राजनीतिक दलों के बीच मुफ्त चीजें बांटने की एक होड़ सी मची हुई है। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा, “आजकल चुनाव जीतने के लिए पार्टियां सूरज और चांद तक देने का वादा कर रही हैं, और यह सीधे तौर पर भ्रष्ट आचरण (Corrupt Practice) के समान है”। याचिका में अदालत से यह घोषित करने का आग्रह किया गया है कि चुनाव से पहले सार्वजनिक धन से ऐसी घोषणाएं करना संविधान के सिद्धांतों के विपरीत है।

घटना कैसे सामने आई?

यह मामला अचानक से तब चर्चा में आया जब गुरुवार को याचिकाकर्ता ने मुख्य न्यायाधीश की बेंच के सामने मामले का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने कोर्ट को याद दिलाया कि इस याचिका पर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस 2022 में ही जारी किए जा चुके थे, लेकिन तब से यह मामला ठंडे बस्ते में पड़ा है।

गौरतलब है कि जनवरी 2022 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एन.वी. रमना की अध्यक्षता वाली पीठ ने इसे “अत्यंत गंभीर मुद्दा” करार दिया था। उस समय कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा था कि कई बार राजनीतिक दलों का ‘मुफ्त उपहार वाला बजट’ राज्य के नियमित बजट की सीमाओं को भी पार कर जाता है, जिससे पूरी अर्थव्यवस्था पटरी से उतर सकती है। इसी गंभीरता को देखते हुए वर्तमान पीठ ने इसे जल्द सुनने का फैसला किया है।

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प्रशासन और आयोग के सामने बड़ी चुनौती

सुप्रीम कोर्ट की इस सक्रियता ने अब निर्वाचन आयोग (ECI) और केंद्र सरकार के लिए भी एक चुनौती पेश कर दी है। याचिका में मांग की गई है कि चुनाव आयोग को ‘चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश 1968’ में संशोधन करने का निर्देश दिया जाए। इसके तहत किसी भी राजनीतिक दल के लिए राज्य या राष्ट्रीय दल के रूप में मान्यता प्राप्त करने की एक अनिवार्य शर्त यह होनी चाहिए कि वह चुनाव से पहले सार्वजनिक धन से मुफ्त उपहारों का वादा नहीं करेगा।

अधिवक्ता अश्वनी कुमार दुबे के माध्यम से दायर इस याचिका में केंद्र सरकार को इस संबंध में एक प्रभावी कानून बनाने का निर्देश देने की भी मांग की गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह अनैतिक प्रथा मतदाताओं को सरकारी खजाने की कीमत पर रिश्वत देने जैसी है, जिसे लोकतंत्र को बचाने के लिए हर हाल में रोका जाना चाहिए।

स्थानीय लोगों और करदाताओं की प्रतिक्रिया

इस खबर के सामने आते ही सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर एक नई बहस छिड़ गई है। देश का एक बड़ा वर्ग, विशेषकर मध्यम वर्गीय करदाता, इस याचिका का समर्थन कर रहा है। लोगों का मानना है कि उनके द्वारा दिए गए टैक्स का उपयोग विकास कार्यों, बुनियादी ढांचे और शिक्षा में होना चाहिए, न कि चुनावी लाभ के लिए बांटे जाने वाले गैजेट्स या नकद राशि में।

वहीं, कुछ विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि ‘लोक कल्याण’ (Welfare) और ‘मुफ्त उपहार’ (Freebies) के बीच का अंतर स्पष्ट होना जरूरी है। उदाहरण के तौर पर, मुफ्त शिक्षा या स्वास्थ्य सुविधाएं एक संवैधानिक जिम्मेदारी हैं, लेकिन निजी उपयोग की वस्तुओं का वितरण केवल वोट बैंक की राजनीति का हिस्सा है। मार्च में होने वाली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट संभवतः इसी अंतर को परिभाषित करेगा।

आगे क्या हो सकता है?

मार्च में होने वाली सुनवाई न केवल कानूनी रूप से बल्कि राजनीतिक रूप से भी ऐतिहासिक साबित हो सकती है। यदि सुप्रीम कोर्ट सख्त दिशानिर्देश जारी करता है, तो:

  • चुनाव घोषणापत्रों पर लगाम: राजनीतिक दलों को अपने घोषणापत्र में किए गए वादों के वित्तीय स्रोत और उनके प्रभाव का विवरण देना पड़ सकता है।

  • दलों की मान्यता पर खतरा: चुनाव आयोग को उन दलों का पंजीकरण रद्द करने की शक्ति मिल सकती है जो नियमों का उल्लंघन करेंगे।

  • अनुच्छेद 14 का दायरा: कोर्ट यह स्पष्ट कर सकता है कि सार्वजनिक धन का उपयोग किस प्रकार किया जाना चाहिए ताकि समानता के अधिकार का उल्लंघन न हो।

अदालत ने याचिकाकर्ता से कहा है कि वे मार्च की तारीख आने पर दोबारा इसे मेंशन करें, ताकि इसे प्राथमिकता के आधार पर सुना जा सके।

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