RTI के सवाल पर डॉ. सी.वी. रामन् विश्वविद्यालय का दो टूक जवाब: “स्ववित्तपोषित हैं, सूचना का अधिकार अधिनियम लागू नहीं” — अब कानूनी दायरे और जवाबदेही पर उठे सवाल

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RTI के सवाल पर डॉ. सी.वी. रामन् विश्वविद्यालय का दो टूक जवाब: “स्ववित्तपोषित हैं, सूचना का अधिकार अधिनियम लागू नहीं” — अब कानूनी दायरे और जवाबदेही पर उठे सवाल

प्रधान संपादक मयंक गुप्ता/ दिन सोमवार/ 21 सितम्बर 2026/
बिलासपुर / डॉ. सी.वी. रामन् विश्वविद्यालय, करगी रोड, कोटा, बिलासपुर में सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत मांगी गई जानकारी को लेकर विवाद सामने आया है। विश्वविद्यालय के उप कुलसचिव की ओर से जारी पत्र में कहा गया है कि विश्वविद्यालय निजी क्षेत्र का स्ववित्तपोषित शैक्षणिक संस्थान है और उसे केन्द्र सरकार, राज्य सरकार, यूजीसी अथवा किसी सरकारी संस्था से वित्तीय अनुदान या अन्य सहायता प्राप्त नहीं होती। इसी आधार पर विश्वविद्यालय ने स्वयं को RTI अधिनियम के दायरे से बाहर बताया है।

मामले में आवेदक की ओर से जनहित से जुड़ी सूचनाएं मांगते हुए निर्धारित प्रक्रिया के तहत आवेदन प्रस्तुत किया गया था। आवेदन के साथ ₹10 का भारतीय पोस्टल ऑर्डर भी लगाया गया था। लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन ने मांगी गई सूचना उपलब्ध कराने के बजाय आवेदन और पोस्टल ऑर्डर वापस कर दिया।

विश्वविद्यालय की ओर से जारी पत्र क्रमांक 2545/सू.अ./2026 में मूल रूप से यह पक्ष रखा गया है कि संस्थान स्ववित्तपोषित है और सरकारी वित्तीय सहायता प्राप्त नहीं करता, इसलिए वह RTI Act, 2005 के अंतर्गत नहीं आता।

राज्य अधिनियम के तहत स्थापित विश्वविद्यालय होने का पहलू

डॉ. सी.वी. रामन् विश्वविद्यालय की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार विश्वविद्यालय छत्तीसगढ़ के निजी विश्वविद्यालय संबंधी कानून के तहत संचालित है। विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर उपलब्ध दस्तावेज में भी इसे राज्य विधानमंडल के अधिनियम से स्थापित निजी विश्वविद्यालय बताया गया है। यूजीसी से संबंधित विश्वविद्यालय के उपलब्ध दस्तावेज में भी इसे राज्य विधानमंडल द्वारा स्थापित निजी विश्वविद्यालय तथा डिग्री प्रदान करने के लिए यूजीसी अधिनियम की धारा 22 के तहत सक्षम विश्वविद्यालय बताया गया है।

विश्वविद्यालय की वर्तमान वेबसाइट पर उसके बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट में राज्य सरकार द्वारा नामित सदस्यों का भी उल्लेख है। हालांकि, केवल किसी नियामक या नामित सदस्य की मौजूदगी से RTI लागू होने का स्वतः निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता; वास्तविक कानूनी स्थिति धारा 2(h) के परीक्षण और संस्था की वास्तविक संरचना एवं सरकारी नियंत्रण पर निर्भर करेगी।

RTI कानून वास्तव में क्या कहता है..?

सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 2(h) में “लोक प्राधिकारी” की परिभाषा दी गई है। इसमें संविधान, संसद या राज्य विधानमंडल के कानून से स्थापित या गठित निकायों के साथ-साथ सरकार के स्वामित्व, नियंत्रण अथवा पर्याप्त प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष वित्तीय सहायता प्राप्त करने वाले निकायों को भी शामिल किया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने Thalappalam Service Cooperative Bank Ltd. बनाम State of Kerala मामले में स्पष्ट किया कि केवल सरकारी निगरानी या सामान्य नियामक नियंत्रण किसी संस्था को स्वतः RTI के तहत “लोक प्राधिकारी” नहीं बना देता। सरकारी नियंत्रण और वित्तीय सहायता की प्रकृति एवं वास्तविकता महत्वपूर्ण होती है।

दूसरी ओर, निजी विश्वविद्यालयों को लेकर न्यायालयों के निर्णय पूरी तरह एक जैसे नहीं हैं। उदाहरण के तौर पर 6 जुलाई 2022 को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने Amity University के मामले में एक स्ववित्तपोषित निजी विश्वविद्यालय को, जो राज्य के निजी विश्वविद्यालय अधिनियम के तहत स्थापित था और सरकारी वित्तीय सहायता प्राप्त नहीं करता था, RTI के तहत “लोक प्राधिकारी” नहीं माना।

इसीलिए डॉ. सी.वी. रामन् विश्वविद्यालय के मामले में भी अंतिम कानूनी स्थिति का निर्धारण संबंधित सूचना आयोग या सक्षम न्यायिक मंच द्वारा विश्वविद्यालय की स्थापना, वैधानिक संरचना, सरकारी नियंत्रण, वित्तीय सहायता और मांगी गई सूचना की प्रकृति जैसे तथ्यों के आधार पर किया जाना अधिक उचित होगा।

सवाल सिर्फ RTI का नहीं, पारदर्शिता का भी

इस पूरे विवाद ने विश्वविद्यालयों की जवाबदेही और पारदर्शिता को लेकर बहस जरूर तेज कर दी है। विश्वविद्यालय हजारों विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा प्रदान करते हैं और उनकी डिग्रियों एवं प्रमाण-पत्रों का उपयोग रोजगार, आगे की पढ़ाई और विभिन्न प्रशासनिक प्रक्रियाओं में किया जाता है।

ऐसे में सवाल यह है कि यदि कोई नागरिक विश्वविद्यालय की मान्यता, पाठ्यक्रम, प्रशासनिक निर्णय, फीस, शैक्षणिक व्यवस्था अथवा अन्य सार्वजनिक महत्व की जानकारी मांगता है, तो वह जानकारी किस वैधानिक माध्यम से प्राप्त कर सकता है..?

यह भी महत्वपूर्ण है कि RTI अधिनियम के तहत हर मांगी गई सूचना स्वतः उपलब्ध कराना आवश्यक नहीं होता। अधिनियम में विभिन्न अपवाद और प्रतिबंध भी निर्धारित हैं। इसलिए किसी सूचना को देने से इनकार करने की स्थिति में उसके लिए लागू वैधानिक आधार और प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

विश्वविद्यालय के अपने दस्तावेज भी बने चर्चा का विषय

दिलचस्प बात यह है कि विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर RTI से संबंधित विषय को शैक्षणिक पाठ्यक्रम का हिस्सा भी दिखाया गया है। विश्वविद्यालय के उपलब्ध B.A. LL.B. पाठ्यक्रम दस्तावेज में Right to Information Act, 2005, लोकतंत्र में सूचना के अधिकार और लोक प्राधिकारियों के दायित्व जैसे विषय शामिल हैं।

ऐसे में यह मामला केवल एक RTI आवेदन और उसके जवाब तक सीमित न रहकर विश्वविद्यालयों की पारदर्शिता, जवाबदेही और वैधानिक स्थिति पर व्यापक चर्चा का विषय बन सकता है।

अब सूचना आयोग में उठ सकता है मामला

यदि आवेदक विश्वविद्यालय के जवाब से असंतुष्ट है, तो उपलब्ध कानूनी उपायों के तहत संबंधित सक्षम मंच के समक्ष इस निर्णय को चुनौती देने का रास्ता खुला रहता है। छत्तीसगढ़ में राज्य सूचना आयोग RTI से जुड़े मामलों के लिए वैधानिक संस्था है। बिलासपुर जिला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट भी छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग को RTI Act के तहत गठित संस्था के रूप में सूचीबद्ध करती है।

ऐसे में अब मुख्य प्रश्न यह होगा कि संबंधित सूचना आयोग विश्वविद्यालय की वैधानिक स्थिति और RTI Act की धारा 2(h) के प्रावधानों को किस प्रकार लागू करता है।

युवाओं से जुड़ा मुद्दा होने के कारण मामला महत्वपूर्ण

डॉ. सी.वी. रामन् विश्वविद्यालय स्वयं अपनी वेबसाइट पर राज्य अधिनियम के तहत स्थापित निजी विश्वविद्यालय होने तथा यूजीसी से मान्यता संबंधी दस्तावेज उपलब्ध कराता है।

इसलिए विवाद का केंद्र विश्वविद्यालय की डिग्रियों को सीधे “अवैध” या “अप्रामाणिक” बताना नहीं, बल्कि यह वैधानिक प्रश्न है कि क्या विश्वविद्यालय RTI Act की धारा 2(h) के तहत लोक प्राधिकारी है और यदि नहीं, तो सार्वजनिक महत्व की सूचनाओं तक नागरिकों की पहुंच का वैधानिक माध्यम क्या होगा..?

अब निगाहें संभावित प्रथम अपील/शिकायत तथा सूचना आयोग अथवा अन्य सक्षम प्राधिकारी के निर्णय पर रहेंगी। यदि मामला वहां पहुंचता है, तो विश्वविद्यालय की स्थापना संबंधी अधिनियम, सरकारी नियंत्रण, वित्तीय सहायता और सूचना की प्रकृति जैसे बिंदुओं पर विस्तृत परीक्षण हो सकता है।

फिलहाल विश्वविद्यालय की ओर से जारी पत्र में स्ववित्तपोषित होने और सरकारी वित्तीय सहायता नहीं मिलने को RTI लागू न होने का आधार बताया गया है। इस दावे की अंतिम वैधानिक व्याख्या संबंधित सक्षम प्राधिकारी अथवा न्यायालय द्वारा ही की जानी है।

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