महासमुंद धान खरीदी घोटाला किसान की आत्महत्या की कोशिश से हड़कंप, 2304 क्विंटल शॉर्टेज पर प्रशासन की चुप्पी ने सुलगाई आग..!

रिपोर्टर मयंक गुप्ता
महासमुंद, 23 दिसंबर 2025: छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में किसानों की बदहाली की एक दिल दहला देने वाली कहानी सामने आ रही है। बागबाहरा ब्लॉक के दूरस्थ क्षेत्र में ओडिशा बॉर्डर से लगी प्राथमिक कृषि साख सहकारी समिति खेमडा (पंजीयन क्रमांक 1373) में समर्थन मूल्य पर धान खरीदी की प्रक्रिया में लगातार अनियमितताओं का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। हाल ही में मीडिया के औचक निरीक्षण से उजागर हुई दबंगई और लापरवाही की घटनाओं के बीच अब एक और चौंकाने वाला खुलासा हुआ है – एक किसान द्वारा आत्महत्या की कोशिश और पिछले साल की बड़ी गड़बड़ी पर प्रशासन की रहस्यमयी चुप्पी। यह सब मिलकर किसानों के हितों पर गहरा संकट पैदा कर रहा है, जहां मेहनतकश किसान अपनी फसल का सही दाम पाने के बजाय हताशा के शिकार हो रहे हैं।

यह सब वर्ष 2025-26 के धान खरीदी अभियान का हिस्सा है, जहां सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर किसानों से धान खरीदा जा रहा है। लेकिन खेमडा समिति में हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। मीडिया की टीम द्वारा किए गए अचानक जांच में पाया गया कि पुराने जूट के बारदानों में धान भरा जा रहा था, बिना किसी मार्किंग या उचित स्टैकिंग के। यह सरकारी नियमों का खुला उल्लंघन है, क्योंकि मार्किंग से बारदानों की ट्रैकिंग और धान की गुणवत्ता सुनिश्चित होती है। बिना इन प्रक्रियाओं के, धान की मात्रा में हेरफेर, गुणवत्ता की गिरावट और किसानों के भुगतान में धांधली की पूरी गुंजाइश बन जाती है। इससे न केवल किसानों का आर्थिक नुकसान होता है बल्कि पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं।
समिति प्रभारी जोगेंद्र साव से जब इस बारे में सवाल किया गया, तो उनका रवैया बेहद आक्रामक और असहयोगपूर्ण था। उन्होंने दावा किया कि जिला नोडल अधिकारी और कलेक्टर से कोई स्पष्ट निर्देश नहीं मिले हैं, और मार्किंग तभी की जाएगी जब ऊपर से आदेश आएंगे। सवालों पर उन्होंने धमकी भरे लहजे में कहा, “आपको क्या फर्क पड़ता है? जो करना है करो, मैं सिर्फ अपने अफसरों को रिपोर्ट करूंगा।” यह जवाब न सिर्फ मीडिया की जांच को चुनौती देता है बल्कि समिति में चल रही गड़बड़ियों को छिपाने की साजिश की ओर इशारा करता है। प्रभारी की यह मनमानी साफ बताती है कि यहां नियमों की बजाय व्यक्तिगत दबदबा चल रहा है, जो किसानों के लिए घातक साबित हो सकता है।
समिति के नए अध्यक्ष चंदू साहू का व्यवहार भी कम चौंकाने वाला नहीं था। फोन पर संपर्क करने पर उन्होंने रूखे अंदाज में पूछा, “आपका समिति से क्या लेना-देना है?” यह दुर्व्यवहार न केवल पारदर्शिता की कमी को उजागर करता है बल्कि सार्वजनिक संस्थाओं में जवाबदेही की कमी को भी सामने लाता है। ऐसी दबंगई से किसानों का विश्वास टूट रहा है, जो साल भर की मेहनत के बाद यहां फसल बेचने आते हैं।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। विगत कुछ दिनों में एक और दर्दनाक घटना घटी, जब किसान मनबोध गाड़ा ने हताशा में अपना गला रेतकर आत्महत्या की कोशिश की। यह घटना समिति की लापरवाही और किसानों पर पड़ रहे दबाव की चरम मिसाल है। सूत्रों के मुताबिक, मनबोध गाड़ा समिति की अनियमितताओं और भुगतान में देरी से इतने परेशान थे कि उन्होंने यह कदम उठाया। शुक्र है कि समय रहते उन्हें बचा लिया गया, लेकिन यह घटना प्रशासन की उदासीनता पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। क्या किसानों की जान की कीमत इतनी सस्ती है कि ऐसी घटनाएं नजरअंदाज की जा रही हैं?
और तो और, लापरवाही की हदें पार करते हुए पिछले साल 2024-25 सीजन में इसी समिति में 2304 क्विंटल धान का शॉर्टेज पाया गया था। यह कमी न केवल लाखों रुपयों के नुकसान का संकेत है बल्कि संभावित घोटाले की ओर भी इशारा करती है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि अब तक इस पर कोई ठोस कार्यवाही नहीं हुई। न जांच हुई, न दोषियों पर कार्रवाई। यह चुप्पी ऊपरी अधिकारियों की मिलीभगत की शंका को और मजबूत करती है। आखिर इतनी बड़ी गड़बड़ी पर सन्नाटा क्यों? क्या यह किसानों के साथ धोखा नहीं है?
मामले को जिला नोडल अधिकारी अविनाश शर्मा के सामने रखा गया, तो उन्होंने बस इतना कहा, “मैं बात कर ठीक करवाता हूं।” लेकिन यह वादा कितना खोखला है, यह समय बताएगा। क्या यह सिर्फ लीपापोती है या वास्तविक सुधार होगा? किसानों और स्थानीय लोगों में आक्रोश बढ़ रहा है, और वे तत्काल जांच की मांग कर रहे हैं।
यह पूरा प्रकरण महासमुंद जिले की कृषि सहकारी समितियों की सड़ी-गली व्यवस्था को उजागर करता है। सरकार को तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए – सख्त जांच, दोषियों पर कार्रवाई और डिजिटल सिस्टम से पारदर्शिता सुनिश्चित करनी चाहिए। किसानों की आवाज दबाने वाली यह दबंगई अब सहन नहीं की जा सकती। अगर जल्द कदम नहीं उठाए गए, तो छोटी घटनाएं बड़े आंदोलन का रूप ले सकती हैं, और किसानों की मेहनत पर पानी फिरने की यह साजिश और गहरा सकती है। प्रशासन जागो, वरना किसान की हताशा पूरे सिस्टम को हिला देगी!



