महासमुंद में ‘पुनर्वास से पुनर्जीवन’ की मिसाल: 15 सशस्त्र माओवादियों ने छोड़ी हिंसा की राह, तिरंगे और संविधान के सामने किया आत्मसमर्पण

महासमुंद। छत्तीसगढ़ के सीमावर्ती महासमुंद जिले से एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक खबर सामने आई है। प्रतिबंधित संगठन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) से जुड़े 15 सशस्त्र माओवादियों ने आज महासमुंद पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण कर समाज की मुख्यधारा में लौटने का निर्णय लिया। यह आत्मसमर्पण केवल संख्या का मामला नहीं, बल्कि हिंसा से शांति की ओर बढ़ते कदम का प्रतीक माना जा रहा है।

9 महिलाएं और 6 पुरुष शामिल
आत्मसमर्पण करने वालों में 9 महिलाएं और 6 पुरुष शामिल हैं। सुरक्षा अधिकारियों का मानना है कि यह घटनाक्रम इस बात का संकेत है कि संगठन के भीतर भी अब बदलाव की सोच पनप रही है, विशेषकर महिला सदस्यों के बीच, जो हिंसात्मक गतिविधियों से अलग होकर सामान्य जीवन की ओर लौटना चाहती हैं।
“पूना मारगेम – पुनर्वास से पुनर्जीवन” अभियान का असर
इस पूरे प्रयास को “पूना मारगेम – पुनर्वास से पुनर्जीवन” नाम दिया गया है। यह अभियान संवाद, विश्वास और पुनर्वास की नीति पर आधारित है। पुलिस द्वारा लगातार चलाए गए जनजागरूकता कार्यक्रम, आकाशवाणी के माध्यम से संदेश, बैनर-पोस्टर और पाम्पलेट वितरण ने माओवादी सदस्यों तक शासन की पुनर्वास नीति की जानकारी पहुंचाई।
सूत्रों के अनुसार, ये सभी सदस्य ओडिशा राज्य कमेटी के पश्चिमी सब-जोन के अंतर्गत बरगढ़-बलांगीर-महासमुंद डिवीजन में सक्रिय थे। वर्ष 2010 के बाद गठित इस संरचना ने सीमावर्ती क्षेत्रों में कई घटनाओं को अंजाम दिया था। हालांकि, बीते कुछ समय से संगठन के भीतर असंतोष और कठिन परिस्थितियों के कारण सदस्य मुख्यधारा में लौटने को इच्छुक थे।
तिरंगा, संविधान और गुलाब से स्वागत
आत्मसमर्पण कार्यक्रम रक्षित केंद्र परसदा परिसर में आयोजित किया गया। इस दौरान समर्पण करने वाले सदस्यों को तिरंगा झंडा, संविधान की प्रति और लाल गुलाब भेंट कर सम्मानित किया गया। यह प्रतीकात्मक पहल शांति, विश्वास और नए जीवन की शुरुआत का संदेश देती है।
कठिन जंगल जीवन बना कारण
जानकारी के मुताबिक, जंगलों में लगातार दबाव, परिवार से दूरी, बीमारियों की समस्या और भविष्य की अनिश्चितता ने इन सदस्यों को आत्मचिंतन के लिए प्रेरित किया। शासन की आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति ने उन्हें सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन की राह दिखाई।
पश्चिमी सब-जोन का खात्मा
पुलिस अधिकारियों का दावा है कि इस आत्मसमर्पण के बाद ओडिशा स्टेट कमेटी का पश्चिमी सब-जोन पूरी तरह निष्क्रिय हो चुका है। साथ ही छत्तीसगढ़ के रायपुर पुलिस रेंज और ओडिशा के संबलपुर रेंज को भी नक्सल प्रभाव से मुक्त घोषित किए जाने की जानकारी दी गई है। इसे मार्च 2026 तक नक्सलवाद के समूल उन्मूलन के लक्ष्य की दिशा में एक अहम उपलब्धि माना जा रहा है।
पुनर्वास नीति के तहत मिलेगी सुविधाएं
शासन की आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति के अंतर्गत समर्पण करने वाले सदस्यों को पदानुसार प्रोत्साहन राशि, स्वास्थ्य सुविधा, आवास सहायता और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए जाएंगे। अधिकारियों का कहना है कि पूर्व में आत्मसमर्पण कर चुके कई सदस्य आज अपने परिवार के साथ सामान्य और सम्मानजनक जीवन व्यतीत कर रहे हैं, जो अन्य सक्रिय सदस्यों के लिए प्रेरणा बन रहे हैं।
बदलाव की नई दस्तक
महासमुंद से सामने आई यह घटना केवल 15 लोगों के आत्मसमर्पण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक परिवर्तन की ओर संकेत करती है जहां बंदूक की जगह संविधान को स्वीकार किया जा रहा है। सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति और विकास की संभावनाएं अब और मजबूत होती दिखाई दे रही हैं।
अब निगाहें बस्तर और ओडिशा के अन्य संवेदनशील इलाकों पर हैं — क्या वहां सक्रिय बचे हुए सदस्य भी इसी राह को चुनेंगे? फिलहाल महासमुंद में आज का दिन शांति और पुनर्वास की दिशा में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में दर्ज हो गया है।

