बेबाक पत्रकार मुकेश के हत्यारों को..! , फांसी दे - दो ...?...!!



सच का आईना दिखाने वाले पत्रकारों को या तो झूठे मामलों में फंसाया जाता है या फिर हत्या जैसी घिनौनी हरकत की जाती है।
रिपोर्टर मयंक गुप्ता
महासमुंद / बस्तर के दबंग पत्रकार मुकेश चंद्राकर की हत्या ने पूरे पत्रकार जगत को झकझोर कर रख दिया है। एक निर्भीक निडर पत्रकार की इस तरह से निर्मम हत्या से पूरे देश के पत्रकारों में आक्रोश है और पूरा पत्रकार जगत में पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग फिर से एक बार उठने लगी है। अघोषित रूप से संविधान के इस चौथे स्तंभ की जो दूर दशा आज देखने मिल रही है। इससे सभी पत्रकार आशंकित है कि यह पत्रकारों के साथ होने वाली जानलेवा घटना अब और कितने पत्रकारों के साथ घटित होगी।
बस्तर के दबंग पत्रकार मुकेश चंद्राकर की बस इतनी से गलती है कि उसने करोड़ों अरबों के एक घोटाले बाज के खिलाफ मुखर होकर घोटाले बाज के कारनामों को बड़े ही बेबाकी के साथ आम जनता तक पहुंचने का काम किया। जिसका नतीजा एक पत्रकार को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी है। छत्तीसगढ़ राज्य सरकार और विपक्ष के नेता एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाकर राजनीतिक रोटी सेकने के लिए फेस बुक, ट्यूटर और इंस्टाग्राम पर बैठ कर सिर्फ आरोप प्रत्यारोप कर रहे हैं।
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के पत्रकार आज राज्यपाल महोदय के दरवाजे पर पत्रकार सुरक्षा की मांग को लेकर ज्ञापन देने पहुंचे थे। जहां पत्रकारों को पुलिस वाले दरवाजे पर रोक लिए। पत्रकारों के लाख कोशिश के बाद भी राज्यपाल महोदय से ना तो मिलने दिया गया और ना ही पत्रकारों से ज्ञापन लिया गया।
इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि शासन प्रशासन पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर कितने संवेदनशील है।
गौरतलब है कि शासन प्रशासन के सहयोग के जनता की गाढ़ी कमाई पर रसोइए से अरबपति बने एक ठेकेदार ने सिर्फ पत्रकार मुकेश चंद्राकर की हत्या नहीं की है। उसने 140 करोड़ आबादी वाले लोकतांत्रिक देश के संविधान की हत्या की है। जहां भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले पत्रकारों की निर्मम हत्या कर उन्हें सेप्टिक टैंक में फेंक दिया जाता है फिर किसी झूठे ब्लैक मेलिंग के आरोप में थाने में केश दर्ज कर गिरफ्तार कर लिया जाता है।
निर्भीक पत्रकार मुकेश चंद्राकर की हत्या के बाद आज फिर से देश के पत्रकारों को एक मंच पर एक सूत्र में पत्रकार सुरक्षा की मांग को लेकर आवाज उठाते देखा जा रहा है। क्या ये आवाज सरकार की कान तक पहुंचेगी? क्या छत्तीसगढ़ राज्य के मुखिया अपनी संवेदनशीलता दिखाते हुए पत्रकारों की सुरक्षा की जवाबदेही तय करेंगे? कि हत्यारों पर कार्रवाई और उनके द्वारा किए गए बेजाकब्जा हटा कर स्वयं अपनी पीठ थपथपाने लगेंगे।

