एक नंबरी मुख्यमंत्री के राज्य हो रहे है, दो नंबरी कामकाज – विनोद चंद्राकर
10 साल का संलग्नीकरण, प्रशिक्षण के बिलों पर सवाल और LRP के मानदेय से कथित वसूली! कलेक्टर को सौंपी शिकायत ने बढ़ाई विभागीय जवाबदेही की चुनौती
प्रधान संपादक मयंक गुप्ता | 24 अक्टूबर 2026 /दिन शनिवार/महासमुंद, छत्तीसगढ़
महासमुंद। जिले के कृषि विभाग में कथित वित्तीय अनियमितताओं, सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन, अधिकारियों-कर्मचारियों के संलग्नीकरण और किसानों के साथ व्यवहार को लेकर विवाद गहराता नजर आ रहा है। विभाग की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवालों के बीच महासमुंद के पूर्व विधायक विनोद सेवनलाल चंद्राकर की शिकायत ने मामले को नया राजनीतिक और प्रशासनिक मोड़ दे दिया है। पूर्व विधायक ने उप संचालक कृषि फागुराम राम कश्यप (F.R. कश्यप) के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करने की मांग उठाई है। साथ ही, कृषि विभाग में लंबे समय से संलग्न ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी जितेंद्र पटेल की पदस्थापना, विभिन्न योजनाओं के खर्च और कथित अवैध वसूली के आरोपों की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की गई है।
पूर्व विधायक की ओर से कलेक्टर को सौंपे गए शिकायत पत्र में विभागीय व्यवस्था से जुड़े कई गंभीर मुद्दे उठाए गए हैं। शिकायत के अनुसार, पत्र क्रमांक कार्या.पु.वि.महा./2025/323, दिनांक 15 अप्रैल 2025 के माध्यम से कृषि विभाग में कथित वित्तीय अनियमितताओं की जांच, संलग्नीकरण समाप्त करने और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की गई थी। अब इन आरोपों के आधार पर यह सवाल उठ रहा है कि शिकायत पर क्या कार्रवाई हुई, संबंधित अभिलेखों की जांच किस स्तर तक पहुंची और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही कब तय होगी?
हालांकि, शिकायत में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और किसी भी अधिकारी की आपराधिक जिम्मेदारी का निर्धारण जांच एवं सक्षम न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही किया जा सकता है।
1.दस साल से कार्यालय में संलग्न रहने का आरोप, मूल पदस्थापना पिथौरा में
शिकायत का एक प्रमुख मुद्दा ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी जितेंद्र पटेल का लंबे समय से उप संचालक कृषि कार्यालय महासमुंद में संलग्न रहना है। पूर्व विधायक की शिकायत के अनुसार, पटेल की मूल पदस्थापना कार्यालय वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी, पिथौरा में है, लेकिन वह लगभग दस वर्षों से जिला कार्यालय में संलग्न होकर काम कर रहे हैं।
शिकायत में यह भी सवाल उठाया गया है कि राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, स्वायल हेल्थ कार्ड योजना, जैविक खेती मिशन और परंपरागत कृषि विकास योजना जैसे महत्वपूर्ण कार्यक्रमों की जिम्मेदारियां लंबे समय तक एक ही कर्मचारी के पास रहने से विभागीय कार्यप्रणाली और पारदर्शिता पर क्या प्रभाव पड़ा?
यदि संबंधित अवधि में संलग्नीकरण की अनुमति, कार्य-विभाजन और जिम्मेदारियों से जुड़े नियमों का पालन नहीं हुआ है, तो इसकी जांच आवश्यक है। प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि संलग्नीकरण किन आदेशों के आधार पर जारी रहा और समय-समय पर इसकी समीक्षा की गई या नहीं।
2.उप संचालक F.R. कश्यप के खिलाफ FIR की मांग, जांच पर टिकी निगाहें
पूर्व विधायक विनोद सेवनलाल चंद्राकर ने उप संचालक कृषि F.R. कश्यप के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करने की मांग की है। उनका आरोप है कि विभाग में कथित वित्तीय अनियमितताओं और प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े मामलों की गंभीरता को देखते हुए निष्पक्ष जांच और जवाबदेही तय करना जरूरी है।
यह मांग ऐसे समय सामने आई है, जब कृषि उपकरणों की खरीदी, योजनाओं के अंतर्गत सामग्री वितरण, प्रशिक्षण कार्यक्रमों के व्यय और कर्मचारियों के संलग्नीकरण को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।
अब महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि कलेक्टर और संबंधित विभागीय अधिकारी शिकायत में दर्ज प्रत्येक बिंदु का परीक्षण किस प्रकार कराते हैं। यदि दस्तावेजी जांच में प्रथमदृष्टया संज्ञेय अपराध के पर्याप्त आधार सामने आते हैं, तो कानून के अनुरूप कार्रवाई की जानी चाहिए।
सिर्फ आरोप लगना किसी को दोषी साबित नहीं करता, लेकिन गंभीर शिकायतों की निष्पक्ष जांच और उस पर हुई कार्रवाई की जानकारी सार्वजनिक करना प्रशासनिक पारदर्शिता के लिए महत्वपूर्ण है।
3.कृषि उपकरणों की खरीदी पर सवाल: दरें, बिल और भुगतान खंगालने की मांग
कृषि विभाग में बीज, कृषि उपकरणों और अन्य सामग्रियों की खरीदी को लेकर भी शिकायत में अनियमितताओं की आशंका जताई गई है। आरोप है कि कुछ खरीदी प्रक्रियाओं में निर्धारित नियमों, वित्तीय स्वीकृतियों और दर निर्धारण की प्रक्रिया का समुचित पालन नहीं किया गया तथा सामग्री की कीमतों को लेकर सवाल खड़े हुए हैं।
इन आरोपों की वास्तविकता सामने लाने के लिए संबंधित वर्षों के निविदा दस्तावेज, स्वीकृति आदेश, तुलनात्मक दर-पत्रक, आपूर्तिकर्ताओं के बिल, भुगतान विवरण और स्टॉक रजिस्टर की जांच जरूरी होगी।
यह भी देखा जाना चाहिए कि खरीदी गई सामग्री वास्तव में प्राप्त हुई या नहीं, उसका वितरण किन लाभार्थियों को किया गया और दर्ज मात्रा का भौतिक सत्यापन उपलब्ध अभिलेखों से मेल खाता है या नहीं।
यदि खरीदी प्रक्रिया में अनियमितता पाई जाती है, तो उसकी प्रकृति और जिम्मेदारी निर्धारित कर नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
4.जैविक खेती मिशन: किसानों को निर्धारित सामग्री मिली या खरीद का दबाव बनाया गया..?
वर्ष 2021 से 2024 के बीच जैविक खेती मिशन के अंतर्गत स्वीकृत गतिविधियों और किसानों को मिलने वाली सुविधाओं को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि निर्धारित घटकों की सामग्री उपलब्ध कराने के बजाय कुछ किसानों को बैटरी चालित स्प्रेयर खरीदने के लिए बाध्य किया गया। इस प्रक्रिया में कथित कमीशनखोरी की आशंका भी व्यक्त की गई है।
इन आरोपों की जांच के लिए योजना की स्वीकृत शर्तों, लाभार्थियों की सूची, सामग्री वितरण पंजी, खरीद बिलों और किसानों के बयानों का मिलान किया जाना चाहिए। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि किसानों को सामग्री उपलब्ध कराने का निर्धारित तरीका क्या था और वास्तविक वितरण उसी के अनुरूप हुआ या नहीं।
यदि किसानों पर नियमों के विपरीत खरीद का दबाव बनाए जाने अथवा किसी प्रकार की अवैध राशि लिए जाने के प्रमाण मिलते हैं, तो संबंधित व्यक्तियों की भूमिका की जांच कर उचित कार्रवाई की जानी चाहिए।
5.प्रशिक्षण कार्यक्रमों के खर्च पर संदेह: उपस्थिति से लेकर बैंक भुगतान तक हो सत्यापन
कृषि विभाग की योजनाओं के अंतर्गत आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रमों और अन्य गतिविधियों के खर्च को लेकर भी शिकायत में गंभीर आरोप लगाए गए हैं। शिकायतकर्ता की ओर से ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी जितेंद्र पटेल, प्रभारी वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी बागबाहरा गंगाप्रसाद शरणागत तथा आत्मा योजना से जुड़े एक ऑपरेटर की भूमिका की जांच की मांग की गई है।
आरोप है कि प्रशिक्षण मद में कथित तौर पर फर्जी बिलों के माध्यम से शासकीय राशि का आहरण किया गया। हालांकि, इस संबंध में अंतिम निष्कर्ष दस्तावेजों और जांच के आधार पर ही निकाला जा सकता है।
प्रशासन को प्रशिक्षण की तिथियों, आयोजन स्थल, प्रतिभागियों की सूची, उपस्थिति रजिस्टर, भोजन एवं सामग्री के बिल, भुगतान स्वीकृति और बैंक लेन-देन का मिलान कराना चाहिए। यदि प्रशिक्षण वास्तव में आयोजित हुए थे, तो उनकी पुष्टि संबंधित प्रतिभागियों और उपलब्ध रिकॉर्ड से की जा सकती है।
सवाल सीधा है—यदि खर्च वास्तविक था, तो उसके समर्थन में रिकॉर्ड क्या कहते हैं? और यदि दस्तावेजों में विसंगति मिलती है, तो उसके लिए जिम्मेदार कौन होगा..?
6.LRP के मानदेय से कथित वसूली: डिजिटल लेन-देन की जांच की मांग
शिकायत का सबसे संवेदनशील पहलू परंपरागत कृषि विकास योजना के अंतर्गत कार्यरत एलआरपी यानी लोकल रिसोर्स पर्सन के मानदेय से कथित अवैध वसूली का आरोप है।
शिकायत के अनुसार, प्रति क्लस्टर लगभग 50 हजार रुपये के मानदेय से संबंधित भुगतान के बाद कुछ राशि वापस लिए जाने की आशंका जताई गई है। पूर्व विधायक ने इस संबंध में डिजिटल लेन-देन के स्क्रीनशॉट भी शिकायत के साथ संलग्न किए जाने का उल्लेख किया है।
शिकायत में प्रस्तुत विवरण के अनुसार, 3 नवंबर 2023 को फोनपे के माध्यम से जितेंद्र पटेल के नाम से दर्शाए गए खाते में 10 हजार रुपये और 5 हजार रुपये के दो अलग-अलग लेन-देन का उल्लेख है। इसके अलावा, 11 दिसंबर 2020 को राजेश कुमार मिर्धा और अन्य खातों में 25-25 हजार रुपये के दो पृथक यूपीआई लेन-देन का भी हवाला दिया गया है।
इन लेन-देन का उल्लेख शिकायत में होना अपने आप में अवैध वसूली का निर्णायक प्रमाण नहीं है। इसके लिए भुगतान का वास्तविक उद्देश्य, संबंधित खाताधारकों की भूमिका, धन के स्रोत और प्राप्ति, लेन-देन की परिस्थितियों तथा एलआरपी के बयानों की जांच आवश्यक होगी।
यदि डिजिटल साक्ष्य और अन्य दस्तावेज किसी गैरकानूनी लेन-देन की पुष्टि करते हैं, तो संबंधित व्यक्तियों की जिम्मेदारी तय करते हुए कानून के अनुरूप कार्रवाई की जानी चाहिए।
7.एक ही शाखा में लंबे समय तक पदस्थापना: कार्य-विभाजन और संपत्ति की जांच की मांग
पूर्व विधायक ने शिकायत में लंबे समय से एक ही कार्यालय या शाखा में कार्यरत कर्मचारियों की पदस्थापना और विभागीय जिम्मेदारियों की समीक्षा की मांग भी उठाई है।
शिकायत के अनुसार, एक ही कर्मचारी के पास वर्षों तक महत्वपूर्ण योजनाओं का प्रभार बने रहने से कार्यप्रणाली की पारदर्शिता और निगरानी को लेकर सवाल उत्पन्न होते हैं। इसी संदर्भ में संबंधित कर्मचारियों की पदस्थापना, कार्य-विभाजन, योजना संबंधी निर्णयों और वित्तीय जिम्मेदारियों की जांच की मांग की गई है।
शिकायत में संबंधित अवधि के दौरान अर्जित संपत्ति और वित्तीय लेन-देन की जांच कराने की मांग भी शामिल है। ऐसी जांच सक्षम प्राधिकारी द्वारा लागू नियमों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही की जानी चाहिए।
8.13 अक्टूबर 2025 का भारमुक्त आदेश: फिर भी जिला कार्यालय में काम करने का आरोप
जितेंद्र पटेल के संलग्नीकरण का मुद्दा प्रशासनिक जवाबदेही के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। उपलब्ध शिकायत विवरण के अनुसार, उप संचालक कार्यालय की ओर से 13 अक्टूबर 2025 को उन्हें भारमुक्त करने संबंधी आदेश जारी किए जाने का उल्लेख है। इसके बावजूद उनके जिला कार्यालय महासमुंद में कार्यरत बने रहने को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
इस मामले में सबसे पहले संबंधित आदेश की प्रमाणित प्रति, उसके पालन की स्थिति, कार्यमुक्ति की वास्तविक तारीख और उसके बाद जारी किसी संशोधित या स्थगन आदेश की जांच की जानी चाहिए।
यदि भारमुक्ति आदेश प्रभावी था और उसका पालन नहीं हुआ, तो यह स्पष्ट करना आवश्यक होगा कि ऐसा किन परिस्थितियों में हुआ और इसकी जिम्मेदारी किसकी थी। वहीं, यदि बाद में कोई वैधानिक आदेश जारी हुआ था, तो उसका विवरण भी सामने आना चाहिए।
9.किसानों के व्यवहार संबंधी आरोप: भारतीय किसान संघ ने भी उठाए सवाल
कृषि विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर किसानों के साथ कथित दुर्व्यवहार का मुद्दा भी सामने आया है। शिकायत विवरण के अनुसार, भारतीय किसान संघ की महासमुंद जिला इकाई से जुड़े किसानों ने उप संचालक कृषि F.R. कश्यप के व्यवहार पर आपत्ति जताते हुए जिला कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा है।
ज्ञापन में कौशल्या तिवारी, शोभ कुमार साहू, रूपेश कुमार, भेख लाल साहू, नेम लाल चंद्राकर, अश्वनी साहू, सोहन, चगन साहू, हेमंत साहू और कुंदन सहित अन्य किसानों के नामों का उल्लेख किया गया है।
किसानों की शिकायतों की निष्पक्ष सुनवाई होना जरूरी है। प्रशासन को संबंधित पक्षों के बयान लेकर यह स्पष्ट करना चाहिए कि कार्यालय में किसानों को किन समस्याओं का सामना करना पड़ा और शिकायतों के समाधान के लिए क्या कदम उठाए गए।
कृषि विभाग का काम किसानों को योजनाओं की जानकारी देना, तकनीकी सहायता उपलब्ध कराना और उनकी समस्याओं का समाधान करना है। ऐसे में किसानों के सम्मान और शिकायत निवारण की व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।
10.कृषि अधिकारियों के संगठन की नाराजगी,
आंदोलन की चेतावनी
ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी जितेंद्र पटेल को उनकी मूल पदस्थापना पिथौरा भेजने की मांग को लेकर कृषि कर्मचारियों के बीच भी असंतोष की बात सामने आई है।
शिकायत विवरण के अनुसार, छत्तीसगढ़ कृषि स्नातक शासकीय कृषि अधिकारी संघ और मैदानी कर्मचारियों की ओर से इस संबंध में मांग उठाई गई है। मांग पूरी नहीं होने की स्थिति में आंदोलन की चेतावनी दिए जाने का भी उल्लेख है।
यदि विभाग के भीतर पदस्थापना और कार्य-विभाजन को लेकर विवाद बढ़ता है, तो इसका असर मैदानी स्तर पर योजनाओं के क्रियान्वयन और किसानों को मिलने वाली सेवाओं पर पड़ सकता है। इसलिए प्रशासन को संबंधित आदेशों की स्थिति स्पष्ट करते हुए विवाद का नियमसम्मत समाधान निकालना चाहिए।
11.कलेक्टर के सामने प्रमुख सवाल: शिकायत पर अब तक क्या कार्रवाई हुई..?
पूर्व विधायक की शिकायत और विभागीय कार्यप्रणाली को लेकर उठे सवालों के बीच अब जिला प्रशासन की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। मामले में पारदर्शिता लाने के लिए निम्न बिंदुओं पर आधिकारिक जानकारी सामने आना जरूरी है—
FIR की मांग: उप संचालक F.R. कश्यप के विरुद्ध लगाए गए आरोपों की जांच किस स्तर पर है और कानूनी कार्रवाई के लिए क्या निर्णय लिया गया..?
वित्तीय परीक्षण: कृषि उपकरणों की खरीदी, दर निर्धारण और सामग्री वितरण के रिकॉर्ड का परीक्षण कराया गया है या नहीं..?
LRP भुगतान: शिकायत में उल्लिखित डिजिटल लेन-देन का सत्यापन हुआ है या नहीं? भुगतान का वास्तविक उद्देश्य क्या था..?
प्रशिक्षण व्यय: प्रशिक्षण कार्यक्रमों के बिल, उपस्थिति रजिस्टर और भुगतान विवरण का मिलान कराया गया है या नहीं..?
संलग्नीकरण: जितेंद्र पटेल के संबंध में 13 अक्टूबर 2025 को जारी भारमुक्ति आदेश का पालन हुआ या नहीं..?
किसानों की शिकायत: भारतीय किसान संघ के ज्ञापन पर क्या कार्रवाई की गई और शिकायतकर्ताओं को क्या जवाब दिया गया..?
जवाबदेही: जांच में अनियमितता पाए जाने पर संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों के विरुद्ध क्या कार्रवाई प्रस्तावित है..?
इन सवालों के जवाब केवल विभागीय स्पष्टीकरण से नहीं, बल्कि प्रमाणित दस्तावेजों, निष्पक्ष जांच और कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट होने से ही मिल सकेंगे।
धान खरीदी से पहले कृषि विभाग की कार्यप्रणाली पर निगाहें
धान खरीदी का मौसम नजदीक होने के साथ कृषि विभाग की प्रशासनिक व्यवस्था और मैदानी कार्यों का सुचारु संचालन बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। किसानों को समय पर तकनीकी मार्गदर्शन, योजनाओं का लाभ और विभागीय सहायता मिलना जरूरी है।
ऐसे समय में वित्तीय अनियमितताओं के आरोप, संलग्नीकरण को लेकर विवाद और किसानों की शिकायतें प्रशासन के लिए गंभीर चुनौती हैं। मामले की निष्पक्ष जांच से न केवल आरोपों की वास्तविकता सामने आएगी, बल्कि विभागीय कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही भी सुनिश्चित हो सकेगी।
अब निगाहें कलेक्टर विनय कुमार लंगेह और संबंधित विभागीय अधिकारियों के अगले कदम पर हैं।
क्या शिकायत में उठाए गए सवालों की स्वतंत्र जांच कराई जाएगी? क्या डिजिटल लेन-देन और वित्तीय रिकॉर्ड का सत्यापन होगा? क्या संलग्नीकरण आदेश की स्थिति सार्वजनिक की जाएगी? और क्या जांच में दोषी पाए जाने वालों पर नियमानुसार कार्रवाई होगी?
इन सवालों का जवाब आने वाले दिनों में इस पूरे प्रकरण की दिशा तय कर सकता है।
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