गरियाबंद में प्रशासनिक हलचल: सचिवालय के आदेशों की अनदेखी, नवीन भगत पर सहायक आयुक्त पद छोड़ने का दबाव बढ़ा

रिपोर्टर मयंक गुप्ता
गरियाबंद/छत्तीसगढ़ – छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में नौकरशाही की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आदिम जाति कल्याण विभाग के सहायक आयुक्त के पद पर प्रभार हस्तांतरित करने के स्पष्ट सरकारी निर्देशों के बावजूद, स्थानांतरित अधिकारी नवीन भगत पद से मुक्त नहीं हो रहे हैं। इससे जिला प्रशासन की विश्वसनीयता पर बट्टा लग रहा है, जबकि नया प्रभारी लोकेश्वर पटेल को जिम्मेदारी सौंपी जानी बाकी है।
आदेशों का पालन क्यों ठप..?
जानकारी के मुताबिक, विभाग के अपर कलेक्टर नवीन भगत का स्थानांतरण हो चुका है। मंत्रालय स्तर से उनके पदमुक्ति के आदेश जारी हो चुके हैं, साथ ही परियोजना प्रशासक लोकेश्वर पटेल को सहायक आयुक्त का दायित्व सौंपने का फरमान भी आ गया है। आश्चर्यजनक रूप से, कलेक्टर कार्यालय में इन निर्देशों का कार्यान्वयन अब तक नहीं हो सका।
जिला कलेक्टर की ओर से भी इस मामले में कोई सक्रियता नजर नहीं आ रही। विपक्षी धड़े और स्थानीय नागरिक अब पूछ रहे हैं कि आखिर एक स्थानांतरित अधिकारी को इतनी आसानी से जिम्मेदारी से क्यों नहीं हटाया जा रहा..?
चार वर्षों से चले आ रहा विवादास्पद पद
यह पद लंबे समय से विवादों का केंद्र रहा है। पहले प्रतिनियुक्ति पर तैनात राजेंद्र सिंह यहां कार्यरत थे, लेकिन दबावों के कारण यह जिम्मेदारी नवीन भगत के पास आ गई। लगभग चार साल से यह पद अस्थायी तौर पर उनके कब्जे में रहा। स्थानांतरण के बाद भी वे पद त्यागने को तैयार नहीं लग रहे, जिससे अफसरशाही में असंतोष फैल रहा है।
करोड़ों की योजनाओं में कथित अनियमितताएं
सूत्रों का दावा है कि इस पूरे प्रकरण की जड़ आदिवासी कल्याण की परियोजनाओं और छात्रावासों से जुड़ी फाइलों में छिपी है। सहायक आयुक्त के रूप में भगत पर आरोप लगे हैं कि उन्होंने कई विकास कार्यों में केवल दस्तावेजीकरण कर धन निकासी की।
छात्रावासों के निर्माण व मरम्मत के लिए मंजूर राशि फर्जी दावों से उड़ाई गई।
ठेकेदारों को पूर्ण भुगतान तो किया गया, लेकिन साइट पर काम या तो अधर में लटका या नाममात्र का।
कई प्रोजेक्ट्स में कागजी आंकड़ों और हकीकत के बीच युगांतर जितना फर्क मिला।
इन दावों से स्थानीय निवासियों और स्टाफ में यह संदेह गहरा गया है कि कहीं यही वजह तो नहीं कि भगत पद पर अड़े हुए हैं।
डाटा एंट्री ऑपरेटर भर्ती में भी उठे सवाल
विवाद केवल यहीं सीमित नहीं। गरियाबंद कलेक्ट्रेट में डाटा एंट्री ऑपरेटर के दो पदों पर भर्ती का विज्ञापन जारी हुआ था। आवेदनों की प्रक्रिया चली, लेकिन आरोप है कि भगत के इशारे पर लाखों की वसूली हुई। बाद में भर्ती आधिकारिक रूप से रद्द घोषित कर दी गई, लेकिन कथित तौर पर चुपचाप कुछ चयन भी हो गए। जनता के सामने निरस्ती का ऐलान, जबकि पर्दे के पीछे ‘समझौते’..!
‘सुपर कलेक्टर’ की उपाधि और प्रशासनिक असंतुलन
जिला मुख्यालय में अब खुली चर्चा है कि नवीन भगत ने वास्तविक कलेक्टर से ऊपर उठकर ‘सुपर कलेक्टर’ का दर्जा हासिल कर लिया है। उनके कार्यालय में लोगों की भारी भीड़ लगती है, जबकि कलेक्टर के दफ्तर में सन्नाटा। ऐसा लगता है मानो जिला का पूरा सिस्टम उनके संकेतों पर निर्भर हो।
यह हालात शासन तंत्र के लिए शर्मिंदगी का सबब बन चुके हैं। यदि उच्च अधिकारियों के आदेश भी नजरअंदाज हो रहे, तो जिले में कानून-व्यवस्था का क्या होगा..?
कलेक्टर की मौन भूमिका पर सवाल
सबसे उलझन वाली कड़ी जिला कलेक्टर की है। मंत्रालय के आदेश साफ हैं – भगत को पद से हटाओ और पटेल को सौंपो। लेकिन क्रियान्वयन शून्य।
क्या कलेक्टर किसी बाहरी दबाव में फंसे हैं..?
या पूरी मशीनरी भगत के इर्द-गिर्द ही घूम रही?
यह चुप्पी आशंकाओं को हवा दे रही है।
संपत्ति जांच की मांग तेज
स्थानीय स्तर पर आवाज उठ रही है कि भगत की अचल संपत्तियों की गहन पड़ताल हो। हाल के वर्षों में उनकी जीवनशैली और संपदा में वृद्धि पर भी उंगलियां उठ रही हैं। यदि आरोप सिद्ध हुए, तो यह छत्तीसगढ़ की अफसरशाही के लिए करारा प्रहार होगा।
आगे क्या..? कार्रवाई की उम्मीद
अब मुख्य प्रश्न यह है कि क्या मंत्रालय आदेशों की अवज्ञा बर्दाश्त करेगा..? कलेक्टर पर जिम्मेदारी तय होगी या करोड़ों के कथित घोटालों की स्वतंत्र जांच होगी..? फिलहाल, गरियाबंद का यह प्रकरण नौकरशाही के लिए परीक्षा बन गया है। यदि उच्च स्तर से मौन रहा, तो संदेश जाएगा कि नियम कागजों तक सीमित हैं, जबकि वास्तविक सत्ता ‘प्रभावशाली अफसरों’ के पास।
नवीन भगत का पद पर कायम रहना महज प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि शासन की मजबूती पर सवाल है। यह न केवल पद-मोह का मुद्दा, बल्कि उन योजनाओं के कथित दुरुपयोग का भी। हाल ही में देवभोग ब्लॉक के पत्रकारों ने भगत के खिलाफ धरना दिया था और उन्हें हटाने का ज्ञापन सौंपा था।
यदि शीघ्र कदम नहीं उठे, तो यह विवाद पूरे राज्य की छवि को प्रभावित कर सकता है। जनमानस अब तंज कस रहा है – “क्या सरकारी फरमान सिर्फ औपचारिकता हैं? क्या गरियाबंद में अब ‘भगत शासन’ की शुरुआत हो चुकी..?”



