GeM टेंडर में ‘सर्टिफिकेट का अड़ंगा’ या सिस्टम की चूक? छत्तीसगढ़ उद्यानिकी विभाग पर गंभीर सवाल, पांच दिन चक्कर लगाने के आरोप से मचा बवाल..!

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GeM टेंडर में ‘सर्टिफिकेट का अड़ंगा’ या सिस्टम की चूक? छत्तीसगढ़ उद्यानिकी विभाग पर गंभीर सवाल, पांच दिन चक्कर लगाने के आरोप से मचा बवाल..!

साइट विजिट प्रमाणपत्र नहीं मिलने से दावेदार कंपनी की बोली प्रक्रिया प्रभावित होने का दावा; पसंदीदा फर्म को लाभ पहुंचाने की आशंका, निष्पक्ष जांच और जिम्मेदारी तय करने की उठी मांग

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता | 27 अक्टूबर 2026/दिन मंगलवार /| रायपुर, छत्तीसगढ़
रायपुर। सरकारी खरीदी में पारदर्शिता, समान अवसर और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए ऑनलाइन टेंडर प्रणाली लागू की गई है। लेकिन जब किसी निविदा में भाग लेने के लिए निर्धारित दस्तावेज ही समय पर उपलब्ध नहीं होने का आरोप सामने आए, तो पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। छत्तीसगढ़ के उद्यानिकी विभाग से संबंधित GeM टेंडर को लेकर ऐसा ही एक मामला सामने आया है, जिसमें एक दावेदार कंपनी के प्रतिनिधियों ने विभागीय अधिकारियों और कर्मचारियों पर कथित टालमटोल, सहयोग नहीं करने और निर्धारित प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न करने के आरोप लगाए हैं।

शिकायतकर्ता पक्ष का कहना है कि संबंधित उद्यानिकी नर्सरी के स्थल का निरीक्षण करने के बाद जारी किया जाने वाला साइट विजिट प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिए उन्होंने लगातार पांच दिनों तक प्रयास किया। इसके बावजूद, उनके दावे के अनुसार, बोली जमा करने की अंतिम समय-सीमा तक प्रमाणपत्र पर हस्ताक्षर नहीं किए गए। कंपनी के प्रतिनिधियों ने इस घटनाक्रम को सामान्य प्रशासनिक देरी मानने के बजाय पूरी निविदा प्रक्रिया में समान अवसर मिलने से जुड़ा गंभीर प्रश्न बताया है।

हालांकि, अभी तक इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि, विभागीय जांच के निष्कर्ष अथवा संबंधित अधिकारियों का आधिकारिक पक्ष उपलब्ध नहीं है। इसलिए मामले में वास्तविक स्थिति दस्तावेजों, शिकायत और विभागीय जवाब के परीक्षण के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।

टेंडर प्रक्रिया पर सवाल, प्रमाणपत्र बना विवाद की वजह

प्राप्त शिकायत संबंधी जानकारी के अनुसार, यह मामला GeM निविदा क्रमांक GEM/2026/B/8119298 से जुड़ा बताया गया है। शिकायतकर्ता कंपनी के प्रतिनिधियों का दावा है कि निविदा की शर्तों के तहत संबंधित स्थल का दौरा करना और साइट विजिट प्रमाणपत्र प्राप्त कर उसे आवश्यक दस्तावेजों के साथ जमा करना जरूरी था।

उनका आरोप है कि जब उन्होंने इस शर्त को पूरा करने के लिए संबंधित नर्सरी के गार्डन सुपरिंटेंडेंट से संपर्क किया, तो उन्हें प्रमाणपत्र उपलब्ध कराने के बजाय बार-बार बाद में आने के लिए कहा गया। प्रतिनिधियों के मुताबिक, वे लगातार पांच दिनों तक इस काम के लिए प्रयास करते रहे, लेकिन अंतिम समय-सीमा तक समस्या का समाधान नहीं हो पाया।

अब इस मामले में सबसे अहम सवाल यही है कि यदि प्रमाणपत्र निविदा की अनिवार्य शर्त थी, तो उसे जारी करने की जिम्मेदारी किस अधिकारी को सौंपी गई थी? क्या इसके लिए कोई निर्धारित प्रक्रिया और समय-सीमा थी? और यदि किसी कारण से प्रमाणपत्र जारी नहीं किया जा सकता था, तो संबंधित आवेदक को लिखित रूप में इसकी जानकारी क्यों नहीं दी गई..?

इन सवालों के जवाब मिलने के बाद ही यह तय हो सकेगा कि मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही का है या प्रक्रिया में किसी गंभीर अनियमितता की आशंका भी है।

पांच दिन की दौड़भाग के बाद भी नहीं हुआ समाधान..!

शिकायतकर्ता कंपनी के प्रतिनिधियों के अनुसार, साइट विजिट प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिए उन्हें कई बार संबंधित नर्सरी जाना पड़ा। उनका कहना है कि प्रत्येक बार उन्हें बाद में आने की बात कहकर लौटा दिया गया।

प्रतिनिधियों का दावा है कि उन्होंने अपनी ओर से निर्धारित औपचारिकता पूरी करने का प्रयास किया, लेकिन प्रमाणपत्र पर हस्ताक्षर नहीं होने के कारण उनके सामने बोली जमा करने की प्रक्रिया पूरी करने में कठिनाई पैदा हुई।

यदि शिकायतकर्ता के दावे दस्तावेजों और अन्य साक्ष्यों से सही साबित होते हैं, तो यह केवल एक कंपनी की परेशानी का मामला नहीं रहेगा। यह उस व्यवस्था की जवाबदेही का प्रश्न भी बनेगा, जिसमें सरकारी निविदा में भाग लेने वाले प्रत्येक पात्र दावेदार को निर्धारित शर्तें पूरी करने के लिए समान अवसर मिलना चाहिए।

यह भी जांच का विषय है कि संबंधित प्रतिनिधियों ने किन तारीखों पर संपर्क किया, क्या उन्होंने लिखित आवेदन दिया था, क्या प्रमाणपत्र के लिए कोई आधिकारिक अनुरोध दर्ज हुआ और क्या विभागीय स्तर पर उसका कोई रिकॉर्ड उपलब्ध है।

उप संचालक कार्यालय तक पहुंची शिकायत, फिर भी राहत नहीं मिलने का आरोप

शिकायतकर्ता पक्ष के मुताबिक, नर्सरी स्तर पर समाधान नहीं मिलने के बाद वे उप संचालक उद्यानिकी कार्यालय पहुंचे। प्रतिनिधियों ने आरोप लगाया कि वहां मौजूद अधिकारी श्री पैकरा ने भी उनकी समस्या का समाधान नहीं किया।

उनके अनुसार, अधिकारी ने कथित तौर पर यह कहते हुए हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया कि मामला संबंधित गार्डन सुपरिंटेंडेंट के अधिकार क्षेत्र का है और वे जहां चाहें शिकायत कर सकते हैं।

यह कथन फिलहाल शिकायतकर्ता पक्ष के हवाले से सामने आया है। संबंधित अधिकारी का पक्ष सामने आना जरूरी है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि उनके समक्ष किस प्रकार की शिकायत रखी गई थी, प्रमाणपत्र जारी करने का अधिकार किसके पास था और क्या शिकायत पर कोई वैकल्पिक प्रक्रिया बताई गई थी।

यदि किसी अधिकारी के पास प्रमाणपत्र जारी करने का अधिकार नहीं था, तो भी शिकायतकर्ता को उचित प्रक्रिया, जिम्मेदार अधिकारी और शिकायत दर्ज कराने के माध्यम के बारे में मार्गदर्शन दिया जाना चाहिए था या नहीं—यह प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा महत्वपूर्ण सवाल है।

क्या किसी कंपनी को प्रतिस्पर्धा से बाहर होने का नुकसान हुआ..?

शिकायतकर्ता प्रतिनिधियों ने आशंका जताई है कि प्रमाणपत्र समय पर नहीं मिलने के कारण उनकी कंपनी निविदा प्रक्रिया में प्रभावी रूप से भाग लेने से वंचित रह गई। उन्होंने यह भी संदेह व्यक्त किया है कि इस घटनाक्रम से किसी दूसरी कंपनी को अनुचित लाभ मिल सकता था।

हालांकि, किसी पसंदीदा कंपनी को लाभ पहुंचाने का आरोप अभी प्रमाणित नहीं है। इस आशंका की जांच के लिए यह देखना जरूरी होगा कि कितनी कंपनियों ने निविदा में भाग लिया, किन कंपनियों ने साइट विजिट प्रमाणपत्र जमा किया, किसे प्रमाणपत्र जारी किए गए और तकनीकी मूल्यांकन में किन आधारों पर पात्रता तय की गई।

जांच में यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया सभी संभावित बोलीदाताओं के लिए समान थी या नहीं। यदि किसी कंपनी को समय पर दस्तावेज उपलब्ध कराया गया और दूसरी कंपनी को समान परिस्थितियों में नहीं मिला, तो उसके पीछे का कारण रिकॉर्ड के आधार पर सामने आना चाहिए।

केवल आशंका के आधार पर किसी अधिकारी या कंपनी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन शिकायत में उठाए गए सवालों की निष्पक्ष जांच करना भी उतना ही आवश्यक है।

GeM टेंडर की ऑनलाइन व्यवस्था और जमीनी प्रक्रिया में तालमेल जरूरी

GeM यानी Government e-Marketplace सरकारी विभागों की खरीद प्रक्रिया के लिए डिजिटल मंच है। ऑनलाइन निविदा का उद्देश्य प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित, पारदर्शी और प्रतिस्पर्धात्मक बनाना है। लेकिन निविदा से जुड़ी कुछ शर्तें यदि स्थल निरीक्षण, भौतिक सत्यापन या विभागीय प्रमाणपत्र पर निर्भर करती हैं, तो उन्हें पूरा कराने की व्यवस्था भी स्पष्ट और समयबद्ध होनी चाहिए।

ऐसी स्थिति में संबंधित विभाग की जिम्मेदारी केवल निविदा जारी करने तक सीमित नहीं रहती। आवश्यक दस्तावेजों के संबंध में स्पष्ट दिशा-निर्देश, जिम्मेदार अधिकारी की जानकारी और शिकायतों के निवारण की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

इस प्रकरण में जांच के दौरान यह देखना जरूरी होगा कि साइट विजिट प्रमाणपत्र वास्तव में निविदा की अनिवार्य शर्त था या नहीं, उसके प्रारूप और जारी करने की प्रक्रिया में क्या प्रावधान थे तथा दस्तावेज उपलब्ध कराने में किसी स्तर पर अनावश्यक देरी हुई या नहीं।

यदि कोई दावेदार समय रहते निर्धारित औपचारिकता पूरी करना चाहता था, लेकिन विभागीय स्तर पर उसे आवश्यक सहयोग नहीं मिला, तो यह स्थिति निविदा की निष्पक्षता को प्रभावित कर सकती है। दूसरी ओर, यदि प्रमाणपत्र जारी करने में कोई वैध प्रक्रियागत बाधा थी, तो उसका रिकॉर्ड और कारण भी सार्वजनिक जवाबदेही के दायरे में आने चाहिए।

सार्वजनिक टेंडर रिकॉर्ड में भी दस्तावेजों का मिलान जरूरी

इस मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य का आधिकारिक दस्तावेजों से मिलान किया जाना आवश्यक है। सार्वजनिक निविदा-सूची में GEM/2026/B/8119298 के लिए कार्य का विवरण भूमिगत जल निकासी और जल-स्रोत प्रणाली की आपूर्ति एवं स्थापना से संबंधित बताया गया है। उसी सूची में बोली जमा करने की अंतिम तिथि 24 अक्टूबर 2026 दर्ज है। यह विवरण निविदा संबंधी एक सार्वजनिक तृतीय-पक्ष सूची में उपलब्ध है। https://www.tendershark.com/details/chhattisgarh-tender/directorate-of-horticulture-and-farm-forestry/0b984c3a-f07b-416a-adb8-2c9dd76ee729

वहीं, शिकायत में इस निविदा को परागांव उद्यानिकी नर्सरी से जोड़कर साइट विजिट प्रमाणपत्र का मुद्दा उठाया गया है। इसलिए अंतिम समाचार में निविदा के वास्तविक कार्यस्थल, विभागीय कार्यालय, शर्तों और प्रमाणपत्र की अनिवार्यता की पुष्टि मूल GeM निविदा दस्तावेजों से करना आवश्यक है। उपलब्ध सार्वजनिक सूची अकेले यह प्रमाणित नहीं करती कि शिकायत में वर्णित प्रत्येक घटना सही है या प्रमाणपत्र न मिलने के कारण ही कोई बोलीदाता प्रक्रिया से बाहर हुआ।

यह दस्तावेजी मिलान इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि निविदा क्रमांक, कार्यस्थल और अंतिम तिथि में किसी भी प्रकार की त्रुटि समाचार की विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकती है।

जांच के दायरे में आने चाहिए ये पांच प्रमुख बिंदु

1.प्रमाणपत्र जारी करने की जिम्मेदारी: संबंधित साइट विजिट प्रमाणपत्र जारी करने और उस पर हस्ताक्षर करने के लिए अधिकृत अधिकारी कौन था..?

2.संपर्क और आवेदन का रिकॉर्ड: क्या कंपनी के प्रतिनिधियों ने पांच दिनों तक संपर्क किया था? क्या उनके आवेदन, ईमेल, पत्राचार या फोन संपर्क का कोई सत्यापन योग्य रिकॉर्ड उपलब्ध है..?

3.सभी दावेदारों के साथ समान व्यवहार: क्या अन्य बोलीदाताओं को प्रमाणपत्र समय पर उपलब्ध कराए गए? यदि हां, तो संबंधित रिकॉर्ड में कोई असमानता दिखाई देती है या नहीं..?

4.बोली पर पड़ा वास्तविक प्रभाव: क्या प्रमाणपत्र नहीं मिलने के कारण कंपनी की बोली जमा नहीं हो सकी, तकनीकी रूप से अस्वीकार हुई या किसी अन्य कारण से प्रक्रिया में शामिल नहीं हो पाई..?

5.उच्चाधिकारियों की भूमिका: शिकायत मिलने पर उप संचालक कार्यालय ने क्या कार्रवाई की? क्या मामले को लिखित रूप में दर्ज कर संबंधित अधिकारी से जवाब मांगा गया..?

इन बिंदुओं पर तथ्यात्मक जांच होने से यह स्पष्ट हो सकता है कि मामला प्रशासनिक लापरवाही, प्रक्रिया संबंधी भ्रम या किसी गंभीर अनियमितता से जुड़ा है।

उच्चस्तरीय जांच और जवाबदेही तय करने की मांग

शिकायतकर्ता पक्ष की मांग है कि संबंधित निविदा की प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच कराई जाए और प्रमाणपत्र जारी करने में हुई कथित देरी की जिम्मेदारी तय की जाए। इसके साथ ही, यदि किसी स्तर पर नियमों के उल्लंघन या किसी बोलीदाता के साथ असमान व्यवहार की पुष्टि होती है, तो नियमानुसार उचित कार्रवाई की जाए।

जांच के लिए मूल निविदा दस्तावेज, साइट विजिट प्रमाणपत्र का प्रारूप, आवेदन एवं पत्राचार, प्रमाणपत्र जारी करने का रिकॉर्ड, तकनीकी मूल्यांकन और निविदा से संबंधित अन्य अभिलेखों की समीक्षा उपयोगी होगी। जरूरत पड़ने पर संबंधित अधिकारियों और कंपनी के प्रतिनिधियों के बयान भी दर्ज किए जा सकते हैं।

यदि जांच में यह सामने आता है कि किसी पात्र बोलीदाता को विभागीय स्तर पर आवश्यक दस्तावेज जानबूझकर उपलब्ध नहीं कराया गया और इससे प्रतिस्पर्धा प्रभावित हुई, तो सक्षम प्राधिकारी को लागू नियमों के अनुसार सुधारात्मक कदम उठाने चाहिए। निविदा निरस्त करने या दोबारा आमंत्रित करने का निर्णय भी जांच के निष्कर्ष और लागू प्रावधानों के आधार पर ही लिया जाना चाहिए।

अब विभाग के जवाब पर टिकी निगाहें

GeM टेंडर से जुड़े इस प्रकरण में फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात आरोपों की गंभीरता के साथ-साथ उनकी निष्पक्ष पुष्टि है। यदि शिकायतकर्ता का दावा सही पाया जाता है, तो यह सरकारी निविदाओं में आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराने, अधिकारियों की जवाबदेही और समान अवसर सुनिश्चित करने की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करेगा।

अब देखना होगा कि उद्यानिकी विभाग शिकायत पर क्या रुख अपनाता है, संबंधित अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगा जाता है या नहीं और निविदा के दस्तावेजों की जांच के बाद क्या निष्कर्ष सामने आते हैं।

फिलहाल मुख्य सवाल यही है—जब किसी निविदा में प्रमाणपत्र अनिवार्य हो, तो उसे समय पर उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी किसकी है और यदि उसी दस्तावेज के अभाव में किसी दावेदार का अवसर प्रभावित हो जाए, तो जवाबदेही कौन तय करेगा।

इस मामले में पक्ष लेने कैलाश सिंह पैकरा (DDH) को 9406375470 से संपर्क करने पर किसी प्रकार से कोई जवाब नहीं दिया गया और न ही फोन उठाया गया।

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